अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextनिर्ंजन का पुनः तप
पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निर्ंजन। युग अनेक किय संयम ॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई। करि रचना बैठे पछताई ॥
धर्मराय तब कीन्ह बिचारा। कैसेलो त्रयपुर विस्तारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हों पाताला। बिनाबीज किमि कीजै ख्याला ॥
कौन भाँति कस करब उपाई। किहि विधि रचों शरीर बनाई ॥
कर सेवा माँगों पुनि सोई। तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥
एक पाँव तब सेवा कियऊ। चौंसठ युग लों ठाढ़े रहे ऊ ॥
निर्ंजन ने तीन लोक बना दिये, स्वर्ग, पाताल, मृत्यु लोक रच डाले, पर सोचा कि तीन लोक का विस्तार कैसे करूँ! क्योंकि बीज नहीं है, इसलिए शरीरों की रचना भी नहीं हो सकती और फिर यह तो निर्जीव सृष्टि है, इसमें जीव नहीं हैं; जैसे अमर लोक में हंस हैं, ऐसे इसमें नहीं हैं। यह सोच निर्ंजन ने पुनः एक पाँव पर खड़े होकर शून्य में 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया, सोचा कि सजीव तीन लोक मेरा हो जाए यानी अभी तक तीन-लोक की सृष्टि निर्जीव थी।
दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सुसेवा के भये।
बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब याचत नये ॥
जाहु सहज निर्ंजन पहँ, देउ जो कुछ माँगई।
करहि रचना पुरुष वचना, छल मता सब त्यागई ॥
परम-पुरुष फिर निर्ंजन की सेवा से अधीन हुए और सहज को उसके पास भेजा।
चले सहज सिरनाय, जबहिं पुरुष आज्ञा कियो।
तहवाँ पहुँचे जाय, जहाँ निर्ंजन ठाढ़ रहो ॥
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