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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

राम नाम का रहस्य

राम नाम का रहस्य

साहिब कहते हैं

ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादी । सब मिलि कीन्ह शून्य समाधी ॥
कवन नाम सुमिरो करतारा । कवन नाम ध्यान अनुसार ॥
सबहिं शून्य महँ ध्यान लगाये । स्वाति नेह सीप ज्यों लाये ॥
तबहिं निरंजन जतन बिचारा । शून्य गुफा ते शब्द उचारा ॥
ररां सु शब्द उठा बहु बारा । मा अक्षर माया संचारा ॥
दोउ अक्षर कहँ सम कै राखा । राम नाम सबहिन अभिलाखा ॥
रामनाम लै जगहि दृढ़ायो । काल फन्द कोइ चीन्ह न पायो ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सनकादि ने मिलकर विचार किया कि परमात्मा का कौन सा नाम जपें, किस नाम से उसका ध्यान करें। तब सबने मिलकर शून्य में समाधि लगायी। ऐसे में निरंजन ने शून्य गुफा से ररां शब्द उच्चार और माया ने मा शब्द उच्चार। दोनों को मिलाया गया और राम नाम को चुना गया। सभी राम नाम का जाप करने लगे, पर काल के फंदे को कोई समझ नहीं पाया।

इस तरह राम शब्द में निरंजन और माया दोनों आ गये। इसलिए सत्य नाम इससे परे है।

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सतयुग के हंस

सत्ययुग के हंस

धर्मदास सुन सत्ययुग भाऊ। जिन जीव को नाम सुनाऊ॥
नृप धोंधल पहुँ हम चलि गयऊ। सत्य शब्द सो ताहि सुनयऊ॥
तिन शब्द हमारो सत्य माना। दीन्ह तिनको मैं पान परमाना॥

साहिब ने कहा—हे धर्मदास! अब जिन जीवों को मैंने शब्द सुनाया, उनका नाम बताता हूँ। सबसे पहले राजा धोंधल को मैंने अपने सत्य शब्द का भेद सुनाया तो उसने सत्य करके माना और उसे मैंने नाम(शब्द) दिया।

धोंधल शब्द चिताय, तब आयउ मथुरा नगर।
खेमसरी आयो धाय, नारि वृद्ध गोवालि सों॥

साहिब कहते हैं कि धोंधल राजा को शब्द से चिताकर फिर मथुरा नगर में आया, वहाँ वृद्ध ग्वालिन खेमसरी रहती थी। मुझे देख वो दौड़कर मेरे पास आ गयी।

कहे खेमसरी पुरुष पुराना। कहँवा ते तुम कीन्ह पयाना॥
तासों कहे उ शब्द उपदेसा। पुरुष भाव अरु यम को भेसा॥

खेमसरी ने कहा कि तुम कहाँ से आए हो? तुम परम पुरुष और काल की बातें कर रहे हो।

पै धोखा इक ताहि रहाई। देखे लोक तब मन पतियाई॥
राखेउ देह हंस लै धावा। पल इक माहिँ लोक पहुँचावा॥
लोक दिखाय हंस लै आयो। देह पाय खेमसरी पछतायो॥
हे साहिब लै चलु वहि देश। यहाँ बहुत है काल कलेशा॥

खेमसरी कुछ संशय में थी तो साहिब ने उसे अमर लोक ले जाकर उसका धोखा मिटा दिया, उसे विश्वास हो गया। जब वापिस आए तो वो पछताने लगी, कहने लगी कि वहीं ले चलो, यहाँ बहुत कष्ट हैं।

तासों कहँ सुनो यह बानी। जो मैं कहूँ लेहु सो मानी॥

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अनुरागसागर वाणी

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जबलौं ठीका पूर न आई। तब लग रहो नाम लौं लाईं ॥
तुम तो देखा लोक हमारा। जीवन को उपदेसहु सारा ॥
एकहु जीव शरणागत लावे। सो जीव सत्पुरुष को भावे ॥
जैसे गऊ बाघ मुख जायी। सो कपिलहि कोउ आय छुड़ायी ॥
ता नर को सब सुयश बखाने। गऊ छुड़ाय बाघ ते आने ॥
एक जीव को भक्ति दृढ़ावे। सो कोटिक गऊ पुण्य सो पावे ॥

साहिब ने कहा कि जब तक जीवन की अवधि पूरी नहीं हो जाती, नाम में लौ लगाए रखो। तुमने तो हमारा लोक देख लिया, अब दूसरों को समझाकर इस सत्य भक्ति में लगाओ, जो एक भी जीव को शरणागत लाता है, वो परम पुरुष को बड़ा अच्छा लगता है। जैसे भोली-भाली गाउँ शेर के मुख में जाती है, पर जो गाय को शेर से छुड़ा लाता है, सब उसकी प्रशंसा करते हैं कि गाय को शेर से छुड़ा लाया। ऐसे ही जो एक जीव को भी काल पुरुष की भक्ति से छुड़ाकर सत्य भक्ति में लगा देता है, वो करोड़ों गाय को बचाने का फल पाता है।

खेमसरी परै चरण पर आयी। हे साहिब मोहि लेहु बचायी ॥
मो पर दाय करहु प्रकाशा। अब नहिं परौं काल की फाँसा ॥

