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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 421 में से

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पृष्ठ 58

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
ऋक्सामयोः शिल्पे स्थस्ते वामारभे ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृचः.
शर्मासि शर्म मे यच्छ नमस्ते अस्तु मा मा हि ᳵ सीः.. (९)
हे ऋग्वेद के देव! हे सामवेद के देव! हे शिष्य स्थित देव! हम यज्ञ में गाई गई
ऋचाओं से आप का स्पर्श करते ( आप तक पहुंचते ) हैं. आप ऋचाओं का गान
करते समय हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप आश्रय ( सुख ) दाता हैं. आप
हमें आश्रय ( सुख ) देने की कृपा कीजिए. आप को नमस्कार है. आप हमें कष्ट
मत दीजिए. ( ९ )
ऊर्गस्याङ्गिर्स्स्यूर्णम्रदा ऊर्जं मयि धेहि.
सोमस्य नीविरसि विष्णोः
शर्मासि शर्म यजमानस्येन्द्रस्य योनिरसि सुसस्याः कृषीस्कृधि.
उच्छ्रयस्व वनस्पत ऽ ऊर्ध्वो मा पाह्य ᳵ हस ऽ आस्य यज्ञस्योदृचः.. (१०)
हे यज्ञमेखला! आप अंगों को ऊर्जा प्रदान करती हैं. आप मुझे ऊर्जा धारण
कराइए. आप सोम की नीवी हो. आप विष्णु को भी सुख प्रदान करती हैं. आप
यजमानों को भी सुख प्रदान कीजिए. आप इंद्र की योनि हैं. आप खेती को समृद्धि
दीजिए. आप वनस्पति को उन्नतिवान बनाइए. हमें यज्ञ की ऋचाएं गाते समय पाप
से बचाने की कृपा कीजिए. ( १० )
व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतैर्यज्ञियः.
दैवीं धियं मनामहे सुमृडीकामभिष्टये वर्चोधां यज्ञवाहस ᳵ सुतीर्था नो ऽ असद्वशे.
ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्षक्रतवस्ते नोवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यः स्वाहा.. (११)
हे यजमानो! अग्नि ब्रह्म व यज्ञ हैं. आप उन के प्रति व्रत का पालन कीजिए.
वनस्पतियां यज्ञ के योग्य हैं. हम बुद्धि की देवी को मानते हैं. हम सुख व
मनोकामना की पूर्ति के लिए उपासना करते हैं. हम यज्ञवाही वाणी धारण करना
चाहते हैं. श्रेष्ठ बुद्धि हमारे वश में रहे. जो देव मन में ( संकाय आदि ) उपजाते
हैं, ( संकल्पादि में ) मन को लगाते हैं, जो देव दक्ष संकल्प वाले हैं, वे देव यज्ञ
में रक्षा करने की कृपा करें. वे देव हमारी रक्षा करने की कृपा करें. उन सभी
देवों के लिए स्वाहा. ( ११ )
श्वात्राः पीता भवत यूयमापो अस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः.
ता ऽ अस्मभ्यमयक्ष्मा ऽ अनमीवा ऽ अनागसः स्वदन्तु देवीरमृता ऽ ऋतावृधः.. (१२)
हे देव! आप जल रूप हैं. हम आप का सेवन करते हैं. आप हमारे पेट के भीतर
( पुष्टिकारक हो कर ) सुख दीजिए. हमारे लिए जल क्षयरोगकारी न हों. जल हमारी
सामान्य ( रोजमर्रा की ) दिक्कतों ( बाधाओं ) को दूर करने वाले, दिव्य, अमृत
स्वरूप एवं स्वादिष्ट हो. यज्ञ में ऋत ( सत्य ) की बढ़ोत्तरी करने वाले हों. ( १२ )
५८ - यजुर्वेद