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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
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चौदहवाँ प्रकरण । २०३

पदच्छेदः ।

क्व, धनानि, क्व, मित्राणि, क्व, मे, विषयदस्यवः, क्व,
शास्त्रम्, क्व, च, विज्ञानम्, यदा, मे, गलिता, स्पृहा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा= जबमित्राणि= मित्र है
मे= मेरीक्व= कहाँ
स्पृहा= इच्छाविषयदस्यवः= विषय-रूपी चोर है
गलिता= गलिता हो गई हैक्व= कहाँ
तदा= तबशास्त्रम्= शास्त्र है
मे= मेरे कोच= और
क्व= कहाँक्व= कहाँ
धनानि= धन हैविज्ञानम्= ज्ञान है
क्व= कहाँ

भावार्थ ।

जनकजी कहते हैं कि विषयों की भावना से शून्य चित्तवाला मैं हूँ, मुझ पूर्णात्मदर्शी को जब विषय-भोगों की इच्छा नष्ट हो गई है, तब मेरा धन कहाँ है ? मेरे मित्र कहाँ हैं ? शास्त्र का अभ्यास कहाँ है ? और निदिध्यासनादिक कहाँ है ? मेरी तो किसी में भी आस्थाबुद्धि नहीं रही ॥ २ ॥

मूलम् ।

विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्तामुक्तये मम ॥ ३ ॥

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२०४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

विज्ञाते, साक्षिपुरुषे, परमात्मनि, च, ईश्वरे, नैराश्ये, बन्धमोक्ष, च, न, चिन्ता, मुक्तये, मम ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
साक्षिपुरुषे='त्वं' पद का अर्थ साक्षी पुरुष अर्थात् जीव हैनैराश्ये=आशा-रहित
च=औरबन्धमोक्षे=बन्ध के मोक्ष होने पर
परमात्मनि=तत्पद का अर्थ परमात्मा हैमम=मुझको
ईश्वरे=ईश्वर केमुक्तये=मुक्ति के लिये
विज्ञाते=जानने परचिन्ता=चिन्ता
न=नहीं है ॥

भावार्थ ।

देह और इन्द्रियों का साक्षी पुरुष जो 'त्वं' पद का अर्थ है, और तत्पद का अर्थ जो परमात्मा ईश्वर है, इन दोनों के लक्ष्यार्थ चेतन का 'तत्त्वमसि' महावाक्य और भागत्याग-लक्षणा करके साक्षात्कार करने से और बंध और मोक्ष में भी इच्छा के अभाव होने से मुक्ति के निमित्त भी विद्वान् को कोई चिन्ता बाकी नहीं रहती है ।

प्रश्न— महावाक्य का लक्षण क्या है ? और लक्षणा का अर्थ क्या है ?

उत्तर— वेद में दो प्रकार के वाक्य हैं—एक अवान्तर्वाक्य हैं, दूसरे महावाक्य हैं । दोनों के लक्षण को दिखाते हैं—

स्वरूपबोधकं वाक्यमवान्तर्वाक्यम् ।

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चौदहवाँ प्रकरण । २०५

आत्मा के स्वरूप का बोधक जो वाक्य है, उसका नाम
अवान्तरवाक्य है । जैसे—
“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म”
आत्मा ब्रह्मसद्रूप है, ज्ञान-स्वरूप है, अनन्त-स्वरूप है ।
यह वाक्य तो केवल आत्मा के स्वरूप को ही बोधन
करता है, इसी वास्ते इसका नाम अवान्तरवाक्य है ।
अभेदबोधकं वाक्यं महावाक्यम् ।
अभेद का बोधक जो वाक्य है, उसी का नाम महा-
वाक्य है । जैसे—
ब्रह्माहमस्मि ।
मैं ही ब्रह्म हूँ ।
अयमात्माब्रह्म ।
यह अपना आत्मा ही ब्रह्म है ।
तत्त्वमसि ।
तत् = वही अर्थात् ईश्वर । त्वं = तू अर्थात् जीव ।
असि = है, ये सब वाक्य जीव और ईश्वर की अभेदता को
ही बोधन करते हैं, इसी से इनका नाम महावाक्य है ।
अब लक्षणा को दिखाते हैं—
पद के अर्थ का ज्ञान दो तरह से होता है । एक तो
शक्तिवृत्ति करके होता है, जैसे किसी ने किसी से कहा

