अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextजो शतौदना गौ का पालन करता है, वह अपनी कामनाएं पूर्ण करता है. उस के संतुष्ट
हुए सभी ऋत्विज् जहां से आते हैं, वहीं चले जाते हैं. (४)
स स्वर्गमा रोहति यत्रादस्त्रिदिवं दिवः.
अपूपनाभिं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्... (५)
वह उस स्वर्ग में पहुंचता है जो अंतरिक्ष में स्थित है तथा जो पुए बना कर शतौदना गौ
को देता है. (५)
स तांल्लोकान्त्समाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवाः.
हिरण्यज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्.. (६)
जो स्वर्ण से अलंकृत कर के शतौदना गौ का दान करता है, वह उन लोकों को प्राप्त
करता है, जो दिव्य एवं पार्थिव अर्थात् पृथ्वी से संबंधित हैं. (६)
ये ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः.
ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति मैभ्यो भैषीः शतौदने.. (७)
हे शतौदना गौ! तेरी शांति करने वाले एवं तेरे पालन कर्ता तेरे रक्षक होंगे. तू उन से
भयभीत मत हो. (७)
वसवस्त्वा दक्षिणत उत्तरान्मरुतस्त्वा.
आदित्याः पश्चाद् गोप्स्यन्ति साग्निष्टोममति द्रव.. (८)
हे शतौदना गौ! आठ वसु, दक्षिण की ओर, उनचास मरुत् उत्तर की ओर तथा आदित्य
पीछे से तेरी रक्षा करेंगे. तू अग्निष्टोम यज्ञ के पार जा. (८)
देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये.
ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति सातिरात्रमति द्रव.. (९)
हे शतौदना गौ! देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, और अप्सराएं—ये सभी तेरी रक्षा करेंगे. तू
अतिशय नामक यज्ञ कर्म के पार जा. (९)
अन्तरिक्षं दिवं भूमिमादित्यान् मरुतो दिशः.
लोकान्त्स सर्वान्नाप्नोति यो ददाति शतौदनाम्.. (१०)
जो शतौदना गौ का दान करता है, वह अंतरिक्ष को, स्वर्ग को, भूमि को, आदित्यों को,
मरुतों को, दिशाओं को तथा सभी लोकों को प्राप्त करता है. (१०)
घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति.
पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीर्दिवं प्रेहि शतौदने.. (११)
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