अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 441 of 1063
Read in contextजो पुरुष तिलक वृक्ष से निर्मित मणि को बांधता है, वह बाघ और सिंह के समान दूसरों
को पराजित करने वाला होता है. वह गायों में सांड़ के समान स्वच्छंद घूमने वाला होता है एवं
शत्रु का विनाश करता है. (१२)
नैनं घ्नन्त्यप्सरसो न गन्धर्वा न मर्त्या:.
सर्वा दिशो वि राजति यो बिभर्तीमं मणिम्.. (१३)
तिलक वृक्ष से निर्मित मणि धारण करने वाले को अप्सराएं, गंधर्व और मनुष्य कोई नहीं
मार पाता है, वह सभी दिशाओं का स्वामी होता है. (१३)
कश्यपस्त्वामसृजत कश्यपस्त्वा समैरयत्.
अबिभस्त्वेन्द्रो मानुषे बिभ्रत् संश्रेषिणे ऽ जयत्.
मणिं सहस्रवीर्यं वर्म देवा अकृण्वत.. (१४)
हे मणि! कश्यप ऋषि ने तुम्हारा निर्माण किया था और उन्हीं ने तुम्हें सब के उपकार
करने की प्रेरणा दी थी. सभी देवों के अधिपति इंद्र ने वृत्रासुर को मारने के लिए तुम्हें धारण
किया था. इसी कारण मनुष्यों में जो तुम्हें धारण करता है, वह संग्राम में विजयी होता है.
प्राचीन काल में असीमित सामर्थ्य वाली इस मणि को देवों ने अपना कवच बनाया था. (१४)
यस्त्वा कृत्याभिर्यस्त्वा दीक्षाभिर्यज्ञैर्यस्त्वा जिघांसति.
प्रत्यक् त्वमिन्द्र तं जहि वज्रेण शतपर्वणा.. (१५)
हे शांति की कामना करने वाले पुरुष! जो तुझे कृत्या संबंधीनी हिंसक क्रियाओं द्वारा
एवं यज्ञ दीक्षाओं द्वारा मारना चाहता है, तू इंद्र के समान बन कर अपने सौ पर्वों वाले वज्र के
द्वारा उसे मार डाल. (१५)
अयमिद् वै प्रतीवर्त ओजस्वान्संजयो मणि:.
प्रजां धनं च रक्षतु परिपाण: सुमङ्गल:.. (१६)
तिलक वृक्ष से निर्मित यह मणि निश्चय ही पाप राक्षसी कृत्या को लौटाने में समर्थ,
अतिशय ओजस्वी एवं विजय प्राप्त करने वाली है. यह मणि पुत्र, पौत्र आदि की रक्षा करे एवं
मेरी भी सभी प्रकार रक्षा करे. (१६)
असपत्नं नो अधरादसपत्नं न उत्तरात्.
इन्द्रासपत्नं न: पश्चाज्ज्योति: शूर पुरस्कृधि.. (१७)
हे इंद्र! तुम शूर हो. तुम दक्षिण दिशा से, उत्तर दिशा से पश्चिम दिशा से एवं पूर्व दिशा से
हमें विनाशक तेज प्रदान करो. (१७)
वर्म मे द्यावापृथिवी वर्मा ऽ हर्वर्म सूर्य:.
ebook converter DEMO Watermarks*