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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

मृतक होय सो साधु

मृतक होय सो साधु

विश्वास कर मम बचन को, चढ़ सत की राह हो।
ज्यों सूरमा रन में धसे, फिर पाछे चितवत नाहिं हो ॥
सती शूरा भाव निरखि के, सत्य को मग धारिये।
मृतक दसा विचार गुरुगम, काल कष्ट निवारिये ॥

साहिब कह रहे हैं कि मेरी बात पर विश्वास करो और सत्य की राह पर ऐसे ही पाँव रखो जैसे कोई शूरमा युद्ध क्षेत्र में एक बार घुस जाता है तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखता। सती और शूरमा की भाँति सत्य की राह पर दृढ़ होकर गुरु प्रेम से जीवित मरने की स्थिति प्राप्त करो, जिससे काल के कष्टों से छूट जाओगे।

कोई सूरा जीव, जो ऐसी करनी करै ॥
ताहि मिलैगो पीव कहहिं कबीर बिचार कै ॥

साहिब कह रहे हैं कि ऐसी दृढ़ता से गुरु प्रेम के मार्ग पर चलने वाला, मरने की परवाह न करने वाला कोई शूरमा ही हो सकता है और निश्चय ही उसे साहिब रूपी प्रियतम की प्राप्ति होगी।

धर्मदास पूछते हैं

मृतक भाव प्रभु कहो समुझाई। जाते मन की तपन बुझाई ॥
केहि विधि मिरतक होय सजीवन। कहो विलोय नाथ अमृत धन ॥

धर्मदास जी ने पूछा कि मरने का भाव क्या है, कृपया मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरे मन की जिज्ञासा दूर हो। किस प्रकार यह जीव जीते जी मरकर उस अमृत को पा सकता है!

साहिब कहते हैं

धर्मदास यह कठिन कहानी। गुरु नाम ते कोई बिरले जानी ॥

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अनुरागसागर वाणी

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मृतक होय के खोजहु संता। शब्द बिचार गहैं मग अंता॥
जैसे भुंग कीट के पास। कीटहि गहि सुरु गमि परकासा॥
पंखधात कर महिं तिहि डारे। भुंगी शब्द कीट जो धारे॥
तब लैगो भुंगी निज गेहा। स्वाँस देइ कीन्हे निज देहा॥
भुंगी शब्द कीट जो माना। वरण फेर आपन कर जाना॥
बिरला कीट होय सुखदाई। प्रथम अवाजु गहै चित लाई॥
कोई दूजे कोई तीजे मानै। तनमन रहित शब्द हित मानै॥
भुंगी शब्द कीट ना गहई। तो पुनि कीट असारे रहई॥
धर्मदास यह कीट को भेवा। यहि मति शिष्य गहे गुरुदेवा॥

साहिब कह रहे हैं-हे धर्मदास! यह बड़ी ही कठिन कहानी है, गुरु कृपा से, गुरुप्रेम से किन्हीं विरले जनों ने इस रहस्य को जाना है; बिचारकर उन्होंने शब्द के सहारे भीतरी मार्ग को पकड़ा है और जीते -जी मृतक समान होकर उस सत्य की खोज की है। जैसे भुंगा कीड़े को पकड़कर अपना शब्द सुनाता है और यदि वो कीड़ा उसका शब्द सुन लेता है तो वो भी उसी की तरह हो जाता है, उसमें पंख भी आ जाते हैं। कीड़े में उड़ने की क्षमता नहीं है, पर फिर उसमें बहुत तेज उसी की तरह उड़ने की क्षमता आ जाती है। इस तरह भुंगा उसे अपने समान कर लेता है। जो भी कीड़ा भुंगे के शब्द को मान लेता है, सुन लेता है, वो अपना रंग खोकर उसी के रंग में रंग जाता है, उसी की तरह हो जाता है। वो कोई बिरला ही सुखदायी कीड़ा होता है, जो पहली आवाजु में ही उस शब्द को पकड़ लेता है। कुछ कठोर दूसरी या तीसरी बार में मानते हैं, उसका शब्द सुनते हैं। पर जो कीड़ा उसका शब्द नहीं सुनता, वो वैसे ही रह जाता है, उसके समान नहीं हो पाता। साहिब धर्मदास को समझाते हुए कहते हैं कि ऐसे ही गुरु भी शिष्य को अपना शब्द सुनाकर अपने समान कर लेते हैं, पर शर्त यह है कि शिष्य उनके शब्द में रम जाए।

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साहिब बन्दगी

भूंग मत दूढ़ कै गहे तो, करौ निज सम तोहिं हो ।
दुतिया भाव न चित व्यापे, सो लहै जिव मोहिं हो ॥
गुरु शब्द निश्चय सत्य माने, भूंग गति तब पावई ।
तजि सकल आसा शब्द वासा, कागा हंस कहावई ॥

