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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages
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साहिब बन्दगी

साथ काबू में रखे और प्रतिदिन नाम रूपी अमृत का पान करे, वो साधु है।

प्रथमहिं चक्षु इन्द्री कहँ साधे। गुरु गम पंथ नाम अवराधे ॥

सुंदर रूप चक्षु की पूजा। रूप कुरूप न भावे दूजा ॥

रूप कुरूपहिं सम कर जाने। दरस विदेहि सदा सुख माने ॥

सबसे पहले वो नयन इन्द्री को वश में करे और गुरु-प्रेम के मार्ग पर चलते हुए नाम में लगा रहे। नयन सुन्दर रूप की पूजा करते हैं और कुरूपता को नहीं देखना चाहते, पर साधु को रूप-कुरूप दोनों के प्रति समान भाव रखते हुए आत्मा की ओर देखकर सदा सुख मानना चाहिए।

इन्द्री श्रवण वचन शुभ चाहै। उक्तव वचन सुनत चित दहै ॥

बोल कुबोल दोउ सम लेखे। हृदय शुद्ध गुरुज्ञान विशेषै ॥

कान इन्द्री अच्छे-अच्छे वचन ही सुनना चाहती है, उग्र, बुरे शब्द सुनते ही हृदय जलने लगता है, पर साधु को अच्छे-बुरे वचनों को समान समझना चाहिए।

नासिका इन्द्री सुबास अधीना। यहि सम राखै संत प्रवीना ॥

नासिका इन्द्री अच्छी सुगन्ध के अधीन रहती है, पर चतुर साधु को इस दृष्टि से भी समभाव से रहना चाहिए, उसे सुगन्ध की तरफ आकर्षित नहीं होना चाहिए।

जिभ्या इन्द्री चाहै स्वादू। खट्टा मीठा मधुर स्वादू ॥

सहज भाव में जो कछु आवै। रूखा फीका नहिं बिलगावै ॥

जो कोई पंचामृत ले आवै। ताहि देख नहिं हरष बढ़ावै ॥

तजे न रूखा साग अलूना। अधिक प्रेम सों पावै दूना ॥

जीभ इन्द्री विभिन्न प्रकार के खट्ट-मीठे स्वाद चाहती है, पर साधु को सहज में जैसा भी मिल जाए, चाहे वो रूखा-सूखा ही क्यों न हो, कुछ अन्तर नहीं पड़ना चाहिए यानी उसे जीभ इन्द्री के स्वाद के पीछे नहीं भागना चाहिए। यदि कोई पंचामृत ले आए तो ज्यादा खुश नहीं

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होना चाहिए और यदि नमक रहित रूखा साग भी मिल जाए तो उसे त्यागना नहीं चाहिए बल्कि ज्यादा खुशी के साथ खाना चाहिए।

इन्द्री दुष्ट महा अपराधी। कुटिल काम कोई विरले साधी।।

कामिनि रूप काल की खानी। तजहु तासु संग हो गुरुज्ञानी।।

काम इन्द्री तो बड़ी ही दुष्ट और अपराधी है, जिसे कोई बिरला ही साध सका है, इसलिए जो स्त्री के सुंदर रूप को काल की खानि समझ उसका संग त्याग दे, वो ज्ञानी है, वो साधु है।

जबहि काम उमंग तन आवै। ताहि समय जो आप जुगावे।।

शब्द विदेह सुरत लै राखे। गहि मन मौन नाम रस चाखे।।

जब हिय तत्त्व में जाय समाई। तबही काम रहै मुरझाई।।

साधु का परिचय देते हुए साहिब कह रहे हैं कि उसे चाहिए, जब काम वेग के साथ शरीर में आए तो युक्तिपूर्वक अपने को बचाकर रखे, उसे रोके रखे। ऐसे में सार शब्द में अपनी सुरति लगाए रखे, मौन रहते हुए मन को पकड़े रहे और नाम रूपी रस का पान करता रहे क्योंकि जब सुरति नाम में जाकर समा जाती है, तब काम उदास होकर शांत हो जाता है।

काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो।

सुर नर मुनि यक्ष गन्धर्व किन्नर, सबहिं कीन्ह बेहाल हो।।

सबहि लूटे बिरले छूटे, ज्ञान गुरु जिन्ह दूढ़ गहे।

गुरु ज्ञान दीप समीप सतगुरु, भक्ति मार्ग तिन्ह लहे।।

साहिब कह रहे हैं कि यह काम बड़ा ही प्रबल है, यही काल रूप है, जिसने देवता, मनुष्य, मुनि, यक्ष, किन्नर (नपुंसक) सबको बेहाल किया हुआ है। काम ने सबको लूट लिया है। इससे कोई बिरला ही छूट सकता है, जो गुरु के ज्ञान को दूढ़ता से पकड़े रहे, हर समय चेतन रहे। जहाँ गुरु-ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश है, वहीं सदगुरु का वास है। ऐसा जीव ही भक्ति मार्ग को पा सकता है, उस पर चल सकता है।

