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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 572 of 1063

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Page 572

तस्मात् ते वृत्रहा पयः क्षीरं क्रुद्धो हरद् वशे.. (१०)
हे वशा गौ! जब तू अनुकूल बन कर इंद्र के समीप जाती है, तब बैल तुझे समीप से
बुलाता है. इस कारण इंद्र क्रोधित हो कर तेरे मधुर दूध को दुहता है. (१०)
यत् ते क्रुद्धो धनपतिरा क्षीरपहरद् वशे. इदं तदद्य नाकस्त्रिषु पात्रेषु
रक्षति.. (११)
हे वशा गौ! जब क्रोध में भरा हुआ धनपति अर्थात् कुबेर तेरा दूध लेता है, तो उसे स्वर्ग
तीन पात्रों में सुरक्षित रखता है. (११)
त्रिषु पात्रेषु तं सोममा देव्य हरद् वशा.
अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये.. (१२)
जहां दीक्षा धारण करने वाला अथर्ववेदी यजमान स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठा
था, वहां दिव्य गुणों वाली वशा गौ ने तीन पात्रों में सोमरस को भर दिया. (१२)
सं हि सोमेनागत समु सर्वेण पद्धता.
वशा समुद्रमध्यष्ठाद् गन्धर्वैः कलिभिः सह.. (१३)
वह वशा गौ चरणों वाले सभी मनुष्यों के साथ सोमरस ले कर आई. वह गौ कलह करने
वाले गंधर्वों के साथ सागर में प्रतिष्ठा पाती रही. (१३)
सं हि वातेनागत समु सर्वैः पतत्रिभिः.
वशा समुद्रे प्रानृत्यदृचः सामानि बिभ्रती.. (१४)
ऋचाओं और सामवेद के मंत्रों को धारण करती हुई वशा गौ सभी पक्षियों के साथ वायु
के पास गई और सागर पर नृत्य करने लगी. (१४)
सं हि सूर्येणागत समु सर्वेण चक्षुषा.
वशा समुद्रमत्यख्यद् भद्रा ज्योतींषि बिभ्रती.. (१५)
सभी नेत्रों के साथ वशा गौ सूर्य से मिली. कल्याणकारिणी उस गौ ने प्रकाश को धारण
करते हुए सागर से भी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की. (१५)
अभीवृता हिरण्येन यदतिष्ठ ऋतावरि.
अश्वः समुद्रो भूत्वा ऽ ध्यस्कन्दद् वशे त्वा.. (१६)
हे ऋतावरी अर्थात् अधिक मात्रा में दूध देने वाली गौ! तू जब सोने के आभूषणों से
ढकी हुई खड़ी थी, तो हे वशा गौ! सागर घोड़ा बन कर अर्थात् घोड़े के समान तेज चाल से
तेरे समीप आ गया था. (१६)
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