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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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मैं ऐसा उपाय करता हूं, जिस से बुढ़ापा और मृत्यु तुझे न छू सकें. मैं तेरी आयु का विस्तार
कर के तेरा कल्याण करता हूं तथा यमराज के द्वारा भेजे हुए एवं सभी जगह घूमते हुए
यमदूतों को तुझ से दूर करता हूं. (११)
आरादरातिं निर्ऋतिं परो ग्राहिं क्रव्यादः पिशाचान्.
रक्षो यत् सर्वं दुर्भूतं तत् तम इवाप हन्मसि.. (१२)
शत्रु बनी हुई एवं आगे आ कर पकड़ने वाले पाप देवता निर्ऋति का मैं समीप से हनन
करता हूं तथा मांसाहारी पिशाचों का विनाश करता हूं. इस प्रकार दुष्टता को प्राप्त जो संपूर्ण
राक्षस जाति है तथा जो अंधकार के समान दूसरों को ढकने वाले हैं, उन का मैं विनाश करता
हूं. (१२)
अग्नेष्टे प्राणममृतादायुष्मतो वन्वे जातवेदसः.
यथा न रिष्या अमृतः सजूरसस्तत् ते कृणोमि तदु ते समृध्यताम्.. (१३)
हे पाप देवता निर्ऋति के द्वारा प्राणरहित बनाए गए पुरुष! चिरजीवी एवं मरणरहित
देव अग्नि से मैं तेरे प्राणों की याचना करता हूं. वह अग्नि देव सभी जन्म लेने वालों को
जानते हैं. हे पुरुष! जिस प्रकार तू न मरे और मरणरहित हो कर प्रसन्न बने, मैं तेरे लिए उसी
प्रकार का शांतिकर्म करता हूं. तुझ से संबंधित यह शांतिकर्म समृद्ध हो. (१३)
शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ.
शं ते सूर्य आ तपतु शं वातो वातु ते हृदे.
शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (१४)
हे कुमार! तेरे घर से निकलने के समय द्यावा पृथ्वी मंगल करने वाली हों, संताप न
पहुंचाएं तथा तुझे धन प्रदान करें. सूर्य तेरे लिए सुखकारक तपें तथा वायु तेरे मन के अनुकूल
बन कर एवं सुखकारी हो कर चले. दिव्य जल तेरे लिए अनेक प्रकार के स्वादों से युक्त एवं
कल्याणकारी हो कर बरसें. (१४)
शिवास्ते सन्त्वोषधय उत् त्वाहार्षमधरस्या उत्तरां पृथिवीमभि.
तत्र त्वादित्यौ रक्षतां सूर्याचन्द्रमसावुभा.. (१५)
हे कुमार! तेरे भोजन के उपयोग में आने वाले गेहूं आदि अन्न सुखकारी हों. पृथ्‍वी के
निचले भाग की अपेक्षा तेरे निमित्त ऊंची पृथ्‍वी का उद्धार किया गया है. पृथ्वी के उच्च भाग
में अदिति के पुत्र सूर्य और चंद्रमा दोनों तेरी रक्षा करें. (१५)
यत् ते वासः परिधानं यां नीविं कृणुषे त्वम्.
शिवं ते तन्वे ३ तत् कृण्मः संस्पर्शेऽदृक्ष्णमस्तु ते.. (१६)
हे बालक! जो वस्त्र तेरे ऊपरी भाग को ढक रहा है और जिसे तूने कमर के नीचे पहना
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है, ये दोनों प्रकार के वस्त्र तेरे शरीर के लिए कल्याणकारी एवं सुखद हों. इस वस्त्र को मैं
ऐसा बनाता हूं कि यह छूने में कठोर न लगे. (१६)
यत् क्षुरेण मर्चयता सुतेजसा वप्ता वपसि केशश्मश्रु.
शुभं मुखं मा न आयुः प्र मोषीः.. (१७)
हे सविता देव! अथवा हजामत बनाने वाले पुरुष! जब तुम केश काटने वाले नाई हो
कर शोभन तेज वाले उस्तरे को चलाते हो, सिर और दाढ़ी के बाल काटते हो, तब मुंडन किए
जाते हुए इस बालक का मुख तेजस्वी बनाओ तथा इस की आयु को मत चुराओ. (१७)
शिवौ ते स्तां व्रीहिवावाबलासावदोमधौ.
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुञ्चतो अंहसः.. (१८)
हे अन्न खाते हुए बालक! तेरे खाने के लिए निश्चित किए गए गेहूं और जौ तेरे लिए
सुखकारी एवं शरीर बढ़ाने वाले हों. उपयोग के पश्चात ये गेहूं और जौ तेरे शरीर को विशेष
रूप से पीड़ित न करें और तुझे पाप से छुड़ाएं. (१८)
यदश्नासि यत्पिबसि धान्यं कृष्याः पयः.
यदाद्यं १ यदनाद्यं सर्वं ते अन्नमविषं कृणोमि.. (१९)
हे कुमार! तुम जिस प्रकार के अनाज को कठिनता से खाते हो तथा दूध के समान
सारवान पिसे हुए धान्य को पीते हो, जो अन्न सुख से खाने योग्य है तथा जो खाने में कठिन
है, इन सभी प्रकार के अन्नों को मैं विषहीन बनाता हूं. (१९)
अह्ने च त्वा रात्रये चोभाभ्यां परि दद्मसि.
अरायेभ्यो जिघत्सुभ्य इमं मे परि रक्षत.. (२०)
हे कुमार! मैं रक्षा के निमित्त तुझे दिन और रात अर्थात् दोनों के देवताओं के लिए देता
हूं. हे देवताओ! तुम निर्धन के पास से तथा खाने वाले राक्षसों के पास से इस बालक की रक्षा
करना. (२०)
शतं ते ऽ युतं हायनान् द्वे युगे त्रीणि चत्वारि कृण्मः.
इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते ऽ नु मन्यन्तामहृणीयमानाः.. (२१)
हे बालक! मैं तेरी अवस्था के सौ वर्षों को हजार वर्ष, हजार वर्षों को दो युग, दो युगों
को तीन युग और तीन युगों को चार युग बनाता हूं. इस प्रकार की प्रार्थना को प्रसिद्ध इंद्र,
अग्नि तथा विश्वे देव लज्जा अथवा क्रोध न करते हुए स्वीकार करें. (२१)
शरदे त्वा हेमन्ताय वसन्ताय ग्रीष्माय परि दद्मसि.
वर्षाणि तुभ्यं स्योनानि येषु वर्धन्त ओषधीः.. (२२)
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हे बालक! मैं तुझे शरद ऋतु, हेमंत ऋतु, वसंत ऋतु और ग्रीष्म ऋतु के लिए देता हूं. हे
बालक! जिन वर्षों में भोग के साधन गेहूं, जौ आदि बढ़ते हैं, वे वर्ष तेरे लिए सुखकारी हों.
(२२)
मृत्युरीशे द्विपदां मृत्युरीशे चतुष्पदाम्.
तस्मात् त्वां मृत्योर्गोपतेरुद्धरामि स मा बिभेः.. (२३)
मृत्यु देव दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं. जिस प्रकार
ग्वाला पशुओं का स्वामी होता है, उसी प्रकार मृत्यु देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं. मैं तेरा
मृत्यु से उद्धार करता हूं. तू भयभीत न हो. (२३)
सो ऽ रिष्ट न मरिष्यसि न मरिष्यसि मा बिभेः.
न वै तत्र म्रियन्ते नो यन्त्यधमं तमः.. (२४)
हे मृत्यु देव से विमुख अर्थात् मृत्यु की हिंसा से रहित पुरुष! तू मरेगा नहीं. तू मरेगा
नहीं, इसीलिए भय मत कर. जिस स्थान में शांति कर्म किया जाता है, वहां के लोग प्राण
त्याग नहीं करते हैं तथा असहनीय मूर्च्छा को भी प्राप्त नहीं करते. (२४)
सर्वो वै तत्र जीवति गौरश्वः पशुः.