गुरु कृपा से साधु कहावै

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गुरु कृपा ते साधु कहावै

गुरु किरपा ते साधु कहावै। अनल पच्छ है लोक सिधावै॥
धर्मदास यह परखो बानी। अनलपच्छ गति कहों बखानी॥
अनलपच्छ जो रहे अकाशा। निशि रहै पवन की आशा॥
दृष्टिभाव तिन रति विधि ठानी। यहि विधि गर्भ रहै तेहि जानी॥
अंड प्रकाश कीन्ह पुनि तहँवा। निराधार अण्ड रहु जहँवों॥
मारग माहिं पुष्ट भो अण्डा। मारग माहिं बिहरभा खण्डा॥
मारग माहिं चक्षु तिन पावा। मारग माहिं पंख परभावा॥
महि ढिंग आवा सुधि भइ ताही। इहाँ मोर आश्रम नहिं आही॥
सुरति सम्हार चले पुनि तहँवा। मात पिता को आश्रम जहँवा॥
अनल पच्छ तेहि लेन न आवै। उलट चीन्ह निज धरहि सिधावै॥
बहु पंछी जग माहिं रहावै। अनल पच्छ सम नाहिं कहावै॥
अनल पच्छ जस पच्छन माहीं। अस बिरले जिव नाम समाहीं॥
यह विधि जो जिव चेते भाई। मेटि काल सतलोक सिधाई॥

गुरु-कृपा से ही जीव साधु समान होता है और अनल पक्षी के समान होकर अमर लोक को जाता है। साहिब धर्मदास से कह रहे हैं कि अब मैं अनल पक्षी की दशा का बखान करता हूँ, तुम मेरी इस वाणी को परख लो।

अनल पक्षी पृथ्वी से बहुत ऊपर शून्य में रहता है, जमीन पर आते ही मर जायेगा। वो सोता भी हवा में ही है, उसका कोई घोंसला नहीं होता। फिर हवा में ही रहता है और खाता भी हवा ही है.... दाना नहीं चुगता है अनल पक्षी। वो विषय भी नहीं करता है, मात्र दृष्टि से अपनी मादा को गर्भवती कर देता है। फिर हवा में ही वो अण्डा देती है और

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अण्डा नीचे गिरना शुरू होता है। इतनी ऊँचाई से जब वो नीचे की ओर आता है तो आते-आते रास्ते में ही वो अण्डा पकता है। मुर्गी तो बैठकर पकाती है, पर वो अण्डा खुद ही पक जाता है और फिर रास्ते में ही फूट भी जाता है। रास्ते में ही उसे आँखें भी आ जाती हैं। पृथ्वी पर गिरे तो मर जाता, पर पृथ्वी पर गिरने से पहले ही उसे सुधि आ जाती है कि यहाँ उसका घर नहीं है। अब सुरति संभाल कर वो खुद ही अपने घर की ओर चल पड़ता है; उसके माता-पिता उसे लेने नहीं आते हैं। इस संसार में बहुत से पक्षी हैं, पर अनल पक्षी समान निर्मल कोई नहीं। जैसे अनल पक्षी खुद अपने माता-पिता के देश में चलता है, ऐसे ही बिरले जीव नाम में समाए रहते हैं और जो ऐसा करते हैं, वे काल को मारकर सतलोक चले जाते हैं।

मन बच कर्म गुरु ध्यान, गुरु आज्ञा निरखत चलै ॥

देहि मुक्ति गुरु दान, नाम विदेह लखाय कै ॥

जो मन, बचन और कर्म से गुरु का ही ध्यान करता रहे और जीवन-भर उनकी आज्ञा में चले। विदेह नाम का ज्ञान देकर सदगुरु उसे मुक्ति का दान देते हैं।

जब लग ध्यान विदेह न आवै। तब लग जिव भव भटका खावै ॥

ध्यान विदेह औ नाम विदेहा। दोइ लख पावे मिटै संदेहा ॥

छन इक ध्यान विदेह समाई। ताकी महिमा बरनि न जाई ॥

काया नाम सबै गोहरावे। नाम विदेह बिरले कोई पावे ॥

जो युग चार रहे कोई कासी। सार शब्द बिन यमपुर बासी ॥

नीमखार बढ़ी परधाना। गया द्वारिका प्राग अस्नाना ॥

अड़सठ तीरथ भू परिकरमा। सार शब्द बिन मिटे न भरमा ॥

कहँ लग कहों नाम परभाऊ। जो सुमिरे जम त्रास नसाऊ ॥

जब तक ध्यान विदेह स्थिति को प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव

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भटकता ही रहता है, जब विदेह ध्यान और विदेह नाम दोनों का भेद पता चल जाए, तब ही सब संदेह दूर होते हैं। यदि ध्यान एक पल के लिए भी विदेह नाम में समा जाए तो फिर उसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। काया से संबंधित नाम यानी मुहँ से जपने वाला नाम तो सभी जपते हैं, पर विदेह नाम कोई बिरले ही पाते हैं। चाहे कोई तीर्थोंदि जगहों पर जाकर कितना ही स्नान करे, चाहे अड़सठ तीर्थ भी घूम आए, पूरी पृथ्वी की परिक्रमा भी कर ले, तो भी सार शब्द के बिना भ्रम नहीं मिट सकता। साहिब कह रहे हैं कि नाम के प्रभाव को कहाँ तक कहूँ, जो इसका सुमिरन करता है, उसे मृत्यु का भय भी नहीं रहता।

सार शब्द सु विदेह स्वरूपा। निःअच्छर वहि रूप अनुपा ॥

तत्त्व प्रकृति प्रभाव सब देहा। सार शब्द निःतत्त्व विदेहा ॥

सार नाम सतगुरु सों पावे। तब हँसा अमर लोक सिधावे ॥

धर्मराय ताको सिर नावे। जो हँसा निःतत्त्व समावे ॥

सार शब्द विदेह स्वरूप है, वो अक्षर से परे हैं, सबसे निराला है। पाँच तत्त्वों की देही है, पर सार शब्द तत्त्व रहित है, विदेह है। जब सदगुरु से सार नाम मिल जाता है तो जो जीव उस नाम की डोरी को पकड़ कर संसार-सागर से पार अपने देश अमर-लोक चला जाता है, उस अमर तत्त्व में समा जाता है; उसे धर्मराज भी प्रणाम करता है।