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२०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

"घटमानय" अर्थात् घट को लाओ । अब यहाँ पर 'घट'-पद
की शक्ति कम्बुग्रीवादिवाली व्यक्ति में है, अर्थात् घड़े में है
और लानेवाले को भी उसका ज्ञान है कि घड़े के लाने को
दूसरा पुरुष कहता है । वह 'घटमानय' शब्द को सुनकर
तुरन्त घड़े को उठा लाता है यहाँ पर तो शक्ति-वृत्ति करके
पद के अर्थ का बोध होता है । और जहां पर शक्ति-वृत्ति
करके बोध नहीं होता है, वहाँ पर लक्षणावृत्ति करके पद के
अर्थ का बोध होता है, सो दिखाते हैं ।

शक्यसम्बन्धो हि लक्षणा ।

शक्ति के आश्रय का नाम शक्य है, अर्थात् पद जिस
अर्थ को बोधन करे, उस अर्थ का नाम शक्य है ।

दृष्टान्त ।

किसी ने एक गुवाल से पूछा, तेरा मकान कहाँ है ।
उसने कहा—गंगायां घोषः । अर्थात् मेरा मकान गंगा में है ।

अब यहाँ पर शक्तिवृत्ति करके तो अर्थ नहीं बनता है,
क्योंकि 'गंगा' पद की शक्ति प्रवाह में है, अर्थात् 'गंगा' पद
का अर्थ जल का प्रवाह है । उस प्रवाह में मकान का होना
असंभव है, इस वास्ते यहाँ पर जो लक्षणा करके अर्थ का
बोध होता है, उसको दिखाते हैं—'गंगा' पद का शक्य प्रवाह
है, उसका सम्बन्ध तीर के साथ है, इस वास्ते गंगा के तीर
पर इसका ग्राम है—'गंगायां घोषः' इस पद से ऐसा बोध
होता है । और तात्पर्यानुपपत्ति लक्षणा में बीज है । जिस

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चौदहवाँ प्रकरण । २०७

अर्थ में वक्ता के तात्पर्य की असिद्धि हो, वहाँ पर ही लक्षणा होती है । 'गंगायां घोषः' यहाँ पर गंगा के प्रवाह में मेरा ग्राम है, ऐसा वक्ता का तात्पर्य नहीं है, क्योंकि ऐसा हो नहीं सकता है, इसी वास्ते—'गंगायां घोषः' में लक्षणा होती है ।

अब लक्षणा के भेद को दिखलाते हैं—

वाच्यार्थमशेषतया परित्यज्य तत्सम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिर्जहल्लक्षणा ।

जहाँ पर वाच्यार्थ का समग्ररूप से त्याग करके तत्सम्बन्धी अर्थान्तर में वृत्ति हो, वहाँ पर जहल्लक्षणा होती है । जैसे—गंगायां घोषः । यहाँ पर गंगा पद का वाच्यार्थ जो प्रवाह है, उसका समग्ररूप से त्याग करके उसके साथ सम्बन्धवाला जो तीर है, उस तीर में गंगा पद की लक्षणा होती है, अर्थात् गंगा के तोर पर इसका ग्राम है । घोष नाम अहीरों के ग्राम का है ।

वाच्यार्थापरित्यागेन तत्सम्बन्धिन्यर्थान्तरे वृत्तिरजहल्लक्षणा ।

जहाँ पर वाच्यार्थ का त्याग न करके उसके सम्बन्धवाले का भी ग्रहण हो, वहाँ पर अजहल्लक्षणा होती है ।

