अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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अण्डा नीचे गिरना शुरू होता है। इतनी ऊँचाई से जब वो नीचे की ओर आता है तो आते-आते रास्ते में ही वो अण्डा पकता है। मुर्गी तो बैठकर पकाती है, पर वो अण्डा खुद ही पक जाता है और फिर रास्ते में ही फूट भी जाता है। रास्ते में ही उसे आँखें भी आ जाती हैं। पृथ्वी पर गिरे तो मर जाता, पर पृथ्वी पर गिरने से पहले ही उसे सुधि आ जाती है कि यहाँ उसका घर नहीं है। अब सुरति संभाल कर वो खुद ही अपने घर की ओर चल पड़ता है; उसके माता-पिता उसे लेने नहीं आते हैं। इस संसार में बहुत से पक्षी हैं, पर अनल पक्षी समान निर्मल कोई नहीं। जैसे अनल पक्षी खुद अपने माता-पिता के देश में चलता है, ऐसे ही बिरले जीव नाम में समाए रहते हैं और जो ऐसा करते हैं, वे काल को मारकर सतलोक चले जाते हैं।
मन बच कर्म गुरु ध्यान, गुरु आज्ञा निरखत चलै ॥
देहि मुक्ति गुरु दान, नाम विदेह लखाय कै ॥
जो मन, बचन और कर्म से गुरु का ही ध्यान करता रहे और जीवन-भर उनकी आज्ञा में चले। विदेह नाम का ज्ञान देकर सदगुरु उसे मुक्ति का दान देते हैं।
जब लग ध्यान विदेह न आवै। तब लग जिव भव भटका खावै ॥
ध्यान विदेह औ नाम विदेहा। दोइ लख पावे मिटै संदेहा ॥
छन इक ध्यान विदेह समाई। ताकी महिमा बरनि न जाई ॥
काया नाम सबै गोहरावे। नाम विदेह बिरले कोई पावे ॥
जो युग चार रहे कोई कासी। सार शब्द बिन यमपुर बासी ॥
नीमखार बढ़ी परधाना। गया द्वारिका प्राग अस्नाना ॥
अड़सठ तीरथ भू परिकरमा। सार शब्द बिन मिटे न भरमा ॥
कहँ लग कहों नाम परभाऊ। जो सुमिरे जम त्रास नसाऊ ॥
जब तक ध्यान विदेह स्थिति को प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव