बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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३७. निम्न मंगल की ओर जाती हुई रेखाएं—क्रोध में आत्महत्या ।
३८. मंगल पर्वत की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रेम के कारण युवावस्था में
बदनामी ।
३६. शुक्र पर्वत की ओर अंदर की ओर जाती हुई रेखाएं—प्रेम-भंग ।
४०. जीवन रेखा को कई स्थानों पर काटती हुई रेखाएं—पारिवारिक जीवन
में पूर्ण असफलता ।
४१. जीवन रेखा को काटकर भाग्य रेखा तक जाने वाली रेखा—व्यापार में
पूर्ण असफलता ।
४२. जीवन रेखा को काटकर मस्तिष्क रेखा की ओर जाती हुई रेखा—
पागलपन ।
४३. जीवन रेखा को काटकर हृदय रेखा की ओर जाती हुई रेखा—हृदयरोग
से पीड़ित ।
४४. जीवन रेखा तथा हृदय रेखा को काटती हुई रेखा—प्रेम कार्यों में
असफलता ।
४५. हृदय रेखा की ओर जाने वाली रेखा के अन्त में द्वीप—दुखपूर्ण वैवाहिक
जीवन ।
४६. जीवन रेखा और सूर्य रेखा को काटती हुई रेखा—सामाजिक पतन ।
४७. शुक्र पर्वत तथा जीवन रेखा पर नक्षत्र का चिह्न—घरेलू झगड़े ।
४८. सूर्य रेखा तथा जीवन रेखा पर नक्षत्र—दुखमय घरेलू जीवन ।
४६. मस्तिष्क हृदय रेखा तथा जीवन रेखा पर चिह्न—रोगपूर्ण जीवन ।
५०. भाग्य रेखा तथा जीवन रेखा पर त्रिकोण—आर्थिक हानि ।
५१. सूर्य रेखा तथा जीवन रेखा पर त्रिकोण—अपराधपूर्ण जीवन ।
मस्तिष्क रेखा
जीवन और मस्तिष्क का आपस में गहरा सम्बन्ध है क्योंकि बिना बुद्धि के या
मस्तिष्क के जीवन व्यर्थ-सा हो जाता है। जीवन में यश, मान, प्रतिष्ठा आदि बुद्धि के
द्वारा ही प्राप्त होती है अतः जीवन रेखा का जितना महत्त्व हथेली में है, लगभग
उतना ही महत्त्व मस्तिष्क रेखा का भी है ।
विद्वानों के अनुसार हथेली में मस्तिष्क रेखा का पुष्ट सुदृढ़ एवं स्पष्ट
होना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि यदि मस्तिष्क रेखा जरा-सी भी विकृत होती है तो
उसका पूरा जीवन लगभग बरबाद-सा हो जाता है ।
मस्तिष्क रेखा का कोई एक उद्गम नहीं है । यह अलग-अलग स्थानों से निक-
लती है । प्रधानतः इनका उद्गम निम्न प्रकार से देखा गया है :
१. जीवन की रेखा के उद्गम स्थान से निकल कर यह जीवन रेखा को ही
काटती हुई हथेली के दूसरे छोर पर पहुंच जाती है ।
२. जीवन रेखा के उद्गम स्थान के पास से निकल कर हथेली के मध्य में
समाप्त हो जाती है ।
३. जीवन रेखा के बराबर चलती हुई काफी आगे चलकर यह अपना रास्ता
बदल लेती है ।
४. जीवन रेखा के पास से चलकर हथेली को दो भागों में बांटती हुई दूसरे
छोर पर पहुंच जाती है ।
५. मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा आपस में मिलती हुई-सी चलती है इस
प्रकार ये पांच उद्गम स्थान देखे जा सकते हैं । परन्तु इसके अलावा भी मस्तिष्क रेखा
के अन्य उद्गम स्थान होते हैं ।
जिस व्यक्ति के हाथ में मस्तिष्क रेखा पहले प्रकार के अनुसार दिखाई देती है
वह अनुकूल नहीं मानी जाती । क्योंकि ऐसी रेखा जीवन रेखा को काट कर चलती है
और इस प्रकार का चिह्न मानव जीवन में दुर्घटना का संकेत देता है । ऐसा व्यक्ति
जीवन में दुर्बल, कमजोर तथा रुग्ण रहता है । जरा-जरा सी बात पर वह क्रोधित हो
जाता है तथा दूरदर्शी न होने के कारण जीवन में अपना ही अहित कर बैठता है । ऐसे
व्यक्ति के जीवन में मित्रों की संख्या कम ही होती है और समय पड़ने पर मित्र भी
धोखा दे देते हैं ।
( १०८ )
दूसरे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम जिस हथेली में दिखाई देता है ऐसा
व्यक्ति निश्चय ही जीवन में महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करता है । ऐसे व्यक्ति के जीवन के
कार्य और विचार में परस्पर पूर्ण सामंजस्य रहता है, और वह समय पड़ने पर शीघ्र
निर्णय लेने वाला एवं अवसर को भली प्रकार से पहिचानने वाला होता है । ऐसा
व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि वाला होता है तथा बात के मर्म तक शीघ्र ही पहुंचने में सक्षम होता
है । यात्राओं के माध्यम से यह व्यक्ति जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है ।
जिसके हाथ में तीसरे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम होता है ऐसा व्यक्ति
प्रबल आत्मविश्वासी होता है, तथा अपना कार्य निकालने में वह बहुत अधिक चतुर
एवं योग्य होता है । जीवन में आय के स्रोत एक से अधिक होते हैं । यद्यपि कई बार
इनके मन में हीनभावना आ जाती है परन्तु फिर भी यह अपने पुरुषार्थ के माध्यम
से जीवन में सफल हो जाता है ।
चौथे प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम जिन व्यक्तियों के हाथों में होता है
उनके जीवन में कई बार विदेश यात्राओं के योग बनते हैं साथ ही वह विदेश में
व्यापार कर विशेष धन लाभ करता है। ऐसे व्यक्ति भौतिक दृष्टि से पूर्ण सफल होते
देखे गये हैं ।
जिन व्यक्तियों के हाथों में पांचवें प्रकार की मस्तिष्क रेखा का उद्गम होता
है वे व्यक्ति कठोर, निर्दयी एवं भावनाशून्य होते हैं। एक प्रकार से इन व्यक्तियों
के पास हृदय नाम की कोई वस्तु नहीं होती । अधिकतर अपराधियों के हाथ में इस
प्रकार का उद्गम सहज ही देखने को मिल जाता है । यदि इस प्रकार के हाथों में
मात्र मस्तिष्क रेखा ही हो और हृदय रेखा दिखाई न दे या हाथ में मस्तिष्क रेखा
तथा हृदय रेखा परस्पर मिल गई हो या एक दूसरे से लिपट गई हो तो ऐसा व्यक्ति
जीवन में कई हत्याएं करता है तथा भयंकर डाकू बनता है ।
वस्तुतः हस्तरेखा विशेषज्ञ को हाथ देखते समय मस्तिष्क रेखा के उद्गम पर
विशेष विचार करना चाहिए, और उस उद्गम को देखकर उसके अनुसार अपनी
धारणा बनानी चाहिए । क्योंकि मस्तिष्क रेखा का प्रारम्भ कई नए तथ्यों को स्पष्ट
करता है ।
आगे की पंक्तियों में मस्तिष्क रेखा से सम्बन्धित अन्य तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं :
१. यदि मस्तिष्क रेखा से कोई पतली रेखा गुरु पर्वत की ओर जा रही हो,
तो वह व्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने वाला तथा बुद्धिमान होता है ।
२. यदि यह रेखा सीधी, स्पष्ट, और निर्दोष हो तो वह व्यक्ति तुरन्त निर्णय
लेने वाला, क्रियाशील मस्तिष्क का धनी तथा बुद्धिमान व्यक्ति होता है ।
३. यदि मस्तिष्क रेखा तथा जीवन रेखा का उद्गम अलग-अलग हो तो ऐसा
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व्यक्ति स्वच्छन्द प्रकृति का होता है । वह अपने तरीके से काम करता है और किसी
के दबाव में कार्य नहीं करता ।
४. यदि किसी स्त्री के हाथ में मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा का उद्गम
अलग-अलग हो तो वह स्त्री कुलटा होती है ।
५. यदि मस्तिष्क रेखा से कोई शाखा निकल कर गुरु पर्वत के अन्त तक पहुंच
जाती है तो वह व्यक्ति देश का श्रेष्ठ साहित्यकार अथवा कलाकार होता है । वह
अपना जीवन शालीनता से व्यतीत करने में समर्थ होता है ।
६. यदि मस्तिष्क रेखा हथेली के बीच में जाकर नीचे की ओर झुक जाती
है तो ऐसा व्यक्ति धन के प्रति बहुत अधिक मोह रखने वाला होता है । उसकी
इच्छाएं ऐश्वर्य में जीवन व्यतीत करने की होती हैं । परन्तु परिस्थितियों के कारण वह
अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाता ।
७. यदि मस्तिष्क रेखा बढ़कर हृदय रेखा को छू ले तो वह व्यक्ति अपनी पत्नी
के अलावा अन्य कई स्त्रियों से सम्बन्ध रखने वाला होता है । परन्तु जीवन में इस क्षेत्र
में उसे बदनामी भी मिलती है ।
८. यदि मस्तिष्क रेखा हृदय रेखा से लिपटती हुई-सी आगे बढ़ती है तो ऐसा
व्यक्ति क्रोध में अपनी पत्नी या प्रेमिका की हत्या कर देता है ।
९. मस्तिष्क रेखा का झुकाव जिस पर्वत की ओर विशेष होता है उस पर्वत
के गुणों में वृद्धि हो जाती है उदाहरणार्थ यदि इसका झुकाव गुरु पर्वत की ओर
होता है तो वह व्यक्ति श्रेष्ठ साहित्यकार या तत्त्वज्ञानी होता है ।
१०. यदि मस्तिष्क रेखा शनि पर्वत की ओर जा रही हो तो ऐसा व्यक्ति
दार्शनिक अथवा चिन्तक होता है ।
११. यदि यह रेखा सूर्य पर्वत की ओर झुकती हुई दिखाई दे तो वह व्यक्ति
अत्यन्त उच्च पद प्राप्त करता है ।
१२. यदि मस्तिष्क रेखा का झुकाव बुद्ध पर्वत की ओर प्रतीत हो तो ऐसा
व्यक्ति एक सफल व्यापारी होता है, तथा व्यापार के माध्यम से वह अतुलनीय धन
प्राप्त करता है ।
१३. यदि मस्तिष्क रेखा लहराती हुई आगे बढ़ती हो तो ऐसे व्यक्ति का
चित्त अस्थिर होता है, तथा उसकी कथनी और करनी में समानता एवं एकरूपता नहीं
रह पाती ।
१४. यदि मस्तिष्क रेखा आगे चलकर चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई
दे तो निश्चय ही वह व्यक्ति कवि होता है और जीवन में कई बार जलयात्रा
करता है ।
( ११० )
१५. मस्तिष्क रेखा जहां समाप्त होती है उस स्थान पर क्रॉस का चिह्न हो
तो वह व्यक्ति निश्चय ही वृद्धावस्था में पागल हो जाता है।
