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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages
Page 489Permalink

अज ने सब से पहले व्यतिक्रमण किया तो उस का पेट भूमि, पीठ द्यौ, अंतरिक्ष मध्य
भाग, पसलियां दिशाएं और कोखें सागर हुईं. (२०)
सत्यं चर्तं च चक्षुषी विश्वं सत्यं श्रद्धा प्राणो विराट् शिरः.
एष वा अपरिमितो यज्ञो यदजः पञ्चौदनः.. (२१)
अज के नेत्र सत्य और ऋत हुए, प्राण श्रद्धा हुए एवं शीश विराट् हुआ. इस प्रकार वह
अज वास्तव में विश्व हुआ. यह पंचौदन रूपी अज असीमित यज्ञ है. (२१)
अपरिमितमेव यज्ञमाप्नोत्यपरिमितं लोकमव रुन्द्धे.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२२)
जो यजमान दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह यज्ञ के
असीमित फल को प्राप्त करता है तथा अपरिमित लोकों का उद्घाटन करता है. (२२)
नास्यास्थीनि भिन्द्यान्न मज्ज्ञो निर्धयेत्.
सर्वमेनं समादायैदमिदं प्र वेशयेत्.. (२३)
न तो इस अज की हड्डियों को तोड़े और न इस की मज्जा अर्थात् चरबी को धोए. इसे
पूर्ण रूप से ले कर यह कहे कि मैं इस में प्रवेश करता हूं. (२३)
इदमिदमेवास्य रूपं भवति तेनैनं सं गमयति.
इषं मह ऊर्जमस्मै दुहे यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२४)
उस का रूप यही है. इसी से वह हम को फल प्राप्त कराता है. जो दक्षिणा से प्रकाशित
अज का पंचौदन के रूप में दान करता है, वह अज दानकर्ता को अन्न के साथ बल प्रदान
करता है. (२४)
पञ्च रुक्मा पञ्च नवानि वस्त्रा पञ्चास्मै धेनवः कामदुघा भवन्ति.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२५)
जो दक्षिणा से प्रकाशित होते हुए अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, उस को
पांच स्वर्ण मुद्राएं, पांच नवीन वस्त्र और इच्छानुसार दूध देने वाली पांच गाएं प्राप्त होती हैं.
(२५)
पञ्च रुक्मा ज्योतिरस्मै भवन्ति वर्म वासांसि तन्वे भवन्ति.
स्वर्गं लोकमश्नुते यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२६)
जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, वह स्वर्गलोक का
भोग करता है. उसे चमकती हुई पांच स्वर्ण मुद्राएं तथा शरीर पर वस्त्र और कवच प्राप्त होते

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हैं. (२६)
या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते ऽ परम्.
पञ्चौदनं च तावजं ददातो न वि योषतः.. (२७)
जो स्त्री पूर्व पति को वाग्दान के रूप में जान कर भी अन्य पुरुष को प्राप्त कर लेती है,
वे दोनों पंचौदन के रूप में अज का दान करने से कभी अलग नहीं होते. (२७)
समानलोको भवति पुनर्भूव ऽ परः पतिः.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२८)
जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, वह पुनर्विवाहिता के
साथ समान लोकों में निवास करता है. (२८)
अनुपूर्ववत्सां धेनुमनड्वाहमुपबर्हणम्.
वासो हिरण्यं दत्त्वा ते यन्ति दिवमुत्तमाम्.. (२९)
जो स्वर्ण के तारों से कढ़े हुए वस्त्रों सहित उपबर्हण अर्थात् गर्भाधान समर्थ बैल और
प्रतिवर्ष बछड़ा देने वाली गाय का दान करते हैं, वे उत्तम स्वर्ग में जाते हैं. (२९)
आत्मानं पितरं पुत्रं पौत्रं पितामहम्.
जायां जनित्रीं मातरं ये प्रियास्तानुप ह्वये.. (३०)
मैं अपनेआप को, पिता को, पुत्र को, पौत्र को, बाबा को, पत्नी तथा जन्म देने वाली
माता को एवं समस्त प्रियजनों को बुलाता हूं. (३०)
यो वै नैदाघं नामर्तुं वेद.
एष वै नैदाघो नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३१)
जो नैदाघ अर्थात् ग्रीष्म नाम की ऋतु को जानता है, वह कहता है—“यह जो पंचौदन
के रूप वाला अज है, वही नैदाघ नामक ऋतु है. जो दक्षिणा से प्रकाश युक्त अज को पंचौदन
के रूप में दान करता है, वह अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है.” (३१)
यो वै कुर्वन्तं नामर्तुं वेद.
कुर्वतींकुर्वतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वै कुर्वन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३२)
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जो कुर्वती नामक ऋतु को निश्चित रूप से जानता है, वह कुर्वती का ज्ञान करता हुआ
भी अप्रिय शत्रुओं तथा बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है. यह जो कुर्वती नाम की ऋतु है, वह
पंचौदन रूप अज ही है. यह जानने वाला व्यक्ति अपने अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य
को अपनी शक्ति से जला डालता है तथा दक्षिणा से प्रकाशित होते हुए अज को पंचौदन के
रूप में दान करता है. (३२)
यो वै संयन्तं नामर्तुं वेद. संयतींसंयतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वै संयन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३३)
जो संयती नामक ऋतु को निश्चित रूप से जानता है, वह समझता है कि यह पंचौदन
रूप अज है, वही संयंती नाम की ऋतु है. जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप
में दान करता है, वह अपने अप्रिय वस्तुओं तथा बांधवों के ऐश्वर्य को अपने बल से जला देता
है. (३३)
यो वै पिन्वन्तं नामर्तुं वेद.