किसी के गृह में दण्डी संन्यासियों का निमन्त्रण था । वहाँ पर जाकर दण्डी लोग बाहर बैठे । जब भोजन तैयार हुआ, तब मालिक ने अपने नौकर से कहा कि—यष्टी प्रवेशय । अर्थात् लाठी का भीतर प्रवेश कराओ ।

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२०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अब यहाँ पर लाठी का भीतर प्रवेश तो बन सकता है, परन्तु उस में वक्ता का तात्पर्य नहीं है, किन्तु यष्टिधर के प्रवेश कराने में वक्ता का तात्पर्य है, इस वास्ते 'यष्टी'-पद का वाच्यार्थ यष्टि है, उसका त्याग न करके उसके साथ सम्बन्धवाला जो पुरुष है, उस पुरुष में जो लक्षणा करनी है, इसी का नाम अजहल्लक्षणा है ।

वाच्यार्थैकदेशपरित्यागे नैकदेशवृत्तिर्जहदजहल्लक्षणा ।

अर्थात् वाच्यार्थ के एकदेश को त्याग करके एकदेश का ग्रहण करना जो है, इसी का नाम जहत् अजहत् लक्षणा है जैसे—'तत्त्वमसि' ।

यहाँ पर 'तत्' पद का वाच्यार्थ सर्वज्ञत्वादिक गुणों करके युक्त ईश्वर चेतन है, और 'त्वं' पद का वाच्यार्थ अल्पज्ञत्वादिक गुणों करके युक्त जीव चेतन है । 'तत्' वह सर्वज्ञत्वादि गुणवाला ईश्वर 'त्वं' तू अल्पज्ञत्वादि गुणवाला जीव, ये जो दोनों के वाक्यार्थ हैं इनका अभेद नहीं हो सकता है, पर दोनों का लक्ष्यार्थ जो गुणों से रहित केवल चेतन है, उसी का अभेद हो सकता है, सो अभेद जहद् अजहद् अर्थात् भागत्यागलक्षणा करके ही होता है । तत्पद के वाच्यार्थ का जो एकदेश सर्वज्ञत्वादिक गुण हैं, उनके त्याग करने से, और त्वं पद के वाच्यार्थ का जो एकदेश अल्पज्ञत्वादिक गुण हैं उनके भी त्याग करने से, दोनों पदों विषे एक जो लक्ष्यार्थ चेतन स्थित है, उसके ग्रहण करने से दोनों का अर्थात् ईश्वर और जीव का अभेद केवल चेतन में

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चौदहवाँ प्रकरण । २०९

होता है, सो जिस विद्वान् ने महाकाव्यों करके और भाग-
त्यागलक्षणा करके जीव ईश्वर की अभेदता को जान लिया
है, वही मुक्त है, उसको मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं
है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

अन्तर्विकल्पशून्यस्य, बहिः, स्वच्छन्दचारिणः, भ्रान्तस्य, इव, दशाः, ताः, ताः, तादृशा, एव, जानते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$अन्तर्विकल्प-\ शून्यस्य = जो अन्तःकरण में विकल्प से शून्य है$\begin{aligned}स्वच्छन्द-\ चारिणः\end{aligned} = स्वतंत्र चलनेवाले की
च=और (जो)ताः ताः=उन उन
बहिः=बाहरदशाः=दशाओं को
$भ्रान्तस्य इव = भ्रान्त हुए पुरुष की नाईं है ऐसे$तादृशाः एव = वैसे ही दशावाले पुरुष
जानते=जानते हैं ॥

भावार्थ ।

जिस पुरुष का अन्तःकरण विकल्प अर्थात् संकल्प से रहित है, अर्थात् जिसको कोई भी विषय-वासना भीतर से

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२१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