१६. यदि मस्तिष्क रेखा चन्द्र पर्वत के ऊपर से होती हुई मणिबन्ध तक पहुंच
जाती है तो ऐसा व्यक्ति जीवन-भर दुखी, दरिद्री और निकम्मा रहता है।
१७. यदि यह रेखा मणिबन्ध तक पहुंच कर रुक जाती है और इसके आगे
क्रॉस का चिह्न होता है तो वह व्यक्ति निश्चय ही आत्महत्या करता है।
१८. यदि मस्तिष्क रेखा के अन्तिम छोर पर दो भाग हो जाते हैं तो वह
व्यक्ति कई प्रयत्नों से धन-संग्रह करने में लगा रहता है। जीवन में ऐसे व्यक्ति को
धन, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा सहज ही मिल जाते हैं।
१९. यदि मस्तिष्क रेखा मंगल क्षेत्र पर ही समाप्त हो जाय तो ऐसा व्यक्ति
अपने जीवन में असफल ही रहता है।
२०. यदि मस्तिष्क रेखा शनि पर्वत की ओर जाती हो तथा उसके अन्तिम
सिरे पर क्रॉस का चिह्न हो तो वह व्यक्ति आधा पागल कहलाता है, तथा जीवन में
उसको असफलता ही मिलती है।
२१. मस्तिष्क रेखा जिस स्थान पर भी हृदय रेखा को काटती है जीवन की
उस उम्र में व्यक्ति को बहुत बड़ी स्वास्थ्य की हानि होती है।
२२. यदि हाथ में मस्तिष्क रेखा दोहरी हो अर्थात् मस्तिष्क रेखा के साथ
ही साथ उसकी सहायक रेखा भी चल रही हो तो ऐसा व्यक्ति अत्यन्त भाग्यवान
कहलाता है।
२३. यदि दोहरी मस्तिष्क रेखा सीधी, स्पष्ट और सपाट हो तो निश्चय ही
व्यक्ति कूटनीति में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है।
२४. यदि मस्तिष्क रेखा चलते-चलते मार्ग में टूट गई हो तो वह असंतुलित
मस्तिष्क वाला होता है।
२५. यदि मस्तिष्क रेखा गुरु पर्वत के नीचे ही खण्डित हो जाती है तो उस
व्यक्ति को बचपन में भयंकर चोट लगती है। इसी प्रकार यदि यह रेखा शनि पर्वत
के नीचे टूटती है तो २४वें वर्ष में शस्त्र घात का योग बनता है।
२६. यदि मस्तिष्क रेखा सूर्य पर्वत के नीचे भंग हो जाती है, तो उस व्यक्ति
को नौकरी में बहुत बदनामी का सामना करना पड़ता है। यदि ऐसी रेखा बुध पर्वत
के नीचे जाकर टूटती हो तो उसे व्यापार में दिवालिया होना पड़ता है।
२७. यदि मस्तिष्क रेखा जंजीर के समान हो तो उसे जीवन में मस्तिष्क
सम्बन्धी रोग रहते हैं।
२८. यदि गुरु पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा पर किसी प्रकार का कोई द्वीप
हो तो वह व्यक्ति पागल होता है।
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२६. शनि पर्वत के नीचे यदि मस्तिष्क रेखा पर द्वीप का चिह्न दिखाई दे
तो २४वें वर्ष में उसे पागलखाने जाना पड़ता है ।
३०. यदि सूर्य पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा पर किसी प्रकार का कोई द्वीप
दिखाई दे तो वह व्यक्ति जीवन में सभी दृष्टियों से असफल रहता है ।
३१. यदि बुध पर्वत के नीचे इस रेखा पर द्वीप बन जाय तो विस्फोट के
कारण उस व्यक्ति की मृत्यु होती है ।
३२. यदि मस्तिष्क रेखा बीच में से कटी हुई हो तो ऐसे व्यक्ति असंतुलित
दिमाग वाला कहा जायगा ।
