Skip to content
SarvaKosh
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

Page 35 of 144

Read in context
Page 35

अनुरागसागर वाणी

35

जब आद्य-शक्ति मानसरोवर को चली तो परम पुरुष ने तुरंत सहज को बुलाकर कहा कि निरंजन के पास जाओ और कहो कि जो वस्तु तुमने चाही थी, सो तुम्हें दे दी है, मूल बीज तुम तक पहुँचा दिया है, अब मानसरोवर को जाओ और सृष्टि करो।

चले सहज तहवाँ तब आये। धर्म धीर जहाँ ठाढ़ रहाये ॥

कहेउ सु वचन पुरुष को जबहीं। धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥

परम-पुरुष की आज्ञा पाकर सहज निरंजन के पास आए और परम-पुरुष के वचन सुनाए।

पुरुष वचन सुन तबही गाजा। मान सरोवर आन विराजा।

आवत कामिनि देख्यो जबही। धर्मराय मन हरष्यो तबही।

कला अनन्त अंत कछु नहीं। काल मगन है निरखत ताही ॥

निरखत धरम सु भयो अधीरा। अंग अंग सब निरख शरीरा ॥

धर्मराय कन्या कह ग्रासा। काल स्वभाव सुनो धर्मदासा ॥

परम-पुरुष के वचन सुन निरंजन मानसरोवर में आकर बैठ गया। जब उसने आद्य-शक्ति को आते देखा तो बड़ा खुश हुआ। आद्य-शक्ति अनन्त कला और सैदर्य से परिपूर्ण थी, सो काल पुरुष उसे देख मग्न हो गया, कामुक हो गया। उसने शक्ति को एक हाथ में पाँव और एक हाथ में शीश की तरफ से पकड़ा और निगल गया। तब से उसका नाम काल पुरुष हुआ अथवा काल निरंजन हुआ।

कीनो ग्रास काल अन्याई। तब कन्या चित विस्मय लाई ॥

ततछन कन्या कीन्ह पुकारा। काल निरंजन कीन्ह अहारा ॥

जैसे ही निरंजन ने उसे निगला, उसने परम-पुरुष को पुकार की, कहा कि काल-निरंजन ने मुझे खा लिया है।

तबही धर्म सहज लग आई। सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई ॥

फिर निरंजन सहज के पास गया और उसे भी वहाँ से भगा दिया, क्योंकि तप के कारण उसमें ताकत आ गयी थी।