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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
हे अग्नि! आप प्रकाशमान हैं. आप यज्ञों में शोभित होते हैं. आप स्वर्गलोक
को भी प्रकाशित करते हैं. आप गोपति व अमर हैं. आप स्वयं यज्ञ में बढ़ोत्तरी पाते
हैं. हम उपासना से आप के पास आते हैं. ( २३ )
स नः पितेव सूनवेग्ने सूपायनो भव. सचस्वा नः स्वस्तये.. (२४)
हे अग्नि! आप यजमानों के पास उसी तरह बने रहें जैसे पिता पुत्र के पास बना
रहता है. आप हम यजमानों के कल्याण के लिए सदैव यजमानों के पास रहने की
कृपा कीजिए. ( २४ )
अग्ने त्वं नो अन्तम ऽ उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः.
वसूरग्निर्वसुश्रवा ऽ अच्छा नक्षि द्युमत्तम १७ रयिं दाः.. ( २५)
हे अग्नि! आप हमारे पास हैं. आप पालक, रक्षक, कल्याणकारी व भावी
पीढ़ियों के दाता हैं. आप घर दाता, विश्वविख्यात, धन और कीर्तिदाता हैं. हमारी
आंख के तारे व धनदाता हैं. ( २५ )
तन्त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः.
स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्याणो अघायतः समस्मात्.. (२६)
हे अग्नि! आप पवित्रतम हैं. आप स्वर्गलोक को भी प्रकाशित करने वाले हैं.
आप से हम अपने अच्छे मन के लिए कामना करते हैं. आप से हम अच्छे मित्रों के
लिए इच्छा करते हैं. आप पापियों से हमें बचाइए. आप हमें जागृत कीजिए. आप
हमारा निवेदन सुनिए. ( २६ )
इड ऽ एह्यदित ऽ एहि काम्या ऽ एत. मयि वः कामधरणं भूयात्.. (२७)
हे इड़ा देवी! व हे अदिति देवी! आप यहां पधारिए. आप यहां पधारने की
इच्छा कीजिए. हे इच्छित गौ! आप हमारी इच्छाओं को पूरा करने के लिए यहां
पधारिए. ( २७ )
सोमान १७ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते. कक्षीवन्तं य ऽ औशिजः.. (२८)
हे ब्रह्मणस्पति! आप सोम का सेवन करने वालों को प्रकाशमान कीजिए. जैसे
उशीज के पुत्र कक्षीवान को आप ने महिमावान बनाया, वैसे ही आप हमें भी
महिमावान बनाने की कृपा कीजिए. ( २८ )
यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः. स नः सिषक्तु यस्तुरः.. ( २९)
हे ब्रह्मणस्पति! आप रोगहारी, धनवान, ऐश्वर्यदाता, पुष्टिवर्धक व जल्दी काम
समाप्त करने वाले हैं. आप हमारे पास पधारने की कृपा कीजिए. ( २९)
मा नः श १७ सो अरुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य. रक्षा णो ब्रह्मणस्पते.. (३०)
५० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
हे ब्रह्मणस्पति! आप हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. हम पर धूर्त, अयज्ञी
( यज्ञ न करने वालों ) लोगों का बुरा असर न हो. ( ३० )
महि त्रीणामवोस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः. दुराधर्षं वरुणस्य.. (३१)
मित्र देवता, अर्यमन देवता और दुर्धर्ष ( प्रबल प्रतापी ) वरुण तीनों देव हमारी
रक्षा करने की कृपा करें. ( ३१ )
नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु. ईशे रिपुरघश ᳪ सः.. (३२)
राह, कठिन स्थान और घर आदि स्थानों में भी तीनों देवों की कृपा से पापी
शत्रु असर नहीं डाल सकता. ( ३२ )
ते हि पुत्रासो अदितेः प्र जीवसे मर्त्याय. ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्.. (३३)
वे तीनों देव अदिति देव के पुत्र हैं. वे मनुष्यों को दीर्घ जीवन और कभी क्षीण
न होने वाली ज्योति प्रदान करते हैं. ( ३३ )
कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे.
उपोपेन्नु मघवन् भूय ऽ इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते.. (३४)
हे इंद्र! आप अहिंसक हैं. यजमान हविदाता हैं. यजमान की धनदान से सेवा करते
हैं. आप ऐश्वर्य से युक्त हैं. आप यजमान को अधिक धन दान करने वाले हैं. ( ३४ )
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (३५)
सविता वरण करने योग्य व सौभाग्यवान हैं. हम उन की बुद्धिपूर्वक उपासना
करते हैं. वे हमारी बुद्धि को प्रेरित करने की कृपा करें. ( ३५ )
परि ते दूडभो रथोस्माँ २ अश्नोतु विश्वतः. येन रक्षसि दाशुषः.. (३६)
हे देवगण! आप चारों ओर से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. हे देवगण! आप
का रथ हमारी रक्षा करने की कृपा करे. हे देवगण! आप चारों ओर से हमारी रक्षा
करने की कृपा करें, ताकि हमारे धन की रक्षा हो सके. ( ३६ )
भूर्भुवः स्वः सुप्राजाः प्रजाभिः स्या ᳪ सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः.
नर्य प्रजां मे पाहि श ᳪ स्य पशून्मे पाह्यर्थर्य पितुं मे पाहि.. (३७)
हे अग्नि! हम अच्छी संतान और अच्छे वीरों वाले हो जाएं. हम सुवीरों का अच्छे
अन्न से पोषण करें. आप हमारी संतान, हमारे पशुओं व पालक की रक्षा करने की
कृपा करें. ( ३७ )
आ गन्म विश्ववेदसमस्मभ्यं वसुवित्तमम्.
अग्ने सम्राडभि द्युम्नमभि सह ऽ आ यच्छस्व.. ( ३८)
यजुर्वेद - ५१

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
हे अग्नि! आप बुलाने योग्य व सर्वविद् हैं. आप हमारे लिए श्रेष्ठ धन धारण
करने व हमारे पास आने की कृपा कीजिए. आप सम्राट् हैं. आप शोभा सहित
पधारिए और हमें भी शोभा प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ३८ )
अयमग्निर्गृहपतिर्गाहर्पत्यः प्रजाया वसुवित्तमः.
अग्ने गृहपतेभि द्युम्नमभि सह आ यच्छस्व.. (३९)
ये अग्नि गृहपति हैं. हमारी संतान के लिए धन देने वाले हैं. हे अग्नि! आप
गृहपति हैं. आप शोभा सहित पधारिए और हमें भी शोभा प्रदान करने की कृपा
कीजिए. ( ३९ )
अयमग्निः पुरीष्यो रयिमान् पुष्टिवर्धनः.
अग्ने पुरीष्याभि द्युम्नमभि सह ऽ आ यच्छस्व... (४०)
यह अग्नि दक्षिण, धनवान व पुष्टिवर्धक है. हे अग्नि! आप वैभववर्धक हैं. आप
शोभा सहित पधारिए और हमें भी शोभा प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ४० )
गृहा मा बिभीत मा वेपध्वमूर्जं बिभ्रत ऽ एमसि.
ऊर्जं बिभ्रद्वः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः.. (४१)
हे घर! भयभीत और कांपिए मत. हम ऊर्जस्वी ( तेजवान ) होने के लिए आप
के पास आते हैं. हम ओज संपन्न हो कर आप में प्रविष्ट होते हैं. हम श्रेष्ठ बुद्धिमान
दुःखहीन हो कर आप में प्रविष्ट होते हैं. ( ४१ )
येषामध्येति प्रवसन्येषु सौमनसो बहुः. गृहानुपह्वयामहे ते नो जानन्तु जानतः.. (४२)
प्रवास के समय जिस के बारे में सोचते हैं, अच्छे मन से उस घर में प्रसन्नता
से रह रहे हैं. घर के पास रहने वाले देवता ज्ञानी हैं. वे देवता हमारे इस भाव को
जानने की कृपा करें. ( ४२ )
उपहूता ऽ इह गाव ऽ उपहूता ऽ अजावयः.
अथो अन्नस्य कीलाल ऽ उपहूतो गृहेषु नः.
क्षेमाय वः शान्त्यै प्रपद्ये शिव ँ शग्म ँ शंयोः शंयोः.. (४३)
हमारे घर में सुख से रहने के लिए गायों, भेड़ों व बकरियों को सम्मान से
बुलाया गया है. अन्न की समृद्धि हेतु हम इन का आह्वान करते हैं. हम कल्याण व
अनिष्ट निवारण हेतु आप का आह्वान करते हैं. हम लौकिक और पारलौकिक सुख
पाना चाहते हैं. ( ४३ )
प्रघासिनो हवामहे मरुतश्च रिशादसः. करम्भेण सजोषसः.. (४४)
हे मरुद्गणो! आप शत्रुओं की हिंसा करने वाले व हवि का भक्षण करने वाले
हैं. हे मरुद्गणो! आप दही मिश्रित सत्तू का भक्षण करने वाले हैं. ( ४४ )
५२ – यजुर्वेद