खेमसरी चरणों पर गिर पड़ी, कहा-हे साहिब! मुझे काल से बचा लो।

सुन खेमसरी यह यम को देश। बिना नाम नहिं मिटै अदेशा ॥

पुरुष नाम बीरा जो पावे। फिरके भवसागर नहिं आवे ॥

साहिब ने खेमसरी से कहा कि यह काल का देश है; बिना नाम के संशय नहीं मिटने वाला; जो परम पुरुष का गुप्त नाम पा जाता है, वो फिर भवसागर में नहीं आता।

कह खेमसरी परवाना दीजे। यम सों छोरि आपन करि लीजे ॥

और जीव हमरे गृह आही। नाम पान प्रभु दीजै ताही ॥

खेमसरी ने कहा कि अब नाम रूपी परवाना देकर यम से छुड़ा लो, अपना बना लो, और भी जो जीव मेरे घर में हैं, उन्हें भी नाम दो। तब साहिब उसके घर गये और सबको नाम दिया, आरती करने की विधि भी समझायी। सत्ययुग में साहिब ने चार हंसों को अमर लोक पहुँचाया।

त्रेतायुग में साहिब का आगमन

त्रेतायुग में साहिब का आगमन

सतयुग गयो त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव समुझावा ॥
जब आयेउ जीवन उपदेशा । धर्मराय हित भयेउ अँदेशा ॥
इन भवसागर मोर उजारा । जिव लै जाहि पुरुष दरबारा ॥
परबस होय मौन सो गहिया । सोच विचार मनहिं मन रहिया ॥

सतयुग बीतने पर त्रेतायुग में साहिब मुनींद्र जी के नाम से भवसागर में विख्यात हुए, जब जीवों को उपदेश देने लगे तो निरंजन को संदेह हुआ कि यह मेरी दुनिया उजाड़ देंगे, हंसों को परम पुरुष के पास ले जायेंगे।

त्रेतायुग जबही पगु धारा । मृत्यु लोक कीन्हों पैसारा ॥
जीव अनेकन पूछा जाई । यम से को तुहि लेहि छुड़ाई ॥
कहें भरम वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥
कोई विष्णु महेश की आस लगावें । कोई चण्डी देवी कहैं गावें ॥
जो ग्रासे जिव सेवैं ताही । अनचीन्है यम मुख में जाहीं ॥

जैसे ही त्रेतायुग आया तो साहिब पुनः मृत्यु लोक आए, आकर बहुतों से पूछा कि तुम्हें काल से कौन बचायेगा! तब कोई कहता कि विष्णु जी हमें काल से छुड़ायेंगे, कोई कहता कि शिवजी छुड़ायेंगे, कोई कहता कि चण्डी देवी जी छुड़ायेंगी। भ्रमवश जीव उसी की भक्ति कर रहे थे, जो भक्षण करने वाला था और बिना सत्य की पहचान किये सब काल के मुख में जा रहे थे।

चहुँ दिशि फिरि आयेउँ गढ़ लंका । भाट विचित्र मिल्यो निःसंका ॥
तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥
सुना विचित्र तबहि भ्रम भागा । अति अधीन है चरणन लागा ॥
कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजे काजू ॥

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अनुरागसागर वाणी

113

कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥
तृण तोर बीरा तिहि दीन्हा । ताकैं गृह में काहु न चीन्हा ॥
सुमिरन ध्यान ताहि सो भाखा । पुरुष डोर गाय नहिं राखा ॥

साहिब चारों दिशाओं में फिरकर लंका में आए तो विचित्र नाम का
भाट मिला, उसने साहिब की बात को समझा और अधीन होकर चरणों
पर गिर पड़ा, कहा कि मेरे जीव का आज कल्याण करो। तब साहिब ने
उसे नाम दिया और खेमसरी की भाँति आरती करना बताया, ध्यान
सुमिरन करना बताया।

तब विचित्र की स्त्री रानी मंदोदरी के पास गयी और कहा कि कोई
साधु आया है, बहुत सुंदर है, श्वेत वस्त्र धारण किए हैं। ऐसा साधु कभी
नहीं देखा। तब मंदोदरी आयी और देखकर चकित हुई, विनती की—
कहे मँदोदरी शुभ दिन मोरा । विनती करों दोई कर जोरा ॥
ऐसा तपसी कबहुँ न देखा । श्वेत अंग सब श्वेतहि भेखा ॥
हे समरथ मोहिं करहु सनाथा । भव बूढ़त गहि राखो हाथा ॥

तब मंदोदरी ने विनती की, कहा कि ऐसा तपस्वी तो कभी नहीं
देखा। वो प्रभावित हुई, कहा कि मुझे सनाथ करो, भवसागर में डुबने से
बचा लो।

सुनहु वधू प्रिय रावण केरी । नाम प्रताप कटे यम बेरी ॥
ज्ञान दृष्टि सो परखहु आई । खरा खोट तोहि देउँ चिन्हाई ॥
पुरुष अमान अंजर मनि सारा । सो तो तीन लोक ते न्यारा ॥
तेहि साहिब कहँ सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥

साहिब ने मंदोदरी से कहा कि नाम की ताकत से ही यम का बंधन
कट सकता है। ज्ञान दृष्टि से परखो, तुम्हें अच्छे बुरे की पहचान बताता
हूँ, जो सत्य पुरुष है, वो तीन लोक से न्यारा है, जो उस साहिब का
सुमिरन करता है, उसका आवागमन मिट जाता है।

सुनतहि शब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो शब्द शुचि मन अनुरागा ॥