३३. यदि मस्तिष्क रेखा के आस-पास छोटी-मोटी बारीक रेखाएं दिखाई दें
तो वह व्यक्ति अस्थिर निर्णय वाला होता है ।
३४. यदि मस्तिष्क रेखा घूम कर शुक्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई दे
तो वह व्यक्ति उन्नति करता है तथा स्त्रियों में अत्यधिक लोकप्रिय होता है ।
३५. यदि मस्तिष्क रेखा पर सफेद बिन्दु दिखाई दे तो वह व्यक्ति जीवन में
पूर्ण सफलता प्राप्त करता है ।
३६. यदि मस्तिष्क रेखा पर काले धब्बे या बिन्दु दिखाई दें तो ऐसा व्यक्ति
विकृत मस्तिष्क वाला होता है ।
३७. यदि इस रेखा पर क्रॉस का चिह्न हो तो उस व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना
से होती है।
३८. यदि इस रेखा पर नक्षत्र का चिह्न दिखाई दे तो उसे जीवन में गहरी
चोट लगती है ।
३६. यदि इस रेखा पर वृत्त का चिह्न हो तो वह व्यक्ति अदूरदर्शी तथा मूर्ख
होता है ।
४०. यदि इस रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तो उसे जीवन में भयंकर हानि
का सामना करना पड़ता है ।
४१. यदि लम्बी उंगलियां हों और मस्तिष्क रेखा भी सीधी तथा स्पष्ट हो
तो वह व्यक्ति सूक्ष्मदर्शी एवं बुद्धिमान होता है ।
४२. यदि छोटी उंगलियां हों पर मस्तिष्क रेखा स्पष्ट हो तो उसके जीवन
में पूर्ण प्रगति नहीं हो पाती ।
४३. यदि सभी पर्वत पुष्ट हों तथा मस्तिष्क रेखा भी सीधी और स्पष्ट हो
तो वह व्यक्ति निश्चय ही अपने प्रयत्नों से जीवन में सफलता प्राप्त करता है ।
४४. यदि हाथ में नोकीली उंगलियां हों तथा मस्तिष्क रेखा सीधी हो तो
वह व्यक्ति विद्वान होता है।
( ११२ )
४५. यदि हृदय रेखा तथा जीवन रेखा के अन्तिम छोर पर त्रिकोण का
चिह्न हो तो यह शुभ माना गया है ।
४६. यदि मस्तिष्क रेखा हथेली के आरपार जाती हुई दिखाई दे तो उस
व्यक्ति की स्मरणशक्ति अत्यन्त तीव्र होती है और वह जीवन में मेधावी कहा
जाता है ।
४७. यदि हृदय रेखा छल्लेदार हो तो उसे सिर के रोग बराबर बने रहते हैं ।
४८. यदि छोटा अंगूठा हो पर साथ में मस्तिष्क रेखा हल्की हो तो वह
व्यक्ति अपनी ही मूर्खता से दिवालिया हो जाता है ।
४९. यदि बुध पर्वत विकसित हो परन्तु मस्तिष्क रेखा कमजोर हो तो उसे
जीवन में बहुत बड़ा विश्वासघात सहन करना पड़ता है ।
५०. यदि चौड़ी हथेली हो तथा सूर्य पर्वत कमजोर हो, परन्तु मस्तिष्क रेखा
स्पष्ट हो तो भी वह व्यक्ति जीवन में सफल नहीं हो पाता ।
५१. पतली हृदय रेखा मानसिक दुर्बलता को स्पष्ट करती है ।
५२. यदि मस्तिष्क रेखा पर छोटे-छोटे कई द्वीप हों तो उस व्यक्ति को
सन्निपात की अवस्था में मरना पड़ता है ।
५३. यदि मस्तिष्क रेखा टेढ़ी-मेढ़ी हो तो, वह व्यक्ति संकुचित विचार-धारा
का होता है ।
५४. यदि हृदय रेखा कमजोर हो और मस्तिष्क रेखा स्पष्ट हो तो उसे जीवन
में क्षयरोग का सामना करना पड़ता है ।
५५. यदि जीवन रेखा ऊपर से उद्गम करती हुई आगे बढ़ती हो, और