यत्रेदं ब्रह्म क्रियते परिधिर्जीवनाय कम्.. (२५)
जहां गाय, घोड़े, पुरुष और पशु सभी जीवित रहते हैं, वहां महाशांति के लिए यज्ञ कर्म
एवं राक्षस, पिशाच आदि का निवारण करने वाला कर्म किया जाता है जो जीवन के लिए
कल्याणकारी होता है. (२५)
परि त्वा पातु समानेभ्यो ऽ भिचारात् सबन्धुभ्यः.
अमम्रिर्भवा ऽ मृतो ऽ तिजीवो मा ते हासिषुरसवः शरीरम्.. (२६)
हे शांति चाहने वाले पुरुष! मेरे द्वारा किया गया शांति कर्म सभी ओर से तेरा पालन
करे. यह तुझे विद्या एवं ऐश्वर्य में समान अन्य मनुष्यों और संबंधियों द्वारा किए हुए जादूटोने
से बचाए. तेरी मृत्यु न हो और तू अत्यधिक जीवन प्राप्त करे. प्राण तेरे शरीर का त्याग न
करें. (२६)
ये मृत्यव एकशतं या नाष्ट्रा अतितार्याः.
मुञ्चन्तु तस्मात् त्वां देवा अग्नेर्वैश्वानरादधि.. (२७)
यमराज के जो प्रसिद्ध आयुध ज्वर, सिरदर्द आदि सौ संख्या में हैं और जो लोगों का
नाश करने वाले हैं, उन से बचना कठिन है. अग्नि और वैश्वानर आदि देव तुझे उन सब से
बचाएं. (२७)
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अग्नेः शरीरमसि पारयिष्णु रक्षोहासि सपत्नहा.
अथो अमीवचातनः पूतुद्रुर्नाम भेषजम्.. (२८)
हे पूतद्रु नामक वृक्ष! तू अग्नि से व्याप्त शरीर वाला है. तू राक्षसों और शत्रुओं का
विनाशक है तथा रोग को बाहर निकालने वाला है. (२८)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म.
शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (१)
मैं राक्षसों का हनन करने वाले एवं बल के साधन अन्न से युक्त अग्नि के लिए हवन
करता हूं. यज्ञ के द्वारा मैं मित्र बने हुए विस्तार को प्राप्त अग्नि की शरण जाता हूं. तीक्ष्ण
ज्वालाओं वाले वे अग्नि देव आज्य आदि के द्वारा प्रज्वलित हों. इस प्रकार के अग्नि देव दिन
में हिंसा करने वाले से हमारी रक्षा करें. (१)
अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः.
आ जिह्वया मूरदेवान् रभस्व क्रव्यादो वृष्ट्वापि धत्स्वासन्.. (२)
हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! हमारे द्वारा किए हुए घृत आदि से भलीभांति
प्रज्वलित हो कर तुम लोहे के दांतों के समान अपनी ज्वालाओं के द्वारा राक्षसों को जला दो.
जादूटोने के द्वारा जो दूसरों की हत्या का खेल खेलते हैं, उन्हें तुम अपनी जीभ से स्पर्श करो
तथा मांस भक्षक राक्षस पिशाच आदि का विनाश कर के अपना मुख बंद कर लो. (२)
उभोभयाविन्नुप धेहि दंष्ट्रौ हिंस्रः शिशानो ऽ वरं परं च.
उतान्तरिक्षे परि याह्यग्ने जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्.. (३)
यह रक्षा करने योग्य है और यह मारने योग्य है—इन दो प्रकार के ज्ञान वाले हे अग्नि
देव! तुम हिंसक एवं तीखी ज्वालाओं वाले हो. तुम हमारे शत्रु एवं हमारे द्वारा द्वेष किए गए
पुरुष को अपनी दोनों दाढ़ों के बीच में रख लो. इस के पश्चात तुम आकाश में विचरण करो.
हे अग्नि देव! मुझे बाधा पहुंचाने के निमित्त घूमते हुए राक्षसों को दांतों से चबा डालो. (३)
अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंसा ऽ शनिर्हरसा हन्त्वेनम्.
प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात् क्रविष्णुर्वि चिनोत्वेनम्.. (४)
हे अग्नि देव! तुम राक्षसों की त्वचा का छेदन करो. तुम्हारा हिंसक वज्र अपने ताप से
इन राक्षसों की हत्या करे. हे जातवेद अग्नि! राक्षसों के जोड़ों को अलगअलग कर दो. इस के
पश्चात भक्षक भेड़िया मांस की इच्छा करता हुआ इन्हें खींच कर ले जाए. (४)
यत्रेदानीं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्.
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उतान्तरिक्षे पतन्तं यातुधानं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः.. (५)
हे जातवेद अग्नि देव! तुम कहीं बैठे हुए और कहीं चलतेफिरते हुए राक्षसों को देखते
हो. वे इस देश में हमारे प्रति उपद्रव करते हैं. आकाश में भी जाते हुए उस राक्षस को खींच
लेने वाले तुम तीक्ष्ण हो कर अपनी ज्वालाओं से मारो. (५)
यज्ञैरिषूः संनममानो अग्ने वाचा शल्याँ अशनिभिर्दिहानः.
ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान् प्रतीचो बाहून् प्रति भङ्ग्ध्येषाम्.. (६)
हे अग्नि! तुम हमारे यज्ञों के द्वारा अपने बाणों को सीधा करते हुए एवं हमारी स्तुतियों
के द्वारा उन के फलों को तेज करते हुए उन बाणों को राक्षसों के हृदयों में चुभा दो. इस के
पश्चात् हमारे वध के लिए उठी राक्षसों की भुजाओं को भग्न कर दो. (६)
उतारब्धान्त्स्पृणुहि जातवेद उतारेभाणाँ ऋष्टिभिर्यातुधानान्.
अग्ने पूर्वो नि जहि शोशुचान आमादः क्ष्विङ्कास्तमदन्त्वेनीः.. (७)
हे जातवेद अग्नि देव! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारा पालन करो तथा हल्ला
करने वाले राक्षसों का अपने आयुधों के द्वारा वध करो. तुम शत्रु को उस के आक्रमण के पूर्व
ही मार डालो. उस मारे हुए का भक्षण कच्चा मांस खाने वाले पक्षी करें. (७)
इह प्र ब्रूहि यतमः सो अग्ने यातुधानो य इदं कृणोति.
तमा रभस्व समिधा यविष्ठ नृचक्षसश्चक्षुषे रन्धयैनम्.. (८)
हे अग्नि देव! इस शांति कर्म में जो राक्षस हमारे शरीर को पीड़ा देने वाला काम करता
है, उन से कह दो कि वह तुम्हारे द्वारा प्रहार करने योग्य है. हे अधिक युवा अग्नि देव, उस
पापी को अपनी जलाने वाली ज्वाला से स्पर्श करो. हे अग्नि देव! तुम पुण्यात्मा और पापियों
को साक्षी रूप हो कर देखते हो. तुम इस पापी को अपनी दृष्टि के द्वारा वश में कर लो. (८)
तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा रक्ष यज्ञं प्राञ्चं वसुभ्यः प्र णय प्रचेतः.
हिंस्रं रक्षांस्यभि शोशुचानं मा त्वा दभन् यातुधाना नृचक्षः.. (९)
हे अग्नि देव! अपने भयंकर एवं उग्र तेज के द्वारा हमारे यज्ञ की रक्षा करो. हे दयालु
मन वाले अग्नि देव! हमारे इस यज्ञ को देवों तक पहुंचाओ और यज्ञ की रक्षा करते हुए तुम
राक्षसों को मारो. वे तुम्हें अपने वश में न कर सकें. (९)
नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा.
तस्याग्ने पृष्ठीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च.. (१०)
हे अग्नि देव! मनुष्यों का जो दंड एवं अनुग्रह कार्य है, उस के द्रष्टा तुम ही हो. जो
राक्षस प्रजा को पीड़ा पहुंचाते है, तुम उन के ऊपर से तीन अंगों अर्थात् दो हाथों और तीसरे
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शीश को काट दो. तुम अपने तेज से उन राक्षसों की पसलियों तथा पैरों के तीन भागों को भी
काट दो. (१०)
त्रिर्यातुधानः प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति.
तमर्चिषा स्फूर्जयञ्जातवेदः समक्षमेनं गृणते नि युङ्ग्धि.. (११)
हे अग्नि देव! राक्षस तुम्हारी ज्वालाओं को तीन बार प्राप्त करें. अर्थात् अग्नि उन्हें तीन
बार प्रातः, दोपहर और शाम को जलाएं. जो मेरे सत्य यज्ञ को छल से नष्ट करता है, उसे
पकड़ कर मेरे सामने ही अपनी ज्वालाओं से नष्ट कर दो. (११)
यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद् वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः.
मन्योर्मनसः शरव्या ३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (१२)
हे अग्नि देव! जिस राक्षस के कारण स्त्री और पुरुष आक्रोश से भरे हुए हैं तथा यज्ञ के
श्रोता कटुवाणी से मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं, उस राक्षस पर अपने ज्वाला युक्त मन का
प्रहार करो. (१२)
परा शृणीहि तपसा यातुधानान् पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि.
परार्चिषा मूरदेवान्छृणीहि परासुतृपः शोशुचतः शृणीहि.. (१३)
हे अग्नि देव! अपने तेज से राक्षसों का विनाश करो तथा अपने प्राणनाशक तेज से उन्हें
मार डालो. हत्या कर्म के द्वारा पीड़ा करने वाले उन राक्षसों को अपनी ज्वाला से जला दो.
जो दूसरे के प्राणों से अपनेआप को तृप्त करते हैं, ऐसे राक्षसों को तुम अपनी ज्वाला से जला
दो. (१३)
पराद्य देवा वृजिनं शृणन्तु प्रत्यगेनं शपथा यन्तु सृष्टाः.
वाचास्तेनं शरव ऋच्छन्तु मर्मन् विश्वस्यैतु प्रसितिं यातुधानः.. (१४)
आज देवगण राक्षस एवं पाप देवता को ऐसा मारें कि वे लौट कर न आएं. राक्षसों
अथवा पाप को संतुष्ट करने वाले जो लोग हमें शाप देते हैं वह उन्हीं की ओर चला जाए.
असत्य वचन के द्वारा जो प्रहार करता है, देवों के बाण उस के मर्म स्थल में लगें. वह राक्षस
संसार को व्याप्त करने वाले अग्नि देव की ज्वाला में गिरे. (१४)
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः.
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च.. (१५)
जो राक्षस पुरुषों के मांस से अपना पोषण करता है तथा घोड़े और बकरी आदि के
मांस से पुष्ट होता है, हे अग्नि देव! जो राक्षस गाय का दूध चुराता है. उन सब के सिरों को
अपनी ज्वाला से काट दो. (१५)
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विषं गवां यातुधाना भरन्तामा वृश्चन्तामदितये दुरेवाः.
परैणान् देवः सविता ददातु परा भागमोषधीनां जयन्ताम्.. (१६)
गायों के दूध की कामना करते हुए राक्षस उन से विष प्राप्त करें. दुष्ट गति वाले राक्षस
सब को आश्रय देने वाली पृथिवी के सुख के लिए छिन्नभिन्न हो जाएं अर्थात् भूमि पर प्राप्त
होने वाले पदार्थों को न पा सकें. सविता देव ये राक्षस वधिकों को सौंप दे. ये सब गेहूं, जौ
आदि के भागीदार न बनें. (१६)
संवत्सरीणं पय उस्रियायास्तस्य माशीद् यातुधानो नृचक्षः.
पीयूषमग्ने यतमस्तितृप्सात् तं प्रत्यञ्चमर्चिषा विध्य मर्मणि.. (१७)
हे मनुष्यों को देखने वाले अग्नि देव! राक्षस हमारी गायों के वर्ष में होने वाले गर्भाधान,
प्रसव आदि को नष्ट न करें तथा उन का दूध न पिएं. उन में से जो राक्षस हवि रूपी अमृत एवं
गो घृत से अपनेआप को तृप्त करना चाहे, उस राक्षस को अपनी ज्वाला से ताड़ित कर के
विमुख करो. (१७)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः.
सहमूराननु दह क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (१८)
हे अग्नि देव! तुम चिरकाल से राक्षसों का हनन करते हो, फिर भी राक्षस युद्धों में तुम्हें
जीत नहीं सकते हैं. इसलिए तुम मांसाहारी राक्षसों को मूल सहित जला दो. वे तुम्हारे दैवी
आयुध से न बच सकें. (१८)
त्वं नो अग्ने अधरादुदक्तस्त्वं पश्चादुत रक्षा पुरस्तात्.
प्रति त्ये ते अजरासस्तपिष्ठा अघशंसं शोशुचतो दहन्तु.. (१९)
हे अग्नि देव! तुम नीचे की दिशा से पीड़ा पहुंचाने वाले राक्षसों से, ऊपर की दिशा से
पीड़ा पहुंचाने वाले राक्षसों से तथा पूर्व दिशा से पीड़ा पहुंचाने वाले राक्षसों से हमारी रक्षा
करो. सर्वत्र वर्तमान तुम्हारी चिनगारी पापी राक्षसों का विनाश करे. हे राक्षस! अग्नि देव वृद्ध
न होने वाले, अतिशय संतापकारी एवं दीप्ति वाले हैं. (१९)
पश्चात् पुरस्तादधरादुतोत्तरात् कविः काव्येन परि पाह्यग्ने.
सखा सखायमजरो जरिम्णे अग्ने मर्ताँ अमर्त्यस्त्वं नः.. (२०)
हे सब कुछ जानने वाले अग्नि देव! तुम क्रांतदर्शी हो. इसलिए दक्षिण, उत्तर, पूर्व और
पश्चिम दिशाओं से बाधा पहुंचाने वाले राक्षसों को जानते हो. तुम अपने रक्षा व्यापारों के द्वारा
हमारी रक्षा करो. तुम मेरे सखा हो, इसलिए अपने सखा अर्थात् मेरी रक्षा करो. हे अग्नि देव!
तुम वृद्धावस्था रहित हो, मुझ वृद्ध और दुर्बल की रक्षा करो. तुम मरण रहित हो, मुझ
मरणधर्मा की रक्षा करो. (२०)
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तदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजो येन पश्यसि यातुधानान्.
अथर्ववज्ज्योतिषा दैव्येन सत्यं धूर्वन्तमचितं न्योष.. (२१)
हे अग्नि देव! तुम शब्द करते हुए राक्षस पर अपनी वह दृष्टि डालो अर्थात् उसे जला दो,
जिस से तुम पशु रूपधारी राक्षसों को देखते हो. अथर्वा नाम के महर्षि ने अपने तप और मंत्र
के प्रभाव से जिस प्रकार राक्षस को जलाया, उसी प्रकार तुम भी अपनी दिव्य ज्योति से सत्य
की हिंसा करने वाले एवं ज्ञानहीन राक्षसों को पूरी तरह जला दो. (२१)
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भङ्गुरावतः.. (२२)
हे सबको पराजित करने वाले अग्नि देव! हम तुम्हारा सभी प्रकार से ध्यान करते हैं.
तुम अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले, मेधावी, अधिक वर्षा युक्त तथा प्रतिदिन गिरते हुए बल और
स्वभाव वाले राक्षसों के हंता हो. (२२)
विषेण भङ्गुरावतः प्रति स्म रक्षसो जहि.
अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिरर्चिभिः.. (२३)
हे अग्नि देव! विष के समान विनाशक अपने तीखे तेज से भग्नचरित्र वाले राक्षसों का
विनाश करो. तुम उन्हें अपनी ताप युक्त ज्वालाओं से भी जलाओ. (२३)
वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निरविर्विश्वानि कृणुते महित्वा.