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साहिब बन्दगी

हे साहिब मोहि लीजे शरणा। मेटहु मोर जन्म अरु मरणा॥
दीन्हों ताहि पान परवाना। पुरुष डोर सौँप्यो सहिदाना॥

मंदोदरी ने जब साहिब के शब्द सुने तो उसका भ्रम दूर हो गया, उसका हृदय स्वच्छ हो गया और प्रेम उमड़ आया, उसने कहा—हे साहिब! मुझे अपनी शरण में लेकर जन्म मरण से दूर कर दो। तब साहिब ने उसे नाम दिया।

तब मैं रावण पहुँ चलि आओ। द्वारपाल सों वचन सुनायो॥
तोसों एक बात समुझाई। राजा कहँ तुम आव लिवाई॥

साहिब तब रावण के महल में पहुँचे और द्वारपाल से कहा कि रावण को संदेश दो कि कोई साधु आया है, आकर उसे महल में ले आओ।

द्वारपाल ने कहा

द्वारपाल तब विनती लाई। महा प्रचण्ड है रावण राई॥
महागर्व अरु क्रोध अपारा। कहों जाय मोहि पल में मारा॥

द्वारपाल ने कहा कि रावण बड़ा प्रचण्ड है, शक्तिशाली है, उसमें बड़ा क्रोध और अभिमान भी है, यदि उससे ऐसी बात कहूँगा तो मुझे वहीं मार देगा।

साहिब ने कहा

मानहु वचन जाव यहि बारा। रोम बंक नहिं होय तुम्हारा॥
सत्य वचन तुम हमरा मानो। रावण जाय तुरत तुम आनो॥

साहिब ने कहा कि तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं होगा, मेरा वचन सत्य मानो और तुरंत रावण को यह संदेश देकर आओ।

ततक्षण गा प्रतिहार जनायी। द्वै कर जोरे ठाढ रहाई॥
सिद्ध एक तो हम पहुँ आई। तेकह राजहि लाव बुलाई॥

तभी द्वारपाल अन्दर गया और दोनों हाथ जोड़ रावण से कहा कि एक सिद्ध आया है, कहता है कि राजा रावण को बुलाओ।

अनुरागसागर वाणी

115

सुन नृप क्रोध कीन्ह तेहि बारा । मैं मति हीन आहि प्रतिहारा ॥
यहि मति ज्ञान हरोँ किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दौरा ॥
दर्श मोर शिवसुत नहिं पावत । मैं कह भिक्षुक कहा बुलावत ॥

रावण ने क्रोधित हो कहा—हे द्वारपाल ! तेरी बुद्धि का किसने हरण कर लिया, जो तू मुझे बुलाने आया है, मेरा दर्शन शिवजी के पुत्र भी नहीं पा सकते, फिर तू मुझे कहने आया है कि भिक्षु बुला रहा है ।

रावण चला शस्त्र लै हाथा । तुरत जाय तिहि काटों माथा ॥
मारों ताहि सीस खसि परयी । देखों भुक्षुक मोर का करयी ॥
जहँ मुनीन्द्र तहँ रावण राई । सत्तर बार अस्त्र कर लाई ॥
लीन्ह मुनीन्द्र तृण कर ओटा । अति बल रावण मारै चोटा ॥

रावण ने क्रोध में आकर हाथ में तलवार ली, सोचा, अभी उसका शीश काट देता हूँ, देखता हूँ कि वो मेरा क्या करता है । रावण ने आकर 70 बार तलवार चलायी, पर साहिब एक तिनके पर उसका वार रोक देते थे । रावण ने बड़े बल का प्रयोग किया, पर कुछ न बना ।

तृण ओट यहि कारणे है , गर्व धारी राय हो ॥

तेही कारणे यह युक्ति कीन्ही, लाज रावण आय हो ॥

साहिब ने तिनके का सहारा इसलिए लिया, क्योंकि रावण बड़ा घमण्डी था, उसे शर्म आ सके , उसका घमण्ड चूर हो सके ।

रावण को अमान करि, तब अवध नगरहि आय ।

दशा संत की जान के , मधुकर पकरै पाय ॥

रावण का घमण्ड तोड़ फिर साहिब अवध में आए, वहाँ मधुकर ब्राह्मण मिला, वो साहिब के चरण पकड़ उन के अधीन हुआ ।

देख्यो ताहि बहु त लवलीना । तासों कह्यो ज्ञान को चीन्हा ॥

पुरुष संदेश कहेउ तिहिं पास । सुनत बचन जिय भयउ हुलासा ॥

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साहिब बन्दगी

साहिब ने उसका प्रेम देखा ते उसे परम पुरुष का ज्ञान दिया, जिसे सुन वो बहुत प्रसन्न हुआ।

अंबु मिलत अंकर सुख माना । तैसहिं मधुकर सब्दहिं जाना ॥
पुरुष भाव सुन तेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥

जैसे जल मिलने से अंकुर फूटकर मानो अपनी खुशी प्रकट कर देते हैं, ऐसे ही मधुकर साहिब के शब्द सुन प्रसन्न हो गया और कहने लगा कि मुझे वो लोक दिखाओ

राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोक लैं तिहिं पहुँचाये ॥
सोभा लोक देख हरषाना । तब मधुकर को मन पतियाना ॥

तब साहिब उसकी आत्मा को शरीर से निकाल अमर लोक गये। अमर लोक की सोभा को देख वो बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे विश्वास हो गया।

इसके अतिरिक्त शृंगी ऋषि, वशिष्ठ मुनि, आदि सहित सात जीवों को साहिब ने त्रेता में तारा।