नहीं फुरती है, और बाहर से जो उन्मत्त की तरह स्वेच्छा-
पूर्वक विहार करता है, वही ज्ञानी है । उसको ज्ञानी पुरुष
ही जानता है, दूसरा अज्ञानी पुरुष नहीं जान सकता
है ॥ ४ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां चतुर्दशप्रकरणं समाप्तम् ॥

—:०:—

पन्द्रहवाँ प्रकरण (तत्त्वोपदेश)

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पन्द्रहवाँ प्रकरण।

---:०:---

मूलम्।

यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति ॥ १ ॥

पदच्छेदः।

यथातथोपदेशेन, कृतार्थः, सत्त्वबुद्धिमान्, आजीवम्, अपि, जिज्ञासु, परः, तत्र, विमुह्यति ॥

अन्वयः।शब्दार्थ ।अन्वयः।शब्दार्थ ।
सत्त्वबुद्धिमान् =सत्त्वबुद्धिवाला पुरुषआजीवम् =जीवनपर्यन्त
यथातथोपदेशेन =जैसे-जैसे याने थोड़े ही उपदेश सेजिज्ञासुःअपि =जिज्ञासु होता हुआ भी
कृतार्थः =कृतार्थतत्र =उसमें
भवति =होता हैविमुह्यति =मोह को प्राप्त होता है ॥
परः =असत् बुद्धिवाला पुरुष

भावार्थ।

अब तत्त्वोपदेशविंशतिक नामक पंचदश प्रकरण का आरम्भ करते हैं—
अष्टावक्रजी जनकजी की ज्ञानस्थिति के लिये पुनः-पुनः उपदेश करते हैं। क्योंकि 'छांदोग्योपनिषद्' में श्वेतकेतु के प्रति, श्वेतकेतु के पिता ने नव बार आत्मतत्त्व का उपदेश किया है।
प्रथम ज्ञान के अधिकारी और अनधिकारी को दिखाते हैं—

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२१२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उत्तम बुद्धिमान् शिष्य सामान्य उपदेश करके आत्म-बोध को प्राप्त हो जाता है अर्थात् कृतार्थ हो जाता है। सत्युग में केवल ओंकार के उपदेश से उत्तम शिष्य कृतार्थ हो गये हैं और निकृष्टबुद्धिवाला शिष्य मरणपर्यन्त उपदेश को सुनता रहता है, पर उसको यथार्थ बोध नहीं होता है। जैसे विरोचन को ब्रह्मा ने अनेक बार उपदेश किया तो भी वह बोध को न प्राप्त हुआ।

संसार में तीन प्रकार के अधिकारी हैं। एक तो उत्तम अधिकारी है, जिसको एक बार गुरु के मुख से महावाक्य के श्रवण करने से बोध हो जाता है। दूसरा मध्यम अधिकारी है, जिसको बारबार श्रवण, मननादिकों के करने से बोध होता है। तीसरा निकृष्ट अधिकारी है, जो चिरकाल तक शास्त्रों का श्रवण और उपासना आदिकों को करके बोध को प्राप्त होता है।

मोक्ष के अधिकारियों को दिखलाते हैं-

शान्तो दान्तः क्षमी शूरः सर्वेन्द्रियसन्वितः ।
असक्तो ब्रह्मज्ञानेच्छुः सदा साधुसमागमः ॥ १ ॥
साधुबुद्धिः सदाचारी यो भेदः सर्वदैवते ।
आशा पाशविनिर्मुक्तस्त्वेते मोक्षाधिकारिणः ॥ २ ॥

जो शान्त चित्त है, जो इन्द्रियों को दमन करनेवाला है, परंतु संपूर्ण इन्द्रियों करके युक्त है, जो पदार्थों में आसक्ति से रहित है, जो ब्रह्मज्ञान की इच्छावाला होकर सदैव महात्माओं का संग करता है, जो सुन्दर बुद्धिवाला और