सृष्टि उत्पत्ति से पहले का रहस्य

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सृष्टि उत्पत्ति से पहले का रहस्य

धर्मदास पूछते हैं

अब साहब मोहि देउ बताई । अमर-लोक सो कहाँ रहाई ॥
कौन द्वीप हंस को बासा । कौन द्वीप पुरुष रह बासा ॥
भोजन कौन हंस तहाँ करई । औ बानी कहीं तहाँ उच्चरई ॥
कैसे पुरुष लोक रच राखा । द्वीपहिं को कैसे अभिलाखा ॥
तीन लोक उत्पत्ति भाखो । वर्णहु सकल गोय जनि राखो ॥
काल निरंजन किस विधि भयऊ । कैसे षोडश सुत निर्मयऊ ॥
कैसे चार खानि विस्तारी । कैसे जीव काल वश डारी ॥
कैसे कूर्म शेष उपराजा । कैसे मीन बराहहिं साजा ॥
त्रय देवा कौने विधि भयऊ । कैसे महि अकाश निरमऊ ॥
चन्द्र सूर्य कहु कैसे भयऊ । कैसे तारागण सब उयऊ ॥
किस विधि भई शरीर की रचना । भाषो साहिब उत्पत्ति बचना ॥

हे साहिब ! कृपा करके अब मुझे बताओ कि वो अमर लोक कहाँ है ? उस अमर लोक में जीव किस स्थान पर रहते हैं ? वहाँ आत्मा भोजन क्या करती है और वहाँ भाषा कौन सी है ? सब लोक कैसे बने ? तीन-लोक की उत्पत्ति कैसे हुई ? काल-पुरुष कैसे हुआ ? सोलह सुत की रचना कैसे हुई ? यह निर्मल आत्मा चार खानियों में कैसे गयी ? आत्माएँ काल-पुरुष के चंगुल में कैसे फँस गयीं । त्रिदेव कैसे बने ? पृथ्वी और आकाश कैसे बने ? सूर्य, चाँद और तारे आदि कैसे बने ? हे सदगुरु ! कृपा करके सृष्टि का सारा भेद मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरा सब संशय दूर हो ।

आदि उत्पत्ति कहो सतगुरु, कृपा करो निज दास को ।
बचन सुधा सु प्रकाश कीजै, नाश हो यम त्रास को ॥

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एक एक विलोय बरनहु, दास मोहि निज जानि कै।

सत्य वक्ता सदगुरु तुम, लेव निश्चय मैं मानि कै ॥

धर्मदास जी प्रार्थना करते हुए कह रहे हैं कि अपने दास पर कृपा करके सृष्टि का सारा भेद समझाकर कहिए। कह रहे हैं कि एक-एक बात अलग-अलग करके बताना; जो भी आप कहेंगे, मैं उसे सत्य मानूँगा, क्योंकि आप झूठ नहीं बोलते हैं।

साहिब कहते हैं

धर्मदास अधिकारी पाया। ताते मैं कहि भेद सुनाया।।

अब तुम सुनहु आदि की बानी। भाखा उत्पति प्रलय निशानी।।

साहिब कह रहे हैं कि जब मुझे अधिकारी जीव मिलते हैं तो मैं यह भेद सुनाता हूँ।

तबकी बात सुनहु धर्मदासा। जब नहिं महि पाताल अकाशा।।

जब नहिं कूर्म बराह औ शेष। जब नहिं शारद गोरि गणेश।।

जब नहिं हते निरंजन राया। जिन जीवन कह बाँधि झुलाया।।

तैतिस कोटि देवता नाहीं। और अनेक बताइऊँ काहीं।।

ब्रह्मा विष्णु महेश न तहिया। शास्त्र वेद पुराण न कहिया।।

तब सब रहे पुरुष के माहीं। ज्यों बट वृक्ष मध्य रह छाहीं।।

हे धर्मदास! मैं तब की बात बता रहा हूँ, जब धरती और आकाश नहीं थे; जब कूर्म, शेष, बाराह, शारद, गौरी, गणेश आदि कोई भी नहीं था; जब जीवों को कष्ट देने वाला निरंजन भी नहीं था; जब तैतैस करोड़ देवता भी न थे..... और अधिक क्या बताऊँ! ब्रह्मा विष्णु और महेश भी न थे, वेद, शास्त्र, पुराण आदि भी न थे..... लेकिन वो एक था और सभी जीव उसमें रहते थे, जैसे बट वृक्ष के मध्य उसकी छाया रहती है।

आदि उत्पति सुनहु धर्मन, कोई न जानत ताहि हो।

सबहिं भो बिस्तार पाछे, साख देउ मैं काहि हो।।

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वेद चारों नहीं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ।

वेद को तब मूल नहीं, अकथ कथा बखानियाँ॥

साहिब ने धर्मदास से कहा कि मैं तुमको आदि उत्पत्ति का रहस्य कहता हूँ, जिसे कोई नहीं जानता है। साकार-निराकार, लोक-लोकान्तर आदि सब बाद में बने, अतः गवाही किसकी दूँ! चारों वेद भी सत्य-पुरुष की कहानियाँ नहीं जानते हैं और निराकार यानी काल-पुरुष की कथाएँ कहते हैं।

सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये। कारण करण नहीं निरमाये॥

समपुट कमल रह गुप्त सनेहा। पुहुप माहिं रह पुरुष विदेहा॥

इच्छा कीन्ह अंश उपजाये। हंसन देख हरष बहु पाये॥

प्रथमहिं पुरुष शब्द परकाश। दीप लोक रचि कीन्ह निवासा॥

चारि कर सिंहासन कीन्हा। तापर पुहुप दीप कर चीन्हा॥

पुरुष कला धरि बैठे जहिया। प्रगटी अगर वासना सहिया॥

सहस अठासी दीप रचि राखा। पुरुष इच्छा तै सब अभिलाखा॥

सबै द्वीप रहु अगर समायी। अगर वासना बहुत सुहायी॥

साहिब कह रहे हैं कि आरम्भ में परम-पुरुष गुप्त थे, उनका न कोई साथी था, न संगी। एक समय उनकी मौज हुई और उन्होंने अंश उत्पन्न किये। सबसे पहले उन्होंने एक शब्द पुकारा, अद्भुत श्वेत प्रकाश उत्पन्न किया और स्वयं उस प्रकाश में समा गये; वो ही अमर-लोक कहाया। फिर उनकी इच्छा हुई और उन्होंने अनेक द्वीपों की रचना की।

वास्तव में यह रहस्य छिपाया गया। मैं बताता हूँ। सर्वप्रथम परम-पुरुष ने इच्छा करके एक शब्द पुकारा, जिससे एक अद्भुत श्वेत रंग का प्रकाश हुआ और वो प्रकाश अनन्त में फैल गया। वो प्रकाश सांसारिक प्रकाश की तरह न था; वो इतना अद्भुत था कि जिसका एक-एक कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे।

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जब वो प्रकाश अनन्त में फैल गया तो फिर वे सत्य पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये। अब वो प्रकाश चेतन हो गया, जीवित हो गया। जिस प्रकार आत्मा के शरीर में आने से शरीर चेतन हो जाता है, उसी प्रकार वो प्रकाश भी जीवित हो उठा। प्रकाश में आने से पहले वे सत्य-पुरुष गुप्त थे जबकि प्रकाश में आकर ही वे सत्य पुरुष कहलाए और वो अद्भुत प्रकाश, जो स्वयं सत्य-पुरुष ही थे, अमर लोक कहलाया।

अभी भी सत्य-पुरुष अकेले ही थे। फिर उनकी मौज हुई और उन्होंने उस प्रकाश को अर्थात अपने ही स्वरूप को अपने में से खिटका दिया।.....अनन्त बिन्दुएँ हुईं, जो वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आयीं। जिस प्रकार समुद्र में से पानी को मुट्ठी में या हाथों में भरकर उछालने से कई कण बिखर जाते हैं, उसी तरह उस प्रकाश में से भी अनेक कण बिखर गये। लेकिन जिस प्रकार समुद्र की बूँदें पुनः समुद्र में गिर समुद्र का ही रूप हो जाती हैं, उसी तरह वे अनन्त कण भी वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आए, लेकिन अचरज यह था कि वे बिन्दुएँ जब वापिस प्रकाश में आयीं तो वे प्रकाशमय नहीं हुईं, क्योंकि सत्य-पुरुष ने इच्छा की कि इनका अपना अलग अस्तित्व भी रह जाए। वे ही जीव कहलाए। वे सब जीव उसी अद्भुत प्रकाश में विचरण करने लगे।

आत्माओं का उस प्रकाश में अलग अस्तित्व के साथ विचरण करना बड़े अचरज की बात थी, क्योंकि समुद्र की बूँदों का समुद्र में अपना अलग अस्तित्व नहीं होता। जिस प्रकार पानी में मछली घूमती रहती है, उसी तरह सभी जीव उस प्रकाश में घूमने लगे। यह देख परम-पुरुष बड़े खुश हुए और उन आत्माओं को बहुत प्यार करने लगे। बहुत समय ऐसे व्यतीत हो गया और सभी जीव उस अद्भुत प्रकाश में विचरण करते हुए परम आनन्द लूट रहे थे। फिर परम-पुरुष ने शब्दों से पुत्र उत्पन्न किये अर्थात जो बोल रहे थे, वो पुत्र बन रहा था।

सोलह सुत की उत्पत्ति

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सोलह सुत की उत्पत्ति

दूजे शब्द जु पुरुष परकासा। निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥
तीजे शब्द भये जु पुरुष उच्चार। ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥
टेकी चरण सम्मुख है रहेऊ। आज्ञा पुरुष द्वीप तिन्ह दएऊ ॥
चौथे शब्द भये पुनि जबही। विवेक नाम सुत उपजे तबहीं ॥
आप पुरुष किये द्वीप निवासा। पंचम शब्द सो तेज परकासा ॥
पांचव शब्द जब पुरुष उच्चार। काल निरंजन भो औतारा ॥
तेज अंग ते काल है आवा। ताते जीवन कह संतावा ॥
जीवरा अंश पुरुष का आहीं। आदि अंत कोउ जानत नाहीं ॥
छठएँ शब्द पुरुष मुख भाषा। प्रगटे सहज नाम अभिलाषा ॥
सतएँ शब्द भयो संतोष। दीन्हो दीप पुरुष परितोषा ॥
अठएँ शब्द पुरुष उच्चार। सुरति सुभाव दीप बैठारा ॥
नवमें शब्द अनंद अपारा। दशएँ शब्द छमा अनुसारा ॥
ग्यारहें शब्द नाम निष्काम। बारहें सब्द सुत जलरंगी नामा ॥
रहें सब्द अचिन्त सुत जानो। चौदहें शब्द सुत प्रेम बखानो ॥
पन्द्रहें शब्द सुत दीन दयाला। सोलहें सब्द भे धीर्य रसाला ॥
सत्रहें शब्द सुत योग संतायन। एक नाल षोडश सुत पायन ॥