पिन्वतींपिन्वतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वै पिन्वन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो३जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३४)
जो पिन्वंती नाम की ऋतु को जानता है, वह पिन्वंती को जानता हुआ ही अप्रिय शत्रुओं
एवं बांधवों के ऐश्वर्य को ग्रहण करता है. यह जो पंचौदन रूप अज है, यही पिन्वंती नाम की
ऋतु है. जो पुरुष दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह अपने अप्रिय
शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को अपनी शक्ति से जला देता है. (३४)
यो वा उद्यन्तं नामर्तुं वेद.
उद्यतीमुद्यतीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वा उद्यन्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३५)
जो उद्यंती नाम की ऋतु को जानता है, वह अपने अप्रिय शत्रुओं और बांधवों की
संपत्ति को ग्रहण करता है. वह समझता है कि यह पंचौदन रूप अज ही उद्यंती नाम की ऋतु
है. जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह अपने अप्रिय शत्रुओं एवं
बांधवों के ऐश्वर्य को अपने तेज से जला डालता है. (३५)
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यो वा अभिभुवं नामर्तुं वेद.
अभिभवन्तीमभिभवन्तीमेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियमा दत्ते.
एष वा अभिभूर्नामर्तुर्यदजः पञ्चौदनः.
निरेवाप्रियस्य भ्रातृव्यस्य श्रियं दहति भवत्यात्मना.
यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (३६)
जो अभिभवंती नाम की ऋतु को जानता है, वह अभिभवंती ऋतु को जानता हुआ ही
अपने अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को छीन लेता है. यह अभिभू नाम की ऋतु ही
पंचौदन रूप अज है. जो दक्षिणा से प्रकाशित पंचौदन रूप अज का दान करता है, वह अपने
अप्रिय शत्रुओं और बांधवों के ऐश्वर्य को अपने तेज से जला देता है. (३६)
अजं च पचत पञ्च चौदनान्.
सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीः सान्तर्देशाः प्रति गृह्णन्तु त एतम्.. (३७)
पंचौदन रूप अज को पकाओ. अंतर्दिशाओं के सहित दिशाएं एकमत हो कर अंतर्देशों
सहित उसे ग्रहण करे. (३७)
तास्ते रक्षन्तु तव तुभ्यमेतं ताभ्य आज्यं हविरिदं जुहोमि.. (३८)
वे सभी दिशाएं मेरे यज्ञ की रक्षा करें. उन के लिए मैं यह हवि देता हूं. (३८)
सूक्त-६ देवता—अतिथि, विद्या
यो विद्याद् ब्रह्म प्रत्यक्षं परूंषि यस्य संभारा ऋचो यस्यानूक्यम्.. (१)
जो ब्रह्म को प्रत्यक्ष रूप में जानता है, उस की गांठें ही संभार हैं तथा ऋचाएं उस का
अनूक्य हैं. (१)
सामानि यस्य लोमानि यजुर्हृदयमुच्यते परिस्तरणमिद्धविः.. (२)
सामवेद के मंत्र जिस के रोम हैं और परिस्तरण जिस का हवि है. (२)
यद् वा अतिथिपतिरतिथीन् प्रतिपश्यति देवयजनं प्रेक्षते.. (३)
अथवा जो अतिथियों का स्वामी और अतिथियों को देखता है, वह देव यज्ञ को ही
देखता है. (३)
यदभिवदति दीक्षामुपैति यदुदकं याचत्यपः प्र णयति.. (४)
अतिथि से जो बोलता है, वही दीक्षा है. जल की याचना ही उस को लाना है. (४)
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या एव यज्ञ आपः प्रणीयन्ते ता एव ताः.. (५)
जिन्हें यज्ञ में लाया जाता है, ये वे ही जल हैं. (५)
यत् तर्पणमाहरन्ति य एवाग्नीषोमीयः पशुर्बध्यते स एव सः.. (६)
जो तर्पण को लाते हैं, वही अग्नि सोमीय तर्पण है. जो यज्ञ में पशु का वध किया जाता
है, वही वह है. (६)
यदावसथान् कल्पयन्ति सदोहविर्धानान्येव तत् कल्पयन्ति.. (७)
जो टखनों की कल्पना करता है, वही मानो हवि धान्य का निर्माण है. (७)
यदुपस्तृणन्ति बर्हिरेव तत्.. (८)
जिन्हें उपस्तरण कहते हैं, वे ही कुश हैं. (८)