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
यद्ग्रामे यदर॑ण्ये॒ यत्स॒भायां॒ यदि॑न्द्रि॒ये.
यदेन॑श्चकृ॒मा व॒यमि॒दं तदव॑यजामहे॒ स्वाहा॑.. (४५)
जो पाप हम ने गांव, जंगल और सभा में किए हैं हम उन से मुक्त होने के लिए
यज्ञ करते हैं, उन के लिए स्वाहा. जो पाप हम ने इंद्रियों से किए हैं हम उन से मुक्त
होने के लिए यज्ञ करते हैं, उन के लिए स्वाहा. ( ४५ )
मो षू ण ऽ इन्द्रात्र॒ पृत्सु॑ दे॒वैरस्ति॒ हि ष्मा॑ ते शुष्मि॒न्नव॑याः.
म॒हश्चि॒द्यस्य॑ मीढुषो यव्या॑ ह॒विष्म॑तो म॒रुतो॒ वन्द॑ते॒ गीः.. (४६)
हे इंद्र! आप शक्तिमान और देवों का पक्ष लेने वाले हैं. आप हमारा नाश मत
कीजिए. आप महान और हवि को ग्रहण करने वाले हैं. आप यज्ञ वाली हवि ग्रहण
करते हैं. हम मरुद्गण की भी वाणी से वंदना करते हैं. ( ४६ )
अक्र॒न् कर्म॑ कर्म॒कृतः॒ सह॑ वा॒चा म॑यो॒भुवा.
दे॒वेभ्यः॒ कर्म॑ कृ॒त्वास्तं॒ प्रेत॑ सचाभुवः.. (४७)
कर्मकर्ता वाणी के साथ मंत्रपाठ का कर्म करने की कृपा करें. परस्पर प्रीतिपूर्वक
रहने वाले यजमानगण देवताओं के अनुष्ठान कर के प्रस्थान करने की कृपा
करें. ( ४७ )
अव॑भृथ निचुम्पु॒ण नि॒चेरु॑रसि निचुम्पु॒णः.
अव॑ दे॒वैर्दे॒वकृ॑त॒मेनो॑यासिष॒मव॒ मर्त्यैर्मर्त्य॑कृ॒तं पु॒रुरा॒व्णो दे॑व रि॒षस्पाहि॑.. (४८)
हे जलप्रवाह! आप नीचे की ओर बहने वाले और बहुत तीव्र वेग वाले हैं.
फिर भी धीमी गति से बहने की कृपा कीजिए. आप देवताओं के प्रति किए गए
पाप धोने के लिए पधारे हैं. आप दुःखदायी शत्रुओं से हमारी रक्षा करने की कृपा
कीजिए. ( ४८ )
पूर्णा दर्वि॒ परा॑पत सु॒पूर्णा पुन॒राप॑त. व॒स्नेव॒ विक्री॑णावहा॒ इष॒मूर्ज॑ १७॒ शत॑क्रतो.. (४९)
हे दर्वि देवी! आप पास स्थित अन्न से परिपूर्ण होने की कृपा कीजिए. आप
इंद्र की ओर जाने की कृपा कीजिए. वे सैकड़ों यज्ञ करने वाले हैं. हम हवि रूप
अन्न रस को आपस में बेचें ( आदानप्रदान करें ). ( ४९ )
देहि॑ मे ददामि ते॒ नि मे॑ धेहि॒ नि ते॑ दधे.
नि॒हारं॑ च॒ हरा॑सि मे नि॒हारं॒ निह॑राणि ते॒ स्वाहा॑.. (५०)
( इंद्र कहते हैं ) हे यजमान! आप हमें हवि प्रदान कीजिए. हम आप को
( सुफल ) प्रदान करेंगे. आप निश्चित ( रूप से ) हवि धारण कीजिए. हम आप को
अभीष्ट फल देंगे. ( यजमान कहते हैं ) हे इंद्र! हम निश्चय ही आप को हवि प्रदान
करते हैं. आप भी हमारे लिए अन्न प्रदान कीजिए. आप के लिए स्वाहा. ( ५० )
यजुर्वेद - ५३

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया ऽ अधूषत.
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५१)
हम ने यज्ञ में जो हवि पितरों के लिए प्रदान की है, उसे पितरों ने स्वीकार कर
लिया है. स्वीकार कर के उस हवि का सेवन भी कर लिया है. स्वयं प्रकाशित
ब्राह्मणों ने नई ऋचाओं से स्तुति शुरू कर दी. हे इंद्र! अब इस यज्ञ में पधारने के
लिए 'हरी' नामक घोड़ों को रथ में जोतने की कृपा कीजिए. (५१)
सुसन्दृशं त्वा वयं मघवन्वन्दिषीमहि.
प्र नूनं पूर्णबन्धुर स्तुतो यासि वशाँ २ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५२)
हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप सभी को अच्छी और समान दृष्टि से देखते हैं.
हम सब आप की उपासना करते हैं. आप निश्चय ही हम सभी के पूर्ण बंधु हैं. आप
स्तुति करने वालों के वश में रहते हैं.आप उन की स्तुतियों का अनुकरण करते हैं.
आप उन की इच्छा पूरी करने के लिए रथ में 'हरी' नामक घोड़ों को जोतने की
कृपा कीजिए. (५२)
मनो न्वाह्वामहे नाराश १७१ सेन स्तोमेन. पितॄणां च मन्मभिः.. (५३)
हम वीर पुरुषों की गाथाओं को गाने वाले मंत्रों से पितरों को आमंत्रित करते
हैं. हम पितरों को मन से बार-बार आमंत्रित करते हैं. (५३)
आ न ऽ एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (५४)
हमारा यह मन (पितृलोक से) पुनः आए. यज्ञ कार्य के लिए जीवलोक में
पधारने की कृपा करे. हम बारबार सूर्य का प्रकाश देख सकें. (५४)
पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः. जीवं व्रात १७१ सचेमहि.. (५५)
पितृगण! पुनः हमारे मन को श्रेष्ठ कार्यों के लिए प्रेरित करने की कृपा करें.
ताकि हम जीवों और घर वालों की सेवा कर सकें. (५५)
वय १७१ सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः. प्रजावन्तः सचेमहि.. (५६)
हे पितरो! आप सोम व्रत वाले हैं. हम आप के प्रति पितृकार्यों में मन और
तन लगाए हुए हैं. उसे धारण किए हुए हैं. हम संतानवान सचित्त आप की सेवा
में लगे रहें. (५६)
एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व स्वाहैष ते रुद्र भाग ऽ आखुस्ते पशुः.. (५७)
हे रुद्र! यह आप का भाग है. आप अपनी पत्नी अंबिका के साथ इसे ग्रहण
करने की कृपा कीजिए. आप के लिए स्वाहा. हे रुद्र! यह भाग आप के पशु चूहे
के लिए अर्पित है. (५७)
५४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
अव रुद्रमदीमह्मव देवं त्र्यम्बकम्.
यथा नो वस्यसस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसाययात्.. (५८)
रुद्र देव व त्र्यंबक को हम लोगों की रक्षा करनी चाहिए. वे हमारे लिए आयुकारी
( बढ़ोतरी करने वाले ), श्रेयकारी व व्यवसायों की बढ़ोतरी करने वाले हों. ( ५८ )
भेषजमसि भेषजं गवेश्वाय पुरुषाय भेषजम्. सुखं मेषाय मेष्यै.. (५९)
हे रुद्र! आप रोग निवारक ओषधि की भांति कष्ट निवारक हैं. आप हमारे
घोड़ों के लिए ओषधि प्रदान कीजिए. आप हमारे व्यक्तियों के लिए ओषधि
प्रदान कीजिए. हम अपने भेड़ और अन्य पशुओं की आप से कुशलता चाहते
हैं. ( ५९ )
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः.. (६०)
हे रुद्र! आप तीन दृष्टियों वाले हैं. हम आप की उपासना करते हैं. आप जीवन
में सुगंध फैलाने व पौष्टिकता बढ़ाने वाले हैं. हमें संरक्षण प्रदान करते हैं. हम
सांसारिक बंधनों से, वृक्ष से अलग हुए फल की भांति अलग हो जाएं; पर अमरता
से नहीं. ( ६० )
एतत्ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोतीहि.
अवततधन्वा पिनाकावसः कृत्तिवासा ऽ अहि ँषन् सन्तः शिवोतीहि.. (६१)
हे रुद्र! आप अपने बचे हुए हवि-भाग को साथ ले कर मूंजवत पर्वत पार कर
जाइए. आप अपना धनुष कपड़ों से ढक दीजिए. आप कल्याण करने वाले हैं. आप
पर्वत को पार कर के पधार जाइए. ( ६१ )
त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्. यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम्.. (६२)
जमदग्नि की तीन अवस्थाएं हैं. कश्यप की तीन अवस्थाएं हैं. देवताओं की
तीन अवस्थाएं हैं. हमारी भी ( वैसी ही ) तीन अवस्थाएं हों. ( ६२ )
शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा मा हि ँसीः.
नि वर्त्तयाम्यायुषेन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय.. (६३)
आप का नाम ही शिव ( कल्याणकारी ) है. धारदार शस्त्र आप के पिता हैं.
आप को हमारा नमन. आप हमें कभी कष्ट न दें. हम आयु, अन्न, प्रजनन, धन व
पोषण के लिए आप से निवेदन करते हैं. हम अच्छी संतान एवं अच्छे वीर्य के लिए
आप से निवेदन करते हैं. ( ६३ )
यजुर्वेद - ५५

चौथा अध्याय

चौथा अध्याय
एदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवासो अजुषन्तविश्वे.
ऋक्सामभ्या ᳪ सन्तरन्तो यजुर्भी रायस्पोषेण समिषा मदेम.
इमा ऽ आपः शमु मे सन्तु देवीरोषधे त्रायस्व स्वधिते मैनं ᳪ हि ᳪ सी:.. (१)
जिस यज्ञ स्थान पर सारे देवता प्रसन्न होते हैं, हम सभी यजमान उसी स्थल पर
इकट्ठे हुए हैं. ऋग्वेद और सामवेद के मंत्रों से हम यज्ञ के पार जाते हैं. यजुर्वेद के
मंत्रों से यज्ञ करते हुए हम धन और पोषण प्राप्त करते हैं. ये जल हमारे लिए
शांतिदायी हों. दिव्य गुणों वाली ओषधियां हमें रोगों से बचाएं. ये अस्त्रशस्त्र
(अनावश्यक) हिंसाकारी न हों. (१)
आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु.
विश्वं ᳪ हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि.
दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा ᳪ शग्मां परि दधे भद्रं वर्णं पुष्यन्.. (२)
जल हमारी मां है. जल हमें शोधित (शुद्ध) करने की कृपा करे. घी से
जो जल झरता है, वह हमें पवित्र करने की कृपा करे. प्रवाहित होता हुआ
जल सभी पापों को धो दे. जल से हम शुद्ध और पवित्र होते हैं. हे रेशमी वस्त्र! आप
दीक्षातपस देव का शरीर हो. आप कोमल, सुखद, कल्याणकारी व श्रेष्ठ (सुंदर)
रंग वाले हैं. हम आप को (यज्ञ में) धारण करते हैं. (२)
महीनां पयोसि वर्चोदा ऽ असि वर्चो मे देहि.
वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा ऽ असि चक्षुर्मे देहि.. (३)
आप गायों का दूध हैं. आप वर्चस्व (चमक) देने वाले हैं. आप हमें वर्चस्व
प्रदान कीजिए. आप वृत्र की आंख की पुतली हैं. आप आंख देने वाले हैं. आप हमें
आंख प्रदान कीजिए. (३)
चित्पतिर्मा पुनातु वाक्पतिर्मा पुनातु देवो मा सविता पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य
रश्मिभिः.
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्.. (४)
५६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध चौथा अध्याय

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
आप चित्त ( मन ) के पति ( स्वामी ) हैं. आप हमें पवित्र कीजिए. आप वाणी
के स्वामी हैं. आप हमें पवित्र बनाइए. दोष ( छिद्रों ) से रहित सविता देव हमें पवित्र
करने की कृपा करें. सूर्य अपनी किरणों से हमें पवित्र बनाएं. हे पवित्रपति ! हम आप
के पुत्र हैं. हम पवित्र हो कर अपनी मनोकामना पूर्ण करें, ताकि हम और अधिक
यज्ञ करने योग्य हो सकें. ( ४ )
आ वो देवास ऽ ईमहे वामं प्रत्यध्वरे. आ वो देवास ऽ आशिषो यज्ञियासो हवामहे.. (५)
हे देवताओ! हम इस यज्ञ के आरंभ में अपनी इच्छापूर्ति के लिए आप को
आमंत्रित करते हैं. हे देवताओ! हम याज्ञिक ( यज्ञ करने वाले ) आशीर्वाद और यज्ञ
फल की प्राप्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. ( ५ )
स्वाहा यज्ञं मनसः स्वाहोरोरन्तरिक्षात्स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ᳪ स्वाहा वातादारभे
स्वाहा.. (६)
हे यज्ञ देव! हम मन से यज्ञ करते हैं. उन के लिए स्वाहा. अंतरिक्षलोक, स्वर्गलोक
व पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. हम वायु को यज्ञ के आरंभ में ही आहुति अर्पित करते
हैं. ( ६ )
आकूत्यै प्रयुजेग्नये स्वाहा मेधायै मनसेग्नये स्वाहा दीक्षायै तपसेग्नये स्वाहा सरस्वत्यै
पूष्णेग्नये स्वाहा.
आपो देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो द्यावापृथिवी उरो अन्तरिक्ष.
बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा.. (७)
अग्नि यज्ञ के संकल्प की प्रेरणा देने वाले हैं. उन के लिए स्वाहा. अग्नि यज्ञ
की बुद्धि देते हैं. यज्ञ करने में मन को प्रेरित करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. दीक्षा
और तप की सिद्धि हेतु अग्नि को यह आहुति दी जाती है. सरस्वती देवी के लिए
स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. हे जल देव! आप के लिए
स्वाहा. संसार के पालक शंभु देव के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा.
पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. विशाल अंतरिक्षलोक के लिए स्वाहा. हम बृहस्पति के
लिए हवि समर्पित करते हैं. उन के लिए स्वाहा. ( ७ )
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरी॑त सख्यम्.
विश्वो राय ऽ इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा.. (८)
सविता देव सभी देवों का नेतृत्व करने वाले हैं. वे वरेण्य ( श्रेष्ठ ) गुणों वाले
हैं. हम उन की मित्रता पाना चाहते हैं. हम उन से सभी प्रकार के वैभव चाहते हैं.
हम सब के लिए उन से धन प्राप्ति की चाह रखते हैं. हम स्वर्गदायी वैभव ( यशस्वी )
चाहते हैं. हम प्रजा का पोषण करने के लिए धन चाहते हैं. सविता देव के लिए
स्वाहा. ( ८ )
यजुर्वेद - ५७

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
ऋक्सामयोः शिल्पे स्थस्ते वामारभे ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृचः.
शर्मासि शर्म मे यच्छ नमस्ते अस्तु मा मा हि ᳵ सीः.. (९)
हे ऋग्वेद के देव! हे सामवेद के देव! हे शिष्य स्थित देव! हम यज्ञ में गाई गई
ऋचाओं से आप का स्पर्श करते ( आप तक पहुंचते ) हैं. आप ऋचाओं का गान
करते समय हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप आश्रय ( सुख ) दाता हैं. आप
हमें आश्रय ( सुख ) देने की कृपा कीजिए. आप को नमस्कार है. आप हमें कष्ट
मत दीजिए. ( ९ )
ऊर्गस्याङ्गिर्स्स्यूर्णम्रदा ऊर्जं मयि धेहि.
सोमस्य नीविरसि विष्णोः
शर्मासि शर्म यजमानस्येन्द्रस्य योनिरसि सुसस्याः कृषीस्कृधि.
उच्छ्रयस्व वनस्पत ऽ ऊर्ध्वो मा पाह्य ᳵ हस ऽ आस्य यज्ञस्योदृचः.. (१०)
हे यज्ञमेखला! आप अंगों को ऊर्जा प्रदान करती हैं. आप मुझे ऊर्जा धारण
कराइए. आप सोम की नीवी हो. आप विष्णु को भी सुख प्रदान करती हैं. आप
यजमानों को भी सुख प्रदान कीजिए. आप इंद्र की योनि हैं. आप खेती को समृद्धि
दीजिए. आप वनस्पति को उन्नतिवान बनाइए. हमें यज्ञ की ऋचाएं गाते समय पाप
से बचाने की कृपा कीजिए. ( १० )
व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतैर्यज्ञियः.
दैवीं धियं मनामहे सुमृडीकामभिष्टये वर्चोधां यज्ञवाहस ᳵ सुतीर्था नो ऽ असद्वशे.
ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्षक्रतवस्ते नोवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यः स्वाहा.. (११)
हे यजमानो! अग्नि ब्रह्म व यज्ञ हैं. आप उन के प्रति व्रत का पालन कीजिए.
वनस्पतियां यज्ञ के योग्य हैं. हम बुद्धि की देवी को मानते हैं. हम सुख व
मनोकामना की पूर्ति के लिए उपासना करते हैं. हम यज्ञवाही वाणी धारण करना
चाहते हैं. श्रेष्ठ बुद्धि हमारे वश में रहे. जो देव मन में ( संकाय आदि ) उपजाते
हैं, ( संकल्पादि में ) मन को लगाते हैं, जो देव दक्ष संकल्प वाले हैं, वे देव यज्ञ
में रक्षा करने की कृपा करें. वे देव हमारी रक्षा करने की कृपा करें. उन सभी
देवों के लिए स्वाहा. ( ११ )
श्वात्राः पीता भवत यूयमापो अस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः.
ता ऽ अस्मभ्यमयक्ष्मा ऽ अनमीवा ऽ अनागसः स्वदन्तु देवीरमृता ऽ ऋतावृधः.. (१२)
हे देव! आप जल रूप हैं. हम आप का सेवन करते हैं. आप हमारे पेट के भीतर
( पुष्टिकारक हो कर ) सुख दीजिए. हमारे लिए जल क्षयरोगकारी न हों. जल हमारी
सामान्य ( रोजमर्रा की ) दिक्कतों ( बाधाओं ) को दूर करने वाले, दिव्य, अमृत
स्वरूप एवं स्वादिष्ट हो. यज्ञ में ऋत ( सत्य ) की बढ़ोत्तरी करने वाले हों. ( १२ )
५८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
इयं ते यज्ञिया तनूरपो मुञ्चामि न प्रजाम्.
अ १४ होमुचः स्वाहाकृताः पृथिवीमाविशत पृथिव्या सम्भव.. (१३)
हे यज्ञ देव! पृथ्वी का शरीर यज्ञ करने योग्य है. हम इस में जल छोड़ते हैं. प्रजा
( जनता ) के लिए लाभदायी जल नहीं छोड़ते हैं. आप हमें इस पाप से मुक्त
कीजिए. स्वाहा के रूप में छोड़ा गया जल पृथ्वी में प्रवेश कर के पृथ्वी की मिट्टी
में मिल कर एकमेक हो जाए, आप ऐसी कृपा कीजिए. ( १३ )
अग्ने त्व १४ सु जागृहि वय १४ सु मन्दिषीमहि.
रक्षा णो ऽ अप्रयुच्छन् प्रबुधे नः पुनस्कृधि.. (१४)
हे अग्नि! आप अच्छी तरह ( भलीभांति ) जागिए ( प्रज्वलित होइए ). हम
यजमान भलीभांति नींद का आनंद लेते हैं. आप हमारी रक्षा व हमें प्रबुद्ध कीजिए.
आप हमें विविध कामों में लगाइए. ( १४ )
पुनर्मनः पुनरायुर्म ऽ आगन् पुनः प्राणः पुनरात्मा म ऽ आगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं
म ऽ आगन्.
वैश्वानरो अदब्धस्तनूपा ऽ अग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात्.. (१५)
मन फिर से आ गया. आयु पुनः आ गई. पुनः प्राण प्राप्त हो गए. पुनः आत्मा
प्राप्त हो गई. पुनः नेत्र मिल गए. पुनः कान मिल गए. हे अग्नि! आप सब का
कल्याण चाहते हैं. आप शरीर के रक्षक हैं. आप का दमन नहीं किया जा सकता.
हे अग्नि! आप हमें पापों व बुरे कामों से बचाएं. ( १५ )
त्वमग्ने व्रतपा ऽ असि देव ऽ आ मर्त्येष्वा त्वं यज्ञेष्वीड्यः.
रास्वेयत्सोमा भूयो भर देवो नः वसोर्दाता वस्वदात्.. (१६)
हे अग्नि! आप व्रतपालक देवताओं, मनुष्यों में पूजनीय एवं यज्ञ में आराधनीय
( आराधना योग्य ) हैं. हे सोम! आप हमें भरपूर धन दीजिए. आप हमें इतना धन
दीजिए कि अपने साथसाथ हम लोगों का भी भला कर सकें. सविता देव धनदाता
हैं. उन्होंने भी हमें बहुत धन देने की कृपा की है. ( १६ )
एषा ते शुक्र तनूरेतद्द्वर्चस्तया सम्भव भ्राजं गच्छ.
जूरसि धृता मनसा जुष्टा विष्णवे.. (१७)
हे अग्नि! आप चमकीले हैं. यह घी आप के शरीर को बढ़ा रहा है. चमकती और
ऊपर उठती हुई आप की लपटें और ऊपर आकाश तक जाएं. हम ने मन से वाणी धारण
की है. यह वाणी और अधिक वेगवान व विष्णु को संतुष्ट करने वाली हो. ( १७ )
तस्यास्ते सत्यसवसः प्रसवे तन्वो यन्त्रमशीय स्वाहा.
शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्वदेवमसि.. (१८)
यजुर्वेद – ५१