साहिब कह रहे हैं कि यदि भूंगे वाली बात को विचार कर मेरे शब्द को दूढ़ता से पकड़े रहो तो तुम्हें अपने समान कर दूँ। जो जीव मेरे शब्द के अलावा किसी दूसरे भाव को चित में नहीं लाता, वो मुझे पा जाता है। जब जीव गुरु के शब्द पर विश्वास करके उसे सत्य मानता है, तभी भूंगे वाली बात हो पाती है। जो अन्य सबकी आशा छोड़कर केवल शब्द में रमे रहता है, वो कोवे से हंस हो जाता है।

धर्मन सुन तुम मृतक सुभावा । मृतक होय सतगुरु पद पावा ॥
मृतक छोह निभाव उर धारे । छोह निभावहि जीव उबारे ॥

साहिब कह रहे हैं कि जीवित मृतक समान होने वाला कोई बिरला जीव होता है; वो गुरुपद को प्राप्त करता है। जो हृदय में प्रेम बसाए रखता है और उसे अच्छी तरह निभाता है, वो ही संसार सागर से खुद तरकर दूसरों को भी तारता है।

जस पृथ्वी कै गंजन होई । चित अनुराग गहो गुण सोई ॥
कोई चंदन कोई विष्ठा डारे । कोई कोड़ि कृशी अनुसारै ॥
गुण अवगुण तिन्ह सम कर जाना । महा विरोध अधिक सुख माना ॥

जैसे पृथ्वी की दुर्दशा होती है, उसका तिरस्कार होता है और वो सब कुछ समान भाव से सहती है, ऐसे ही तुम भी सहो। कोई उस पर चन्दन फेंकता है तो कोई विष्ठा और कोई-कोई कौड़ी फेंकता है, पर पृथ्वी तो सबके गुण-अवगुणों को समान भाव से ग्रहण करती है, मान-अपमान को सम-भाव से ग्रहण करती है और किसी का विरोध नहीं करती हुई सुख से रहती है।

अनुरागसागर वाणी

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और मृतक भाव सुनि लेहू । निरखि परखि गुरु मग पग देहू ॥

जैसे उख किसान बनावै । रती रती कै देह कटावै ॥

कोल्हू महँ पुनि आप पिरावे । रस निसरै पुनि ताहि तपावै ॥

निज तन दाहे गुड़ पुनि होई । बहु रि ताव दै खाँड बिलोई ॥

ताहु माहिं ताव पुनि दीन्हा । चीनी तबहि कहावै लीन्हा ॥

चीनी होय बहुरि तन जारा । ताते मिसरी हूँ अनुसारा ॥

मिसरी ते जब कंद कहावा । कहै कबीर सबके मन भावा ॥

याही बिधि ते जो शिष सहई । गुरु कृपा सहजे भव तरई ॥

साहिब कह रहे हैं कि मृतक का और स्वभाव बताता हूँ । जैसे किसान खेत में गन्ना बोता है तो पहले वो गन्ना एक-एक करके काटता है; फिर कोल्हू में पेश जाता है और रस निकाला जाता है; फिर रस को कड़ाही में पकाया जाता है और तब जाकर वो गुड़ बनता है; फिर आँच पर लाल खाँड बनती है और फिर आँच पर जाकर सफेद चीनी बनती है । पुनः उस चीनी से मिसरी तैयार होती है और फिर कुज्जे वाली मिसरी के रूप में तैयार होकर सबके मन को भाती है । ऐसे ही जो शिष्य सब कुछ सहता हुआ गुरु मार्ग में दृढ़ रहता है, वो गुरु-कृपा से सहज ही भवसागर से पार हो जाता है ।

मृतक होय सो साधु, सो सतगुरु को पावई ।

मेटे सकल उपाध, तासु देव आसा करें ॥

सच्चा साधु वही है जो जीवित मृतक हो जाए और वो ही सदगुरु को पा सकता है । उसकी सब चिंता दूर हो जाती है और वो उस चौथे पद मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, जिसकी आशा देवता लोग भी करते हैं ।

साधु मार्ग कठिन धर्मदासा । रहनी रहे सो साधु सुवासा ॥

पाँचों इन्द्री सम करि राखे । नाम अमीरस निशि दिन चाखे ॥

साहिब कह रहे हैं—हे धर्मदास ! साधु मार्ग बड़ा ही कठिन है । जो गुरु आज्ञा में रहे, वो ही पहुँचा हुआ साधु है; जो पाँचों इन्द्रियों को एक

