अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ प्रकरण । २०५
आत्मा के स्वरूप का बोधक जो वाक्य है, उसका नाम
अवान्तरवाक्य है । जैसे—
“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म”
आत्मा ब्रह्मसद्रूप है, ज्ञान-स्वरूप है, अनन्त-स्वरूप है ।
यह वाक्य तो केवल आत्मा के स्वरूप को ही बोधन
करता है, इसी वास्ते इसका नाम अवान्तरवाक्य है ।
अभेदबोधकं वाक्यं महावाक्यम् ।
अभेद का बोधक जो वाक्य है, उसी का नाम महा-
वाक्य है । जैसे—
ब्रह्माहमस्मि ।
मैं ही ब्रह्म हूँ ।
अयमात्माब्रह्म ।
यह अपना आत्मा ही ब्रह्म है ।
तत्त्वमसि ।
तत् = वही अर्थात् ईश्वर । त्वं = तू अर्थात् जीव ।
असि = है, ये सब वाक्य जीव और ईश्वर की अभेदता को
ही बोधन करते हैं, इसी से इनका नाम महावाक्य है ।
अब लक्षणा को दिखाते हैं—
पद के अर्थ का ज्ञान दो तरह से होता है । एक तो
शक्तिवृत्ति करके होता है, जैसे किसी ने किसी से कहा