मधुकर जेते जीव, लोकहिं कीन्ह पयान ॥
तातैं नाम मुनीन्द्र कहि, जीव सत्त दान ॥

द्वापार में आए साहिब

द्वापर में आए साहिब

द्वापर युग प्रवेश भा जबही । पुरुष अवाज् कीन्ह पुनि तबही ॥
ज्ञानी बेगि जाहु संसारा । यम सों जीवन करहु उबारा ॥
काल देत जीव कहँ त्रासा । काटो जाय तिनहिं को फाँसा ॥

द्वापर में पुनः परम पुरुष ने साहिब को बुलाकर कहा कि संसार में जाओ और काल से जीवों को छुड़ाओ, वो जीवों को कष्ट दे रहा है ।

तब हम कहा पुरुष सों बानी । आज्ञा करहु शब्द परवानी ॥
कालहिं मेटि जीव लै आवो । बार-2 का जगहिं सिधावो ॥

साहिब ने तब परम पुरुष से कहा कि काल को मार सब जीवों को ले आता हूँ, बार-2 क्या भवसागर में जाना ।

कहा पुरुष सुनो हो ज्ञानी । शब्द चिताय जीव मुक्तानी ॥
जो अब कालहिं मेटो जाई । हो तबहिं मम वचन नसाई ॥
सहज भाई जग प्रगटहु जाई । जब लग जीव काल बस भाई ॥
हमसों तुमसों अन्तर नाही । जिमि तरंग जलमाहिं समाहीं ॥
हम है तुमहि जो दुइकर जाना । ता घट जम सब करिहैं थाना ॥
जाहु बेगि तुम वा संसारा । जीवन खेइ उतारहु पारा ॥

परम पुरुष ने साहिब से कहा कि यदि अब काल को मिटाया तो मेरा शब्द कट जायेगा, इसलिए जब तक जीव काल के फंदे में हैं, तुम सहज

भाव से संसार में प्रगट होकर उन्हें चिताते रहो, मुझमें और तुममें कोई भेद नहीं है, जो मुझमें और तुममें कोई अन्तर मानेगा, उसके अन्दर काल निवास करेगा। अच्छा, अब जल्दी से संसार में जाओ और जीवों की जीवन रूपी नैया खेवकर उन्हें पार लगाओ ।

चले तब हम माथ नवायी । पुरुष आज्ञा जग माहिं सिधायी ॥
करुणामय तब नाम धराया । द्वापर युग जब महि में आया ॥

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साहिब बन्दगी

साहिब पुनः परम पुरुष की आज्ञा से उन्हें माथ नवाकर चले। जब धरती पर द्वारप युग आया, तब उनका नाम करुणामय हुआ।

गढ़ गिरनार तबहि चलि आये। चन्द्रविजय नृप तहाँ रहाये ॥
ताको नारि रहै सयानी। पूजै साधु महातम जानी ॥
तिन सुधि जब हमरी पाई। वृष ली अपनी दीन्ह पठाई ॥
आई चेरी विनती कीन्ह। तुब दर्शन रानी चित्त दीन्ह ॥

साहिब द्वारप में गिरनार में आए, वहाँ के राजा चन्द्रविजय की रानी साधु महात्माओं की महत्ता जानती थी। जब उसे साहिब के आने का पता चला तो अपनी दासी को साहिब को लाने भेजा। दासी ने आकर साहिब से रानी का सँदेश कहा कि रानी आपके दर्शन करना चाहती हैं।

तब ज्ञानी कहि वचन सुनावै। राज रावघर हम नहिं जावै ॥

राज काज है मान बड़ाई। हम साधू नृप गृह नहिं जाई ॥

साहिब ने उससे कहा कि हम राजा लोगों के घर नहीं जाते, उन्हें बड़ा अभिमान रहता है।

चलि वृषली रानी पहँ आयी। द्वै कर जोर विनय सुनायी ॥

साधुन आवे मोर बुलाई। राज राव घर हम नहिं जाई ॥

सुन इन्द्रमती उठि चलि आऊँ। कीन्ह दण्डवत टेके पाऊँ ॥

दासी ने रानी के पास जाकर साहिब का सँदेश दिया। यह सुन रानी इन्द्रमती खुद आई और दण्डवत करके चरण स्पर्श किये।

इन्द्रमती ने कहा

हे साहिब मोपर करू दया। मोरे गृह अब धारिये पाया ॥

रानी ने कहा कि मेरे घर में चरण रखें।

साहिब कहते हैं

प्रीति देख हम भवन सिधारै। राजा घर तबहीं पग धारे।

कहे रानी चलु मंदिर मोरे। भयो सुखी दर्शन लिये तोरे ॥

अनुरागसागर वाणी

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प्रीति देखि तेहि भवन सिधाये । दीन्ह सिंहासन चरण खटाये ॥
दीन्ह सिंहासन चरण पखारी । चरण पर छालन अंगोछा धारी ॥
चरण धोय पुनि राखे सिरानी । पट पद पोंछ जन्म शुभ जानी ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि रानी की प्रीत देख मैं उसके घर गया। रानी ने मुझे बैठने के लिए सिंहासन दिया, मेरे चरण धोये और अपने जन्म को सफल माना।

रानी ने कहा

पुनि प्रसाद को आज्ञा माँगी। हे प्रभु मोकहँ करहु सुभागी ॥
जूठन परै मोर गृह माहीं। सीत प्रसाद लै हमहूँ खाहीं ॥