प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षोभ्यो विनिक्षे.. (२४)
ये अग्नि देव महान तेज से प्रकाशित हैं. हे अग्नि देव! अपने तेजों की अधिकता से तुम
समस्त प्राणियों को प्रकट करते हो. ये अग्नि देव राक्षसों से संबंधित और कष्ट से जानने योग्य
मायाओं का पूर्णतया विनाश करते हैं तथा राक्षसों के विनाश के लिए अपने सींग पैने करते
हैं. (२४)
ये ते शृङ्गे अजरे जातवेदस्तिग्महेती ब्रह्मसंशिते.
ताभ्यां दुर्हार्दमभिदासन्तं किमीदिनं प्रत्यञ्चमर्चिषा जातवेदो वि निक्ष्व..
(२५)
हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे जो प्रसिद्ध सींग हैं, उन के द्वारा तुम अपने विरोधियों का
विनाश करो. तुम्हारे सींग जरा रहित, तीखे आयुधों के समान एवं हमारे मंत्रों के द्वारा
शक्तिशाली बनाए गए हैं. तुम दुष्ट हृदय वाले सब के विनाशक एवं यह कौन है, यह कौन है,
इस प्रकार बोल कर विनाश करने वाले राक्षसों को मारो. (२५)
अग्नी रक्षांसि सेधति शुक्रशोचिरमर्त्यः. शुचिः पावक ईड्यः.. (२६)

सूक्त-४ देवता—मंत्र में बताए गए इंद्र

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ये अग्नि देव सभी प्रकार से बाधा पहुंचाने वाले राक्षसों का विनाश करते हैं. अग्नि देव
दीप्ति प्रकाश वाले, मृत्यु रहित, शुद्ध और सब को पवित्र करने वाले हैं. (२६)
सूक्त-४ देवता—मंत्र में बताए गए इंद्र
आदि
इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृधः.
परा शृणीतमचितो न्योषितं हतं नुदेथां नि शिशीतमत्रिणः.. (१)
हे इंद्र और सोम! राक्षसों को संतप्त करो तथा मार डालो. हे अभिलाषाएं पूर्ण करने
वालो! अंधकार में बढ़ने वाले ज्ञानहीन राक्षसों को निम्न गति प्रदान करो तथा अत्यधिक
जलाओ. मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को मारो तथा मारे हुए राक्षसों को हम से दूर
ले जाओ. इस प्रकार उन की संख्या कम करो. (१)
इन्द्रासोमा समघशंसमभ्य १ घं तपुर्ययस्तु चरुरग्निमाँ इव.
ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषो धत्तमनवायं किमीदिने.. (२)
हे इंद्र और सोम! अनर्थ बोलने वाले एवं पापी राक्षस को पराजित करो. वह राक्षस
संताप को प्राप्त हो तथा अग्नि में डाले गए अन्न के समान जल जाए. तुम दोनों ब्राह्मणों से
द्वेष करने वाले मांसाहारी एवं अब किसे, अब किसे खाऊं कहते हुए राक्षस के पीछे द्वेष और
विरोध धारण करो. (२)
इन्द्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अन्तरनारम्भणे तमसि प्र विध्यतम्.
यतो नैषां पुनरेकश्चनोदयत् तद् वामस्तु सहसे मन्युमच्छवः.. (३)
हे इंद्र और सोम! तुम दुष्कर्म करने वाले राक्षसों को ढकने वाले तथा बिना सहारे वाले
अंधकार में धकेलो, जिस से अंधकार में पड़े हुए राक्षसों में से एक भी बाहर न आ सके. तुम
दोनों का यह बल राक्षसों को हराने के लिए क्रोध युक्त हो. (३)
इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम्.
उत् तक्षतं स्वर्यं १ पर्वतेभ्यो येन रक्षो वावृधानं निजूर्वथः.. (४)
हे इंद्र एवं सोम! अंतरिक्ष से वध का साधन आयुध एक बार ही चलाओ. पाप की बातें
करने वाले राक्षसों के वध के लिए अपना आयुध पृथ्वी से भी एक बार ही चलाओ. उन के
वध के लिए अपने हिंसक वज्र को तेज करो तथा शब्द करते हुए जिस आयुध वज्र से तुम ने
मेघों से जल प्राप्त किया है, उस से राक्षसों का वध करो. (४)
इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवस्पर्यग्नितप्तेभिर्युवमश्महन्मभिः.
तपुर्वधेभिरजरेभिरत्रिणो नि पर्शने विध्यतं यन्तु निस्वरम्.. (५)
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हे इंद्र और सोम! तुम दोनों अग्नि के द्वारा तपाए हुए, फौलाद के बने हुए, संतापकारी
एवं पुराने न होने वाले अपने आयुधों को अंतरिक्ष में घुमाओ तथा उन के द्वारा मानवभक्षी
राक्षसों को समीपवर्ती प्रदेश में भेज दो, जहां जा कर वे मर जाएं. (५)
इन्द्रासोमा परि वां भूतु विश्वत इयं मतिः कक्ष्याश्वेव वाजिना.
यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधयेमा ब्रह्माणि नृपती इव जिन्वतम्.. (६)
हे इंद्र तथा सोम! तुम दोनों हमारे द्वारा की गई स्तुति को उसी प्रकार सब ओर से
स्वीकार करो, जिस प्रकार रस्सी शक्तिशाली घोड़ों को बांध लेती है. हम आह्वान के योग्य
बुद्धि से तुम दोनों को प्रेरित करते हैं. हमारे मंत्र तुम्हें उसी प्रकार प्रसन्न करें, जिस प्रकार
राजा चारणों के वचन सुन कर प्रसन्न होते हैं. (६)
प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरेवैर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावतः.
इन्द्रासोमा दुष्कृते मा सुगं भूद् यो मा कदा चिदभिदासति द्रुहः.. (७)
हे इंद्र एवं सोम! तुम दोनों शक्तिशाली एवं गमन के साधन अश्वों के द्वारा हमारा स्मरण
करते हुए आओ तथा आ कर हम से द्रोह करने वाले और विनाशकारी राक्षसों की हिंसा करो.
हे इंद्र एवं सोम! बुरे कर्म करने वाले राक्षस को सुख न मिले. जो दुष्ट एक बार भी मुझे बाधा
पहुंचाए, उसे तुम दुःख दो. (७)
यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभिः.
आप इव काशिना संगृभीता असन्नस्त्वासत इन्द्र वक्ता.. (८)
हे इंद्र! जो राक्षस सच्चे मन से कार्य करने वाले मुझ ब्राह्मण को शाप देता है और मुझ
से असत्य वचन बोलता है, उस की बात अंजलि से निकल जाने वाले जल के समान सारहीन
है. असत्य बोलने वाला वह स्वयं ही शून्य हो जाए अर्थात् नष्ट हो जाए. (८)
ये पाकशंसं विहरन्त एवैर्यै वा भद्रं दूषयन्ति स्वधाभिः.
अहये वा तान् प्रददातु सोम आ वा दधातु निर्ऋतेरुपस्थे.. (९)
जो राक्षस मुझ सत्यवादी की इच्छानुसार निंदा करते हैं और जो राक्षस मुझ
कल्याणकारी के यज्ञ कर्म को अन्नों के द्वारा दूषित करते हैं—इन दोनों प्रकार के राक्षसों को
सोमदेव सर्प के लिए दे दें अथवा पाप देवता निर्ऋति की गोद में बैठा दें. (९)
यो नो रसं दिप्सति पित्वो अग्ने अश्वानां गवां यस्तनूनाम्.
रिपु स्तेन स्तेयकृद् दभ्रमेतु नि ष हीयतां तन्वा ३ तना च.. (१०)
हे अग्नि देव! जो राक्षस हमारे शरीर के सार को नष्ट करना चाहता है तथा जो हमारे
घोड़ों, गायों और पुत्र, पौत्र आदि के शरीर के रस को दूषित करना चाहता है, इस प्रकार का
शत्रु तस्कर और लुटेरा है. वह नष्ट हो जाए. वह अपने शरीर से और अपनी संतान से नष्ट हो
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जाए. (१०)
परः सो अस्तु तन्वा ३ तना च तिस्रः पृथिवीरधो अस्तु विश्वाः.