यदुपरिशयनमाहरन्ति स्वर्गमेव तेन लोकमव रुन्ध्दे.. (९)
जो उपरिशयन का आहरण करते हैं, उस से स्वर्गलोक का उद्घाटन करते हैं. (९)
यत् कशिपूपबर्हणमाहरन्ति परिधय एव ते.. (१०)
जो कशिपु उपबर्हण को लाते हैं, वे ही यज्ञ की परिधियां हैं. (१०)
यदाञ्जनाभ्यञ्जनमाहरन्त्याज्यमेव तत्.. (११)
जो कशिपु उपबृंहण लाते हैं, वे ही आज्य हैं. (११)
यत् पुरा परिवेशात् खादमाहरन्ति पुरोडाशावेव तौ.. (१२)
जो सामने परोसने के लिए खाद्य पदार्थ लाते हैं, वे ही पुरोडाश हैं. (१२)
यदशनकृतं ह्वयन्ति हविष्कृतमेव तद्ध्वयन्ति.. (१३)
भोजन के हेतु जो आमंत्रित करते हैं, वही हवि स्वीकार करने के लिए आह्वान है. (१३)
ये व्रीहयो यवा निरुप्यन्तें ऽ शव एव ते.. (१४)
जो धान और जौ निरूपित किए जाते हैं, वे ही सोम हैं. (१४)
यान्युलूखलमुसलानि ग्रावाण एव ते.. (१५)
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जो उलूखल अर्थात् ओखली और मूसल हैं, वे ही पत्थर हैं. (१५)
शूर्पं पवित्रं तुषा ऋजीषाभिषवणीरापः.. (१६)
सूप ही पवित्र छन्ना है, भूमि ऋजीषा है और अभिषवणी ही जल है. (१६)
स्रुग् दुर्विर्नेक्षणमायवनं द्रोणकलशाः कुम्भ्यो वायव्यानि
पात्राणीयमेव कृष्णाजिनम्.. (१७)
सुवा ही दर्वी अर्थात् करछुली हैं, शुद्ध करना ही आयवन है, द्रोण कलश ही घड़ा है,
वायव्य पात्र ही कृष्णाजिन अर्थात् काले मृग का चर्म है. (१७)
सूक्त-७ देवता—अतिथि, विद्या
यजमानब्राह्मणं वा एतदतिथिपतिः कुरुते
यदाहार्याणि प्रेक्षत इदं भूया ३ इदा ३ मिति.. (१)
जो यजमान को अथवा ब्राह्मण को अतिथि पति अर्थात् अतिथि का पालन करने वाला
बनता है, वह आहार्य अर्थात् यज्ञ संबंधी द्रव्य को देखता हुआ कहता है कि यह होना चाहिए.
(१)
यदाह भूय उद्धरेति प्राणमेव तेन वर्षीयांसं कुरुते.. (२)
जो अतिथि से बारबार भोजन करने की बात कहता है, वह प्राण शक्ति की वृद्धि करता
है. (२)
उप हरति हवींष्या सादयति.. (३)
जो अतिथि के लिए भोजन लाता है, वह हवि प्राप्त करता है. (३)
तेषामासन्नानामतिथिरात्मन्जुहोति.. (४)
अतिथि उन परोसे हुए भोज्य पदार्थों का आत्मा में ही हवन करता है. (४)
स्रुचा हस्तेन प्राणे यूपे सुक्कारेण वषट्कारेण.. (५)
अतिथि का हाथ सुवा, उस के प्राण स्तूप अर्थात् यज्ञीय पशु को बांधने का खंभा और
खाते समय चटखारे लेना ही वषट् शब्द है. (५)
एते वै प्रियाश्चाप्रियाश्चर्त्विजः स्वर्गं लोकं गमयन्ति यदतिथयः.. (६)
अतिथि ही वे प्रिय अथवा अप्रिय अतिथि हैं, जो यजमान को स्वर्गलोक में भेजते हैं.
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(६)
स य एवं विद्वान् न द्विषन्नश्नीयान्न द्विषतो ऽ न्नमश्नीयान्न
मीमांसितस्य न मीमांसमानस्य.. (७)
जिस के विषय में विचार कर चुका हो, अतिथि उस का अन्न खाए, जिस के विषय में
विचार चल रहा हो, उस का अन्न न खाए. (७)
सर्वो वा एष जग्धपाप्मा यस्यान्नं नाश्नन्ति.. (८)
अतिथि जिस का अन्न खाता है, उस के सभी पापों को भी खाता है. (८)
सर्वो वा एषो ऽ जग्धपाप्मा यस्यान्नं नाश्नन्ति.. (९)
अतिथि जिस का अन्न नहीं खाता है, उस के पापों को भी नहीं खाता है. (९)
सर्वदा वा एष युक्तग्रावार्द्रपवित्रो वितताध्वर आहतयज्ञक्रतुर्य उपहरति..
(१०)
जो यजमान अतिथियों को अन्न देता रहता है, वह ग्रावाओं अर्थात् सोमलता कूटने वाले
पत्थरों से गीले यज्ञ का कर्ता और उस यज्ञ को पूर्ण करने वाला होता है. (१०)
प्राजापत्यो वा एतस्य यज्ञो विततो य उपहरति.. (११)
अतिथि के निमित्त अन्न देना प्राजापत्य यज्ञ है. (११)
प्रजापतेर्वा एष विक्रमाननुविक्रमते य उपहरति.. (१२)
जो अतिथि के निमित्त भोजन लाता है, वह प्रजापति के समान ही पराक्रम करता है.
