अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
नहीं पहुँच पाए विष्णु
नहीं पहुँच पाये विष्णु
आज्ञा माँगि विष्णु चले बाला । पिता दरश को चले पताला ॥
इत उत चितय महे स न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥
तेहि शिव मन अस चितं अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥
यहि विधि बहुत दिवस चलि गयऊ । माता सोच पुत्र कस कियऊ ॥
विष्णु जी भी आज्ञा माँगकर पिता के दर्शन को पाताल में चले गये । पर शिवजी कहीं नहीं गये; वे माता की सेवा में लगे रहे । इस तरह बहुत दिन बीत गये, माता ने सोचा कि पुत्रों ने यह क्या किया ।
प्रथम विष्णु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥
सबसे पहले विष्णु लौटकर माता के पास आए और सच्ची-2 बात बता दी कि मैं पिता के चरण नहीं देख सका ।
सुनि हर्षित भइ आदि कुमारी । लीन्ह विष्णु कहँ निकट दुलारी ॥
चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥
विष्णु की बात सुन शक्ति ने उसे आशीर्वाद दिया और उसका मुख चूमा, उसे प्यार किया, कहा-तुमने सत्य बोला है ।
पुनि कह माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इक वचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहो बुझाई । पितु पद परसन जब गै भाई ॥
प्रथम हुतो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भए धीरा ॥
माता ने विष्णु से कहा-तुम सत्य बोलो कि तुम पिता के चरण स्पर्श नहीं कर सके, पर यह बताओ कि पहले तो तुम गौर वर्ण थे, अब श्याम वर्ण कैसे हो गये !
आज्ञा पाय हम तत्काला । पितु पद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह कर माहँ । चले पताल पंथ मग जाहँ ॥
53
54
साहिब बन्दगी
पहुँचि शेषनाग पहुँ गयऊ । विष के तेज हम अलसयऊ ॥
भयो श्याम विष तेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जायी । बचन सत्य कहियो समझायी ।
सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥
तब तुम हौहु कृष्ण अवतारा । लैहो ओयल सो कही विचारा ॥
नाथहु नाग कलिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्है उ सत्य वचन परकासा ॥
भेटे उ नाहिं माहि पद ताता । विष ज्वाला साँवले भो गाता ॥
व्याकुल भयो तबै फिरि आयो । पितु पद दर्शन मैं नहिं पायो ॥
विष्णु ने कहा कि तुम्हारी आज्ञा पाकर जब फूल लेकर मैं पाताल लोक में गया तो रास्ते में शेषनाग मिले, उनके विष के प्रभाव से मैं अचेत हो गया और मेरा वर्ण श्याम हो गया, तब शेषनाग ने कहा कि हे विष्णु! माता के पास वापिस लौट जाओ और सत्य कहना। उसने कहा कि सतयुग और त्रेता युग बीत जायेंगे तो द्वापर युग आयेगा, तब तुम्हारा कृष्णावतार होगा, मुझे नाथना, पर अब जल्दी से लौट जाओ। तब हम तुम्हारे पास आ गये और पिता के चरणों का दर्शन नहीं कर सके। (शेषनाग कालीनाग के रूप में यमुना में रहता था।)