जैसे ही परम-पुरुष ने इच्छा करके दूसरा शब्द पुकारा तो उससे कूर्म उत्पन्न हुआ। इसी तरह तीसरे शब्द से ज्ञान और चौथे से विवेक उत्पन्न हुआ। ये सब परम-पुरुष ने इच्छा से पैदा किए, पर आत्मा इच्छा से नहीं बनी, वो परम-पुरुष का अंश है। फिर परम पुरुष ने पांचवा शब्द तेज अंग से पुकारा। जिसके तेज से निरंजन पैदा हुआ। तो छठे शब्द से सहज की उत्पत्ति हुई, सातवें से संतोष, ग्यारहवें से निष्काम, बारहवें से जलरंगी, तेरहें से अचिन्त, चौदहें से प्रेम, पन्द्रहवें से दीनदयाल, सोलहवें से धैर्य और सत्रहवें शब्द से योग संतायन हुए। ये सब परम-पुरुष के 16 पुत्र

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हुए, जिन्हें उन्होंने सुरति की एक नाल से पिरो दिया।

शब्दहिते भयो सुतन अकारा । शब्द ते लोक द्वीप विस्तारा ॥

अग्र अमी दिय अंश अहारा । द्वीप द्वीप अंशन बैठारा ॥

अंशन शोभा कला अनंता । होत तहाँ सुख सदा बसंता ॥

सब सुत करें पुरुष को ध्याना । अमी अहार सदा सुख माना ॥

शब्द से ही परम-पुरुष ने पुत्र उत्पन्न किये और शब्द से ही अमर-लोक के द्वीपों की रचना की। हरेक द्वीप पर अंशों को स्थान दिया और सब उस अमृत(परम-पुरुष के स्वरूप) का पान करने लगे। अंशों की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता; वहाँ सदा आनन्द रहता है। सभी पुत्र परम-पुरुष का ध्यान करने लगे और अमृत भोजन करते हुए सुख से रहने लगे।

द्वीप करि को अनंत सोभा, नहिं बरनत सो बनै ।

अमिय कला अपार अद्भुत, सुतन शोभा को गनै ॥

पुरुष के उजियार से सुत, सबै दीप उजियार हो ।

सतपुरुष रोम प्रकाश एकहि, चन्द्र सूर्य करोर हो ॥

अमर-लोक के द्वीपों और परम-पुरुष के पुत्रों की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। परम-पुरुष के प्रकाश से सब द्वीप प्रकाशित रहते हैं; उनके एक रोम मात्र का प्रकाश करोड़ों सूर्यों और चन्द्रमा के बराबर है।

सतपुर आनन्द धाम, सोक मोह दुख तहाँ नहीं ।

हंसन को बिसराम, पुरुष दरस अँचवन सुधा ॥

सत्य लोक आनन्द का घर है; वहाँ दुख, मोह आदि नहीं है; वहाँ हंस सत्य पुरुष के अमृत का पान करते हैं।

काल निरंजन कीनहीं तपस्या

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काल निरंजन कीन्हों तपस्या

यहि बिधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥
धर्मराय अस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझहु धर्मदासा ॥
युग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढ़ पुरुष चित दीन्हा ॥
सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा ॥

अमर लोक में सबको आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके बाद पाँचवाँ पुत्र निरंजन परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर एकाग्रचित्त परम-पुरुष का ध्यान किया। जब उसने इतना कठिन तप किया तो परम-पुरुष प्रसन्न हुए।

परम पुरुष ने कहा

पुरुष अवाज् उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥

परम-पुरुष ने पूछा कि इतनी घोर सेवा, तप क्यों कर रहे हो!

निरंजन ने कहा

कहै धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहाँ बैठों जायी ॥

निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं स्थान दे दो।

परम पुरुष ने कहा

आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ । मानसरोवर दीप है जहवाँ ॥

कहा-हे पुत्र! जाओ, तुम मानसरोवर द्वीप में जाकर रहो।

चले धरम तब मानसरोवर । बहुत हरषचित्त करत कलौहर ॥
मानसरोवर आये जहिया । भये आनन्द धरम पुनि तहिया ॥
बहु रि ध्यान पुरुष को कीन्हा । सत्तर युग सेवा चित दीन्हा ॥
यक पग ठाढ़ सेवा सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥

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मानसरोवर में आकर काल-निरंजन बड़ा खुश हुआ और आनन्द से रहने लगा। वहाँ वो पुनः परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। अबकी बार उसने पुनः 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर ध्यान किया। परम-पुरुष के हृदय में दया आयी।

विकस्यो पुहुप उदयो जब बानी । बोलत वचन उदयो अधरानी ।
जाहु सहज तुम धरम कै पास। अब कस ध्यान कीन्ह परगासा ॥

परम-पुरुष ने तब सहज को निरंजन के पास भेजा, कहा-पूछो कि अब क्यों ध्यान कर रहे हो, क्या चाहते हो!

चले सहज तब सीस नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥
कहे सहज सुन भ्राता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥
अब का माँगहु सो कह मोही । पुरुष अवाज दीन्ह यह तोही ॥

परम-पुरुष की आज्ञा पाकर उन्हें प्रणाम करके निरंजन के पास आए और कहा-हे भाई! परम-पुरुष तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हैं, इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भिजवाया है कि अब जो माँगना चाहते हो, मुझसे कहो।

निरंजन ने कहा

अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिनती जाई ॥
इतना ठाँव न मोहि सुहाई । अब मोहि बकसि देहु ठकुराई ॥
मोरे चित अस भौ अनुरागा । देऊ देश मोहि करहु सभागा ॥
कै मोहि देहु लोक अधिकारा । कै मोहि देहु देस यक न्यारा ॥

निरंजन ने सहज से कहा कि तुम मेरे बड़े भाई हो, तुम परम-पुरुष के पास जाकर विनती करते हुए कहना कि मैं इतने स्थान से खुश नहीं हूँ, इसलिए अब कृपा करके या तो अमर-लोक का राज्य ही मुझे दे दो या फिर अलग से एक न्यारा देश दो, जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो।

चले सहज सुनि धर्म के बाता । जाय पुरुष सो कहे विख्याता ॥
जो कछु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥

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निरंजन की बात सुनकर सहज वापिस परम-पुरुष के पास आए और जो कुछ निरंजन ने कहा, वो सुना दिया।

सुन्यो सहज के बचन जबहीं, पुरुष बैन उच्चारै ऊ।

धरम से संतुष्ट हैं हम, बचन मम हिय धारे ऊ॥

लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू॥

करहु रचना जाय तहवाँ, सहज वचन सुनावहू॥

परम-पुरुष ने सहज के वचन सुनकर कहा कि मैं निरंजन से बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए उसके पास जाकर कहो कि मैंने उसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है; वो शून्य में एक अलग देश बसा ले।

आय सहज तब वचन सुनावा। सत्य पुरुष जस कहि समुझावा॥

सुनतहिं बचन धर्म हरषाना। कल्लु क हरष कल्लु विस्मय आना॥

जब सहज ने निरंजन को परम-पुरुष की आज्ञा सुनाई तो निरंजन बहुत खुश हुआ। पर उसे कुछ आश्चर्य भी था। तो कहा-

कहे धर्म सुनु सहज पियारा। कै से रचौं करौं विस्तारा॥

पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू। जानू न भेद करौं किम काजू॥

गम्य अगम्य मोहि नाहिं आयी। करो दया सो युक्ति बतायी॥

विनती करौ पुरुष सों मोरी। अहो भ्रात बलिहारी तोरी॥

किहि विधि रचूँ नौ खंड बनाई। हे भ्राता सो आज्ञा पाई॥

मो कहँ देहु साज प्रभु सोई। जाते रचना जगत की होई॥

निरंजन ने सहज से कहा कि परम-पुरुष ने मुझे तीन-लोक का राज्य तो दिया, पर मुझे रचना का भेद मालूम ही नहीं तो फिर कैसे करूँ! मुझे वो सामग्री तो दो, जिससे मैं रचना कर सकूँ।

तबही सहज लोक पगु धारा। कीन्ह दण्डवत् बारंबारा॥

सहज फिर परम-पुरुष के पास गया और दण्डवत् प्रणाम किया।

अहो सहज कस इहवाँ आऊ। सो हमसों तुम सब्द सुनाऊ॥

परम-पुरुष ने सहज से पूछा कि किस कारण से आए हो, सो मुझे बताओ।

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साहिब बन्दगी

कह्यो सहज तब धर्म की बाता । जो कछु धर्म कही विख्याता ॥

तब सहज ने निरंजन की विनती सुना दी ।

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा । सुनो सहज तुम बचन हमारा ॥

कूर्म उदर आहि सब साजा । सो ले धरम करे निज काजा ॥

विनती करे कूर्म सो जायी । माँगि लेइ तेहि माथ नवायी ॥

परम-पुरुष ने सहज को आज्ञा दी, कहा कि कूर्म के पेट में रचना का सब सामान है; तुम निरंजन को कहो कि कूर्म के पास जाकर विनती करे और उससे वो सामान माँग ले ।

गये सहज पुनि धर्म के पास । आज्ञा पुरुष कीन्ह परगासा ॥

विनती करो कूर्म सो जाई । माँगि लेहु तेहि सीस नवाई ॥

जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं कृपा बहुत तब पावहु ॥

सहज ने निरंजन के पास जाकर परम-पुरुष की आज्ञा सुनाई, कहा कि कूर्म के पास जाकर विनती करना और उससे माँग लेना; वो तुम्हें दे देगा ।

चलि भौ धरम हरष तब बाढ़ो । मनहिं कीन गुमान अति गाढ़ो ॥

जाय कूर्म के सन्मुख भयऊ । दंड परनाम एक नहिं कियऊ ॥

अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई । तपत न तनि को अति शितलाई ॥

करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाला ॥

बारह पालँग कूर्म शरीरा । छै पालँग धरम बलवीरा ॥

धौवै चहुँ दिश रहै रिसाई । किहि विधि लीजे उत्पति भाई ॥

कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा । जाय कूर्म के सन्मुख भीरा ॥