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
हे अग्नि! आप सत्य स्वरूप हैं. हम भी आप के उस सत्य स्वरूप को पाएं.
अर्थात् आप इसे हमारे शरीर में भी उपजाइए. हम आप का यह अनुशासन (यंत्र)
पा सकें. आप के लिए आहुति प्रदान करते हैं. आप चमकीले, चंद्र, अमृत व सब
के देव हैं. (१८)
चिदसि मनासि धीरसि दक्षिणासि क्षत्रियासि यज्ञियास्यदितिरस्युभयतः शीर्ष्णी.
सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधि मित्रस्त्वा पदि बध्नीतां पूषाध्वनस्पात्विन्द्रायेन्द्राध्यक्षाय.. (१९)
हे मंत्रवाणी! आप चित्त, मन, धीर, दक्षिण, क्षत्रिय व यज्ञ करने योग्य हैं. आप
अदिति, दोनों ओर से सिर वाली पूर्व व पश्चिम दिशा वाली एवं मित्र हैं. आप के
पैरों में (प्रेम भाव का) बंधन (बेड़ी) डालना चाहते हैं. इंद्र यज्ञ के अध्यक्ष हैं. हम
उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं. हम पूषा देव से अनुरोध करते हैं कि वे यज्ञ के मार्ग
की रक्षा करने की कृपा करें. (१९)
अनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्योऽनु सखा सयूथ्यः.
सा देवि देवमच्छेहीन्द्राय सोम ँ रुद्रस्त्वा वर्तयतु स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि.. (२०)
हे वाग् देवी! आप को इंद्र के लिए सोम लेने जाना है. इस के लिए आप को
माता, पिता, भाई, बहन, मित्रगण और पड़ोसी अनुमति प्रदान करने की कृपा करें.
सोम लेने के बाद रुद्र देव आप को हमारी ओर लाने व हमारा कल्याण करने की
कृपा करें. आप सोमसखा को ले कर पुनः यहां आने की कृपा करें. (२०)
वस्यस्यदितिरस्यादित्यासि रुद्रासि चन्द्रासि.
बृहस्पतिष्ट्वा सुम्ने रम्णातु रुद्रो वसुभिरा चके.. (२१)
हे वाग् देवी! आप वसु, अदिति, रुद्र तथा चंद्र हैं. बृहस्पति रुद्र और वसुगण
के साथ आप की रक्षा करने की कृपा करें. बृहस्पति आप के श्रेष्ठ मन में रमण
करने की कृपा करें. (२१)
अदित्यास्त्वा मूर्द्धन्नाजिघर्मि देवयजने पृथिव्या ऽ इडायास्पदमसि घृतवत् स्वाहा.
अस्मे रमस्वास्मे ते बन्धुस्त्वे रायो मे रायो मा वय ँ रायस्पोषेण वियौष्म तोतो
रायः.. (२२)
हे वाग् देवी! आप मूर्धन्य हैं. हम आप को देवताओं के यज्ञ में घी से भरी हुई
हवि प्रदान करते हैं. आप पृथ्वी की श्रेष्ठ देवियों में स्थान रखती हैं. आप यह घी
वाली आहुति स्वीकार कीजिए. आप धनवान हैं. आप अपने धन से हमें पोसिए. आप
अपने धन से हमें वंचित मत कीजिए. हम आप के बंधु हैं. (२२)
समख्ये देव्या धिया सं दक्षिणयोरुचक्षसा.
मा म ऽ आयुः प्रमोषीर्मो ऽ अहं तव वीरं विदेय तव देवि सन्दृशि.. (२३)
६० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
हे वाग् देवी! आप दक्षिणा के योग्य हैं. आप ने बुद्धिपूर्वक हमें देखा है. आप
हमारी ( सपरिवार ) आयु क्षीण मत कीजिए यानी हमें दीर्घायु बनाइए. हे देवी! हम
भी आप की आयु क्षीण न करें. आप की दया दृष्टि से हम वीर पुत्र पाएं. ( २३ )
एष ते गायत्रो भाग ऽ इति मे सोमाय ब्रूतादेष ते त्रैष्टुभो भाग ऽ इति मे सोमाय ब्रूतादेष
ते जागतो भाग ऽ इति मे सोमाय ब्रूताच्छन्दोनामानाम १७ साम्राज्यं गच्छेति मे सोमाय
ब्रूतादास्माकोसि शुक्रस्ते ग्रहो विचितस्त्वा वि चिन्वन्तु.. ( २४ )
हे सोम! यह आप का गायत्री ( छंद ) का भाग है. यह सोम के लिए त्रिष्टुप्
( छंद ) का भाग है. यह हमारा सोम के लिए जगती ( छंद ) का भाग है. आप
( पुरोहित ) हमारी ओर से सोम के लिए यह निवेदन करें. आप सोम से यह भी
निवेदन करें कि वह हमारे हैं. शुक्र आदि ग्रह उन के नियंत्रण में हैं. सोचविचार
( चिंतन ) कर के ही आप का चयन ( ग्रहण ) किया जाता है. ( २४ )
अभि त्यं देव १७ सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसव १७ रत्नधामभि प्रियं मतिं कविम्.
ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा ऽ अदिद्युतत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः. प्रजाभ्यस्त्वा
प्रजास्त्वानुप्राणन्तु प्रजास्त्वमनुप्राणिहि.. ( २५ )
हे सविता देव! आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के बीच में विराजमान हैं. आप
विद्वान, सत्यवान व रत्नों के धाम हैं. आप विद्वानों द्वारा चाहे गए हैं. आप ऊंचाई
की ओर जाने वाले, चमकदार, सुनहरे हाथों व श्रेष्ठ कार्यों वाले हैं. आप हम पर
अपनी कृपा बनाए रखें. हम आप की अर्चना करते हैं. हम प्रजा के लिए आप की
उपासना करते हैं. प्रजा सांस लेने में आप का अनुसरण करती है. आप भी प्रजा का
अनुसरण करते हुए सांस लेने की कृपा करें. ( २५ )
शुक्रं त्वा शुक्रेण क्रीणामि चन्द्रं चन्द्रेणामृतममृतेन.
सग्मे ते गौरस्मे ते चन्द्राणि तपसस्तनूरसि प्रजापतेर्वर्णः
परमेण पशुना क्रीयसे सहस्रपोषं पुषेयम्.. ( २६ )
हे सोम! आप चमकीले हैं. हम आप को चमकते हुए सोने से खरीदते हैं
( अपना बनाते हैं ). आप चंद्रमा के समान मन प्रसन्न करने वाले हैं. आप अमृत जैसे
हैं. गोरों और चमकते हुए तपस्वियों के शरीर प्रजापति के रंग जैसे हो जाएं. हम
परम पशुधन से आप को खरीदते हैं. आप हजारों का पालनपोषण करने में समर्थ
हैं. आप हमारा भी पालनपोषण कीजिए. ( २६ )
मित्रो न ऽ एहि सुमित्रध ऽ इन्द्रस्योरुमा विश दक्षिणमुशन्जुशन्त १७ स्योनः स्योनम्.
स्वान भ्राजाङ्घारे बम्भारे हस्त सुहस्त कृशानवेते वः सोमक्रयणास्तान्रक्षध्वं मा
वो दभन्.. ( २७ )
हे सोम! आप हमारे मित्र हैं. आप मित्रों का पालनपोषण करने वाले हैं. आप
यजुर्वेद - ६१