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साहिब बन्दगी

साथ काबू में रखे और प्रतिदिन नाम रूपी अमृत का पान करे, वो साधु है।

प्रथमहिं चक्षु इन्द्री कहँ साधे। गुरु गम पंथ नाम अवराधे ॥

सुंदर रूप चक्षु की पूजा। रूप कुरूप न भावे दूजा ॥

रूप कुरूपहिं सम कर जाने। दरस विदेहि सदा सुख माने ॥

सबसे पहले वो नयन इन्द्री को वश में करे और गुरु-प्रेम के मार्ग पर चलते हुए नाम में लगा रहे। नयन सुन्दर रूप की पूजा करते हैं और कुरूपता को नहीं देखना चाहते, पर साधु को रूप-कुरूप दोनों के प्रति समान भाव रखते हुए आत्मा की ओर देखकर सदा सुख मानना चाहिए।

इन्द्री श्रवण वचन शुभ चाहै। उक्तव वचन सुनत चित दहै ॥

बोल कुबोल दोउ सम लेखे। हृदय शुद्ध गुरुज्ञान विशेषै ॥

कान इन्द्री अच्छे-अच्छे वचन ही सुनना चाहती है, उग्र, बुरे शब्द सुनते ही हृदय जलने लगता है, पर साधु को अच्छे-बुरे वचनों को समान समझना चाहिए।

नासिका इन्द्री सुबास अधीना। यहि सम राखै संत प्रवीना ॥

नासिका इन्द्री अच्छी सुगन्ध के अधीन रहती है, पर चतुर साधु को इस दृष्टि से भी समभाव से रहना चाहिए, उसे सुगन्ध की तरफ आकर्षित नहीं होना चाहिए।

जिभ्या इन्द्री चाहै स्वादू। खट्टा मीठा मधुर स्वादू ॥

सहज भाव में जो कछु आवै। रूखा फीका नहिं बिलगावै ॥

जो कोई पंचामृत ले आवै। ताहि देख नहिं हरष बढ़ावै ॥

तजे न रूखा साग अलूना। अधिक प्रेम सों पावै दूना ॥

जीभ इन्द्री विभिन्न प्रकार के खट्ट-मीठे स्वाद चाहती है, पर साधु को सहज में जैसा भी मिल जाए, चाहे वो रूखा-सूखा ही क्यों न हो, कुछ अन्तर नहीं पड़ना चाहिए यानी उसे जीभ इन्द्री के स्वाद के पीछे नहीं भागना चाहिए। यदि कोई पंचामृत ले आए तो ज्यादा खुश नहीं

अनुरागसागर वाणी

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होना चाहिए और यदि नमक रहित रूखा साग भी मिल जाए तो उसे त्यागना नहीं चाहिए बल्कि ज्यादा खुशी के साथ खाना चाहिए।

इन्द्री दुष्ट महा अपराधी। कुटिल काम कोई विरले साधी।।

कामिनि रूप काल की खानी। तजहु तासु संग हो गुरुज्ञानी।।

काम इन्द्री तो बड़ी ही दुष्ट और अपराधी है, जिसे कोई बिरला ही साध सका है, इसलिए जो स्त्री के सुंदर रूप को काल की खानि समझ उसका संग त्याग दे, वो ज्ञानी है, वो साधु है।

जबहि काम उमंग तन आवै। ताहि समय जो आप जुगावे।।

शब्द विदेह सुरत लै राखे। गहि मन मौन नाम रस चाखे।।

जब हिय तत्त्व में जाय समाई। तबही काम रहै मुरझाई।।

साधु का परिचय देते हुए साहिब कह रहे हैं कि उसे चाहिए, जब काम वेग के साथ शरीर में आए तो युक्तिपूर्वक अपने को बचाकर रखे, उसे रोके रखे। ऐसे में सार शब्द में अपनी सुरति लगाए रखे, मौन रहते हुए मन को पकड़े रहे और नाम रूपी रस का पान करता रहे क्योंकि जब सुरति नाम में जाकर समा जाती है, तब काम उदास होकर शांत हो जाता है।

काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो।

सुर नर मुनि यक्ष गन्धर्व किन्नर, सबहिं कीन्ह बेहाल हो।।

सबहि लूटे बिरले छूटे, ज्ञान गुरु जिन्ह दूढ़ गहे।

गुरु ज्ञान दीप समीप सतगुरु, भक्ति मार्ग तिन्ह लहे।।

साहिब कह रहे हैं कि यह काम बड़ा ही प्रबल है, यही काल रूप है, जिसने देवता, मनुष्य, मुनि, यक्ष, किन्नर (नपुंसक) सबको बेहाल किया हुआ है। काम ने सबको लूट लिया है। इससे कोई बिरला ही छूट सकता है, जो गुरु के ज्ञान को दूढ़ता से पकड़े रहे, हर समय चेतन रहे। जहाँ गुरु-ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश है, वहीं सदगुरु का वास है। ऐसा जीव ही भक्ति मार्ग को पा सकता है, उस पर चल सकता है।