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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

शाप से ग्रसित हुए सब

अनुरागसागर वाणी

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अब तुम जाय धरो औतारा । क्योड़ ! कैतकी नाम तुम्हारा ॥

आद्या शक्ति ने पुहुपावती को भी शाप दिया, कहा—तुमने झूठ बोला कि फूल से उत्पन्न हुई, जा केली का फूल हो जा। तू कुण्ठाओं पर उत्पन्न होगी और तुझे लगाने वाले का वंश ही समाप्त हो जायेगा।

भये शापवश तीनों विकल मति हीन छीन कुकर्मते ।

यह काल प्रचण्ड कामिनि डस्यो सब कहँ चर्मते ॥

ब्रह्मादि शिव सनकादि नारद कोठ न बचि भागि हो ।

सुनु धरमनि विरल बाचे सब्द सत सो लागि हो ॥

शाप पाकर तीनों व्याकुल हो गये और कुकर्म के कारण सबकी मति हीन हो गयी। साहिब धर्मदास से कहते हैं कि काल का यह प्रचण्ड जादू सबपर छाया हुआ है, जिस कारण माया के कामिनि रूप से कोई नहीं बच पाया, सबको इसने डस लिया है। कहाँ तक बात की जाए, ब्रह्मादि, शिव, सनकादि, नारद आदि कोई भी इससे बचकर भाग नहीं सका। हे धर्मदास! इससे केवल वे बिरले जन ही बच सकते हैं, जो सद्गुरु से सत्य शब्द पाकर उसमें रमे रहें।

शाप तीनों को दै लियो, मन माहिँ तब पछतावई ।

कस करहि मोहि निरंजना, पल छमा मोहि न आवई ॥

तो जब तीनों को शाप दे दिया तो शक्ति मन ही मन पछताने लगी कि मैंने इन्हें शाप क्यों दिया, छमा क्यों नहीं कर दिया, अब निरंजन पता नहीं क्या करेगा!

निरंजन ने आकाशवाणी की

अकास बानी तब भयी, यहु कहा कीन भवानिया ।

उत्पति कारन तोहि पठायो, कहा चरित यह ठानिया ॥

निरंजन ने आकाशवाणी की, कहा—हे भवानी! यह तुने क्या किया! मैंने तुम्हें सृष्टि का कार्य करने को कहा, लेकिन तूने क्या चरित्र किया!

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साहिब बन्दगी

अद्या को भी मिला शाप

नीचहि ऊँच सिताय, बदल मोहि सो पावई ॥

द्वारपर युग जब आय, तुमहुँ पंच भतारि हो ॥

निरंजन ने कहा कि आगे भी जो कोई बलवान निर्बल को सतायेगा, मैं उसे बदले में दुख दूगाँ, और अद्या को शाप दिया कि जब द्वारपर युग आयेगा जो द्रोपती (गायत्री) के पाँच पति होंगे वो आपके (आद्या शक्ति) पुत्र होंगे और बिना बाप के होंगे।

शाप ओयल जब सुनेउ भवानी। मन सन गुने कहा नहिं बानी ॥

ओयल प्रभाव शाप हम पाया। अब कहा निरंजन राया ॥

तोरै बस परी हम आई। जस चाहो तस करो उपाई ॥

बदले में निरंजन की आकाशवानी सुन अद्या चुप रह गयी और मन ही मन कहने लगी कि शाप के बदले में मैंने शाप पाया, पर मैं तो तेरे वश में हूँ, इसलिए जो तेरी इच्छा है, वही कर।

मन ही सख्यी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई।
पांच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई॥

विष्णु को हुए पिता के दर्शन

अब माता विष्णु पहुँ आई। लीन्ह विष्णु कहँ गोद उठाई॥
पुनि अस कहै उ आदि भवानी। अब सुनहु पुत्र मम बानी॥
देख पुत्र तोहिँ पिता भिटावों। तोरे मन कर धोख मिटावों॥
प्रथमहिँ ज्ञान दृष्टि सों देखो। मोर बचन निज हृदय परे खो॥
मन स्वरूप करता कहँ जानो। मनते दूजा और न मानो॥
स्वर्ग पताल दौर मन केरा। मन अस्थिर मन अहै अनेरा॥
क्षणमहँ कला अनंत दिखावे। मनकहँ देख कोइ नहिँ पावे॥
निराकार मनही को कहिये। मन की आश निशि दिन रहिये॥
देखहु पलटि शून्य महँ जोती। जहवाँ झिलमिल झालर होती॥
फेरहु श्वास गगन कहँ धाओ। मार्ग अकाशहि ध्यान लगाओ॥
जैसे माता कहि समुझावा। तैसे विष्णु ध्यान मन लावा॥

विष्णु ने सत्य बोला था, इसलिए माता ने विष्णु को गोद में बिठाकर कहा कि हे पुत्र! तुझे पिता का दर्शन करवाती हूँ। मन ही सृष्टि का कर्ता है, मन से ही स्वर्ग, पाताल आदि हैं। मन को कोई देख नहीं पाता है, यही निराकार तुम्हारा पिता है। फिर शून्य में माता ने विष्णु को ज्योति के दर्शन कराए और कहा कि श्वास को पलट कर ऊपर शून्य में चढ़ाओ, ध्यान लगाओ। विष्णु ने वैसा ही किया।

तेहि पीछे धर्मदास, मन पुनि आप दिखायऊ।

कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हर्षित भये॥

मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णु भा।

मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव॥

तब मन विष्णु को दिखाई दिया, निरंजन(मन) ने ज्योति दिखाई और उसे देख विष्णु बड़े प्रसन्न हुए, माता को शीश नवाया, कहा—मैंने तुम्हारी कृपा से परमात्मा के दर्शन कर लिये।

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साहिब बन्दगी

धर्मदास का संशय

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास गहि टेके पाया। हे साहिब इक संशय आया।।

कन्या मन को ध्यान बतावा। सो यह सकल जीव भरमावा।।

धर्मदास जी ने साहिब के चरण पकड़ लिये, कहा कि एक संशय है, अद्या ने उस मन का ध्यान करना विष्णु को बता दिया, जिसने सब जीवों को भरमाया हुआ है।

साहिब कहते हैं

धर्मदास यह काल स्वभाऊ। पुरुष भेद विष्णु नहिं पाऊ।।

कामिनी की यह देखहु बाजी। अमृत गोय दियो विष साजी।।

देख ज्योति पतंग हु लासा। प्रीति जान आवै तिहि पास।।

परसत होवे भस्म पतंगा। अनजाने जरि मरे पतंगा।।

ज्योति स्वरूप काल असस आही। कठिन काल वह छाड़त नाहीं।।

काहि विष्णु औतारहि खाया। ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया।।

कौन विपति जीवन की कहऊं। परखि वचन निज सहजहि रहऊं।।

लख जीव वह नित्यहि खाई। अस विकराल सो काल कसाई।।

साहिब ने कहा—हे धर्मदास! यह काल का स्वभाव था, परम पुरुष का भेद विष्णु ने नहीं पाया। अद्या का खेल तो देखो, उसने काल रूपी, मन रूपी विष का भेद विष्णु को देकर परम पुरुष रूपी अमृत का भेद गुप्त रखा। जैसे दीपक की लौ को देखकर पतंगा प्रसन्न होता है और प्रेम वश उसके पास आता है, पर उसके स्पर्श से वो पतंगा भस्म हो जाता है, अनजाने में बेचारा जल मरता है। ऐसे ही ज्योति स्वरूप काल भी किसी