(१२)
योऽतिथीनां स आहवनीयो यो वेश्मनि स गार्हपत्यो
यस्मिन् पचन्ति स दक्षिणाग्निः.. (१३)
अतिथियों को बुलाना आह्वनीय अग्नि है, अपने घर में उन्हें भोजन कराना गार्हपत्य
अग्नि है और जिस पात्र में अतिथि के लिए भोजन पकाया जाता है, वह दीक्षाग्नि है. (१३)
सूक्त-८ देवता—अतिथि, विद्या
इष्टं च वा एष पूर्तं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (१)
जो अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने में होने वाले इष्टापूर्त कर्मों का फल
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खा लेता है. संध्या आदि नित्य कर्म इष्ट और किसी प्रयोजन से किए जाने वाले यज्ञ आदि
कर्म आपूर्त कहलाते हैं. (१)
पयश्च वा एष रसं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वोऽतिथेरश्नाति.. (२)
जो अतिथियों से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों के दूध और रस को नष्ट करता
है. (२)
ऊर्जां च वा एष स्फातिं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (३)
जो व्यक्ति अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने घरों के बल और समृद्धि का
नाश करता है. (३)
प्रजां च वा एष पशूंश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (४)
जो अतिथि से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों की संतान और पशुओं का भक्षण
करता है. (४)
कीर्तिं च वा एष यशश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (५)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की कीर्ति और यश को समाप्त
करता है. (५)
श्रियं च वा एष संविदं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (६)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की श्री और सौमनस्य का विनाश
करता है. (६)
एष वा अतिथिर्यच्छ्रोत्रियस्तस्मात् पूर्वो नाश्नीयात्.. (७)
श्रोत्रिय ब्राह्मण ही वास्तव में अतिथि है. यजमान को चाहिए कि उस से पूर्व भोजन नहीं
करे. (७)
अशितावत्यतिथावश्नीयाद् यज्ञस्य सात्मत्वाय यज्ञस्याविच्छेदाय तद्
व्रतम्.. (८)
अतिथि के भोजन कर लेने पर ही यजमान भोजन करे. यज्ञ के निर्वाह एवं यज्ञ का
विच्छेद न होने के लिए ही यह व्रत है. (८)
एतद् वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा तदेव नाश्नीयात्.. (९)
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सूक्त-९ देवता—अतिथि, विद्या

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चाहे जितना स्वादिष्ट हो, पर यजमान को गाय का दूध और मांस नहीं खाना चाहिए.
(९)
सूक्त-९ देवता—अतिथि, विद्या
स य एवं विद्वान् क्षीरमुपसिच्योपहरति.. (१)
जो इस बात को जानता है, वह दूध का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (१)
यावदग्निष्टोमेनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (२)
यजमान अग्निष्टोम यज्ञ के द्वारा स्वर्ग में जितना समृद्धिपूर्ण स्थान पा सकता है, उतना
ही अतिथि सेवा के द्वारा प्राप्त कर सकता है. (२)
स य एवं विद्वान्सर्पिरुपसिच्योपहरति.. (३)
इस का ज्ञाता घी का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता है. (३)
यावदतिरात्रेणेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (४)
अतिरात्र यज्ञ के द्वारा यजमान स्वर्ग में जितना समृद्धि पूर्ण पद प्राप्त कर सकता है,
उतना ही अतिथि सेवा के द्वारा प्राप्त करता है. (४)
स य एवं विद्वान् मधूपसिच्योपहरति.. (५)
जो इस बात को जानता है, वह मधुर शहद का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन
लाता है. (५)
यावत् सत्रसद्येनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (६)
यजमान सत्र यज्ञ कर के स्वर्ग में जो समृद्धि पूर्ण स्थान प्राप्त करता है, उसे अतिथि की
सेवा के द्वारा पाया जा सकता है. (६)
स य एवं विद्वान् मांसमुपसिच्योपहरति.. (७)
जो इस बात को जानता है, वह मांस का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (७)
यावद् द्वादशाहेनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (८)
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यजमान बारह दिन तक चलने वाले यज्ञ के द्वारा स्वर्ग में जितना समृद्धि पूर्ण स्थान
पाता है, वही अतिथि की सेवा के द्वारा पा सकता है. (८)
स य एवं विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (९)
जो इस बात को जानता है, वह जल का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (९)
प्रजानां प्रजननाय गच्छति प्रतिष्ठां प्रियः प्रजानां भवति य एवं
विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (१०)
जो इस बात को जानता है और जल का उपसेचन कर के अतिथि के हेतु भोजन लाता
है, वह संतान को जन्म देने की क्षमता प्राप्त करता है, प्रतिष्ठा पाता है और प्रजाओं का प्रिय
बनता है. (१०)
सूक्त-१० देवता—अतिथि, विद्या
तस्मा उषा हिङ्कृणोति सविता प्र स्तौति.. (१)
उषा उस के लिए हुंकार करती है और सूर्य उस की स्तुति करता है. (१)
बृहस्पतिरूर्जयोद् गायति त्वष्टा पुष्ट्या प्रति हरति विश्वे देवा निधनम्..
(२)
अन्न के रस से उत्पन्न ऊर्जा से बृहस्पति उदगायन करते हैं, त्वष्टा पुष्टि प्रदान करते हैं
और विश्वे देव पूर्णता प्रदान करते हैं. (२)
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (३)
जो इस बात को जानता है, वह सेवकों, संतानों और पशुओं के पालन की पूर्णता प्राप्त
करता है. (३)
तस्मा उद्यन्सूर्यो हिङ्कृणोति संगवः प्र स्तौति.. (४)
उदय होते हुए सूर्य उस के लिए हुंकार करते हैं और किरणों वाले सूर्य उस की प्रशंसा
करते हैं. (४)
मध्यन्दिन उद्गायत्यपराह्नः प्रति हरत्यस्तंयन् निधनम्.
