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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 566 of 1063

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Page 566

प्रवेश नहीं करते. (४२)
पुण्डरीकं नवद्वारं त्रिभिर्गुणेभिरावृतम्.
तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः.. (४३)
नौ द्वारों वाला कमल तीनों अर्थात् रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण से घिरा हुआ है.
उस में जो आत्मा वाला दिव्य दल है, उसे ब्रह्मज्ञानी जानते हैं. (४३)
अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः.
तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम्.. (४४)
वह परमात्मा कामना रहित, धीर, मरण रहित, स्वयं उत्पन्न होने वाला तथा रस से तृप्त
है. वह कहीं से भी कम नहीं है अर्थात् सर्वथा पूर्ण है. उसी धीर, जरा अर्थात् वृद्धावस्था से
रहित तथा युवा आत्मा को जानने वाला मृत्यु से नहीं डरता. (४४)
सूक्त-९ देवता—शतौदना गौ
अघायतामपि नह्या मुखानि सपत्नेषु वज्रमर्पयैतम्.
इन्द्रेण दत्ता प्रथमा शतौदना भ्रातृव्यघ्नी यजमानस्य गातुः.. (१)
यह धेनु पापियों के मुखों को बंद करे और शत्रुओं पर इस वज्र को गिराए. इंद्र के द्वारा
दी हुई यह सब से पहली शतौदना गाय शत्रु विनाशिनी एवं यजमान का मार्गदर्शन करने वाली
है. (१)
वेदिष्टे चर्म भवतु बर्हिर्लोमानि यानि ते.
एषा त्वा रशनाग्रभीद् ग्रावा त्वैषो ऽ धि नृत्यतु.. (२)
हे शतौदना गौ! तेरे रोम कुशों के रूप में हैं और यज्ञ वेदी तेरा चर्म है. यह रस्सी तुझे
बांध रही है. यह पत्थर तेरे ऊपर नृत्य करे. (२)
बालास्ते प्रोक्षणीः सन्तु जिह्वा सं मार्ष्ट्वर्घ्ये.
शुद्धा त्वं यज्ञिया भूत्वा दिवं प्रेहि शतौदने.. (३)
हे हिंसा के अयोग्य गौ! तेरे बाल यज्ञ का प्रोक्षणी नामक पात्र बनें तथा तेरी जीभ यज्ञ
वेदी का मार्जन करे अर्थात् सफाई करे. हे शतौदना गौ! तू इस प्रकार शुद्ध और यज्ञ के योग्य
बन कर स्वर्ग को गमन कर. (३)
यः शतौदनां पचति कामप्रेण स कल्पते.
प्रीता ह्यस्यार्त्विजः सर्वे यन्ति यथायथम्.. (४)
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