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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 405 में से

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पृष्ठ 224

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २१७

उसमें नर्तकी है, याने नाचनेवाली वेश्या है, इन्द्रियगण सब ताल बजानेवाले हैं, चेतन आत्मा साक्षी सबका प्रकाशक है । जैसे दीपक अपने स्थान में स्थित होकर सबको प्रकाश करता है, वैसे चेतन भी अचल स्थित साक्षी-रूप होकर सबको प्रकाश करता है ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! देह में जो इन्द्रिय और अहंकारादिक हैं, उनको तू अपने को साक्षी मानकर सुख-पूर्वक विचर ॥ ४ ॥

मूलम् ।
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन ।
निर्विकल्पोऽसिबोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
रागद्वेषौ, मनोधर्मौ, न, मन, ते, कदाचन, निर्विकल्पः, असि, बोधात्मा, निर्विकारः, सुखम्, चर ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
रागद्वेषौ=राग और द्वेषते=तेरा है
मनोधर्मौ=मन के धर्म हैं+ त्वम्=तू
न ते=तेरे नहीं हैंनिर्विकल्पः=विकल्प-रहित
मनः=मननिर्विकारः=विकार-रहित
कदाचन=कभीबोधात्मा=बोधस्वरूप
न=नहींअसि=है ॥

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! राग-द्वेषादिक सब मन के धर्म हैं, तुझ आत्मा के धर्म नहीं हैं । अन्यत्र भी कहा है—