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (५)
सूर्य माध्यंदिन अर्थात् दोपहर के समय उस की प्रशंसा करते हैं और दोपहर के बाद उस
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की मृत्यु का विनाश करते हैं. जो इस बात को जानता है, वह समृद्धि की प्रजाओं और
पशुओं को प्राप्त करता है. (५)
तस्मा अभ्रो भवन् हिङ्कृणोति स्तनयन् प्र स्तौति.. (६)
उत्पन्न होने वाला बादल उस के लिए हुंकार करता है और गर्जन करता हुआ उस की
प्रशंसा करता है. (६)
विद्योतमानः प्रति हरति वर्षन्नुद्गायत्युद्गृह्णन् निधनम्.
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (७)
बादल दमकता हुआ उस का प्रतिहार करता है, बरसता हुआ उद्गान करता है तथा
उद्ग्रहण करता हुआ उसे पूर्णता प्रदान करता है. जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजाओं और
पशुओं की संपन्नता प्राप्त करता है. (७)
अतिथीन् प्रति पश्यति हिङ्कृणोत्यभि वदति प्र स्तौत्युदकं
याचत्युद्गायति.. (८)
वह अतिथियों को देखता है तो उन्हें बुलाता है, अभिवादन करता है, जल प्रस्तुत करता
है और उन की प्रशंसा करता है. (८)
उप हरति प्रति हरत्युच्छिष्टं निधनम्.. (९)
वह अशेष पूर्णता का उपहार और प्रतिहार करता है. (९)
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (१०)
जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजा और पशुओं की समृद्धि की अंतिम अवस्था को
प्राप्त करता है. (१०)
सूक्त-११ देवता—अतिथि, विद्या
यत् क्षत्तारं ह्वयत्या श्रावयत्येव तत्.. (१)
जो क्षत्ता अर्थात् इच्छित कार्य करने वाले का आह्वान करता है, वह श्रुति को ही सुनाता
है. (१)
यत् प्रतिशृणोति प्रत्याश्रावयत्येव तत्.. (२)
जो प्रतिज्ञा करता है, वही श्रुति को सुनाने का आग्रह करता है. (२)
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यत् परिवेष्टारः पात्रहस्ताः पूर्वे चापरे च प्रपद्यन्ते चमसाध्वर्यव एव ते..
(३)
हाथों में पात्र लिए जो परोसने वाले आगेपीछे चलते हैं, वे ही यज्ञ के चमस और अध्वर्यु
हैं. (३)
तेषा नं कश्चनाहोता.. (४)
उन अतिथियों में कोई भी ऐसा नहीं है जो होता अर्थात् हवन करने वाला न हो. (४)
यद् वा अतिथिपतिरतिथीन् परिविष्य गृहानुणेदैत्यवभृथमेव तदुपावैति..
(५)
जो अतिथि सत्कार कर्ता अतिथियों को भोजन परोस कर घरों में आता है, वह यज्ञ के
पश्चात होने वाले अवभृथ स्नान का फल प्राप्त करता है. (५)
यत् सभागयति दक्षिणाः सभागयति यदनुतिष्ठत उदवस्यत्येव तत्.. (६)
जो यजमान भोज्य पदार्थों को अलगअलग करता हुआ तथा दक्षिणा देता हुआ
अनुष्ठान करता है, वह उदवास करता है. (६)
स उपहूतः पृथिव्यां भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यत् पृथिव्यां विश्वरूपम्.. (७)
वह बुला कर पृथिवी के समस्त प्राणियों को भोजन कराता है, उस अतिथि सत्कार में
मानो विश्वरूप ही बुलाए जाते हैं. (७)
स उपहूतो ऽ न्तरिक्षे भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यदन्तरिक्षे विश्वरूपम्.. (८)
वह बुलाने पर स्वर्ग में भोजन करता है. अंतरिक्ष में जो विश्वरूप है, वह उस के यहां
बुलाया जाता है. (८)
स उपहूतो दिवि भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् दिवि विश्वरूपम्.. (९)
वह बुलाए जाने पर स्वर्ग में भक्षण करता है. स्वर्ग में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया
जाता है. (९)
स उपहूतो देवेषु भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् देवेषु विश्वरूपम्.. (१०)
वह बुलाए जाने पर देवों के मध्य भोजन करता है. देवों में जो विश्वरूप है, उस में वह
बुलाया जाता है. (१०)
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स उपहूतो लोकेषु भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यल्लोकेषु विश्वरूपम्.. (११)
वह बुलाया गया लोकों में भोजन करता है. लोकों में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया
जाता है. (११)
स उपहूत उपहूत:.. (१२)
वह इस लोक और परलोक दोनों में आदर से बुलाया जाता है. (१२)
आप्नोतीमं लोकमाप्नोत्यमुम्.. (१३)
वह इस लोक को और परलोक को प्राप्त करता है. (१३)
ज्योतिष्मतो लोकान्जयति य एवं वेद.. (१४)
जो इस बात को जानता है, वह ज्योतिर्मय लोकों को जीतता है. (१४)
सूक्त-१२ देवता—गौ
प्रजापतिश्च परमेष्ठी च शृङ्गे इन्द्रः शिरो अग्निर्ललाटं यमः कृकाटम्.. (१)
इस गाय के दोनों सींग प्रजापति और परमेष्ठी हैं. इंद्र ही इस का सिर, अग्नि ललाट और
यम कृकाट अर्थात् गले के नीचे लटकता हुआ भाग है. (१)
सोमो राजा मस्तिष्को द्यौरुत्तरहनुः पृथिव्यधरहनुः.. (२)
सोम राजा गाय का मस्तक है, द्यौ ऊपर की ठोड़ी और धरती ठोड़ी का ऊपर वाला
भाग है. (२)
विद्युज्जिह्वा मरुतो दन्ता रेवतीर्ग्रीवाः कृत्तिका स्कन्धा घर्मो वहः.. (३)
बिजली गाय की जीभ, मरुद्गण, दांत, रेवती नक्षत्र गरदन, कृत्तिका नक्षत्र कंधा और
धर्म रक्त का प्रवाह है. (३)
विश्वं वायुः स्वर्गो लोकः कृष्णद्रं विधरणी निवेश्यः.. (४)
विश्व वायु, स्वर्गलोक तथा कृष्णाद्रि विधरणी (धारक शक्ति) निवेश्य (पृष्ठ भाग) है. (४)
श्येनः क्रोडो ३ न्तरिक्षं पाजस्यं १ बृहस्पतिः ककुद् बृहतीः कीकसाः..