प्रति शुष्यतु यशो अस्य देवा यो मा दिवा दिप्सति यश्च नक्तम्.. (११)
हे देवो! वह राक्षस अपने शरीर से और अपने पुत्रों से अलग हो जाए. वह तीनों प्रकार
की पृथ्वी के नीचे पहुंचे अर्थात् नरक को प्राप्त हो. उस पापी का अन्न एवं यश नष्ट हो जाए.
जो द्वेषकर्ता दिन अथवा रात में मुझे मारना चाहता है, उस का विनाश करो. (११)
सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच वचसी पस्पृधाते.
तयोर्यत् सत्यं यतरदृजीयस्तदित् सोमो ऽ वति हन्त्यासत्.. (१२)
विद्वान् को सत्य और असत्य वचन जानना सरल होता है. सत्य और असत्य वचन
परस्पर विरुद्ध होते हैं. इन सत्य और असत्य वचनों में जो यथार्थ है और जो सरल है,
सोमदेव उस की रक्षा करते हैं तथा असत्य वचन का विनाश करते हैं. (१२)
न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति न क्षत्रियं मिथुया धारयन्तम्.
हन्ति रक्षो हन्त्यासद् वदन्मुभाविन्द्रस्य प्रसितौ शयाते.. (१३)
सोमदेव पापी राक्षस को जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. असत्य को धारण करने
वाले पापी राक्षस को भी सोमदेव जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. सोमदेव राक्षस का
विनाश करते हैं और असत्यवादी का भी विनाश करते हैं. ये दोनों इंद्र के पाश में बंध जाते हैं.
(१३)
यदि वा हमनृतदेवो अस्मि मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने.
किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोधवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम्.. (१४)
हे अग्नि देव! न तो मैं देवों की निंदा करने वाला हूं तथा न मैं स्तुति योग्य देवों के प्रति
व्यर्थ धारण करता हूं. हे जातवेद अग्नि देव! फिर मुझ पर तुम क्रोध क्यों करते हो? मुझ से
अतिरिक्त जो देव विरोधी राक्षस हैं, वे नाश को प्राप्त हों. (१४)
अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य.
अधा स वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह.. (१५)
हे मिथ्या आरोप लगाने वाले पुरुष! मैं यदि दूसरों को पीड़ा पहुंचाने वाला हूं अथवा मैं
ने किसी पुरुष के जीवन की हिंसा की है तो मैं इसी दिन मर जाऊं. तुम ने मुझे व्यर्थ ही
राक्षस कहा है. ऐसे तुम अपने दसों वीर पुत्रों से बिछुड़ जाओ. (१५)
यो मायातूं यातुधानेत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह.
इन्द्रस्तं हन्तु महता वधेन विश्वस्य जन्तोरधमस्पदीष्ट.. (१६)
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जिस मिथ्या आरोप लगाने वाले ने मुझ अराक्षस को राक्षस कहा है, अथवा जिस ने
राक्षस होते हुए भी अपनेआप को शुद्ध बताया है—इन दोनों असत्यवादियों को इंद्र देव अपने
वध साधन वज्र के द्वारा मारें. ये दोनों प्रकार के जन संसार के सभी प्राणियों से अधम हो कर
नष्ट हों. (१६)
प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहुस्तन्वं १ गूहमाना.
वव्रम्रनन्तमव सा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दैः.. (१७)
जो राक्षसी उलूकी के समान हमें मारने को आती है तथा जो द्रोह करने वाली राक्षसी
अपने शरीर को छिपाती हुई आती है, वह दुष्ट राक्षसी अंतहीन गड्ढे में नीचे मुंह किए हुए
गिरे. सोमलता को पीसने वाले पत्थर अपनी ध्वनियों से राक्षसों का विनाश करें. (१७)
वि तिष्ठध्वं मरुतो विश्वी ३ च्छत गृभायत रक्षसः सं पिनष्टन.
वयो ये भूत्वा पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे.. (१८)
हे मरुतो! तुम सब प्रजाओं के मध्य अनेक प्रकार से स्थित रहो तथा राक्षसों का विनाश
करने की इच्छा करो. तुम पकड़े हुए राक्षसों को भलीभांति चूर्ण कर दो. जो राक्षस पक्षी बन
कर रात में घूमते हैं अथवा जो देव संबंधी यज्ञों में हिंसा करते हों, उन राक्षसों का विनाश
करो. (१८)
प्र वर्तय दिवो ऽ श्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन्तसं शिशाधि.
प्राक्तो अपाक्तो अधरादुदक्तो ३ भि जहि रक्षसः पर्वतेन.. (१९)
हे इंद्र! अंतरिक्ष से अपना वज्र नीचे गिराओ. उस वज्र को तुम ऐसा तेज करो, जैसा
सोमदेव ने किया था. तुम उस तेज किए हुए वज्र से पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण सभी
दिशाओं में राक्षसों का विनाश करो. (१९)
एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवो ऽ दाभ्यम्.
शिशीते शक्रः पिशुनेभ्यो वधं नूनं सृजदशनिं यातुमद्भ्यः.. (२०)
इस प्रकार के जो राक्षस कुत्तों के समान खाते हुए घूमते हैं और आ कर हिंसा की इच्छा
करते हुए अपराजित इंद्र की हिंसा करना चाहते हैं, इंद्र उन राक्षसों का वध करने के लिए
अपना वज्र तेज करते हैं. वे इंद्र हिंसक राक्षसों के निमित्त निश्चय ही अपना वज्र तैयार करें.
(२०)
इन्द्रो यातूनामभवत् पराशरो हविर्मथीनामभ्या ३ विवासताम्.
अभीदु शक्रः परशुर्यथा वनं पात्रेव भिन्दन्तसत एतु रक्षसः.. (२१)
इंद्र देवों के निमित्त दिए गए हवि को चुराने वाले तथा विरोधी गतिविधि करने वाले
राक्षसों का विनाश करें. इंद्र राक्षसों को मारने के लिए इस प्रकार आक्रमण करें, जिस प्रकार
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कुल्हाड़ी वृक्षों को काटने के लिए उठती है. प्राप्त होने वाले राक्षसों को इंद्र देव मिट्टी के
बर्तनों के समान काटते हुए आएं. (२१)
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम्.
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र.. (२२)
हे इंद्र! जो राक्षस परिवारों के साथ आते हैं, जो अकेले आते हैं, जो कुत्तों, चकवों,
गरुड़ एवं गिद्ध के समान आक्रमण करते हैं, उन का विनाश करो. जिस प्रकार पत्थर से
मिट्टी का पात्र तोड़ा जाता है, उसी प्रकार अनेक आकारों में वर्तमान राक्षसों को मारो. (२२)
मा नो रक्षो अभि नड् यातुमावदपोच्छन्तु मिथुना ये किमीदिनः.
पृथिवी नः पार्थिवात् पात्वंहसो ऽ न्तरिक्षं दिव्यात् पात्वस्मान्.. (२३)
हमें हिंसक राक्षस जाति प्राप्त न करे. अब किसे खाएं, अब किसे खाएं— ऐसा कहते
हुए जो राक्षस जोड़े अर्थात् स्त्रीपुरुष घूमते हैं, वे दूर चले जाएं. पृथ्वी माता हमें राक्षस,
पिशाच आदि द्वारा किए गए पाप से बचाएं. (२३)
इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम्.
विग्रीवासो मूरदेवा ऋदन्तु मा ते दृशन्त्सूर्यमुच्चरन्तम्.. (२४)
हे इंद्र! तुम पुरुष रूपधारी राक्षस का वध करो तथा दूसरों को माया के द्वारा हिंसित
करने वाली स्त्री रूप धारिणी राक्षसी का वध करो. मृत्यु जिन के लिए खेल है, ऐसे राक्षसों
की गरदनें कट जाएं और वे मर जाएं. वे उदय होते हुए सूर्य को न देखें. (२४)
प्रति चक्ष्व वि चक्ष्वेन्द्रश्च सोम जागृतम्.
रक्षोभ्यो वधमस्यतमशनिं यातुमद्भ्यः.. (२५)
हे इंद्र एवं सोम! तुम प्रत्येक राक्षस को अपने प्रतिकूल देखो तथा विविध राक्षसों को
अपने विपरीत समझो. तुम दोनों हमारी रक्षा के लिए जाग्रत रहो और हिंसक राक्षसों के वध
के लिए अपना आयुध वज्र चलाओ. (२५)
सूक्त-५ देवता—मंत्र में बताए गए
अयं प्रतिसरो मणिवीरो वीराय बध्यते.
वीर्यवान्त्सपत्नहा शूरवीरः परिपाणः सुमङ्गलः.. (१)
तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि कृत्या राक्षसी को उसी के पास लौटा देती है, जो उसे
किसी पर जादू टोने के रूप में भेजता है. यह वीरकर्म करने वाले शत्रुओं को भगाने में समर्थ
है. यह मणि अतिशय शक्तिशालीनी, शत्रु घातक एवं यजमान की रक्षा करने वाले पुरोहित
का मंगल करने वाली है. (१)
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अयं मणिः सपत्नहा सुवीरः सहस्वान् वाजी सहमान उग्रः.
प्रत्यक् कृत्या दूषयन्नेति वीरः.. (२)
तिलक वृक्ष से निर्मित मणि शत्रु घातक, संतान देने वाली, शक्तिशालिनी, वेगवती,
शत्रुओं को पराजित करने वाली, उग्र तथा दूसरे के द्वारा भेजी गई कृत्या राक्षसी को उसी के
विरोध में भेजने वाली है. शत्रुओं को अनेक प्रकार से दूषित करने वाली यह मणि हमारे
सामने आती है. (२)
अनेनेन्द्रो मणिना वृत्रमहन्नेनासुरान् पराभावयन्मनीषी.
अनेनाजायद् द्यावापृथिवी उभे इमे अनेनाजयत् प्रदिशश्चतस्रः.. (३)
किसी भी उपाय से वृत्रासुर को मारने में असफल होने पर इंद्र ने इसी मणि को बांधने
के प्रभाव से विजय के उपाय जाने एवं राक्षसों को पराजित एवं नष्ट किया था. इंद्र ने इसी
मणि के प्रभाव से धरती और आकाश पर विजय प्राप्त की है. इसी मणि के प्रभाव से इंद्र ने
पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण-चारों दिशाओं को जीता है. (३)
अयं स्रक्त्यो मणिः प्रतीवर्तः प्रतिसरः.
ओजस्वान् विमृधो वशी सो अस्मान् पातु सर्वतः.. (४)
तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि, विरोधियों को लौटाने वाली तथा रोग आदि का विनाश
करने वाली है. शत्रु विनाशक तेज से युक्त, शत्रुओं को भगा कर युद्ध का अभाव करने वाली
एवं सब को वश में करने वाली यह मणि सभी से हमारी रक्षा करे. (४)
तदग्निराह तदु सोम आह बृहस्पतिः सविता तदिन्द्रः.
ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु.. (५)
उस अग्नि देव ने कृत्या राक्षसी को वापस लौटाने वाली मणि के विषय में मुझे बताया
है. सोम, बृहस्पति, सविता एवं इंद्र ने भी मणि के विषय में यही कहा है. अन्य प्रसिद्ध देवों
एवं पुरोहितों ने भी इस मणि के द्वारा कृत्या राक्षसी को वापस लौटाया है. (५)
अन्तर्दधे द्यावापृथिवी उताहरुत सूर्यम्.
ते मे देवाः पुरोहिताः प्रतीचीः कृत्याः प्रतिसरैरजन्तु.. (६)
मैं धरती और आकाश को तथा दिवस और सूर्य को अपने तथा कृत्या राक्षसी के मध्य
में स्थापित करता हूं. धरती, आकाश आदि देव एवं यजमान को कृत्या से बचाने वाले
पुरोहित तिलक वृक्ष से मणि के द्वारा कृत्या राक्षसी को वापस करें. (६)
ये स्रक्त्यं मणिं जना वर्मणि कृण्वते.
सूर्य इव दिवमारुह्य वि कृत्या बाधते वशी.. (७)
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कृत्या राक्षसी से बचाने वाले लोग तिलक वृक्ष से निर्मित मणि को अपना कवच बना
लेते हैं. यह मणि दूसरे द्वारा भेजी गई कृत्या का उसी प्रकार विनाश करती है, जिस प्रकार
सूर्य आकाश में पहुंच कर अंधकार का विनाश करते हैं. (७)
साक्त्येन मणिन ऋषिरणेव मनीषिणा.
अजैषं सर्वाः पृतना वि मृधो हन्मि रक्षसः.. (८)
मुझ साधक ने तिलक वृक्ष द्वारा निर्मित मणि की सहायता से पूतना नामक सभी
राक्षसियों को उसी प्रकार जीत लिया है, जिस प्रकार विद्वान् ऋषि अथवा ने जीता था. मैं
उपद्रवकारी राक्षसों को तिलक वृक्ष से निर्मित मणि के द्वारा नष्ट करता हूं. (८)
याः कृत्या आङ्गिरसीर्याः कृत्या आसुरीर्याः कृत्याः स्वयंकृता या
उचान्येभिराभृताः.
उभयीस्ताः परा यन्तु परावतो नवतिं नाव्‍या ३ अति.. (९)
जो कृत्या राक्षसियां अंगिरा ऋषि द्वारा बताई हुई विधि से प्रयुक्त हैं, जो कृत्या
राक्षसियां असुरों द्वारा निर्मित हैं, जो कृत्या राक्षसियां चित्त विकलता के कारण किसी के
द्वारा अपने ऊपर की गई हैं अथवा अन्य अभिचारकों द्वारा की गई हैं, ये दोनों प्रकार की
कृत्याएं दूर चली जाएं. कृत्याएं नौ नदियों के पार चली जाएं. (९)
अस्मै मणिं वर्म बध्नन्तु देवा इन्द्रो विष्णुः सविता रुद्रो अग्निः.
प्रजापतिः परमेष्ठी विराट् वैश्वानर ऋषयश्च सर्वे.. (१०)
इंद्र, विष्णु, सविता, रुद्र एवं अग्नि कृत्या से बचने के इच्छुक इस यजमान को कवच के
स्थान पर तिलक वृक्ष से निर्मित मणि बांधें अथवा सर्वोच्च स्थान पर विराजमान प्रजापति एवं
सभी ऋषि यजमान की रक्षा के लिए यह मणि बांधें. प्रजापति संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी तथा
सभी मनुष्यों के हितकारी हिरण्यगर्भ हैं. (१०)
उत्तमो अस्योषधीनामनड्वाञ्जगतामिव व्याघ्रः श्वपदामिव.
यमैच्छामाविदाम तं प्रतिस्पाशनमन्तितम्.. (११)
हे मणि के उपादान तिलक वृक्ष! तू सभी वृक्षों में उत्तम है, क्योंकि अन्य वृक्ष सीमित
फल के साधक हैं और तू समस्त अभिमत फल देने वाला होने के कारण उसी प्रकार श्रेष्ठ है,
जिस प्रकार बैल पालतू चौपायों में और बाघ हिंसक जंगली पशुओं में श्रेष्ठ है. हम ने जिस
की इच्छा की थी, उसे तेरी सहायता से पा लिया. मेरी इच्छित वस्तु विरोधी अभिचारक की
बाधक एवं मेरे अत्यंत समीप रहने वाली है. (११)
स इद् व्याघ्रो भवत्यथो सिंहो अथो वृषा.
