अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-६ देवता—मंत्र में बताए गए मातृनामा
यौ ते मातोन्ममार्ज जातायाः पतिवेदनौ.
दुर्णामा तत्र मा गृधदलिंश उत वत्सपः.. (१)
हे गर्भिणी! तेरे जन्म लेने के समय तेरी माता ने पति को प्राप्त होने वाले जो दुर्नाम और
सुनाम नामक दो उन्मार्जन किए थे, उन में त्वचा के दोष से सुगंधित दुर्नाम तेरी इच्छा न करे
अर्थात् तुझे प्राप्त न हो तथा अलीश एवं वत्सप नामक रोग भी तुझे न हों. (१)
पलालाानुपलालौ शर्कुं कोकं मलिम्लुचं पलीजकम्.
आश्रेषं वव्रीवाससमृक्षग्रीवं प्रमीलिनम्.. (२)
गर्भिणी को पीड़ा पहुंचाने वाले जो पलाल, अनुपलाल, शर्कु, कोक, मलिम्लुच,
पलीजक, आश्लेष, वव्रीवास, ऋक्षग्रीव एवं प्रमीली नामक राक्षस हैं, मैं उन सब का विनाश
करता हूं. (२)
मा सं वृत्तो मोप सृप ऊरू माव सृपो ऽ न्तरा.
कृणोम्यस्यै भेषजं बजं दुर्नामचातनम्.. (३)
हे दुर्नाम रोग से संबंधित राक्षस! इस गर्भिणी की जंघाओं के मध्य में संकोच उत्पन्न मत
कर तथा उन के भीतर प्रवेश भी मत कर. तू गर्भिणी की जंघाओं के नीचे की ओर भी मत
खिसक. इस गर्भिणी से संबंधित सफेद सरसों के रूप में मैं जो ओषधि तैयार करता हूं, वह
दुर्नाम रोग का विनाश करने वाली है. (३)
दुर्णामा च सुनामा चोभा संवृतमिच्छतः.
अरायानप हन्मः सुनामा सैणमिच्छताम्.. (४)
दुर्नाम और सुनाम नामक दोनों रोग एक साथ ही संचरण करना चाहते हैं. मैं उन में से
दुर्नाम को नष्ट करता हूं, जो सुंदरता का विरोधी है. सुनाम स्त्री की इच्छा करने वाला हो. (४)
यः कृष्णः केश्यसुर स्तम्बज उत तुण्डिकः.
अरायानस्या मुष्काभ्यां भंससोऽप हन्मसि.. (५)
जो कृष्णकेशी, स्तंबज एवं तुंडिक नामक असुर हैं, ये सब दुर्भाग्य रूपी रोग हैं. मैं इन्हें
गर्भिणी की जंघाओं तथा कमर से दूर करता हूं. (५)
अनुजिघ्रं प्रमृशन्तं क्रव्यादमुत रेरिहम्.
अरायांछ्वकिष्किणो बजः पिङ्गो अनीनशत्.. (६)
अनुजिघ्र, प्रमृशन्त, क्रव्याद एवं रेरिह नामक जो सुंदरता विनाशक रोगों से संबंधित
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