कीन्हो काल सीस नख घाता । उदरते निकसे पवन अघाता ॥

तीन सीस के तीनहु अंशा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बंशा ॥

पाँच तत्व धरती आकाश । चन्द्र सूर्य उडगन रहिवासा ॥

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अनुरागसागर वाणी

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निस्र्यो नीर अग्नि शशि सूर। निस्र्यो नभ ढाकन महि अस्थूला ॥
छीना सीस कूर्म को जबही। चले परसेव ठाँव पुनि तबही ॥
जबही परसेव बुंद जल दीन्हा। उंचास कोट पृथ्वी को चीन्हा ॥

निरंजन बड़े ही घमण्ड के साथ कूर्म जी के पास पहुँचा और वहाँ जाकर कोई प्रणाम नहीं किया, कोई प्रार्थना नहीं की। पर कूर्म जी शांत थे, शीतल थे, उन्हें गुस्सा नहीं आया। निरंजन ने देखा कि कूर्म तो बहुत बलवान हैं। उनका शरीर उससे दुगुना था। निरंजन क्रोधित होकर उसके चारों ओर दौड़ने लगा, सोचने लगा कि कैसे इससे उत्पत्ति का सामान ले लूँ। उसने नख से उनके शीश पर प्रहार किया और तीन शीश काट कर खा लिए। तब उनके पेट से पाँच तत्व, धरती, आकाश, सूर्य, चाँद, तारे आदि सब सूक्ष्म रूप से निकले। वो सब सामान लेकर निरंजन शून्य में आया और रचना कर डाली। पर यह निर्जीव सृष्टि थी।

कूर्म ने कहा

आदि कूर्म रह लोक मैझारा। तिन पुनि ध्यान पुरुष अनुसारा ॥
निरंकार कीन्हो बरियाया। काल कला धरि मोपहँ आया ॥
उदर बिदार कीन्ह उन मोरा। आज्ञा जानि कीन्ह नहिं थोरा ॥

उधर कूर्म जी ने परम-पुरुष से ध्यान में कहा कि निरंकार (निरंजन) ने बल का प्रयोग करके मेरा पेट फाड़ा है, पर आपकी आज्ञा जानकर मैंने उसे कुछ नहीं कहा।

परम-पुरुष ने कहा

पुरुष अवाज् कीन्ह तेहि बारा। छोट वह आहि तुम्हारा ॥

आही यही बड़न की रीती। औगुन ठाँव करहिं वह प्रीती ॥

परम-पुरुष ने कहा कि वो तुम्हारा छोटा भाई है और बड़ों की रीत यही होनी चाहिए कि छोटे चाहे उपद्रव भी करें, उन्हें माफ कर देना चाहिए, उनसे प्रेम करना चाहिए।

निरंजन का पुनः तप

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निर्ंजन का पुनः तप

पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निर्ंजन। युग अनेक किय संयम ॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई। करि रचना बैठे पछताई ॥
धर्मराय तब कीन्ह बिचारा। कैसेलो त्रयपुर विस्तारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हों पाताला। बिनाबीज किमि कीजै ख्याला ॥
कौन भाँति कस करब उपाई। किहि विधि रचों शरीर बनाई ॥
कर सेवा माँगों पुनि सोई। तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥
एक पाँव तब सेवा कियऊ। चौंसठ युग लों ठाढ़े रहे ऊ ॥

निर्ंजन ने तीन लोक बना दिये, स्वर्ग, पाताल, मृत्यु लोक रच डाले, पर सोचा कि तीन लोक का विस्तार कैसे करूँ! क्योंकि बीज नहीं है, इसलिए शरीरों की रचना भी नहीं हो सकती और फिर यह तो निर्जीव सृष्टि है, इसमें जीव नहीं हैं; जैसे अमर लोक में हंस हैं, ऐसे इसमें नहीं हैं। यह सोच निर्ंजन ने पुनः एक पाँव पर खड़े होकर शून्य में 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया, सोचा कि सजीव तीन लोक मेरा हो जाए यानी अभी तक तीन-लोक की सृष्टि निर्जीव थी।

दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सुसेवा के भये।
बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब याचत नये ॥
जाहु सहज निर्ंजन पहँ, देउ जो कुछ माँगई।
करहि रचना पुरुष वचना, छल मता सब त्यागई ॥

परम-पुरुष फिर निर्ंजन की सेवा से अधीन हुए और सहज को उसके पास भेजा।

चले सहज सिरनाय, जबहिं पुरुष आज्ञा कियो।
तहवाँ पहुँचे जाय, जहाँ निर्ंजन ठाढ़ रहो ॥

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अनुरागसागर वाणी

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सहज परम-पुरुष की आज्ञा पाकर निरंजन के पास आए।

देखत सहज धर्म हरषाना। सेवा बस पुरुष तब जाना।।

निरंजन ने जब सहज को आते देखा तो जान गया कि परम-पुरुष सेवा से खुश हो गये हैं।

तबै सहज अस भाषे लीन्हा। सुनहु धर्म तोहि पुरुष सब दीन्हा।।

कूर्म उदर सो जो कछु आवा। सो तोहि देन पुरुष फरमावा।।

तीन लोक राज तोहि दीन्हा। रचना रचहु होहु जनि भीना।।

कहै सहज सुनहु धर्मराया। केहि कारण अब सेवा लाया।।

सहज ने कहा-हे निरंजन! तुम्हें परम-पुरुष ने तीन लोक का राज्य दिया; कूर्म के पेट से जो निकला, वो भी तुमने ले लिया; अब क्यों तप कर रहे हो!

