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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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पाप का विनाश करने वाला यह हंस जब स्वर्ग की ओर गमन करता है तो इस के दोनों
पंख हजार दिनों तक फैले रहते हैं. यह सभी देवों को अपनी छाती पर बैठा कर सारे संसार
को देखता हुआ जाता है. (१८)
सत्येनोर्ध्वस्तपति ब्रह्मणा ऽ र्वाङ् वि पश्यति.
प्राणेन तिर्यङ् प्राणति यस्मिन्ज्येष्ठमधि श्रितम्.. (१९)
वह सत्य की सहायता से ऊपर तपता है तथा वेद मंत्रों के द्वारा नीचे की ओर देखता है.
वह प्राण वायु में तिरछी सांस लेता है, उसी में वह सब से महान परमात्मा स्थित है. (१९)
यो वै ते विद्यादरणी याभ्यां निर्मथ्यते वसु.
स विद्वान्ज्येष्ठं मन्येत स विद्याद् ब्राह्मणं महत्.. (२०)
जो उन दोनों अणियों को जानता है, जिस के द्वारा धन का मंथन किया जाता है, वही
विद्वान् परमात्मा को सब से महान मानता है और वही महान वेद मंत्रों को जानता है. (२०)
अपादग्रे समभवत् सो अग्रे स्व १ राभरत्.
चतुष्पाद् भूत्वा भोग्यः सर्वमादत्त भोजनम्.. (२१)
सब से पहले चरणहीन आत्मा उत्पन्न हुआ. उस ने आगे चल कर आनंद को अपने में
पूर्ण किया. उस ने चार चरणों वाला अर्थात् अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चतुर्वर्ग बन कर समस्त
भोजन को स्वीकार किया अर्थात् सारे भोग भोगे. (२१)
भोग्यो भवदथो अन्नमदद् बहु. यो देवमुत्तरावन्तमुपासातै सनातनम्..
(२२)
पहले भोग्य अर्थात् भोजन करने वाला उत्पन्न हुआ. इस के पश्चात उस ने बहुत सा अन्न
खाया. वही सनातन एवं श्रेष्ठ देव की उपासना करता है. वही भोग्य हुआ और अधिक मात्रा
में अन्न खाने लगा, जो सनातन एवं सर्वश्रेष्ठ देव परमात्मा की उपासना करता है. (२२)
सनातनमेनमाहुरुताद्य स्यात् पुनर्भवः.
अहोरात्रे प्र जायेते अन्यो अन्यस्य रूपयोः.. (२३)
इस सूर्य को सनातन कहा गया है. वह आज भी पुनः नवीन है. उसी परमात्मा से दिन
और रात उत्पन्न होते हैं जो एकदूसरे से भिन्न रूप वाले हैं. (२३)
शतं सहस्रमयुतं न्यर्बुदमसंख्येयं स्वमस्मिन् निविष्टम्.
तदस्य घ्न्त्यभिपश्यत एव तस्माद् देवो रोचत एष एतत्.. (२४)
सौ, एक हजार, दस हजार, एक अरब एवं अनगिनती दिवस इसी सूर्य में व्याप्त हैं. वे
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