पूर्वार्ध चौथा अध्याय

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
हमारी ओर पधारने की कृपा करें. आप इंद्र देव की दाईं जंघा में प्रवेश करने की
कृपा करें. आप सुखदायी, पाप के शत्रु, संसार के पालक, सुंदर हाथों वाले तथा
कृश ( दुर्बल ) लोगों के पालक हैं. जिनजिन से सोम को खरीदा जा सकता है, आप
उनउन की रक्षा करने की कृपा कीजिए. ( २७ )
परि माग्ने दुश्चरिताद्वाधस्वा मा सुचरिते भज.
उदायstore स्वायुषोदस्थाममृताँ २ ऽ अनु.. ( २८ )
हे अग्नि! आप हमें पूरी तरह पाप से बचाने की कृपा करें. आप बुरे चरित्र वालों
का वध कीजिए. आप सच्चरित्रवान को स्थापित करने की कृपा कीजिए. हम आप
की उत्कृष्ट आयु से अपनी श्रेष्ठ आयु के लिए आप की अमरता का अनुसरण करते
हैं. ( २८ )
प्रति पन्थामपद्महि स्वस्तिगामनेहसम्.
येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु.. (२९)
हे अग्नि! हम उस मार्ग का अनुसरण करें जो मंगलमय व सुगम हो, जिस पथ
पर जाने से द्वेषियों का पूरी तरह नाश हो और हमें धन की प्राप्ति हो. ( २९ )
अदित्यास्त्वगस्यदित्यै सद आसीद.
अस्तभ्नाद्यां वृषभो अन्तरिक्षममिमीत वरिमाणं पृथिव्याः.
आसीदद्विश्वा भुवनानि सम्राड्विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि.. (३०)
हे आसन! आप पृथ्वी की त्वचा जैसे हैं. आप यज्ञवेदी पर विराजने की कृपा
कीजिए. बलवान वरुण स्वर्गलोक को माप लेते हैं. अंतरिक्षलोक को माप लेते हैं.
पृथ्वीलोक को माप लेते हैं. वे सभी लोकों में व्याप्त हैं. उन के व्रत भलीभांति
शोभते हैं. ( ३० )
वनेषु व्यन्तरिक्षं ततान वाजमर्वत्सु पय ऽ उस्त्रियासु.
हृत्सु क्रतुं वरुणो विश्वग्निं दिवि सूर्यमदधात् सोममद्रौ.. (३१)
वरुण ने अंतरिक्ष को ताना. बल व गायों में दूध की बढ़ोतरी की. हृदय में यज्ञ
शक्ति स्थापित की. अग्नि की स्थापना की. स्वर्गलोक में सूर्य को एवं पर्वत पर सोम
को स्थापित किया. ( ३१ )
सूर्यस्य चक्षुरारोहाग्नेरक्षणः कनीनकम्.
यत्रैतशोभिरीयसे भ्राजमानो विपश्चिता.. (३२)
हे वरुण देव! आप सूर्य के चक्षु हैं. आप अग्नि की आंख हैं. आप आंख की
पुतली पर आरोहण की कृपा कीजिए. आप प्रकाशमान हैं. आप यहां शोभित होने
की कृपा कीजिए. ( ३२ )
६२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
उस्रावेतं धूर्षाहौ युज्येथामनश्रू अवीरहणौ ब्रह्मचोदनौ.
स्वस्ति यजमानस्य गृहान् गच्छतम्.. ( ३३)
हे देवताओ! आप यजमान का कल्याण करने के लिए उन के घरों की ओर
जाने की कृपा कीजिए. आप भार वहन करने में समर्थ हैं. आप वीरों को सुख देते
हैं. ब्रह्मज्ञान हेतु प्रेरक हैं. आप रथ में जुड़ने की कृपा कीजिए. ( ३३ )
भद्रो मेसि प्रच्यवस्व भुवस्पते विश्वान्यभि धामानि.
मा त्वा परिपरिणो विदन् मा त्वा परिपन्थिनो विदन् मा त्वा वृका अघायवो विदन्.
श्येनो भूत्वा परापत यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ स ष्कृतम्.. ( ३४)
हे सोम! आप मेरा कल्याण कीजिए. आप भुवनपति हैं. आप विश्व के सभी
धामों की ओर तेजी से प्रयाण ( यात्रा ) करते हैं. आप चोरों के ज्ञान का विषय मत
होइए. यज्ञ के विरोधी लोग आप को न जान पाएं. सब ओर भ्रमण करने वाले आप
को न जान पाएं. पापी भेड़िए आप को न जान सकें. आप बाज के समान जल्दी
जाइए. आप यजमान के घरों की ओर प्रस्थान कीजिए. वहां भलीभांति सज्जित
यज्ञशालाओं का प्रबंध है. ( ३४ )
नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत ष् सपर्यत.
दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय श ष् सत.. ( ३५)
मित्र देवता और वरुण देवता की आंखों से देखने वाले सूर्य को नमस्कार है.
सूर्य प्रकाशमान, दूर दृष्टि वाले, देवता से उत्पन्न व स्वर्गलोक के पुत्र हैं. सूर्य के
लिए नमन! यजमान को सूर्य के लिए यज्ञ करना चाहिए. यजमान को सूर्य के लिए
स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. ( ३५ )
वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्यऋतसदन्यसि वरुणस्यऋ-
तसदनमसि वरुणस्यऋतसदनमासीद.. ( ३६)
हे शमी देव ( यज्ञ में काम आने वाली लकड़ी )! आप वरुण का उत्थान करने
वाले हैं. आप वरुण की गति के सर्जक ( रचनाकार ) हैं. आप उन्हें स्थिर करने वाले
हैं. आप वरुण के यज्ञ का सदन, यज्ञ का बैठने का स्थान हैं. आप वरुण के यज्ञ
के सदन में सुख से विराजने की कृपा कीजिए. ( ३६ )
या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्.
गयस्फानः प्रतरणः सुवीरो ऽ वीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्.. ( ३७)
हे सोम! जो यजमान यज्ञ में आप के धाम का भजन करते हैं. वे सभी यज्ञ
स्थान आप को प्राप्त हों. आप घरों को स्फारित ( विस्तृत ) करते हैं. आप पार लगाने
वाले श्रेष्ठ वीर व कायरों के विनाशक हैं. आप हमारे यज्ञों में पहुंचने की कृपा
कीजिए. ( ३७ )
यजुर्वेद - ६३

पांचवां अध्याय

पांचवां अध्याय
अग्नेस्तनूरसि विष्णवे त्वा सोमस्य तनूरसि विष्णवे त्वातिथेरातिथ्यमसि विष्णवे त्वा
श्येनाय त्वा सोमभृते विष्णवे त्वाग्नये त्वा रायस्पोषदे विष्णवे त्वा.. (१)
हे अग्नि! आप धनदाता, समृद्धि देने वाले व संसार के पालक हैं. हम विष्णु
व सोम के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हे सोम! आप अग्नि जैसे और उन्हीं की
तरह ऊर्जस्वी हैं. आप यज्ञ में आए मेहमानों का स्वागतसत्कार करते हैं. आप
सोमरस को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने वाले श्येन पक्षी के समान हैं. ( १ )
अग्नेर्जनित्रमसि वृषणौ स्थ ऽ उर्वशीयस्यायुरसि पुरूरवा ऽ असि.
गायत्रेण त्वा छन्दसा मन्थामि त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा मन्थामि जागतेन त्वा छन्दसा
मन्थामि.. (२)
हे शकल! आप अग्नि के जनिता ( जनने वाले ) हैं. आप वृषण ( वीर्यवान )
में स्थित हैं. आप उर्वशी ( के समान ) हैं. आप आयु ( के समान ) हैं. आप पुरूरवा
( के समान ) हैं. मैं गायत्री छंद के साथ आप का मंथन करता हूं. मैं त्रिष्टुप् छंद के
साथ आप का मंथन करता हूं. मैं जगती छंद के साथ आप का मंथन करता हूं. ( २ )
भवतं नः समनसौ सचेतसावरेपसौ.
मा यज्ञ ँ् हि ँ् सिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः.. (३)
हे अग्नि! आप आलस्यरहित, समान व सावधान चित्त वाले हैं. आप हमारे यज्ञों
में यजमानों की भी हिंसा मत होने दीजिए. आप यज्ञ के स्वामी हैं. आप आज से ही
हमारा कल्याण करने की कृपा कीजिए. ( ३ )
अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऽ ऋषीणां पुत्रो अभिशस्तिपावा.
स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्य ँ् सदमप्रयुच्छन्स्वाहा.. (४)
हे यजमानो! आप ऋषियों के पुत्र जैसे हैं. अग्नि शाप से हमारी रक्षा करते हैं.
अग्नि आह्वान के योग्य हैं. अग्नि यज्ञकुंड में प्रविष्ट हो चुके हैं. वे अग्नि हम पर
कृपालु हों. हम देवताओं के लिए हवि प्रदान करते हैं. वे उस हवि को ग्रहण कर
के उन देवताओं तक पहुंचाने की कृपा करें. ( ४ )
६४ - यजुर्वेद 632/4

