अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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सहज परम-पुरुष की आज्ञा पाकर निरंजन के पास आए।
देखत सहज धर्म हरषाना। सेवा बस पुरुष तब जाना।।
निरंजन ने जब सहज को आते देखा तो जान गया कि परम-पुरुष सेवा से खुश हो गये हैं।
तबै सहज अस भाषे लीन्हा। सुनहु धर्म तोहि पुरुष सब दीन्हा।।
कूर्म उदर सो जो कछु आवा। सो तोहि देन पुरुष फरमावा।।
तीन लोक राज तोहि दीन्हा। रचना रचहु होहु जनि भीना।।
कहै सहज सुनहु धर्मराया। केहि कारण अब सेवा लाया।।
सहज ने कहा-हे निरंजन! तुम्हें परम-पुरुष ने तीन लोक का राज्य दिया; कूर्म के पेट से जो निकला, वो भी तुमने ले लिया; अब क्यों तप कर रहे हो!
तबै निरंजन विनती लायी। कैसे रचना रचूँ बनायी।।
पुरुषहिं कहो जोरि युग पानी। मैं सेवक दुतिया नहीं जानी।।
पुरुष सो विनती करो हमारा। दीजे खेत बीज निज सारा।।
मैं सेवक दुतिया नहीं जानू। ध्यान पुरुष का निशि दिन आनू।।
निरंजन ने कहा कि बीज ही नहीं है तो सृष्टि कैसे करू! इसलिए बीज दो और जीव भी दो, जिन पर राज्य कर सकूँ।
सहज कहो पुनि पुरुषहिं जाई। जस कछु कहो निरंजन राई।।
सहज ने परम-पुरुष के पास जाकर निरंजन की प्रार्थना सुना दी।
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा। अष्टं गी कन्या उपचारा।।
अष्ट बाहु कन्या होय आई। बायें अंग सो ठाढ़ रहाई।।
माथ नाई पुरुष सो कहई। अहो पुरुष आज्ञा कस अहई।।
परम-पुरुष ने तब इच्छा करके एक ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं। आद्य शक्ति ने परम पुरुष से पूछा कि उसको क्यों बनाया गया है!