(५)
श्येन गाय का क्रोड अर्थात् कोख अथवा बगल, अंतरिक्ष पाजस्य (उदर), बृहस्पति
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ककुद, अर्थात् ठाट तथा बृहती छंद हड्डियां हैं. (५)
देवानां पत्नी: पृष्टय उपसद: पर्शव:.. (६)
देवों की पत्नियां गाय की पसलियां हैं और उपसद उस की कोखें हैं. (६)
मित्रश्च वरुणश्चांसौ त्वष्टा चार्यमा च दोष्णी महादेवो बाहू.. (७)
मित्र और वरुण गाय के कंधे हैं, त्वष्टा तथा अर्यमा गाय की भुजाएं अर्थात् अगले पैर हैं
तथा महादेव बाहु हैं. (७)
इन्द्राणी भसद् वायु: पुच्छं पवमानो बाला:.. (८)
इंद्राणी गाय की कमर है. वायु पूंछ है और पवमान बाल हैं. (८)
ब्रह्म च क्षत्रं च श्रोणी बलमूरू.. (९)
ब्राह्मण और क्षत्रिय गाय के नितंब हैं तथा बल उस की जंघाएं हैं. (९)
धाता च सविता चाष्ठीवन्तौ जङ्घा गन्धर्वा
अप्सरस: कुष्ठिका अदिति: शफा:.. (१०)
धाता और सविता गाय के होंठ, गंधर्व जंघाएं, अप्सराएं कोखें और अदिति शफ अर्थात्
खुर हैं. (१०)
चेतो हृदयं यकृन्मेधा व्रतं पुरीतत्.. (११)
चेत गाय का हृदय, यकृत अर्थात् जिगर मेधा अर्थात् बुद्धि है तथा व्रत पुरीतत (आंत)
नाड़ी है. (११)
क्षुत् कुक्षिरिरा वनिष्ठ: पर्वता: प्लाशय:.. (१२)
पर्वत बैल की प्लाशि (छोटी आंत) है, इरा उस की बड़ी आंत है और भूख के अभिमानी
देवता इस की कोख हैं. (१२)
क्रोधो वृक्कौ मन्युराण्डौ प्रजा शेप:.. (१३)
क्रोध इस के गुरदे हैं, मन्यु इस के अंडकोष हैं और प्रजा इस का जननांग है. (१३)
नदी सूत्री वर्षस्य पतय स्तना स्तनयित्नुरूध:.. (१४)
नदी इस गाय का मूत्र, वर्ष के स्वामी इस के थन और मेघगर्जन इस का एन है. (१४)
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विश्वव्यचाश्चर्मौषधयो लोमानि नक्षत्राणि रूपम्.. (१५)
विश्वव्यचा इस का चर्म है, जड़ीबूटियां इस के लोम हैं तथा नक्षत्र इस का रूप है. (१५)
देवजना गुदा मनुष्या आन्त्रान्यत्रा उदरम्.. (१६)
देवजन इस की गुदा, मनुष्य आंतें तथा अन्न उदर है. (१६)
रक्षांसि लोहितमितरजना ऊबध्यम्.. (१७)
राक्षस इस के लोहित अर्थात रक्त और अन्य जन इस के ऊवध्य हैं. (१७)
अभ्रं पीबो मज्जा निधनम्.. (१८)
बादल इस का मोटापा है तथा निधन मज्जा अर्थात् चरबी है. (१८)
अग्निरासीन उत्थितो ऽ श्विना.. (१९)
अग्नि इस की बैठी हुई दशा और दोनों अश्विनीकुमार इस की उठी हुई दशा हैं. (१९)
इन्द्रः प्राङ् तिष्ठन् दक्षिणा तिष्ठन् यमः.. (२०)
इंद्र इस का पूर्व दिशा में तथा यम इस का दक्षिण दिशा में ठहरना है. (२०)
प्रत्यङ् तिष्ठन् धातोदङ् तिष्ठन्त्सविता.. (२१)
पूर्व दिशा में गाय का ठहरना इंद्र तथा दक्षिण दिशा में ठहरी हुई गाय यम है. (२१)
तृणानि प्राप्तः सोमो राजा.. (२२)
पश्चिम दिशा में ठहरी हुई गाय और उत्तर दिशा में ठहरी हुई गाय सविता हैं. (२२)
मित्र ईक्षमाण आवृत्त आनंदः.. (२३)
गाय को घास के तिनकों की प्राप्ति सोम राजा है. (२३)
युज्यमानो वैश्वदेवो युक्तः प्रजापतिर्विमुक्तः सर्वम्.. (२४)
गाय का देखना मित्र और लौटना आनंद है. (२४)
एतद् वै विश्वरूपं सर्वरूपं गोरूपम्.. (२५)
विश्व का यह रूप ही गाय का रूप है. (२५)
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उपैनं विश्वरूपाः सर्वरूपाः पशवस्तिष्ठन्ति य एवं वेद.. (२६)
जो इस बात को जानता है, वह सारे संसार के सभी रूपों वाले पशुओं का स्वामी बनता है. (२६)
सूक्त-१३ देवता—सर्व शीर्षामय
दूरीकरण
शीर्षक्तिं शीर्षामयं कर्णशूलं विलोहितम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (१)
हम तेरे शीश के रोगों अर्थात् शीर्षोक्ति, शीर्षामय और कर्ण शूल तथा विलोहित को तुझ से दूर करते हैं. (१)
कर्णाभ्यां ते कङ्कूषेभ्यः कर्णशूलं विसल्पकम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (२)
मैं तेरे कानों से तथा कानों के गड़ढों से कर्णशूल अर्थात् कानों के दर्द को तथा विसल्पक (विशेष कष्ट देने वाले)को दूर करता हूं. इस प्रकार मैं तेरे शीश संबंधी सभी रोगों को दूर करता हूं. (२)
