सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

त्रिदेवों ने किया समुद्र मंथन

त्रिदेवों ने किया समुद्र मंथन

त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिंधु मथाने ॥
बालक मातै खेल खिलारी । सिंधु मंथन नहिं गयै उखरारी ॥
तेहि अन्तर इक भयो तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥
धान्यो योग निरंजन राई । पवन अरं भ कीन्ह बहुताई ॥
त्यागो पवन रहित पुनि जबही । निकसेउ वेद स्वास संग तबही ॥
स्वास संग आयेउ सो वेदा । बिरला जन कोई जाने भेदा ॥
अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञा का मोहि निरगुन नाहां ॥
कह्यो जाय करु सिंधु निवासा । जेहि भेंटे जैहौ तिहि पासा ॥
उठी अवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावत भेखा ॥
चलेउ वेद तहँवा को जाई । जहँवा सिंधु रचा धर्मराई ॥
पहुँचे वेद तब सिंधु मँझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥
गुप्त ध्यान देविहिं समुझावा । सिंधु मंथन कहँ कस विलमावा ॥
पठवहु बेगि सिंधु त्रय बारा । दिठकै सोचहु बचन हमारा ॥
बहुरि आप पुनि सिंधु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥
तिहुँ बालक को कहा समुझायी । आसिष दे पुनि तहाँ पठायी ॥
पैहो वस्तु सिंधु के माहीं । जाहु बेगि तीनों सुत ताही ॥
चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाही । दोइ लहु रा पुनि पाछे जाई ॥

जब तीनों बालक कुछ बड़े हुए तो माता ने कहा कि समुद्र मंथन को जाओ; पर बच्चे खेलने में मस्त रहे, वहाँ नहीं गये। इतने में पहले निरंजन ने तमाशा किया, उसने योग से पवन उत्पन्न की और जब उसका त्याग किया तो स्वांस के साथ वेद बाहर निकले यानी निरंजन ने वायु में वेद के शब्द किये, कोई पुस्तक लिखी हुई नहीं थी। इस भेद को कोई

44

अनुरागसागर वाणी

45

बिरला ही जानता है। वेद ने निरंजन की स्तुति की और आज्ञा माँगी। निरंजन ने कहा-जाओ समुद्र में समा जाओ, जब मंथन हो तब जिसे मिलो, उसी के पास चले जाना। निरंजन ने आकाशवानी की, ज्योति दिखाई, पर वेद ने उसका रूप नहीं देखा, इसलिए वेद निराकार के लिए भी कहता है कि उसका पूरा भेद नहीं पा रहा हूँ।.... तो जब वेद चले गये तो निरंजन ने तेज उत्पन्न करके उसे भी समुद्र में समाने को कहा; फिर तेज के बाद विष उत्पन्न करके उसे भी समुद्र में समाने भेज दिया। वेद जब समुद्र मध्य आकर समा गये तो निरंजन ने ध्यान में आद्य शक्ति को कहा कि समुद्र मंथन में बिलम्ब क्यों हो रहा है, हमारे वचन पर ध्यान दो और जल्दी से तीनों पुत्रों को समझाकर और आशीर्वाद देकर समुद्र मंथन के लिए भेजो। तब आद्य शक्ति ने तीनों को समझाकर और आशीर्वाद देकर समुद्र मंथन के लिए भेजा, कहा कि समुद्र के अन्दर कोई वस्तु है, जल्दी जाओ। ब्रह्मा मान सहित आगे-2 चले और पीछे-2 दोनों भाई विष्णु और शिवजी भी चले।

गये सिंधु के पास, भये ठाढ़ तीनों जने।

युक्ति मथन परकास, एक एक को निरखहीं॥

तीनों पुत्र समुद्र के पास जाकर खड़े हो गये और एक दूसरे को देखते हुए मंथन पर विचार करने लगे।

तीनों कीन्ह मंथन तब जाई। तीन वस्तु तीनों जन पाई॥

ब्रह्मा वेद तेज तेहि छोटा। लहुरा तासु मिले विष खोटा॥

भेट वस्तु त्रय तीनों भाई। चलि भये हर्ष कहत जहँ माई॥

माता पहँ आये त्रय बारा। निज-2 वस्तु प्रगट अनुसारा॥

माता आज्ञा कीन्ह प्रकासा। राखु वस्तु तुम निज-2 पासा॥

जब मंथन किया तो तीनों को तीन चीजें मिली। ब्रह्मा को वेद मिले, विष्णु को तेज मिला और शिवजी को विष मिला। तीनों चीजें लेकर तीनों भाई बड़े खुश होकर माता के पास आए। माता ने कहा कि जो चीजे जिसे मिली है, वो अपने पास रख ले।