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय
आपतये त्वा परिपतये गृह्णामि तनूनेप्त्रे शाक्वराय शक्वन ऽ ओजिष्ठाय.
अनाधृष्टमस्यनाधृष्यं देवानामोजो ऽ नभिशस्त्यभिशस्तिपा ऽ अनभिशस्तेन्यमञ्जसा
सत्यमुपगेष १४ स्विते मा धाः.. (५)
हे अग्नि! हम यज्ञ कार्य के लिए आप को ग्रहण करते हैं. आप सर्वव्यापक हैं
और ओजस्वी, सर्वसमर्थ, प्रशंसनीय घृणित ( बुरे ) कामों से हमारी रक्षा करते हैं.
आप किसी को शाप नहीं देते. आप स्वयं भी अभिशप्त नहीं हैं. आप हमें सत्यमार्ग
पर ले चलिए. आप हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कामों में लगाने की कृपा कीजिए. आप
हमारे आधार व रक्षक हैं. ( ५ )
अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा या तव तनूरिय १४ सा मयि यो मम तनूरेषा सा त्वयि.
सह नौ व्रतपते व्रतान्यनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्पतिः.. (६)
हे अग्नि! आप व्रत के पालनकर्ता हैं. आप का वह व्रत पालन करने वाला
शरीर हमारे साथ एकाकार हो जाए. हे व्रतपति अग्नि! व्रतों का यजमान अनुकरण
करने की कृपा करें. हम भी आप के साथ ( आप जैसे ) व्रतपति हो जाएं. सोम
दीक्षापति हैं. सोम दीक्षा के पालनहार हैं. उन से हम एकाकार हो जाएं. आप तप के
स्वामी हैं. हम तप करने वाले हैं. ( आप की कृपा से ) हम आप से एकाकार हो
जाएं. ( ६ )
अ १४ शुर १४ शुष्टे देव सोमाप्यायतामिन्द्रायैकधनविदे.
आ तुभ्यमिन्द्रः प्यायतामा त्वमिन्द्राय प्यायस्व.
आप्याययास्मानत्सखीन्त्सन्या मेधया स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय.
एष्टा रायः प्रेषे भगाय ऋतमृतवादिभ्यो नमो द्यावापृथिवीभ्याम्.. (७)
हे सोम! आप की सोमबेल इंद्र के लिए बढ़ोतरी पाने की कृपा करे. इंद्र धन
वेत्ता ( जानने वाले ) हैं. वे आप को पी कर तृप्त हों. आप उन के पीने ( सेवन ) के
लिए बढ़ोतरी पाने की कृपा करें. आप अपने सखा यजमान को तृप्त करने की कृपा
करें. सोम का कल्याण हो. हम अपनी मेधा ( बुद्धि ) से सोम हेतु किए जा रहे यज्ञ
और इन स्तुतियों को शीघ्र पूरा करें. आप हमारे लिए इष्ट ( प्रिय ) धन भेजने की
कृपा कीजिए. अग्नि की कृपा से हम सत्यवादी हों. इंद्र की कृपा से हम अमरता
प्राप्त करें. हम स्वर्गलोक को नमन करते हैं. हम पृथ्वीलोक को नमन करते हैं. ( ७ )
या ते अग्ने ऽ यःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा.
उग्रं वचो अपावधीत्तेषं वचो अपावधीत्स्वाहा.
या ते अग्ने रजःशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा.
उग्रं वचो अपावधीत्तेषं वचो अपावधीत्स्वाहा.
या ते अग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा गह्वरेष्ठा.
उग्रं वचो अपावधीत्तेषं वचो अपावधीत्स्वाहा.. (८)
यजुर्वेद - ६५

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय
हे अग्नि! आप का शरीर लोहे व चांदी जैसा चमकीला है. आप का शरीर सोने
जैसा सुनहरा है. आप के वचन उग्र हैं. आप मनोकामना पूरी करने वाले, गुफा व
दुर्गम स्थान के वासी हैं. आप राक्षसों की कठोर आवाजों का नाश करने वाले एवं
महिमावान हैं. आप गुफा हैं. आप के लिए आहुतियां भेंट करते हैं. (८)
तप्तायनी मेसि वित्तायनी मे ऽ स्यवतान्मा नाथितादवतान्मा व्यथितात्.
विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अङ्गिर ऽ आयुना नाम्नेहि यो ऽ स्यां पृथिव्यामसि यत्ते ऽ नाधृष्टं नाम
यज्ञियं तेन त्वा दधे विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अङ्गिर ऽ आयुना नाम्नेहि यो द्वितीयस्यां
पृथिव्यामसि यत्तेनाधृष्टं नाम यज्ञियं तेन त्वा दधे विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अङ्गिर ऽ आयुना
नाम्नेहि यस्तृतीयस्यां पृथिव्यामसि यत्तेनाधृष्टं नाम यज्ञियं तेन त्वा दधे.
अनु त्वा देववीतये.. (९)
हे पृथ्वि! आप ऊर्जा व धन देने वाली हैं. हे पृथ्वि! आप हमें धृष्टता से बचाने
की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि! आप यज्ञ के योग्य हैं. 'नभ' नामक अग्नि आप की
ओर उन्मुख होने की कृपा करें. अंगिरस अग्नि आयु प्रदान करें. यहां पधारने की
कृपा करें. पृथ्वी द्वितीय व तृतीय स्थान में अवस्थित है. हम पृथ्वी पर यज्ञ करते हैं.
हम देवताओं के लिए आप को पृथ्वी पर स्थापित करते हैं. (९)
सि ᳪ ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्व सि ᳪ ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व
सि ᳪ ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व.. (१०)
हे उत्तरवेदिका! आप सिंहिनी की तरह शत्रुनाशी हैं. आप देवताओं के लिए
भी कल्पित होने वाली हैं. आप देवताओं के लिए शुद्ध होने की कृपा कीजिए.
आप सिंहिनी की तरह शत्रुनाशी हैं. आप देवताओं के लिए शुद्ध होने की कृपा
कीजिए. (१०)
इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात्पातु प्रचेतास्त्वा रुद्रैः पश्चात्पातु मनोजवास्त्वा
पितृभिर्दक्षिणतः पातु विश्वकर्मा त्वादित्यैरुत्तरतः पात्विदमहं तप्तं वार्बर्हिर्धा यज्ञाम्निः
सृजामि.. (११)
इंद्र वसुओं के साथ सब ओर से रक्षा करने की कृपा करें. वरुण रुद्रों के साथ
पश्चिम से (आप की) रक्षा करने की कृपा करें. पितरों के साथ यम दक्षिण से रक्षा
करने की कृपा करें. विश्वकर्मा आदित्यों के साथ उत्तर से रक्षा करने की कृपा करें.
हम यज्ञ से आप को तृप्त करने वाला जल सिरजते हैं. (११)
सि ᳪ ह्यसि स्वाहा सि ᳪ ह्यस्यादित्यवनिः स्वाहा सि ᳪ ह्यसि ब्रह्मवनिः क्षत्रवनिः
स्वाहा सि ᳪ ह्यसि सुप्राजावनी रायस्पोषवनिः स्वाहा सि ᳪ ह्यस्या वह देवान्
यजमानाय स्वाहा भूतेभ्यस्त्वा.. (१२)
हे उत्तरवेदिके! आप सिंहिनी हैं. सिंहिनी के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप
६६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय
आदित्य को प्रसन्न करने वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप
ब्राह्मणों को प्रसन्न करने वाली हैं. आप सिंहिनी हैं, आप क्षत्रियों को प्रसन्न करने
वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी रूप हैं. आप अच्छी संतान देने व धन
देने वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप यजमान के लिए देवताओं
का आह्वान करने वाली हैं. प्राणियों के लिए आप को यह आहुति समर्पित है. ( १२ )
ध्रुवोसि पृथिवीं दृ ँह ह ध्रुवक्षिदस्यन्तरिक्षं दृ ँह हाच्युतक्षिदसि दिवं दृ ँह हाग्नेः
पुरीषमसि.. (१३)
हे मध्यम परिधि! आप पृथ्वी को स्थिर करने की कृपा करें. आप स्थिर व
अंतरिक्षवासी हैं. आप अंतरिक्ष को स्थिर बनाने की कृपा कीजिए. उत्तरवेदिका स्वर्ग
स्वरूप है. स्वर्गलोक को स्थिर बनाने की कृपा करें. हे अग्नि! आप सुगंधित वस्तुओं
से स्वर्गलोक को सुगंधित करने की कृपा करें. ( १३ )
युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः.
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा.. (१४)
ब्राह्मण यजमान अपना मन अपनी बुद्धि तथा सब कामों से अपने को हटा कर
यज्ञ में लगाते हैं. होता यज्ञ को विशेष रूप से धारते हैं. सविता देव जाग्रत हैं. प्रशंसा
प्राप्त हैं. सविता देव को सर्वविध अनुकूल करना चाहते हैं. सविता देव के लिए
स्वाहा. ( १४ )
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्. समूढमस्य पा ँह सुरे स्वाहा.. (१५)
यह विष्णु विशेष रूप से सर्वत्र भ्रमण करते हैं ( अर्थात् सर्वव्यापक हैं ). विष्णु
तीन प्रकार से तीन पैर धारण करते हैं यानी सब लोक इन के तीन पैरों में समाए
हुए हैं. इन की चरणरज में लोक समाए हैं. विष्णु के लिए स्वाहा. ( १५ )
इरावती धेनुमती हि भूत ँह सुयवसिनी मनवे दशस्या.
व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा.. (१६)
पृथ्वी धनवती व गोवती है. पृथ्वी यज्ञ साधन देने वाली है. विष्णु ने पृथ्वी को
स्वर्गलोक से अलग कर के स्थिर बनाया है. उन्होंने किरणों से पृथ्वी को पूरी तरह
व्याप्त किया है. पृथ्वी के लिए स्वाहा. ( १६ )
देवश्रुतौ देवेष्वा घोषतं प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम्.
स्वं गोष्ठमा वदतं देवा दुर्ये आयुर्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्टमत्र रमेथां वर्ष्मन्
पृथिव्याः.. (१७)
हे देवो! आप दिव्य विधाओं में दक्ष हैं. आप देवताओं की सभा में यह घोषणा
करने की कृपा करें कि देवगण यज्ञ को पूर्व दिशा में पहुंचाते हैं. वे यज्ञ को इष्ट
यजुर्वेद - ६७