फिर रानी ने साहिब से शीत प्रसाद की माँग की।

साहिब ने कहा

सुन रानी मोहि क्षुधा ना होई। पंच तत्व पावे जेहि सोई ॥
अमृत नाम अहार है मोरा। सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥
देह हमारि तत्व गुण न्यारी। तत्व प्रकृति तिहिँ काल रचिवारी ॥
असी पंच किहु काल समीरा। पंच तत्व की देह खमीरा ॥
तामह आदि पवन इक आही। जीव सोहँ ग बीलियो ताही ॥
यह जिव अहै पुरुष को अंशा। रोकसि काल ताहि दे संशा ॥
नाना फंद रचि जीव गरासै। देइ लोभ तब जीवहि फाँसै ॥
जिव तारन हम यहि जग आये। देइ लोभ तब जीवहि फाँसै ॥
धर्मराय अस बाजी कीन्हा। धोक अनेक जीव कहँ दीन्हा ॥
नीर पवन कृत्रिम किहु काला। विनशि जाय बहु करै बिहाला ॥
तन हमार यहि साज ते न्यारा। मम तन नहिँ सिरज्यो करतारा ॥
शब्द अमान देह है मोरा। परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥

साहिब ने रानी से कहा कि मुझे भूख नहीं लगती है, क्योंकि मेरी देही पंच तत्व की नहीं है; मैं तो अमृत का आहार ही करता हूँ। कहा कि

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साहिब बन्दगी

जीव परम पुरुष के अंश हैं, जिन्हें काल पुरुष ने अपने भ्रम जाल में फँसाकर रोके रखा है। मैं जीवों को काल के फँदे से छुड़ाने आया हूँ। जो जीव मुझे पहचान कर मेरी शरण में आ जाते हैं, उन्हें मैं इस संसार से मुक्त करके ले जाता हूँ। काल ने जीवों को धोखे में रखा हुआ है। पवन, पानी आदि नाशवान तत्वों से देही का निर्माण किया है, पर मेरी देही इन चीजों से न्यारी है; मेरी शब्द की देही है। यह मैंने संक्षेप में थोड़ा बताया है, अब तुम इसे परख लो।

इन्द्रमती ने पूछा

हे प्रभु अस अचरज मोहि होई। अस सुभाव दूजा नहीं कोई॥
कौन आहु कहँवाते आये। तन अर्चित प्रभु कहँवा पाये॥
कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा। यह सब वरण कहो मोहि भेवा॥
हम का जानहिं भेद तुम्हारा। ताते पूछों यह व्यवहारा॥

रानी ने कहा कि मुझे एक अचरज हो रहा है कि ऐसी देही तो और किसी की नहीं सुनी, इसलिए कृपा करके मुझे बताओ कि आप कहाँ से आए हैं, यह देही आपने कहाँ से पाई है, आपका नाम क्या है! यह सब मुझे बताओ। मैं आपका भेद नहीं जानती हूँ, इसलिए यह सब पूछ रही हूँ।

इन्द्रमती कथा सुन सुहावन। तोहि समझाय कहों गुण पावन॥
देश हमार न्यार तिहुँ पुर ते। अहि पुर नर पुर अरु सुर पुर ते।
तहाँ नहीं यम केर प्रवेशा। आदि पुरुष को जहवाँ देशा॥
सत्य लोक की ऐसी बाता। कोटि शशि इक रोम लजाता॥
ऐसी पुरुष कांति उजियारा। हँसन शोभा कहों बिचारा॥
एक हँस जस षोडश भाना। अग्र वासना हँस अघाना॥
कहा कहों कछु कहत न आवे। धन्य भाग जे हँस सिधावे॥
ताहि देश ते हम चलि आये। करुणामय निज नाम धराये॥

अनुरागसागर वाणी

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सतयुग सत् सुकृत त्रेता मुनीन्द्र । द्वापर करुणामय नाम धराये ॥
युगन युगन हम यहाँ चले आये । जो चीन्हा तहाँ लोक पठाये ॥

साहिब ने कहा कि मेरा देश तीन लोक से परे है, वहाँ यम प्रवेश नहीं कर सकता, वहाँ आदि पुरुष का निवास है। सत्य लोक की बात ऐसी है कि करोड़ों सूर्य चन्द्र उस परम पुरुष के मात्र एक रोम से लजा जाएँ और आत्मा का प्रकाश 16 सूर्यों का है। क्या कहूँ, वहाँ की बात कुछ कही नहीं जा सकती है; जो वहाँ पहुँचता है, उसका बड़ा भाग्य है। उसी देश से मैं आया हूँ और यहाँ आकर करुणामय नाम धराया है। वास्तव में मैं हर युग में आता हूँ; सतयुग में सतसुकृत, त्रेता में मुनीन्द्र और द्वापर में करुणामय नाम से मैं यहाँ आया हूँ और जिसने मेरी बात को समझा, विश्वास किया, उसे मैंने वहाँ पहुँचाया है।

इन्द्रमती ने कहा

जोरि पाणि बोली बिलखायी । हे प्रभु यम ते लेहु छुड़ाई ॥
राज पाट सब तुम पर वारों । धन सम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु शरण मुहिं दीनदयाला । बंदिछोर मुहिं करहु निहाला ॥

रानी ने साहिब से कहा—हे प्रभु! यम से छुड़ा लो। कहा कि यह राज पाट सब मैं तुम पर वार देती हूँ, यह धन—धौलत यह त्याग देती हूँ, मुझे अपनी शरण में लेकर काल के जाल से मुक्त कर दो।

