अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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निस्र्यो नीर अग्नि शशि सूर। निस्र्यो नभ ढाकन महि अस्थूला ॥
छीना सीस कूर्म को जबही। चले परसेव ठाँव पुनि तबही ॥
जबही परसेव बुंद जल दीन्हा। उंचास कोट पृथ्वी को चीन्हा ॥
निरंजन बड़े ही घमण्ड के साथ कूर्म जी के पास पहुँचा और वहाँ जाकर कोई प्रणाम नहीं किया, कोई प्रार्थना नहीं की। पर कूर्म जी शांत थे, शीतल थे, उन्हें गुस्सा नहीं आया। निरंजन ने देखा कि कूर्म तो बहुत बलवान हैं। उनका शरीर उससे दुगुना था। निरंजन क्रोधित होकर उसके चारों ओर दौड़ने लगा, सोचने लगा कि कैसे इससे उत्पत्ति का सामान ले लूँ। उसने नख से उनके शीश पर प्रहार किया और तीन शीश काट कर खा लिए। तब उनके पेट से पाँच तत्व, धरती, आकाश, सूर्य, चाँद, तारे आदि सब सूक्ष्म रूप से निकले। वो सब सामान लेकर निरंजन शून्य में आया और रचना कर डाली। पर यह निर्जीव सृष्टि थी।
कूर्म ने कहा
आदि कूर्म रह लोक मैझारा। तिन पुनि ध्यान पुरुष अनुसारा ॥
निरंकार कीन्हो बरियाया। काल कला धरि मोपहँ आया ॥
उदर बिदार कीन्ह उन मोरा। आज्ञा जानि कीन्ह नहिं थोरा ॥
उधर कूर्म जी ने परम-पुरुष से ध्यान में कहा कि निरंकार (निरंजन) ने बल का प्रयोग करके मेरा पेट फाड़ा है, पर आपकी आज्ञा जानकर मैंने उसे कुछ नहीं कहा।
परम-पुरुष ने कहा
पुरुष अवाज् कीन्ह तेहि बारा। छोट वह आहि तुम्हारा ॥
आही यही बड़न की रीती। औगुन ठाँव करहिं वह प्रीती ॥
परम-पुरुष ने कहा कि वो तुम्हारा छोटा भाई है और बड़ों की रीत यही होनी चाहिए कि छोटे चाहे उपद्रव भी करें, उन्हें माफ कर देना चाहिए, उनसे प्रेम करना चाहिए।