अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 436 of 1063
Read in contextजाए. (१०)
परः सो अस्तु तन्वा ३ तना च तिस्रः पृथिवीरधो अस्तु विश्वाः.
प्रति शुष्यतु यशो अस्य देवा यो मा दिवा दिप्सति यश्च नक्तम्.. (११)
हे देवो! वह राक्षस अपने शरीर से और अपने पुत्रों से अलग हो जाए. वह तीनों प्रकार
की पृथ्वी के नीचे पहुंचे अर्थात् नरक को प्राप्त हो. उस पापी का अन्न एवं यश नष्ट हो जाए.
जो द्वेषकर्ता दिन अथवा रात में मुझे मारना चाहता है, उस का विनाश करो. (११)
सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच वचसी पस्पृधाते.
तयोर्यत् सत्यं यतरदृजीयस्तदित् सोमो ऽ वति हन्त्यासत्.. (१२)
विद्वान् को सत्य और असत्य वचन जानना सरल होता है. सत्य और असत्य वचन
परस्पर विरुद्ध होते हैं. इन सत्य और असत्य वचनों में जो यथार्थ है और जो सरल है,
सोमदेव उस की रक्षा करते हैं तथा असत्य वचन का विनाश करते हैं. (१२)
न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति न क्षत्रियं मिथुया धारयन्तम्.
हन्ति रक्षो हन्त्यासद् वदन्मुभाविन्द्रस्य प्रसितौ शयाते.. (१३)
सोमदेव पापी राक्षस को जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. असत्य को धारण करने
वाले पापी राक्षस को भी सोमदेव जीवित रहने के लिए नहीं छोड़ते हैं. सोमदेव राक्षस का
विनाश करते हैं और असत्यवादी का भी विनाश करते हैं. ये दोनों इंद्र के पाश में बंध जाते हैं.
(१३)
यदि वा हमनृतदेवो अस्मि मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने.
किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोधवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम्.. (१४)
हे अग्नि देव! न तो मैं देवों की निंदा करने वाला हूं तथा न मैं स्तुति योग्य देवों के प्रति
व्यर्थ धारण करता हूं. हे जातवेद अग्नि देव! फिर मुझ पर तुम क्रोध क्यों करते हो? मुझ से
अतिरिक्त जो देव विरोधी राक्षस हैं, वे नाश को प्राप्त हों. (१४)
अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य.
अधा स वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह.. (१५)
हे मिथ्या आरोप लगाने वाले पुरुष! मैं यदि दूसरों को पीड़ा पहुंचाने वाला हूं अथवा मैं
ने किसी पुरुष के जीवन की हिंसा की है तो मैं इसी दिन मर जाऊं. तुम ने मुझे व्यर्थ ही
राक्षस कहा है. ऐसे तुम अपने दसों वीर पुत्रों से बिछुड़ जाओ. (१५)
यो मायातूं यातुधानेत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह.
इन्द्रस्तं हन्तु महता वधेन विश्वस्य जन्तोरधमस्पदीष्ट.. (१६)
ebook converter DEMO Watermarks*