साहिब ने कहा

इन्द्रमती सुन वचन हमारा । छोरों निश्चय बंदि तुम्हारा ॥
चीन्हउ मोहि परतीत दूढ़ाना । अब देहुँ तोहि नाम परवाना ॥
करहु आरती लेवहु परवाना । भागे यम तब दूर पयाना ॥
चीन्हों मोहि करो परवाती । लेहु पान चलुभौ जल जीती ॥
आनहु जो कछु आरति साजा । राजपाट कर मोहि ना काजा ॥
धनसंपति कछु मोहि ना भावा । जीव चितावन यहि जग आवा ॥
धन सम्पति तुम यहँवा लायी । करहु संत सम्मान बनायी ॥

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साहिब बन्दगी

सकल जीव हैं साहिब केरा । मोह विविश जिव परे अंधेरा ॥
सब घट पुरुष अंश कियो वासा । कहीं प्रगट कहिं गुप्त निवासा ॥

साहिब ने रानी से कहा कि अब मैं तुम्हें काल से ज़रूर छुड़ाऊँगा, तुम्हें नाम दूँगा। इसलिए अब आरति का सामान लाकर आरति करो, जिससे यम दूर भाग जाए। मुझे राज पाट, धन धौलत से कुछ नहीं लेना। सब जीव साहिब के हैं और मोह वश इस संसार में पड़े हुए हैं, मैं उन्हें लेने आया हूँ।

इन्द्रमती ने कहा

इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुण बानी ॥
मोहि अधम को तुम सुख दीन्हा । तुव प्रसाद आगम गम चीन्हा ॥
हे प्रभु चीन्ह तोहि अब पाहू । निश्चय सत्य पुरुष तुम आहू ॥
सत्य पुरुष जिन लोक सँवारा । करेहु कृपा सो मोहि उदारा ॥
आपन हृदय अस हम जाना । तुमते अधिक और नहिं आना ॥
अब भाषहु प्रभु आरति भाऊ । जो चाहिय सो मोहि बताऊ ॥

रानी ने कहा कि अब मुझे विश्वास हो गया है कि आप परम-पुरुष ही हैं। इसलिए अब मेरे लिए आपसे बड़ा और कोई नहीं है। कृपा करके अब मुझे बताएँ कि आरति के लिए क्या-क्या चाहिए।

साहिब ने कहा

हे धर्मन सो ताहि सुनावा । जस खेमसरी सो भाषेठ भावा ॥
चौका कर लेवहु परवाना । पाछे कहीं अपन सहिदाना ॥
आनेउ सकल साज तब रानी । चौका बैठि शब्द ध्वनि ठानी ॥
आरति कर दीन्हा परवाना । पुरुष ध्यान सुमिरण सहिदाना ॥
उठि रानी तव माथ नवायी । ले आज्ञा परवाना पायी ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि जैसे मैंने खेमसरी को आरती बतायी थी, वैसे ही रानी को भी बतायी। रानी सब सामान लेकर आयी और आरती करके नाम लिया।

अनुरागसागर वाणी

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पुनि रानी राजहि समुझावा। हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा।।
गहो शरण जो कारज चाहो। इतना वचन मोर निरवाहो।।

रानी ने फिर राजा को भी समझाया कि साहिब की शरण में आ जाओ, कल्याण हो जायेगा।

राजा ने कहा

तुम रानी अरधंगी सोई। हम तुम भक्त होय नहिं दोई।।
तोरि भक्ति कर देखो भाऊ। किहि विधि मोहि लेहु मुक्ताऊ।।
देखो तोरि भक्ति परतापा। पहुँचो लोक मिटे संतापा।।

राजा ने रानी से कहा कि तुम मेरी अंधांगिनी हो, तुम्हारी भक्ति के प्रताप से मेरा भी कल्याण हो जायेगा।

साहिब ने रानी से कहा

रानी बहुरि मोहि पहँ आई। हम तिहि काल चरित्र लखाई।।
सुन रानी इक वचन हमारा। कालहु कला करे छल धारा।।
तो कह शिष्य कीन हम जानी। डसे काल तच्छक है आनी।।
अब हम तोकहँ मंत्र लखाओं। काल गरल सब दूर भगाओं।।
दीन्हो शब्द विरहु ली ताही। काल गरल जेहि व्यापे नाहीं।।
पुनि यम दूसर छल तोहि ठानी। सो चरित्र मैं कहों बखानी।।
छल कर यम आये तुम पासा। सो तुहि भेद कहों परगासा।।
हँ स वर्ण वह रूप बनायी। हम सम ज्ञान तोहि समझायी।।
तुम सन कहे चीन्ह मुहिं रानी। मरदन काल नाम ममज्ञानी।।
यहि विधि काल ठगे तोहि आयी। काल रेख सब देउँ बतायी।।
मस्तक छोट काल कर जानू। चक्षु गुंजन को रंग बखानू।।
काल लक्षण मैं तोहि बतायी। और अंग सब सेत रहायी।।

रानी पुनः साहिब के पास आयी। तब साहिब ने उसे काल चरित्र समझाया, कहा-तुमने मेरा नाम ले लिया है, यह जान काल तुम्हें सौंप