साथ में कई छोटी-मोटी रेखाएं हों तो ऐसा व्यक्ति अत्यधिक शक्तिशाली होता है।
५६. यदि इस रेखा के अन्त में चतुर्भुज हो तो वह व्यक्ति विदेश में सफलता
प्राप्त करता है ।
५७. यदि गुरु एवं मंगल पर्वत विकसित हो तथा मस्तिष्क रेखा स्पष्ट हो
तो ऐसे व्यक्ति में असाधारण आत्मविश्वास एवं प्रबल इच्छाशक्ति होती है ।
५८. यदि मस्तिष्क रेखा अंगूठे के पास में से होकर चल रही हो तो उसकी
आयु बहुत कम होती है ।
५९. यदि हृदय रेखा की ओर बढ़ती हुई यह रेखा बीच में कई जगह टूटी
हुई हो तो उसे जीवन में मिर्गी का रोग होता है ।
६०. यदि यह रेखा जीवन रेखा के साथ-साथ आगे बढ़ रही हो तो प्रेम में
विश्वासघात होने के कारण इसकी मृत्यु होती है ।
६१. यदि यह रेखा चन्द्र पर्वत पर जाकर समाप्त होती है तो वह व्यक्ति
प्रसिद्ध तांत्रिक होता है ।
( ११३ )
६२. यदि यह रेखा जालीदार हो तो वह कुबास बनता होता है ।
६३. यदि यह रेखा तिरछापन लिये हुए आगे बढ़ती हो तो ऐसा व्यक्ति जूए
में अपना सब-कुछ बर्बाद कर लेता है।
६४. यदि यह रेखा हथेली के बीच में समाप्त होती है तो वह व्यक्ति पागल
होता है।
६५. यदि यह रेखा कुछ दूर चलकर वापिस मुड़ जाती हो तो ऐसे व्यक्ति
का प्रेम में दुखद अन्त होता है ।
६६. यदि यह भाग्य रेखा के आस-पास जाकर समाप्त होती है तो वह व्यक्ति
२५ साल के पहले-पहले मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।
६७. यदि इसका अन्त बुध पर्वत की ओर हो तो वह व्यवस्थित कार्य करने
वाला व्यक्ति होता है । यदि इसका अन्त मंगल पर्वत पर हो तो उसे दिमागी परेशानी
रहती है ।
६८. यदि यह रेखा छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी हुई हो तो वह व्यक्ति अत्यधिक
घमण्डी होता है ।
६६. यदि यह सूर्य क्षेत्र के नीचे टूट जाती है तो हिंसक पशु के आघात से
उसकी मृत्यु होती है ।
७०. यदि मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा मिलकर न्यून कोण बनाते हों तो
वह व्यक्ति राज्य सेवा में अत्यन्त उच्चपद पर पहुंचता है ।
७१. यदि यह जीवन रेखा से मिलकर हृदय रेखा की ओर जा रही हो तो
वह व्यक्ति अंधा होता है ।
७२. यदि मस्तिष्क रेखा और स्वास्थ्य रेखा दोनों के अन्तिम सिरे पर क्रॉस
का चिह्न हो तो उसे जीवन में मस्तिष्क रोगों से ग्रसित होना पड़ता है ।
७३. यदि मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा दोनों टूटी हुई हों तो उसे गृहस्थ-
जीवन का सुख नहीं मिलता ।
७४. यदि स्वास्थ्य रेखा और मस्तिष्क रेखा दोनों ही लहरदार हों तो उस
व्यक्ति का स्वास्थ्य अत्यन्त कमजोर होता है ।
७५. यदि हथेली के मध्य में यह हृदय रेखा से मिलती है तो उसके जीवन
में शस्त्र भय बना रहता है ।
७६. यदि कोई अन्य रेखा मस्तिष्क रेखा को काट दे तो उसका मस्तिष्क
कमजोर होता है ।
∙ ७७. यदि मस्तिष्क रेखा टूटी हुई हो तथा इसके साथ अन्य रेखाएं भी हों
वह व्यक्ति जीवन में पागल होता है ।
( ११४ )