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय
दिशा में पहुंचाते हैं. देवगण यज्ञ को फलीभूत करते हैं. देवगण यज्ञ को ऊंचाई पर
पहुंचाते हैं. आगे गायों के बाड़े में (गोशाला में) घोषणा करने की कृपा करें कि
देवता यजमान को आयु प्रदान करने की कृपा करें. देवता यजमान को निंदित न
होने दें. देवता यजमान को सुखपूर्वक रहने का आशीर्वाद प्रदान करते हैं. देवगण
पृथ्वी के इन स्थानों पर सुख से वास करने की कृपा करें. (१७)
विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजा ᳪ सि.
यो अस्कभायद॒त्तर ᳪ सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा.. (१८)
हम यजमान विष्णु के अनुकरणीय कार्यों पराक्रमपूर्ण कार्यों का वर्णन करते
हैं. उन की चरणरज में पृथ्वी आदि लोक वास करते हैं. वे हमें भयमुक्त करते हैं.
वे लोकों को साधने वाले व सर्वव्यापक हैं. हम उन की प्रसन्नता के लिए हैं. काष्ठ
देव आप की स्थापना करते हैं. (१८)
दिवो वा विष्ण ऽ उत वा पृथिव्या महो वा विष्ण ऽ उरोरन्तरिक्षात्.
उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वा.. (१९)
हे विष्णु! आप स्वर्गलोक से हमें धन दें या हे विष्णु! आप पृथ्वीलोक से हमें
धन से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप विशाललोक से हमें धन दें या हे विष्णु! आप धन
से पूर्ण करें या हे विष्णु! आप अपने दोनों हाथों से हमें धन से पूर्ण करें या हे विष्णु!
आप दाएं या बाएं हाथ से हमें धन दे कर पूर्ण करें. विष्णु की प्रसन्नता के लिए हम
काष्ठ देव को स्थापित करते हैं. (१९)
प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः.
यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा.. (२०)
विष्णु अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं. वे अपनी वीरता के कारण स्तुत्य हैं.
वे सिंह व संवेग की तरह विचरण करते हैं वे पर्वत में वास करते हैं. इन के तीनों
पैरों में सब आश्रय पाए हुए हैं. इन विष्णु के तीनों पैरों में सब लोक आश्रय पाए
हुए हैं. (२०)
विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोध्रुवोसि.
वैष्णवमसि विष्णवे त्वा.. (२१)
हे विष्णु! आप ललाट हैं. आप ललाट के दोनों भाग हैं. विष्णु सभी लोकों
को व्यापक बनाते हैं. आप स्थिर हैं. आप ध्रुव हैं. हम विष्णु की प्रसन्नता के लिए
काष्ठ देव की स्थापना करते हैं. (२१)
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽ श्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
आ ददे नार्यसी दमह ᳪ रक्षसां ग्रीवा अपिकृन्तामि.
बृहन्नसि बृहद्रवा बृहतीमिन्द्राय वाचं वद.. (२२)
६८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय
सब देवताओं को सविता ने पैदा किया है. अश्विनी के बाहुओं से हम आप
को स्वीकारते हैं. पूषा देव के हाथों हम आप को स्वीकारते हैं. आइए, आप हमें
सहायता दीजिए. हम राक्षसों की गरदनें छेदते हैं, काटते हैं. आप विशाल व बहुत
अधिक आवाज करने वाले हैं. आप इंद्र के लिए वाणी (मंत्र) दीजिए अर्थात्
मंत्रपाठ कीजिए. (२२)
रक्षोहणं वलगहनं वैष्णवीमिदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे निष्ट्यो यममात्यो
निचखानेदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे समानो यमसमानो निचखानेदमहं तं
वलगमुत्किरामि यं मे सबन्धुर्यमसबन्धुर्निचखानेदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे
सजातो यमसजातो निचखानोत्कृत्यां किरामि.. (२३)
राक्षसों का हनन करने वाले मंत्रपाठ कीजिए. अतिचार साधनों का नाश करने
वाले मंत्रपाठ कीजिए. पोषणता देने वाले मंत्रपाठ कीजिए. अभिचार साधनों का
नाश करने वाले मंत्रपाठ कीजिए. अनिष्ट निवारण हेतु मंत्रपाठ कीजिए. छिपा कर
रखे हुए अनिष्टकर साधनों के नाश हेतु मंत्रपाठ कीजिए. छिपा कर रखे हुए
अभिचार साधनों को हम खोद कर उखाड़ फेंकते हैं. हमारे सजातियों ने जो
अनिष्टकारी प्रयोग किए हैं, हम उन्हें खोद कर उखाड़ फेंकते हैं. (२३)
स्वराडसि सपत्नहा सत्रराडस्यभिमातिहा जनराडसि रक्षोहा सर्वराडस्यमित्रहा.. (२४)
हे गर्त! स्वयं प्रकाशवान, शत्रुनाशी, यज्ञ सत्र तक रहने वाले, अभिमान नाशक,
जनों के रक्षक व राक्षस हंता (मारने वाले) हैं. सभी के प्रकाशक और अमित्रों के
नाशक हैं. (२४)
रक्षोहणो वो वलगहनः प्रोक्षामि वैष्णवान् रक्षोहणो वो वलगहनोवनयामि वैष्णवान्
रक्षोहणो वो वलगहनोवस्तृणामि वैष्णवान् रक्षोहणौ वां वलगहना ऽ उप दधामि
वैष्णवी रक्षोहणौ वां वलगहनौ पर्यूहामि वैष्णवी वैष्णवमसि वैष्णवा स्थ.. (२५)
राक्षस नाश हेतु हम गड्ढा खोदते हैं. अभिचार नाश हेतु हम गड्ढा खोदते हैं.
विष्णु को इन गड्ढों में अधिष्ठित करते हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में जल छिड़कते
हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में कुश का आसन बिछाते हैं. वे राक्षस व अभिचार नाशक
हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में फलक (पटरा) रखते हैं. वे राक्षस व अभिचार नाशक
हैं. उन के हेतु हम गड्ढों में मिट्टी व पत्थर बिछाते हैं. आप पालक हैं.
हे विष्णु! स्थिर होने की कृपा करें. (२५)
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
आददे नार्यसीदमह ष्षं रक्षांसां ग्रीवा ऽ अपिकृन्तामि.
यवोसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीर्दि वे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा शुन्धन्ताँल्लोकाः
पितृषदनाः पितृषदनमसि.. (२६)
यजुर्वेद - ६९