124

साहिब बन्दगी

का रूप धारण कर डसेगा, इसलिए मेरा मंत्र याद रखो, काल का जहर नहीं चढ़ेगा। दूसरी बार पुनः काल हंस रूप बनाकर तुम्हें ठगने आयेगा, इसलिए मैं तुम्हें काल का रूप समझा देता हूँ, ताकि तुम उसे पहचान सको। उसका छोटा माथा होगा, काली आखें होंगी, बाकी अंग सफेद होंगे।

रानी चरण गहे तब धायी। हे प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥

यह तो देस काल कर थानी। हे प्रभु लै चल देस अमानी ॥

रानी ने कहा कि यह तो काल का देश है, मुझे अपने लोक ले चलो।

तब रानी सों कहेउ बुझाई। बचन हमार सुनो चित लाई ॥

जब लंगि ठे का पूरे आई। तब लग रहो नाम लौ लाई ॥

साहिब ने कहा कि आयु से पहले नहीं ले जाऊँगा तुम्हारा जीव, इसलिए जब तक आयु है, तब तक नाम में लौ लगाए रखो, जब पूरी होगी तो ले जाऊँगा।

गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ।

रोक रहो तुम ढाल, काल खडग व्यापे नहीं ॥

साहिब ने कहा कि काल हाथी की तरह है, पर परम पुरुष की नाम सिंह की तरह है, उसकी ढाल होगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा।

इतना कह हम गुप्त छिपाया। तक्षक रूप काल हो आया ॥

जबहीं रात बीती आधी। रानी उठ चली सेवा साथी ॥

सेज आय रानी पौढायी। डसेउ व्याल मस्तक मँह जायी ॥

साहिब रानी को समझाकर गुप्त हो गये और इतने में काल साँप का रूप धारण कर आया। जब आधी रात बीत गयी तो रानी सेवा भक्ति करके अपने विस्तर पर आयी। तब काल ने उसे मस्तक में डस लिया।

इन्द्रमती ने कहा

इन्द्रमती अस वचन सुनायी। तक्षक डसेउ मोहि कहँ आयी ॥

सुन राजा व्याकुल है धावा। गुणी गारुडी वेगि बुलावा ॥

अनुरागसागर वाणी

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राय कहे मम प्राण पियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥
तक्षक गरल दूर हो आयी । देहु परगना तोहि दिवायी ॥

इन्द्रमती ने राजा को पुकारा कि मुझे साँप ने डस लिया है । यह सुनकर राजा व्याकुल होकर दौड़ा हुआ आया और अच्छे वैद्य को बुलवाया । राजा ने कहा कि तुम मेरे प्राणों से भी प्यारी हो, तुम्हें नहीं जाने दूँगा, देखो, अभी सारा ज़हर दूर हो जायेगा ।

इन्द्रमती ने कहा

मंत्र मोहि लखाय सतगुरु, गरल मोहि न लागई ॥
होत सूर्य प्रकाश जेहि क्षण, अंध अघोर नशावई ॥

रानी ने कहा कि मुझे सदगुरु ने मंत्र दिया है, इसलिए मुझे ज़हर नहीं लगेगा । यह कह रानी साहिब के नाम का सुमिरन करती रही और कुछ ही देर में उठ बैठी ।

विष्णु जी ने दूत को भेजा

कहे विष्णु सुनहो यमदूत । सतहि अंग करो तुम पूता ॥
छल करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥

विष्णु जी ने यमदूत को कहा कि तुम श्वेत अंग धारण कर रानी को छल कपट से ले आओ और हमारा बचन मानो ।

दूत रानी के पास आया

कीन्हों दूत सेत सब अंगा । चलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥
रानी सो अस वचन प्रकाशा । तुम कस रानी भई उदासा ॥
जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीक्षा मंत्र तोहि हम दीन्हा ॥
ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदो काल करौँ पिसमानी ॥
तक्षक काल होय तोहि खायी । तब हम राख लीन्ह तोहि आयी ॥
छोड़हु पलँग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बड़ाई ॥
अब हम लैन तोहि कहँ आवा । प्रभु के दर्शन तोहि करावा ॥

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साहिब बन्दगी

यमदूत श्वेत अंग बनाकर आया और रानी से कहा—हे रानी! उदास क्यों बैठी हो, मैंने तो तुम्हें दीक्षा मंत्र दिया है, मेरा नाम ज्ञानी है। काल तुम्हें साँप रूप में डसने आया था, तब मैंने ही तुम्हारी रक्षा की थी। अब मैं तुम्हें लेने आया हूँ, चलो मेरे साथ।

रानी ने कहा

इन्द्रमती तब चीन्हे उ रेखा। जस कछु साहिब कहे उ विशेषा ॥
तीनों रेख देख चक माहीं। जर्द सेत अरु राता आहीं ॥
मस्तक ओछ देख पुनि ताको। भयो प्रतीत वचन को साको ॥
जाहु दूत तुम अपने देसा। अब हम चीन्हे उ तुम्हरो भेसा ॥
काग रूप जो बहुत बनाई। हंस रूप शोभा किमि पाई ॥
तस हम तोरा रूप निहारा। ऐ समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥

तब रानी उसे पहचान गयी, क्योंकि साहिब ने उसे काल का रूप समझा दिया था कि उसका छोटा-सा मस्तक होगा, भँवरे की तरह काली आँखें होंगी। तो रानी ने कहा कि कौवे को हंस का रूप शोभा नहीं देता। हमारा गुरु बड़ा समर्थ है।

