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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 578 of 1063

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Page 578

हे वीर अध्वर्यु! अपने हाथ में उत्तम कर्म वाले उलूखल और मूसल नाम के दो पत्थर
ग्रहण करो. प्रसिद्ध एवं यज्ञ के योग्य देव तुम्हारे यज्ञ में आए हैं. हे यजमान! तू यज्ञ कर्म की
समृद्धि, सांसारिक सुखों की समृद्धि और परलोक की समृद्धि— इन तीन वरों की कामना
करता है. मैं इस यज्ञ के द्वारा इन तीन समृद्धियों की साधना करता हूं. (१०)
इयं ते धीतिरिदमु ते जनित्रं गृह्णातु त्वामदितिः शूरपुत्रा.
परा पुनीहि य इमां पृतन्यवो ऽ स्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (११)
हे सूप! चावलों से भूसी को अलग करना तेरा कार्य है और यही तेरे जन्म का कारण है.
शूर पुत्रों वाली देवमाता अदिति इस कार्य के लिए तुझे हाथ में लें. जो शत्रु इस पत्नी की हिंसा
करने के लिए सेना ले कर आए हैं, उन की हिंसा करने के लिए तू चावलों से भूसी को अलग
कर. तू इस पत्नी के लिए वीर पुत्रों एवं पौत्रों से युक्त धन अधिक मात्रा में प्रदान कर. (११)
उपश्वसे द्रुवये सीदता यूयं वि विच्यध्वं यज्ञियासस्तुषैः.
श्रिया समानानति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि.. (१२)
हे चावलों! मैं स्थिर एवं उत्तम फल वाले कर्म के निमित्त तुम्हें अधिक बना रहा हूं.
इसीलिए तुम सूप में बैठ जाओ. यज्ञ में उपयोग के योग्य तुम भूसी से अलग हो जाओ. हम
भी तुम्हारे कारण उत्पन्न संपत्ति से अपने समान जन्म वाले पुरुषों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो जाएं
और द्वेष करने वाले शत्रुओं को अपने पैरों में गिराएं. (१२)
परेहि नारि पुनरेहि क्षिप्रमपां त्वा गोष्ठो ऽ ध्यरुक्षद् भराय.
तासां गृह्णीताद् यतमा यज्ञिया असन् विभाज्य धीरीतरा जहीतात्.. (१३)
हे नारी! तू मुझ से विमुख हो कर जल भरने जा और जल ले कर शीघ्र लौट आ. उस
समय गायों के जल पीने का जलाशय जल भरने के हेतु तेरे शीष पर चढ़े अर्थात् उस
जलाशय से जल ले कर तू जल पात्र सिर पर रख ले. जलाशय के जलों में जो जल यज्ञ के
योग्य हैं, उन्हें ग्रहण करना. हे बुद्धिमती! तू यज्ञ के योग्य जलों को अलग कर के त्याग देना.
(१३)
एमा अगुर्योषितः शुम्भमाना उत्तिष्ठ नारि तवसं रभस्व.
सुपत्नी पत्या प्रजया प्रजावत्या त्वागन् यज्ञः प्रति कुम्भं गृभाय.. (१४)
हे पत्नी! शोभन अलंकारों से युक्त ये नारियां जल भरने के लिए आ गई हैं. तू भी उठ
कर जल भरने के लिए तैयार हो जा. तू उत्तम पति के कारण श्रेष्ठ पत्नी एवं संतान के कारण
प्रजावती है. यज्ञ तुझे जल के रूप में प्राप्त हुआ है. तू जल से भरा हुआ घड़ा ले कर आ जा.
(१४)
ऊर्जो भागो निहितो यः पुरा व ऋषिप्रशिष्टाप आ भरैताः.
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