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पन्द्रहवां प्रकरण । २१३

श्रेष्ठाचारवाला है, जो संपूर्ण देवताओं में एक ही चेतन को
जानता है, जो विषयों के आशा-रूपी पाश से रहित है, वह
मोक्ष का अधिकारी है । जिसमें ऊपर कहे हुए गुणों में से
कोई भी गुण नहीं घटता है, वह मोक्ष का अधिकारी नहीं
है ॥ १ ॥

मूलम् ।
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः ।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।
मोक्षः, विषयवैरस्यम्, बन्धः, वैषयिकः, रसः, एतावत्,
एव, विज्ञानम्, यथा, इच्छसि, तथा कुरु ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
विषयवैरस्यम् = विषयों से वैराग्यएतावत् एव = इतना ही
मोक्षः = मोक्ष हैविज्ञानम् = ज्ञान है
वैषयिकः = विषय-सम्बन्धीयथा इच्छसि = जैसा चाहे
रसः = रसतथा = वैसा
बन्धः = बन्ध हैकुरु = ( तू ) कर

भावार्थ ।
अब बंध और मोक्ष के उपाय को संक्षेप से निरूपण
करते हैं—
विषयों में जो अनुराग है वही बंध है और विषयों में
जो अनुराग का त्याग है, वही मोक्ष है । ऐसा कहा भी है—
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।

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२१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

बंधाय विषयासक्तं मुक्तयै निर्विषये स्मृतम् ॥ १ ॥

मनुष्यों का मन ही बंध और मोक्ष का कारण है। विषयों में जब मन आसक्त हो जाता है, तब वह मन बंध का हेतु होता है । जब विषयों की आसक्ति से रहित होता है, तब वही मन मुक्ति का हेतु होता है ॥ १ ॥

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इतना ही बंध-मोक्ष का विशेष ज्ञान है । इसको तुम भली प्रकार जानकर जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा तुम करो ॥ २ ॥

मूलम् ।

वाग्मि प्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम् ।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगम्, जनम्, मूकजडालसम्, करोति, तत्त्वबोधः अयम्, अतः, त्यक्तः, बुभुक्षुभिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अयम् =यहकरोति =करता है
तत्त्वबोधः =तत्त्वज्ञानअतः =इसी कारण
वाग्मिप्राज्ञम-होद्योगम् =अत्यन्त बोलने वाले पण्डित महाउद्योगीबुभुक्षुभिः =भोगाभिलाषी पुरुषों करके
जनम् =पुरुष कोअयम् =यह
मूकजडालसम् =गूँगा जड़ और आलसीत्यक्तः =त्याग किया गया है ॥
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पन्द्रहवाँ प्रकरण । २१५

भावार्थ ।
हे प्रियदर्शन ! तत्त्वज्ञान के सिवा किसी अन्य उपाय से विषया-सक्ति का नाश नहीं होता है। यह जो आत्मबोध है, वह बहुत बोलचालवाले चतुर को मूक कर देता है, और जो बड़ा बुद्धिमान् अनेक प्रकार के ज्ञान करके युक्त हो, उसको जड़ बना देता है, और बड़े उद्योगी को क्रिया से रहित आलसी बना देता है। मन का अंतर आत्मा की तरफ प्रवाह होने से सब इन्द्रियाँ ढीली हो जाती हैं अर्थात् अपने-अपने विषयों के ग्रहण करने में असमर्थ हो जाती हैं। यह तत्त्व-बोधवाक्यादिक संपूर्ण इन्द्रियों को बेकाम कर देता है। इसी वास्ते विषय-भोगों की कामनावाला पुरुष इसका आदर नहीं करता है, किन्तु वह आत्मज्ञान के साधनों से हजारों कोस भागता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान् ।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षीनिरपेक्षः सुखं चर ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।
न, त्वम्, देहः, न, ते, देहः, भोक्ता, कर्ता, न, वा, भवान्, चिद्रूपः, असि सदा, साक्षी, निरपेक्षः, सुखम्, चर ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
त्वम् = तूभोक्ता = भोक्ता
देहः = शरीरन = नहीं है
न = नहीं हैचिद्रूपः = चैतन्य-रूप है
न = नसदा = नित्य
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२१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