46

साहिब बन्दगी

पुनि तुम मथहु सिंधु कहँ जाई। जो जिहि मिले लेहु सो भाई॥
कीन्ह चरित अस आदि भवानी। कन्या तीन कीन्ह उत्पानी॥
कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं। अंस वारि महँ नायो सबहीं॥
पठयो सिंधु माहिँ पुनि ताहीं। त्रय सुत मरम सो जानत नाहीं॥
पुनि तिन मंथन सिंधु को कीन्हा। भैंट्यो कन्या हरित है लीन्हा॥
कन्या तीनहु लीन्हे साथा। आ जननी कहँ नायउ माथा॥
सब माता के आगे कीन्हा। माता बाँटि तिन्हन कहँ दीन्हा॥
माता कहै सुनहु सुत मोरा। यह तो काज भये सब तोरा॥
एक एक बाँटि तीन्हु को दीन्हा। करहु भोग अस आज्ञा कीन्हा॥
सावित्री ब्रह्मा तुम लेऊ। है लक्ष्मी विष्णु कहँ देऊ॥
पारवती शंकर कहँ दीन्ही। ऐसी माता आज्ञा कीन्ही॥
तीनउ जन लीन्ही सिर नाई। दीन्ह अद्या जस भाग लगाई॥
पाई कामिनी भये अनंदा। जस चकोर पाये निशिचदा॥
काम वसी भए तीनों भाई। देव दैत दोनों उपजाई॥
धरमदास परखो यह बाता। नारी भयी हती सो माता॥

माता ने पुत्रों से कहा कि पुनः समुद्र मंथन के लिए जाओ और जो जिसे मिले, वो उसे अपने पास रख ले। इतने में शक्ति ने तीन कन्याओं की उत्पत्ति की और उन्हें भी समुद्र में समाने को कहा। तीनों बेटों में से किसी को भी इसका भेद मालूम न चला। जब तीनों ने पुनः समुद्र मंथन किया तो तीनों कन्याएँ मिलीं। तीनों कन्याएँ लेकर तीनों माता के पास आए। माता ने कहा कि यह सब तुम्हारा काम है, इसलिए एक-एक कन्या सबको दे दी और एक दूजे के संग रहने को कहा। सावित्री ब्रह्मा जी को दी, लक्ष्मी विष्णु जी को और पार्वती शंकर जी को दी। स्त्री पाकर तीनों भाई बड़े खुश हुए। जैसे चकोर को रात्रि का चाँद मिल गया

अनुरागसागर वाणी

47

हो, ऐसे ही सब उनमें खो गये। फिर तीनों भाई काम के वशीभूत हुए और उनमें ही रम गए। जिससे देवताओं और दैत्यों की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी और विष्णु जी से देवताओं की और शिवजी से राक्षसों की उत्पत्ति हुई। इसलिए आगे चलकर शिवजी ने ही राक्षसों को वरदान भी दिये।

माता बहुरि कहै समुझायी। अब फिर सिंधु मथो तुम जाईं ॥
जो जेहि मिलै लेहु सो जाईं। अब जनि करो विलंब तुम भाईं ॥

माता ने पुत्रों से कहा कि अब फिर से समुद्र मंथन के लिए जाओ और अबकी बार विलंब न करना।

त्रय सुत चले माथ नवायी। जो कछु कहै उ करब हम जायी ॥
मथ्यो सिंधु कछु विलंब न कीना। निकसे चौदह रतन सो लीन्हा ॥
चौदह रतन की निकसी खानी। ले माता पहँ पहुँचे आनी ॥
तीनहु बन्धु हरषित हैं लीन्हा। विस्नु सुधा पायउ हर विष दीन्हा ॥

तीनों माता को प्रणाम करके पुनः मंथन के लिए चले और अबकी बार 14 रतन की खानी निकली और उन्हें लेकर माता के पास आए। तब उसमें से विष्णु जी को अमृत और शिवजी को विष दिया गया।