अथो सपत्नकर्शनो यो बिभर्तीमं मणिम्.. (१२)
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जो पुरुष तिलक वृक्ष से निर्मित मणि को बांधता है, वह बाघ और सिंह के समान दूसरों
को पराजित करने वाला होता है. वह गायों में सांड़ के समान स्वच्छंद घूमने वाला होता है एवं
शत्रु का विनाश करता है. (१२)
नैनं घ्नन्त्यप्सरसो न गन्धर्वा न मर्त्या:.
सर्वा दिशो वि राजति यो बिभर्तीमं मणिम्.. (१३)
तिलक वृक्ष से निर्मित मणि धारण करने वाले को अप्सराएं, गंधर्व और मनुष्य कोई नहीं
मार पाता है, वह सभी दिशाओं का स्वामी होता है. (१३)
कश्यपस्त्वामसृजत कश्यपस्त्वा समैरयत्.
अबिभस्त्वेन्द्रो मानुषे बिभ्रत् संश्रेषिणे ऽ जयत्.
मणिं सहस्रवीर्यं वर्म देवा अकृण्वत.. (१४)
हे मणि! कश्यप ऋषि ने तुम्हारा निर्माण किया था और उन्हीं ने तुम्हें सब के उपकार
करने की प्रेरणा दी थी. सभी देवों के अधिपति इंद्र ने वृत्रासुर को मारने के लिए तुम्हें धारण
किया था. इसी कारण मनुष्यों में जो तुम्हें धारण करता है, वह संग्राम में विजयी होता है.
प्राचीन काल में असीमित सामर्थ्य वाली इस मणि को देवों ने अपना कवच बनाया था. (१४)
यस्त्वा कृत्याभिर्यस्त्वा दीक्षाभिर्यज्ञैर्यस्त्वा जिघांसति.
प्रत्यक् त्वमिन्द्र तं जहि वज्रेण शतपर्वणा.. (१५)
हे शांति की कामना करने वाले पुरुष! जो तुझे कृत्या संबंधीनी हिंसक क्रियाओं द्वारा
एवं यज्ञ दीक्षाओं द्वारा मारना चाहता है, तू इंद्र के समान बन कर अपने सौ पर्वों वाले वज्र के
द्वारा उसे मार डाल. (१५)
अयमिद् वै प्रतीवर्त ओजस्वान्संजयो मणि:.
प्रजां धनं च रक्षतु परिपाण: सुमङ्गल:.. (१६)
तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि निश्चय ही पाप राक्षसी कृत्या को लौटाने में समर्थ,
अतिशय ओजस्वी एवं विजय प्राप्त करने वाली है. यह मणि पुत्र, पौत्र आदि की रक्षा करे एवं
मेरी भी सभी प्रकार रक्षा करे. (१६)
असपत्नं नो अधरादसपत्नं न उत्तरात्.
इन्द्रासपत्नं न: पश्चाज्ज्योति: शूर पुरस्कृधि.. (१७)
हे इंद्र! तुम शूर हो. तुम दक्षिण दिशा से, उत्तर दिशा से पश्चिम दिशा से एवं पूर्व दिशा से
हमें विनाशक तेज प्रदान करो. (१७)
वर्म मे द्यावापृथिवी वर्मा ऽ हर्वर्म सूर्य:.
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वर्म म इन्द्रश्चाग्निश्च वर्म धाता दधातु मे.. (१८)
धरती और आकाश के देवता मेरे लिए कवच बनें. दिवस और सूर्य मेरे लिए कवच बनें.
इंद्र और अग्नि मेरे लिए कवच बनें. (१८)
ऐन्द्राग्नं वर्म बहुलं यदुग्रं विश्वे देवा नाति विध्यन्ति सर्वे.
तन्मे तन्वं त्रायतां सर्वतो बृहदायुष्मान्जरदष्टिर्यथासानि.. (१९)
इंद्र और अग्नि देवों द्वारा सम्मत मणिरूपी कवच अतिशय शक्तिशाली होता है. सभी
देव इस मणि रूपी कवच का भेदन नहीं करते अर्थात् उसे धारण करने वाले का पालन करते
हैं. इस प्रकार का मणि रूपी कवच मेरे शरीर की सभी ओर से रक्षा करे, जिस से मैं सौ वर्ष
की आयु प्राप्त करूं तथा वृद्धावस्था तक जीवित रहूं. (१९)
आ मारुक्षद् देवमणिर्मह्या अरिष्टतातये.
इमं मेथमभिसंविशध्वं तनूपानं त्रिवरूथमोजसे.. (२०)
इंद्र, अग्नि आदि देवों के द्वारा धारण की गई मणि विनाश से बचाने के लिए मेरी भुजा
में बंधी है. हे मनुष्यो! तुम भी शत्रुओं का विनाश करने वाली इस मणि का सभी प्रकार
आश्रय लो. यह मणि शरीर की रक्षा करने वाली, तीन प्रकार के आवरण से युक्त एवं बल
बढ़ाने वाली है. (२०)
अस्मिन्निन्द्रो नि दधातु नृम्णमिमं देवासो अभिसंविशध्वम्.
दीर्घायुत्वाय शतशारदायायुष्मान्जरदष्टिर्यथ ऽ सत्.. (२१)
इंद्र उस मणि में हमारा चाहा हुआ सुख स्थापित करें. हे देवो! अधिक आयु प्राप्त करने
के लिए तुम भी इस मणि के चारों ओर स्थित रहो. यह प्रार्थना सौ वर्ष की एवं वृद्धावस्था
पर्यंत आयु प्राप्त करने के लिए है. (२१)
स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी.
इन्द्रो बध्नातु ते मणिं जिगीवाँ
अपराजितः सोमपा अभयङ्करो वृषा.
स त्वा रक्षतु सर्वतो दिवा नक्तं च विश्वतः.. (२२)
अपने भक्तों का कल्याण करने वाले, देव मनुष्य रूपी प्रजाओं के पालक, वृत्र राक्षस
का वध करने वाले, अपराजित, सोम पीने वाले, अभय कर्ता एवं अभिमत फल दाता इंद्र देव
उस महिमामयी मणि को तुम्हारी भुजा में बांधें एवं तुम्हें सभी भयों से रातदिन तथा सभी
ओर से बचाएं. (२२)
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सूक्त-६ देवता—मंत्र में बताए गए मातृनामा
यौ ते मातोन्ममार्ज जातायाः पतिवेदनौ.
दुर्णामा तत्र मा गृधदलिंश उत वत्सपः.. (१)
हे गर्भिणी! तेरे जन्म लेने के समय तेरी माता ने पति को प्राप्त होने वाले जो दुर्नाम और
सुनाम नामक दो उन्मार्जन किए थे, उन में त्वचा के दोष से सुगंधित दुर्नाम तेरी इच्छा न करे
अर्थात् तुझे प्राप्त न हो तथा अलीश एवं वत्सप नामक रोग भी तुझे न हों. (१)
पलालाानुपलालौ शर्कुं कोकं मलिम्लुचं पलीजकम्.
आश्रेषं वव्रीवाससमृक्षग्रीवं प्रमीलिनम्.. (२)
गर्भिणी को पीड़ा पहुंचाने वाले जो पलाल, अनुपलाल, शर्कु, कोक, मलिम्लुच,
पलीजक, आश्लेष, वव्रीवास, ऋक्षग्रीव एवं प्रमीली नामक राक्षस हैं, मैं उन सब का विनाश
करता हूं. (२)
मा सं वृत्तो मोप सृप ऊरू माव सृपो ऽ न्तरा.
कृणोम्यस्यै भेषजं बजं दुर्नामचातनम्.. (३)
हे दुर्नाम रोग से संबंधित राक्षस! इस गर्भिणी की जंघाओं के मध्य में संकोच उत्पन्न मत
कर तथा उन के भीतर प्रवेश भी मत कर. तू गर्भिणी की जंघाओं के नीचे की ओर भी मत
खिसक. इस गर्भिणी से संबंधित सफेद सरसों के रूप में मैं जो ओषधि तैयार करता हूं, वह
दुर्नाम रोग का विनाश करने वाली है. (३)
दुर्णामा च सुनामा चोभा संवृतमिच्छतः.
