अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextक्रोडौ ते स्तां पुरोडाशावाज्येनाभिघारितौ.
तौ पक्षौ देवि कृत्वा सा पक्तारं दिवं वह.. (२५)
हे शतौदना गौ! तेरे पिछले दोनों भाग घी से सिंचित हैं एवं पुरोडाश हैं. हे देवी! उन्हें
पंख बना कर तू पालनकर्ता को स्वर्ग में ले जा. (२५)
उलूखले मुसले यश्च चर्मणि यो वा शूर्पे तण्डुलः कणः.
यं वा वातो मातरिश्वा पवमानो ममाथाग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (२६)
जो ओखली और मूसल हैं, जो चमड़े, जो सूप, चावल और चावलों के टूटे हुए भाग हैं
तथा जिन को पवित्र करने वाली वायु ने मथा है, उन्हें होता अग्नि की उत्तम आहुति बनाएं.
(२६)
अपो देवीर्मधुमतीर्घृतश्रुतो ब्रह्मणां हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि.
यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हं तन्मे सर्वं सं पद्यतां वयं स्याम पतयो
रयीणाम्.. (२७)
मधु से युक्त एवं घी टपकाने वाले जल हम ब्राह्मणों के हाथों में अलग-अलग डालते हैं.
जिस कामना से हम ब्राह्मणों के हाथों को धुलाते हैं, हमारी वह कामना पूर्ण हो तथा हम धनों
के स्वामी बनें. (२७)
सूक्त-१० देवता—वशा गौ
नमस्ते जायमानायै जाताया उत ते नमः.
बालेभ्यः शफेभ्यो रूपाया ऽ घ्न्ये ते नमः.. (१)
हे हिंसा न करने योग्य गौ! तुझ जन्म लेती हुई को एवं उत्पन्न होती हुई को नमस्कार है.
तेरे बालों के लिए, खुरों के लिए तथा रूप के लिए नमस्कार है. (१)
यो विद्यात् सप्त प्रवतः सप्त विद्यात् परावतः.
शिरो यज्ञस्य यो विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्.. (२)
जो वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को
जानता हो तथा यज्ञ का शीश जानता हो, वही वशा गौ का दान स्वीकार करे. (२)
वेद़ाहं सप्त प्रवतः सप्त वेद परावतः.
शिरो यज्ञस्याहं वेद सोमं चास्यां विचक्षणम्.. (३)
मैं वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को
जानता हूं. मैं यज्ञ के शीश को जानता हूं तथा वशा गौ में होने वाले प्रकाशशील सोम को भी
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