यह सुन काल निकट चल आवा। इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥
थाप चलाय सुमुख पर मारा। रानी खसि परि भूमि मँझारा ॥
इन्द्रमती तब सुमिरन लाई। हे गुरु ज्ञानी होठ सहाई ॥

यह सुन काल ने इन्द्रमती को थप्पड़ मारा, जिससे रानी भूमि पर गिर पड़ी। इन्द्रमती ने साहिब को पुकारा कि रक्षा करो।

सुनत पुकार मुहि रहो न जाय। सुनहु धर्मनि यह मोर सुभाय ॥
रानी जबहीं कीन्ह पुकारा। ततछन मैं तहाँ पगु धारा ॥
देखत रानी भयी हु लासा। मन ने भाग्यो काल त्रासा ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि जब कोई मुझे सच्चे दिल से पुकारता है तो मुझसे रहा नहीं जाता, यह मेरा स्वभाव है। तो रानी ने जब पुकार की तो मैं तुरंत वहाँ पहुँचा। मुझे देख रानी प्रसन्न हो गयी और काल का डर जाता रहा।

अनुरागसागर वाणी

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कह इन्द्रमती तब कर जोरी । हे प्रभु सुनो विनती मोरी ।
चीन्ह परी मोही यम की छाहीं । अब यहि देश रहब हम नाहीं ॥
हे साहिब लै चलु निज देश । इहवाँ बहु काल कलेशा ॥

रानी ने दोनों हाथ जोड़कर विनती की, कहा—मुझे काल की बाधा समझ आ गयी है, इसलिए अब इस देश में नहीं रहूँगी, मुझे अपने देश ले चलो, यहाँ बहुत कष्ट है ।

साहिब कहते हैं

प्रथमहि रानी कीन्हों संग। मेट्यो काल कठिन परसंगा ॥
तबहीं ठीक पूर भराया । ले रानी सत लोक सिधाया ॥
ले पहुँचायो मानसरोवर । जहवाँ कामिनि करहिं कतोहर ॥
अमी सरोवर अमी चखायी । सागर कबीर पाँव परायी ॥
तेहि आगे सुरति को सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥
लोक द्वार ठाढ तब कीनी । देखत रानी अति सुख भीनी ॥
हंस धाय अंकम भर लीन्हा । गावहिं मंगल आरति कीन्हा ॥
सकल हंस कीन्हा सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥
भल तुम छोड़ेहु काल का फंदा । तुम्हरो कष्ट मिट्यो दुखदंदा ॥
चलो हंस तुम हमरे साथ। पुरुष दरश कर नावहु माथा ॥
इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवै अब तोरे ॥
इन्द्रमती अरु हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥
चलत हंस सब अस्तुति लावै । अब तो दरश पुरुष को पावै ।
तब हम पुरुष सन बिनती लावा । देहु दरश अब हंस ढिग आवा ॥
देहु दरश तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥
बिकस्यो पुहुह उठा अस बानी । सुनहु योग संतायन ज्ञानी ॥
हंसन कहै अब आव लिवाई । दरश कराइ लेउ तुम आई ॥

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साहिब बन्दगी

तब साहिब उसे अपने साथ अमर लोक ले गये। जब मानसरोवर, अमृत सरोवर, सुरति का सागर देखकर रानी अमर लोक पहुँची तो लोक की शोभा देख बहुत प्रसन्न हुई। सभी हँसों ने रानी का सम्मान किया, कहा कि तुमने सतगुरु को पहचाना, तुम धन्य हो, तुम्हारा कष्ट अब समाप्त हुआ। तब साहिब ने इन्द्रमती से कहा कि अब परम पुरुष के दर्शन को चलो। सभी हँस भी खुशी-2 साथ हो लिये कि अब परम पुरुष के दर्शन होंगे। तब साहिब के कहने पर परम पुरुष ने दर्शन दिये।

पुरुष कांति जब देखउ रानी। अद्भुत अमी सुधा की खानी ॥
गदगद होय चरण लपटानी। हँस सुबुद्धि सुजन गुणज्ञानी ॥

परम पुरुष की शोभा देख रानी गद्गद हो गयी और चरणों में लिपट गयी। परम पुरुष ने रानी से कहा कि करुणामय को बुला लाओ। जब रानी साहिब के पास आई तो देखकर चकित हो गयी कि साहिब ही परम पुरुष हैं, उनमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं है। तब रानी ने कहा-

कह रानी यह अचरज आही। भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥
जो कोइ कला पुरुष कहै देखा। करुणामय तन एक विसेखा ॥
धाय चरण गह हँस सुजाना। हे प्रभु तव चरित्र सब जाना ॥
तुम सतपुरुष दास कहलाये। यह शोभा कस उहाँ छिपाये ॥
मोरे चित्त यह निश्चय आई। तुमहि पुरुष दूजा नहिं भाई ॥

रानी ने कहा कि मुझे आपमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं दिखा, अब मैं आपका चरित्र समझ चुकी हूँ, आप सतपुरुष होकर दास कहलाते हैं और अपना असली रूप छिपाए रखते हैं, पर मुझे निश्चय हो गया है कि आप परम पुरुष ही हैं, अन्य नहीं हैं।

तब रानी ने राजा को भी वहाँ लाने की विनती की, कहा-वे काल के मुख में जा रहे हैं, उन्होंने मुझे कभी संतों की सेवा में रुकावट नहीं दी। तब विनती मान साहिब गढ़गिरनार में आए और राजा को लेकर अमर लोक पहुँचे।