ते=तेरासाक्षी=साक्षी है
देहः=शरीर हैनिरपेक्षः=इच्छा-रहित
वा=औरसुखम्=सुख-पूर्वक
भवान्=तूचर=विचर

भावार्थ ।

तत्त्व-ज्ञान की प्राप्ति के लिये अष्टावक्रजी फिर उपदेश करते हैं ।

हे जनक ! तुम पंचभूतात्मक देह नहीं हो, क्योंकि देह जड़ है और अनित्य है, तुम नित्य हो, चैतन्य-स्वरूप हो तुम्हारा देह के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है ।

असंगोऽह्ययं पुरुष इति श्रुतेः ।

यह पुरुष अर्थात् जीवात्मा असंग है, देहादिकों के साथ सम्बंध से रहित है । इसी श्रुतिप्रमाण से तुम संयोगादिक सम्बन्धों से रहित हो और तुम कर्ता भोक्ता भी नहीं हो, क्योंकि कर्तापना और भोक्तापना ये दोनों अंतःकरण के धर्म हैं। तुम उन दोनों के भी साक्षी हो और ऐसा नियम भी है जो जिसका साक्षी होता है, वह उससे भिन्न होता है। जैसे घट का साक्षी घट से भिन्न है वैसे कर्ता भोक्ता जो अंतःकरण है, उनका साक्षी भी उनसे भिन्न है । इसमें दृष्टांत को कहते हैं—

जैसे नृत्यशाला में स्थित दीपक शाला के स्वामी को, सभावालों को और नर्तकी को तुल्य ही प्रकाश करता है । यह शरीर तो नृत्यशाला है, अहंकार उसमें सभापति है, और विषय सब सभ्य हैं, याने सभा में बैठनेवाले हैं, और बुद्धि

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पन्द्रहवाँ प्रकरण । २१७

उसमें नर्तकी है, याने नाचनेवाली वेश्या है, इन्द्रियगण सब ताल बजानेवाले हैं, चेतन आत्मा साक्षी सबका प्रकाशक है । जैसे दीपक अपने स्थान में स्थित होकर सबको प्रकाश करता है, वैसे चेतन भी अचल स्थित साक्षी-रूप होकर सबको प्रकाश करता है ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! देह में जो इन्द्रिय और अहंकारादिक हैं, उनको तू अपने को साक्षी मानकर सुख-पूर्वक विचर ॥ ४ ॥

मूलम् ।
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन ।
निर्विकल्पोऽसिबोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
रागद्वेषौ, मनोधर्मौ, न, मन, ते, कदाचन, निर्विकल्पः, असि, बोधात्मा, निर्विकारः, सुखम्, चर ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
रागद्वेषौ=राग और द्वेषते=तेरा है
मनोधर्मौ=मन के धर्म हैं+ त्वम्=तू
न ते=तेरे नहीं हैंनिर्विकल्पः=विकल्प-रहित
मनः=मननिर्विकारः=विकार-रहित
कदाचन=कभीबोधात्मा=बोधस्वरूप
न=नहींअसि=है ॥

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! राग-द्वेषादिक सब मन के धर्म हैं, तुझ आत्मा के धर्म नहीं हैं । अन्यत्र भी कहा है—

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२१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

शत्रु मित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।
एकात्मत्वे कथं भेदः संभावेद्द्वैतदर्शनात् ॥ १ ॥

यह शत्रु है, यह मित्र है । शत्रु से द्वेष, मित्र से राग और उदासीनता ये सब मन के ही धर्म हैं । अद्वैतदर्शी की दृष्टि में भेद कहाँ हो सकता है, द्वैतदर्शन से ही भेद होता है ॥१॥

हे जनक ! मन का सम्बन्ध कदापि तेरे साथ नहीं है, मन के अध्यास से तुम रागादिकों में अध्यास मत करो ।

प्रश्न—रागद्वेष भी मुझ आत्मा ही के धर्म क्यों न हों ?