तबै निरंजन विनती लायी। कैसे रचना रचूँ बनायी।।

पुरुषहिं कहो जोरि युग पानी। मैं सेवक दुतिया नहीं जानी।।

पुरुष सो विनती करो हमारा। दीजे खेत बीज निज सारा।।

मैं सेवक दुतिया नहीं जानू। ध्यान पुरुष का निशि दिन आनू।।

निरंजन ने कहा कि बीज ही नहीं है तो सृष्टि कैसे करू! इसलिए बीज दो और जीव भी दो, जिन पर राज्य कर सकूँ।

सहज कहो पुनि पुरुषहिं जाई। जस कछु कहो निरंजन राई।।

सहज ने परम-पुरुष के पास जाकर निरंजन की प्रार्थना सुना दी।

इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा। अष्टं गी कन्या उपचारा।।

अष्ट बाहु कन्या होय आई। बायें अंग सो ठाढ़ रहाई।।

माथ नाई पुरुष सो कहई। अहो पुरुष आज्ञा कस अहई।।

परम-पुरुष ने तब इच्छा करके एक ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं। आद्य शक्ति ने परम पुरुष से पूछा कि उसको क्यों बनाया गया है!

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साहिब बन्दगी

तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरम के पास।।

देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्पति वारी ।।

दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सुहँ ग जीव कर होई ।।

जीव सोहँ गम दूसर नाही । जीव सो अंश पुरुष को आही ।।

परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएँ देते हुए कहा कि हे पुत्री ! मानसरोवर में निरंजन के पास ये आत्माएँ लेकर जाओ और उसके साथ मिलकर सत्य सृष्टि करो । सोहँ ग जीव का ही नाम है और यह परम-पुरुष का अंश है ।

पुरुष सेवा वश भये तब अष्टगहिँ दीन्ह हो ।

मानसरोवर जाहु कहिया देहु धर्महिँ चीन्ह हो ।

अष्टँ गी कन्या हती जेहिँ रूप शोभा अति बनी ।

जाहु कन्या मानसरोवर करहु रचना अति घनी ।।

सेवा के वश होकर ही परम-पुरुष ने अष्टंगी को जीव देकर निरंजन के पास मानसरोवर में भेजा ।

चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे ।।

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नाय के ।।

परम-पुरुष ने आद्य-शक्ति को जीवात्माएँ देते हुए कहा कि सत्य सृष्टि करना । (यानी आत्माओं को शरीरों में डालने की आज्ञा नहीं दी) आद्य-शक्ति परम-पुरुष को प्रणाम कर चल पड़ी ।

यह सब दीन्हो आदि कुमारी । मान सरोवर चलि भई नारी ।।

तत्छिन्न पुरुष सहज टेरावा । धावत सहज पुरुष पहिँ आवा ।।

जाही सहज धरम यह कहेहु । दीन्ही वस्तु जस तुम चहे हु ।।

मूल बीज तुम पहुँ पठवावा । करहु सृष्टि जस तुम मन भावा ।।

मानसरोवर जाहि रहाहु । ताते होई हैं सृष्टि उराहु ।।

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अनुरागसागर वाणी

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जब आद्य-शक्ति मानसरोवर को चली तो परम पुरुष ने तुरंत सहज को बुलाकर कहा कि निरंजन के पास जाओ और कहो कि जो वस्तु तुमने चाही थी, सो तुम्हें दे दी है, मूल बीज तुम तक पहुँचा दिया है, अब मानसरोवर को जाओ और सृष्टि करो।

चले सहज तहवाँ तब आये। धर्म धीर जहाँ ठाढ़ रहाये ॥

कहेउ सु वचन पुरुष को जबहीं। धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥

परम-पुरुष की आज्ञा पाकर सहज निरंजन के पास आए और परम-पुरुष के वचन सुनाए।

पुरुष वचन सुन तबही गाजा। मान सरोवर आन विराजा।

आवत कामिनि देख्यो जबही। धर्मराय मन हरष्यो तबही।

कला अनन्त अंत कछु नहीं। काल मगन है निरखत ताही ॥

निरखत धरम सु भयो अधीरा। अंग अंग सब निरख शरीरा ॥

धर्मराय कन्या कह ग्रासा। काल स्वभाव सुनो धर्मदासा ॥

परम-पुरुष के वचन सुन निरंजन मानसरोवर में आकर बैठ गया। जब उसने आद्य-शक्ति को आते देखा तो बड़ा खुश हुआ। आद्य-शक्ति अनन्त कला और सैदर्य से परिपूर्ण थी, सो काल पुरुष उसे देख मग्न हो गया, कामुक हो गया। उसने शक्ति को एक हाथ में पाँव और एक हाथ में शीश की तरफ से पकड़ा और निगल गया। तब से उसका नाम काल पुरुष हुआ अथवा काल निरंजन हुआ।

कीनो ग्रास काल अन्याई। तब कन्या चित विस्मय लाई ॥

ततछन कन्या कीन्ह पुकारा। काल निरंजन कीन्ह अहारा ॥

जैसे ही निरंजन ने उसे निगला, उसने परम-पुरुष को पुकार की, कहा कि काल-निरंजन ने मुझे खा लिया है।

तबही धर्म सहज लग आई। सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई ॥

फिर निरंजन सहज के पास गया और उसे भी वहाँ से भगा दिया, क्योंकि तप के कारण उसमें ताकत आ गयी थी।