७८. यदि कोई रेखा शुक्र पर्वत से निकलकर मस्तिष्क रेखा को काटती हो
तो उसका गृहस्थ-जीवन बरबाद हो जाता है ।
७६. यदि मस्तिष्क रेखा से कोई शाखा निकलकर शुक्र पर्वत की ओर जाती
हो तो उसका प्रेम जीवन-भर गुप्त बना रहता है ।
८०. यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर गुरु पर्वत की ओर
जाती हो तो वह व्यक्ति किराने का व्यापारी होता है ।
८१. यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर शनि पर्वत की ओर
जाती हो तो वह जीवन में उच्चकोटि का धार्मिक व्यक्ति होता है ।
८२. यदि इस रेखा से निकल कर कोई सहायक रेखा सूर्य पर्वत की ओर
जाती हो तो उसे आकस्मिक धन-लाभ होता है ।
८३. यदि इस रेखा से कोई सहायक रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो तो
निश्चय ही वह लाखों का स्वामी होता है ।
८४. यदि इस रेखा के अन्त में रेखाओं का गुच्छा-सा हो तो वह व्यक्ति
कुटिल झूठा एवं चालाक होता है ।
८५. यदि शनि पर्वत के नीचे इस रेखा पर सफेद धब्बे हों तो उसे जीवन में
आर्थिक सफलता मिलती है ।
८६. यदि सूर्य पर्वत के नीचे इस रेखा पर सफेद धब्बे हों तो उसे राष्ट्र-
व्यापी सम्मान मिलता है ।
८७. यदि बुध पर्वत के नीचे इस रेखा पर सफेद धब्बे हों तो वह व्यक्ति
करोड़पति होता है ।
८८. यदि मंगल पर्वत बलवान हो और इस रेखा के अन्त में त्रिकोण बना
हुआ हो तो वह अपने जीवन में किसी न किसी की हत्या अवश्य करता है ।
८६. यदि इस रेखा पर कहीं पर भी लाल धब्बा हो तो सिर पर चोट लगने
से उस व्यक्ति की मृत्यु होती है ।
६०. यदि इस रेखा पर कहीं पर भी नीला धब्बा होता है तो वह जीवन में
अपराधी मनोवृत्ति का होता है ।
यदि यह रेखा तर्जनी के मूल तक पहुंच जाए तो वह जीवन में असफल व्यक्ति
होता है ।
६१. 'यदि यह रेखा मध्यमा उंगली पर चढ़ जाय तो उस व्यक्ति की डूबने
से मृत्यु होती है ।
( ११५ )
६३. यदि यह रेखा अनामिका के मूल तक पहुंच जाए तो ऐसा व्यक्ति प्रसिद्ध
तांत्रिक होता है।
६४. यदि यह रेखा कनिष्ठिका उंगली पर चढ़ जाय तो उसकी सन्निपात
की अवस्था में मृत्यु होती है।
६५. यदि यह रेखा सभी दृष्टियों से दोष मुक्त हो तो उसका चुम्बकीय
व्यक्तित्व होता है।
वस्तुतः मस्तिष्क रेखा का हथेली में बहुत बड़ा महत्त्व होता है और यदि इस
रेखा का सम्यक् अध्ययन न किया जाए तो सही भविष्यफल स्पष्ट करना कठिन हो
जाता है। इसलिये हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह मस्तिष्क रेखा का भली-भांति
अध्ययन कर अपनी धारणा को पुष्ट बनाकर भविष्य कथन करे जिससे वह अपने
जीवन में यशस्वी हो सके।
हृदय रेखा
हथेली में जीवन रेखा, और मस्तिष्क रेखा का जितना महत्त्व है लगभग उतना
ही महत्त्व हृदय रेखा का भी है । इसलिये विद्वानों को चाहिए कि वह हृदय रेखा के
बारे में सावधानी के साथ अध्ययन करें ।
जिस व्यक्ति के हाथ में हृदय रेखा शुद्ध, स्पष्ट, निर्दोष और ललायी लिये हुए
