अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतदग्ने चक्षुः प्रति धेहि रेभे शफारुजो येन पश्यसि यातुधानान्.
अथर्ववज्ज्योतिषा दैव्येन सत्यं धूर्वन्तमचितं न्योष.. (२१)
हे अग्नि देव! तुम शब्द करते हुए राक्षस पर अपनी वह दृष्टि डालो अर्थात् उसे जला दो,
जिस से तुम पशु रूपधारी राक्षसों को देखते हो. अथर्वा नाम के महर्षि ने अपने तप और मंत्र
के प्रभाव से जिस प्रकार राक्षस को जलाया, उसी प्रकार तुम भी अपनी दिव्य ज्योति से सत्य
की हिंसा करने वाले एवं ज्ञानहीन राक्षसों को पूरी तरह जला दो. (२१)
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भङ्गुरावतः.. (२२)
हे सबको पराजित करने वाले अग्नि देव! हम तुम्हारा सभी प्रकार से ध्यान करते हैं.
तुम अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले, मेधावी, अधिक वर्षा युक्त तथा प्रतिदिन गिरते हुए बल और
स्वभाव वाले राक्षसों के हंता हो. (२२)
विषेण भङ्गुरावतः प्रति स्म रक्षसो जहि.
अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिरर्चिभिः.. (२३)
हे अग्नि देव! विष के समान विनाशक अपने तीखे तेज से भग्नचरित्र वाले राक्षसों का
विनाश करो. तुम उन्हें अपनी ताप युक्त ज्वालाओं से भी जलाओ. (२३)
वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निरविर्विश्वानि कृणुते महित्वा.
प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षोभ्यो विनिक्षे.. (२४)
ये अग्नि देव महान तेज से प्रकाशित हैं. हे अग्नि देव! अपने तेजों की अधिकता से तुम
समस्त प्राणियों को प्रकट करते हो. ये अग्नि देव राक्षसों से संबंधित और कष्ट से जानने योग्य
मायाओं का पूर्णतया विनाश करते हैं तथा राक्षसों के विनाश के लिए अपने सींग पैने करते
हैं. (२४)
ये ते शृङ्गे अजरे जातवेदस्तिग्महेती ब्रह्मसंशिते.
ताभ्यां दुर्हार्दमभिदासन्तं किमीदिनं प्रत्यञ्चमर्चिषा जातवेदो वि निक्ष्व..
(२५)
हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे जो प्रसिद्ध सींग हैं, उन के द्वारा तुम अपने विरोधियों का
विनाश करो. तुम्हारे सींग जरा रहित, तीखे आयुधों के समान एवं हमारे मंत्रों के द्वारा
शक्तिशाली बनाए गए हैं. तुम दुष्ट हृदय वाले सब के विनाशक एवं यह कौन है, यह कौन है,
इस प्रकार बोल कर विनाश करने वाले राक्षसों को मारो. (२५)
अग्नी रक्षांसि सेधति शुक्रशोचिरमर्त्यः. शुचिः पावक ईड्यः.. (२६)