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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 442 of 1063

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Page 442

वर्म म इन्द्रश्चाग्निश्च वर्म धाता दधातु मे.. (१८)
धरती और आकाश के देवता मेरे लिए कवच बनें. दिवस और सूर्य मेरे लिए कवच बनें.
इंद्र और अग्नि मेरे लिए कवच बनें. (१८)
ऐन्द्राग्नं वर्म बहुलं यदुग्रं विश्वे देवा नाति विध्यन्ति सर्वे.
तन्मे तन्वं त्रायतां सर्वतो बृहदायुष्मान्जरदष्टिर्यथासानि.. (१९)
इंद्र और अग्नि देवों द्वारा सम्मत मणिरूपी कवच अतिशय शक्तिशाली होता है. सभी
देव इस मणि रूपी कवच का भेदन नहीं करते अर्थात् उसे धारण करने वाले का पालन करते
हैं. इस प्रकार का मणि रूपी कवच मेरे शरीर की सभी ओर से रक्षा करे, जिस से मैं सौ वर्ष
की आयु प्राप्त करूं तथा वृद्धावस्था तक जीवित रहूं. (१९)
आ मारुक्षद् देवमणिर्मह्या अरिष्टतातये.
इमं मेथमभिसंविशध्वं तनूपानं त्रिवरूथमोजसे.. (२०)
इंद्र, अग्नि आदि देवों के द्वारा धारण की गई मणि विनाश से बचाने के लिए मेरी भुजा
में बंधी है. हे मनुष्यो! तुम भी शत्रुओं का विनाश करने वाली इस मणि का सभी प्रकार
आश्रय लो. यह मणि शरीर की रक्षा करने वाली, तीन प्रकार के आवरण से युक्त एवं बल
बढ़ाने वाली है. (२०)
अस्मिन्निन्द्रो नि दधातु नृम्णमिमं देवासो अभिसंविशध्वम्.
दीर्घायुत्वाय शतशारदायायुष्मान्जरदष्टिर्यथ ऽ सत्.. (२१)
इंद्र उस मणि में हमारा चाहा हुआ सुख स्थापित करें. हे देवो! अधिक आयु प्राप्त करने
के लिए तुम भी इस मणि के चारों ओर स्थित रहो. यह प्रार्थना सौ वर्ष की एवं वृद्धावस्था
पर्यंत आयु प्राप्त करने के लिए है. (२१)
स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी.
इन्द्रो बध्नातु ते मणिं जिगीवाँ
अपराजितः सोमपा अभयङ्करो वृषा.
स त्वा रक्षतु सर्वतो दिवा नक्तं च विश्वतः.. (२२)
अपने भक्तों का कल्याण करने वाले, देव मनुष्य रूपी प्रजाओं के पालक, वृत्र राक्षस
का वध करने वाले, अपराजित, सोम पीने वाले, अभय कर्ता एवं अभिमत फल दाता इंद्र देव
उस महिमामयी मणि को तुम्हारी भुजा में बांधें एवं तुम्हें सभी भयों से रातदिन तथा सभी
ओर से बचाएं. (२२)
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