अरायानप हन्मः सुनामा सैणमिच्छताम्.. (४)
दुर्नाम और सुनाम नामक दोनों रोग एक साथ ही संचरण करना चाहते हैं. मैं उन में से
दुर्नाम को नष्ट करता हूं, जो सुंदरता का विरोधी है. सुनाम स्त्री की इच्छा करने वाला हो. (४)
यः कृष्णः केश्यसुर स्तम्बज उत तुण्डिकः.
अरायानस्या मुष्काभ्यां भंससोऽप हन्मसि.. (५)
जो कृष्णकेशी, स्तंबज एवं तुंडिक नामक असुर हैं, ये सब दुर्भाग्य रूपी रोग हैं. मैं इन्हें
गर्भिणी की जंघाओं तथा कमर से दूर करता हूं. (५)
अनुजिघ्रं प्रमृशन्तं क्रव्यादमुत रेरिहम्.
अरायांछ्वकिष्किणो बजः पिङ्गो अनीनशत्.. (६)
अनुजिघ्र, प्रमृशन्त, क्रव्याद एवं रेरिह नामक जो सुंदरता विनाशक रोगों से संबंधित
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राक्षस हैं, मैं ने पीली सरसों रूपी ओषधि के द्वारा इन सभी हिंसकों का विनाश कर दिया है.
(६)
यस्त्वा स्वप्ने निपद्यते भ्राता भूत्वा पितेव च.
बजस्तान्सहतामितः क्लीबरूपांस्तिरीटिनः.. (७)
हे गर्भिणी! जो राक्षस तेरी स्वप्न अवस्था में सहोदर भ्राता एवं पिता के समान विश्वास
उत्पन्न करता हुआ गर्भ नष्ट करने के विचार से तुझ में प्रवेश करता है, मैं सफेद सरसों रूपी
ओषधि के द्वारा इन सब को तथा नपुंसक का रूप बना कर घूमने वाले सभी राक्षसों का
विनाश करता हूं. (७)
यस्त्वा स्वपन्तीं त्सरति यस्त्वा दिप्सति जाग्रतीम्.
छायामिव प्र तान्सूर्यः परिक्रामन्ननीनशत्.. (८)
हे गर्भिणी! जो राक्षस सोते समय तेरे समीप आता है अथवा जो जाग्रत अवस्था में तेरी
हिंसा करना चाहता है, यह सरसों उन सब को उसी प्रकार नष्ट कर दे, जिस प्रकार आकाश में
विचरण करने वाला सूर्य अंधकार का विनाश करता है. (८)
यः कृणोति मृतवत्सामवतोकामिमां स्त्रियम्.
तमोषधे त्वं नाशयास्याः कमलमज्जिवम्.. (९)
जो राक्षस गर्भिणी को मरे हुए पुत्र वाली बनाता है अथवा जो उसे नष्टगर्भ वाली बनाता
है, हे सरसों रूपी ओषधि! तू उस दुष्ट का विनाश कर तथा इस के गर्भ द्वार को स्पष्ट कर.
(९)
ये शालाः परिनृत्यन्ति सायं गर्दभनादिनः.
कुसूला ये च कुक्षिलाः ककुभाः करुमाः स्रिमाः.
तानोषधे त्वं गन्धेन विषूचीनान् वि नाशय.. (१०)
जो पिशाच संध्या के समय गधों के समान शब्द करते हुए घरों के चारों ओर नाचते हैं
तथा जो कुसूल के समान आकृति बना कर नाचते हैं, इन के अतिरिक्त जो बड़े पेट वाले,
अर्जुन वृक्ष के समान भयानक आकृति वाले एवं भांतिभांति के आकारों तथा ध्वनियां करने
वाले राक्षस घरों के चारों ओर नाचते हैं, हे सरसों रूपी ओषधि! तू अपनी गंध से उन सभी
विप्लवकारियों को समाप्त कर. (१०)
ये कुकुन्धाः कुकूरभाः कृत्तीर्दूशानि बिभ्रति.
क्लीबा इव प्रनृत्यन्तो वने ये कुर्वते घोषं तानितो नाशयामसि.. (११)
मुरगे के समान ध्वनि करने वाले जो ककुंध नामक पिशाच हैं तथा जो दूषित कर्म
धारण करते हैं, जो पिशाच हिजड़ों और पागलों के समान नृत्य करते हैं तथा जो वन में हल्ला
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मचाते हैं, इन सब को मैं गर्भिणी के पास से भगाता हूं. (११)
ये सूर्यं न तितिक्षन्त आतपन्तममुं दिवः.
अरायान् बस्तवासिनो दुर्गन्धींल्लोहितास्यान् मककान् नाशयामसि..
(१२)
जो विशेष प्राणी आकाश में सभी ओर चलते हुए इन सूर्य को सहन नहीं करते हैं जो
श्रीविहीन हैं, भेड़ का चमड़ा पहनते हैं, दुर्गंध वाले हैं, सदा मांस खाने के कारण जिन का मुंह
लाल रहता है एवं जिन की चाल बुरी है, ऐसे पिशाचों का मैं नाश करता हूं. (१२)
य आत्मानमतिमात्रमंस आधाय बिभ्रति.
स्त्रीणां श्रोणिप्रतोदिन इन्द्र रक्षांसि नाशय.. (१३)
जो पिशाच गर्भिणी नारियों के स्थूल शरीर को कंधे पर धारण करते हैं तथा जो गर्भिणी
स्त्रियों की कमर को अत्यधिक व्यथित करते हैं, हे इंद्र! उन राक्षसों का विनाश करो. (१३)
ये पूर्वे वध्वो ३ यन्ति हस्ते शृङ्गाणि बिभ्रतः.
आपाकेष्ठाः प्रहासिन स्तम्बे ये कुर्वते ज्योतिस्तानितो नाशयामसि.. (१४)
जो पिशाच अपने बजाने के लिए अथवा पीने के लिए अपने हाथों में सींग ले कर
अपनी पत्नियों के साथ घूमते हैं जो पाकशालाओं अथवा कुम्हारों के घरों में स्थित हैं, जो
अट्टहास करते हैं तथा जो घर के खंभों पर अग्नि का रूप बना लेते हैं, उन सब को हम
गर्भिणी के निवास स्थान से दूर भगाते हैं. (१४)
येषां पश्चात् प्रपदानि पुरः पार्ष्णीः पुरो मुखा.
खलजाः शकधूमजा उरुण्डा ये च मट्मटाः कुम्भमुष्का अयाशवः.
तानस्या ब्रह्मणस्पते प्रतीबोधेन नाशय.. (१५)
जिन राक्षसों के पंजे पीछे की ओर हैं, एड़ियां तथा मुख आगे की ओर हैं, जो खलिहान
में जन्मे हैं, जो गाय, घोड़े आदि के गोबर से उत्पन्न हुए हैं, जो शीर्ष रहित हैं, जो मुटमुट शब्द
करते हैं, जिन के मुंह घोड़े के समान हैं तथा जो वायु के समान तेज चलते हैं, हे ब्रह्मणस्पति!
उन सब को निरोध के साधन इस सरसों के द्वारा नष्ट करो. (१५)
पर्यस्ताक्षा अप्रचङ्कशा अस्रैणाः सन्तु पण्डगाः.
अव भेषज पादय य इमां संविवृत्सत्यपतिः स्वपतिं स्त्रियम्.. (१६)
इधरउधर फैली हुई आंखों वाले, पतली जंघाओं वाले एवं पैरों से न चलने वाले जो
पिशाच हैं, वे बिना स्त्रियों वाले हो जाएं. हे सरसों रूपी ओषधि! तुम उन्हें नीचे की ओर मुंह
कर के गिराओ. जो अनियंत्रित पिशाच इस पति वाली गर्भिणी स्त्री को वश में करना चाहते
हैं, उन का विनाश करो. (१६)
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