उत्तर—रागद्वेषादिक तुम्हारे धर्म नहीं हो सकते हैं, क्योंकि तुम ज्ञान-स्वरूप हो । यदि यह कहा जाय कि राग-द्वेषादिक आत्मा के ही धर्म हैं, तो वे आत्मा के स्वाभाविक धर्म हैं, या आगन्तुक धर्म हैं, या आध्यासिक धर्म हैं ।

वे स्वाभाविक धर्म तो हो नहीं सकते, क्योंकि श्रुतियों में और स्मृतियों में आत्मा को निर्धर्मक लिखा है—

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसन्नित्यमगन्धवच्चयत ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥१॥

आत्मा शब्द, स्पर्श, रूप, रसादिकों से रहित है, नाश से, गंध से भी रहित है, नित्य है, न उसका आदि है और न उसका अन्त है, महत्तत्त्व से परे है, ऐसे आत्मा को जान-कर पुरुष मृत्यु के मुख से छूट जाता है ॥ १ ॥

इस तरह की अनेक श्रुतियाँ आत्मा को निर्धर्मक बताती हैं—

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पन्द्रहवाँ प्रकरण । २१९

शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।
बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १॥

आत्मा शुद्ध है, मुक्त है, बंध से रहित है । बंध मोक्षा-
दिक धर्म सब मन में ही स्थित रहते हैं । मन के शान्त होने
से सब शान्त हो जाते हैं । इस तरह की अनेक स्मृतियाँ भी
आत्मा को रागद्वेषादिकों से रहित बताती हैं ॥ १ ॥

यदि रागद्वेषादिक आत्मा के स्वाभाविक धर्म माने जावें,
तब मोक्ष किसी को कदापि नहीं होगा, क्योंकि स्वाभाविक धर्म
की निवृत्ति किसी उपाय से भी नहीं होती है, केवल आध्यासिक
धर्म उपाय से नाश होता है। आध्यासिक धर्म एक के सम्बन्ध
से दूसरे में प्रतीत होने लगता है । सम्बन्ध के नाश होने से
उसका भी नाश हो जाता है, जैसे बिल्लौर पत्थर के समीप
लाल पुष्प के रखने से उसमें लाल रंग जो कि पुष्प का धर्म है,
प्रतीत होने लगता है और जब पुष्प दूर कर दिया जाता है,
तो लाल रंग जो उस पत्थर में दिखाई देता था, लोप हो
जाता है । आत्मा में अन्तःकरण के धर्म रागद्वेषादिक आध्या-
सिक हैं, स्वाभाविक नहीं हैं, इसलिये वे दूर हो सकते हैं॥ ५ ॥

मूलम् ।
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।
सर्वभूतेषु, च, आत्मानम्, सर्वभूतानि, च, आत्मनि,
विज्ञाय, निरहंकारः निर्ममः, त्वम्, सुखी, भव ॥

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२२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः । शब्दार्थअन्वयः । शब्दार्थ ।
सर्वभूतेषु=सब भूतों मेंनिरहंकारः=अहंकार-रहित
आत्मानम्=आत्मा कोच=और
च=औरनिर्मम्=ममता-रहित
सर्वभूतानि=सब भूतों कोत्वम्=तू
आत्मनि=आत्मा मेंसुखी=सुखी
विज्ञाय=जान करकेभव=हो

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! ब्रह्मा से लेकर चींटी पर्यंत संपूर्ण भूतों में कारण-रूप करके अनुस्यूत एक ही आत्मा को जानकर, और संपूर्ण भूत प्राणियों को आत्मा में अध्यस्त अर्थात् कल्पितमान करके अहंकार और ममता से रहित होकर तू सुख-पूर्वक विचर ।। ६ ।।

