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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 429 of 1063

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Page 429

अग्नेः शरीरमसि पारयिष्णु रक्षोहासि सपत्नहा.
अथो अमीवचातनः पूतुद्रुर्नाम भेषजम्.. (२८)
हे पूतद्रु नामक वृक्ष! तू अग्नि से व्याप्त शरीर वाला है. तू राक्षसों और शत्रुओं का
विनाशक है तथा रोग को बाहर निकालने वाला है. (२८)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म.
शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (१)
मैं राक्षसों का हनन करने वाले एवं बल के साधन अन्न से युक्त अग्नि के लिए हवन
करता हूं. यज्ञ के द्वारा मैं मित्र बने हुए विस्तार को प्राप्त अग्नि की शरण जाता हूं. तीक्ष्ण
ज्वालाओं वाले वे अग्नि देव आज्य आदि के द्वारा प्रज्वलित हों. इस प्रकार के अग्नि देव दिन
में हिंसा करने वाले से हमारी रक्षा करें. (१)
अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः.
आ जिह्वया मूरदेवान् रभस्व क्रव्यादो वृष्ट्वापि धत्स्वासन्.. (२)
हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! हमारे द्वारा किए हुए घृत आदि से भलीभांति
प्रज्वलित हो कर तुम लोहे के दांतों के समान अपनी ज्वालाओं के द्वारा राक्षसों को जला दो.
जादूटोने के द्वारा जो दूसरों की हत्या का खेल खेलते हैं, उन्हें तुम अपनी जीभ से स्पर्श करो
तथा मांस भक्षक राक्षस पिशाच आदि का विनाश कर के अपना मुख बंद कर लो. (२)
उभोभयाविन्नुप धेहि दंष्ट्रौ हिंस्रः शिशानो ऽ वरं परं च.
उतान्तरिक्षे परि याह्यग्ने जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्.. (३)
यह रक्षा करने योग्य है और यह मारने योग्य है—इन दो प्रकार के ज्ञान वाले हे अग्नि
देव! तुम हिंसक एवं तीखी ज्वालाओं वाले हो. तुम हमारे शत्रु एवं हमारे द्वारा द्वेष किए गए
पुरुष को अपनी दोनों दाढ़ों के बीच में रख लो. इस के पश्चात तुम आकाश में विचरण करो.
हे अग्नि देव! मुझे बाधा पहुंचाने के निमित्त घूमते हुए राक्षसों को दांतों से चबा डालो. (३)
अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंसा ऽ शनिर्हरसा हन्त्वेनम्.
प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात् क्रविष्णुर्वि चिनोत्वेनम्.. (४)
हे अग्नि देव! तुम राक्षसों की त्वचा का छेदन करो. तुम्हारा हिंसक वज्र अपने ताप से
इन राक्षसों की हत्या करे. हे जातवेद अग्नि! राक्षसों के जोड़ों को अलगअलग कर दो. इस के
पश्चात भक्षक भेड़िया मांस की इच्छा करता हुआ इन्हें खींच कर ले जाए. (४)
यत्रेदानीं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्.
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