यस्य हेतोः प्रच्यवते यक्ष्मः कर्णात आस्यतः.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (३)
जिस सिर रोग के कारण यक्ष्मा रोग, कानों और मुख से प्रकाश में आता है, हम तेरे उस सिर रोग को पूर्णतया बाहर निकालते हैं. (३)
यः कृणोति प्रमोतमन्धं कृणोति पूरुषम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (४)
जो रोग पुरुष को शक्तिहीन बनाता है और अंधा कर देता है, तेरे उन सभी शीश संबंधी रोगों को मैं तुझ से बाहर निकालता हूं. (४)
अङ्गभेदमङ्गञ्च्वरं विश्वाङ्ग्यं विसल्पकम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (५)
अंग भेद, अंग ज्वर, विश्वांग्य एवं विसल्पक—ये सभी शीश संबंधी रोग हैं. हम इन्हें पूर्ण रूप से तुझ से दूर करते हैं. (५)
यस्य भीमः प्रतीकाश उद्वेपयति पूरुषम्.
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तक्मानं विश्वशारदं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (६)
जिस का भयानक आवेश मनुष्य को कंपित कर देता है, शरद ऋतु में होने वाले उस
ज्वर को हम तुझ से पूर्ण रूप से दूर करते हैं. (६)
य ऊरू अनुसर्पत्यथो एति गवीनिके.
यक्ष्मं ते अन्तरङ्गेभ्यो बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (७)
जो गवीनिका नाम की नाड़ियों में तथा जंघाओं में घूमता है, उस यक्ष्मा रोग को हम तेरे
अंतरंग अंगों से बाहर निकालते हैं. (७)
यदि कामादपकामाद्धृदयाज्जायते परि.
हृदो बलासमङ्गेभ्यो बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (८)
हृदय की शक्ति कम करने वाला जो रोग काम के वश में होने अथवा न होने से उत्पन्न
होता है, उस बलास (कफ) रोग को हम तेरे अंगों से बाहर निकालते हैं. (८)
हरिमाणं ते अङ्गेभ्यो ऽ प्वामन्तरोदरात्. यक्ष्मोधामन्तरात्मनो
बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (९)
हम तेरे अंगों से हरिमा (रक्तहीनता) रोग को, तेरे उदर से अप्वा (जलोदर) रोग को तथा
तेरी अंतरात्मा से यक्ष्मा रोग को पूर्णतया बाहर निकालते हैं. (९)
आसो बलासो भवतु मूत्रं भवत्वामयत्.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१०)
बलास रोग नष्ट हो तथा मूत्र रोग समाप्त हो. सभी रोगों का विष यक्ष्मा रोग है, उसे मैं
तुझ से दूर करता हूं. (१०)
बहिर्बिलं निर्द्रवतु काहाबाहं तवोदरात्.
यक्ष्माणां सर्वेषां विष निरवोचमहं त्वत्.. (११)
काहावाह नामक (फड़फड़ाने वाला) रोग तेरे पेट से बाहर निकल जाए. मैं सभी प्रकार
के यक्ष्मा रोगों के विष को तुझ से बाहर करता हूं. (११)
उदरात् ते क्लोम्नो नाभ्या हृदयादधि.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१२)
हम तेरे उदर से, क्लोम से, नाभि से और हृदय से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालते हैं जो
सभी विषों का विष है. (१२)
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याः सीमानं विरुजन्ति मूर्धानं प्रत्यर्षणीः.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१३)
जो अंडकोषों को पीड़ित करने वाली एवं मस्तक का निर्माण करने वाली हड्डियां
विकार रहित हैं, वे तेरे शरीर का त्याग न करें. (१३)
या हृदयमुपर्षन्त्यनुतन्वन्ति कीकसाः.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१४)
कीकस नाम की जो अस्थियां हृदय के ऊपरी और निचले भाग में फैली हुई हैं, वे रोग
रहित अस्थियां हिंसा न करती हुई तुम्हारे शरीर से बाहर न जाएं. (१४)
याः पार्श्वे उपर्षन्त्यनुनिष्खन्ति पृष्टीः.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१५)
जो अस्थियां दोनों पसलियों की ओर जाती हैं तथा पीठ वाले भाग को सशक्त बनाती
हैं, वे रोगरहित रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१५)
यास्तिरश्चीरुपर्षन्त्यर्षणीर्वक्षणासु ते.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१६)
जो अस्थियां तिरछी स्थित हैं एवं वक्षणाओं (पेड़ू और जांघों के बीच के भाग) से
संबंधित हैं, वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई एवं नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें.