मूलम् ।

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे ।
तत्त्वमेव न संदेहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव ।। ७ ।।

पदच्छेदः ।

विश्वम्, स्फुरति, यत्र, इदम्, तरंगा, इव, सागरे, तत्, त्वम्, एव, न, संदेहः, चिन्मूर्ते, विज्वरः, भव ।।

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यत्र=जिस स्थान में$\left.\begin{aligned} &\textbf{तरंग इव} \ &\textbf{सागरे} \end{aligned}\right} =$ समुद्र विषे तरंगों की तरह
इदम्=यह
विश्वम्=संसारस्फुरति=स्फुरण होता है
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पन्द्रहवाँ प्रकरण । २२१

तत=सो | चिन्मूर्ते=हे चैतन्य-रूप
त्वमेव=तू ही है | विज्वर=संताप-रहित
न संवेह=इसमें संदेह नहीं | भव=हो ॥

भावार्थ ।

हे जनक ! जिस अधिष्ठान चेतन में यह सारा जगत् समुद्र में तरंग की तरह अभिन्न स्फुरण हो रहा है, वही चेतन तुम्हारा आत्मा है, इसवास्ते हे जनक ! तुम विगतज्वर होकर ऐसा अनुभव करो कि मैं चैतन्य-स्वरूप हूँ और संतापों से रहित हूँ ॥ ७ ॥

मूलम् ।

श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः ।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

श्रद्धत्स्व, तात, श्रद्धत्स्व, न, अत्र, मोहम्, कुरुष्व, भोः, ज्ञानस्वरूपः, भगवान्, आत्मा, त्वम्, प्रकृतेः, परः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तात=हे सौम्य !त्वम्=तू
भोः=हे प्रियज्ञानस्वरूपः=ज्ञान-रूप
$\left.\begin{aligned} &श्रद्धत्स्व \ &श्रद्धत्स्व \end{aligned}\right} = श्रद्धा कर श्रद्धा कर$भगवान्=ईश्वर
आत्मा=परमात्मा
अत्र=इसमेंप्रकृतेः=प्रकृति से
मोहम्=मोहपरः=परे हैं
न कुरुष्व=मत कर
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२२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे तात ! आत्मा की चिद्रूपता में अहंभावना और विपरीतभावना-रूपी मोह को मत प्राप्त हो, क्योंकि आत्मा ज्ञान-स्वरूप है और प्रकृति से भी परे है।
प्रश्न—चित्-पद का क्या अर्थ है ? और ज्ञान-पद का क्या अर्थ है ?
उत्तर—साधनान्तर नैरपेक्ष्येण स्वयं प्रकाशमान तया इतरपदार्थविभासकं यत् तच्चित् ।
जो अपने से भिन्न किसी और साधन की अपेक्षा न करके अपने प्रकाश से इतर पदार्थों को प्रकाश करे, उसी का नाम चित् है ।
अज्ञाननाशकत्वे सति स्वात्मबोधकत्वं ज्ञानम् ।
जो अज्ञान को नाश करके अपने आत्मा के स्वरूप को प्रकाशित करे, उसका नाम आत्म-ज्ञान है ।
अर्थप्रकाशो हि ज्ञानम् ।
जो पदार्थ को प्रकाशित करे उसी का नाम ज्ञान है, सोई आत्मा चेतन-रूप ज्ञान-स्वरूप है ।
अब जड़ और चेतन के भेद को सुगम रीति से दिखलाते हैं—
जो अपने को जाने और अपने से भिन्न भी सब पदार्थों को जाने, वही चेतन कहलाता है और जो अपने को न जाने और अपने से भिन्न भी किसी पदार्थ को न जाने, वह जड़ कहलाता है, सो आत्मा चेतन है । क्योंकि अपने को जानता है और अपने से भिन्न सम्पूर्ण घट पटादिक जड़ पदार्थों को भी जानता है, इसी से आत्मा चेतन है और आत्मा से भिन्न