अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextको जन्म दे. ब्राह्मणों ने उसी को वशा का बंधु निश्चित किया. (२३)
युध एकः सं सृजति यो अस्या एक इद् वशी.
तरांसि यज्ञा अभवन् तरसां चक्षुरभवद् वशा.. (२४)
एक योद्धा इस के समीप आता है, जो एक मात्र एक गौ को वश में करने वाला है. यज्ञ
ही पार करने वाले बने. वशा गौ ही पार करने वालों की आंख बनी. अर्थात् वशा गौ के पीछे
चल कर ही सब ने दुःख को पार किया. (२४)
वशा यज्ञं प्रत्यगृह्णाद् वशा सूर्यमधारयत्.
वशायामन्तरविशदोदनो ब्रह्मणा सह.. (२५)
वशा गौ ने यज्ञ को स्वीकार किया तथा सूर्य को धारण किया. ब्रह्म अर्थात् ज्ञान के साथ
ओदन अर्थात् भात वशा गौ में प्रविष्ट हुआ. (२५)
वशामेवामृतमाहुर्वशां मृत्युमुपासते.
वशेदं सर्वमभवद्देवा मनुष्या ३ असुराः पितर ऋषयः.. (२६)
वशा गौ को ही अमृत कहा गया है. मृत्यु समझ कर भी वशा गौ की उपासना की जाती
है. वशा ही यह सब हुई जैसे—देव, मनुष्य, असुर, पितर और ऋषि. (२६)
य एवं विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्.
तथा हि यज्ञः सर्वपाद् दुहे दात्रे ऽ नपस्फुरन्.. (२७)
जो इस बात को जानता है, वही वशा गौ का दान स्वीकार करेगा. यश सभी चरणों से
गति करता हुआ अर्थात् स्थिर हो कर वशा गौ का दान देने वाले को सभी पुण्य फल प्रदान
करता है. (२७)
तिस्रो जिह्वा वरुणस्यान्तर्दीद्यत्यासनि.
तासां या मध्ये राजति सा वशा दुष्प्रतिग्रहा.. (२८)
वरुण के मुख में तीन जिह्वाएं दीप्त हैं. उन के मध्य में जो विराजमान है, वही वशा है.
उस को दान के रूप में स्वीकार करना कठिन काम है. (२८)
चतुर्धा रेतो अभवद् वशायाः.
आपस्तुरीयममृतं तुरीयं यज्ञस्तुरीयं पशवस्तुरीयम्.. (२९)
वशा गौ का वीर्य अर्थात् बल चार भागों में विभाजित हुआ. जल, अमृत, यज्ञ और पशु
उस के चौथे भाग हैं. (२९)
वशा द्यौर्वशा पृथिवी वशा विष्णुः प्रजापतिः.
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