(१६)
या गुदा अनुसर्पन्त्यान्त्राणि मोहयन्ति च.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१७)
गुदा के पीछे फैली एवं आंतों को सहारा देने वाली जो अस्थियां हैं, वे रोग रहित रहती
हुई तथा तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१७)
या मज्ज्ञो निर्धयन्ति परूंषि विरुजन्ति च.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१८)
जो अस्थियां गांठों का निर्माण करती हैं तथा जो मज्जा अर्थात् चर्बी से स्निग्ध होती हैं,
वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई और नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१८)
ये अङ्गानि मदयन्ति यक्ष्मासो रोपणास्तव.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१९)
मैं ने तुझे वे सभी ओषधियां बता दी हैं जो अंगों को स्वस्थ बनाती हैं एवं यक्ष्मा रोग को
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समाप्त करती हैं. मैं ने यक्ष्मा रोग के समस्त विषों का निवारण करने वाली ओषधियां भी तुझे
बता दी हैं. (१९)
विसल्पस्य विद्रधस्य वातीकारस्य वालजेः.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (२०)
मैं तेरे लिए विसल्प (पीड़ा), विद्ध (सूजन), वातीकार एवं वालजि (संधि) नामक समस्त
यक्ष्मा रोगों के विषयों को नष्ट करने वाले मंत्रों का उच्चारण कर चुका हूं. (२०)
पादाभ्यां ते जानुभ्यां श्रोणिभ्यां परि भंससः.
अनूकादर्षणीरुष्णिहाभ्यः शीर्ष्णो रोगमनीनशम्.. (२१)
मैं ने तेरी जंघाओं, पैरों, घुटनों, अनूक, उष्णिहा एवं शीश संबंधी समस्त रोगों का
विनाश कर दिया है. (२१)
सं ते शीर्ष्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः.
उद्यन्नादित्य रश्मिभिः शीर्ष्णो रोगमनीनशो ऽ ङ्गभेदमशीशमः.. (२२)
तेरे शीश पर

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इमं रथमधि ये सप्त तस्थुः सप्तचक्रं सप्त वहन्त्यश्वाः.
सप्त स्वसारो अभि सं नवन्त यत्र गवां निहिता सप्त नामा.. (३)
सूर्य के सात पहियों वाले रथ को सात घोड़े खींचते हैं. सात ऋषि इस रथ के समीप
खड़े रहते हैं. सात बहनें सूर्य की स्तुति करती हैं. किरणों रूपी सात गाएं सूर्य के रथ से
संबंधित हैं, जो इसे रस युक्त बनाती हैं. (३)
को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति.
भूम्या असुरसृगात्मा क्वस्वित् को विद्वांसमुप गात् प्रष्टुमेतत्.. (४)
सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले अस्थिरहित को किस ने देखा था जो समस्त विश्व को धारण
करता है? भूमि को प्राणवंत करने वाले जल की आत्मा कहां स्थित है? इस बात को पूछने
के लिए विद्वान् के समीप कौन गया था? (४)
इह ब्रवीतु य ईमङ्ग वेदास्य वामस्य निहितं पदं वेः.
शीर्ष्णः क्षीरं दुहते गावो अस्य वव्रिं वसाना उदकं पदा ऽ पुः.. (५)
इन सूर्य के विषय में जो जानता हो, वह बताए कि इन के चरण आकाश में कहां स्थित
हैं? गाएं इन्हीं सूर्य के मंडल में दूध दुहाती हैं तथा वे गाएं इन्हीं सूर्य की किरणों के द्वारा जल
पीती हैं. (५)
पाकः पृच्छामि मनस ऽ विजानन् देवानामेना निहिता पदानि.
वत्से बष्कये ऽ धि सप्त तन्तून् वि तत्निरे कवय ओतवा उ.. (६)
सूर्य के रूप को पूर्ण रूप से न जानता हुआ मैं अपने मन से पूछता हूं कि समस्त देवों
के रक्षासाधन इन सूर्य में ही निहित हैं. विद्वानों ने सूर्य देव के विस्तार के हेतु सात तंतु
स्थापित कर दिए हैं. (६)
अचिकित्वांश्र्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मनो न विद्वान्.
वि यस्तस्तम्भ षडिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम्.. (७)
अज्ञानी मैं विद्वानों और ज्ञानियों से पूछता हूं कि जिस ने छः रजोगुणी तत्त्वों को स्तंभित
किया है, वह अजन्मा क्या एक ही है? मैं संदेह में पड़ा हूं. और संदेहरहित जनों से अपना
संदेह निवारण करना चाहता हूं. (७)
माता पितरमृत आ बभाज धीत्यग्रे मनसा सं हि जग्मे.
सा बीभत्सुर्गर्भरसा निविद्धा नमस्वन्त इदुपवाकमीयुः.. (८)
सूर्य के जन्म लेते समय ही उन की माता उन के पिता की सेवा करती है. इस के फल
स्वरूप वह बुद्धि और मन से युक्त हो जाती है एवं गर्भरूपी रस से निबद्ध हो जाती है. हवि
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