होती है, वह व्यक्ति वास्तव में ही अपने जीवन में सफल होता है, और उसे समाज से
पूरा यश तथा सम्मान मिलता है। ऐसे व्यक्ति सामाजिक उत्तरदायित्व को अनुभव
करते हैं और अपने जीवन में मानवोचित गुण सामने रखकर आगे बढ़ते हैं ।
यदि यह रेखा अस्पष्ट कमजोर टूटी हुई या कटी-छटी होती है तो वह व्यक्ति
कितना ही दृढ़ एवं धनवान क्यों न हो उसे सही रूप में मानव नहीं कहा जा सकता
क्योंकि ऐसा व्यक्ति हृदय से स्वार्थी, पापी तथा कलुषित होगा। ऐसे व्यक्ति का सहज
ही विश्वास नहीं करना चाहिए ।
हृदय रेखा मनुष्य की हथेली में कनिष्ठिका उंगली के नीचे बुध पर्वत के नीचे
से निकलकर सूर्य तथा शनि क्षेत्र को पार करती हुई गुरु पर्वत तक जाती है, परन्तु
सभी हाथों में ऐसा नहीं होता । सामान्यतः इस रेखा की पांच स्थितियां पायी जाती
हैं जो कि निम्नलिखित हैं :
१. पहले प्रकार की हृदय रेखा वह होती है जो बुध पर्वत के नीचे से प्रारम्भ
होकर सूर्य और शनि पर्वत के नीचे चलती हुई गुरु पर्वत पर जाकर समाप्त होती है।
२. कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से प्रारम्भ होकर सूर्य
शनि तथा गुरु पर्वत के नीचे-नीचे चलती हुई हथेली के उस पार तक जा पहुंचती है।
३. कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से निकलकर सूर्य
पर्वत के नीचे ही समाप्त हो जाती है ।
४. कुछ हाथों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से निकल कर शनि पर्वत के
नीचे समाप्त हो जाती है।
५. कुछ व्यक्तियों की हथेलियों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से निकल कर
तर्जनी और मध्यमा के बीच में जाकर समाप्त होती है ।
उपर्युक्त पांचों ही प्रकार की स्थितियों का अध्ययन करने से उनका फलादेश में
अन्तर आता है । इस रेखा से मानव का हृदय उसकी इच्छाएं, उसका व्यवहार,
( ११७ )
उसकी भावनाएं, उसकी मानसिक क्रियाएं तथा आन्तरिक गोपनीय तथ्यों का पता
लगता है। अब मैं प्रत्येक प्रकार की स्थिति का संक्षेप में वर्णन कर रहा हूं :
पहला प्रकार :
इस प्रकार की हृदय रेखा जिसकी हथेली में होती है वह सर्वश्रेष्ठ रेखा
कहलाती है। सही रूप में देखा जाय तो यह रेखा अपनी अन्तिम अवस्था में शनि
और गुरु पर्वत को विभक्त कर लेती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों की भलाई करने वाले
निष्पक्ष, स्वतंत्र विचार-धारा रखने वाले तथा प्रेम के क्षेत्र में धैर्य से काम लेने वाले
होते हैं। इनके जीवन में न तो उच्छृंखलता होती है, और न अधूरापन ही स्पष्ट
होता है। ऐसे व्यक्ति अपने वचनों की सामर्थ्य समझते हैं और जीवन में जो भी बात
कह देते हैं उसे पूरी तरह से निभाने की क्षमता रखते हैं।
ऐसा व्यक्ति हल्के स्तर का नहीं होता तथा अपनी पत्नी को भी सबसे अधिक
महत्त्व देता है। यद्यपि यह बात सही है कि इसके जीवन में प्रेमिकाएं होती हैं। परन्तु
उन्हें यह जरूरत से ज्यादा महत्त्व नहीं देते। ऐसा व्यक्ति धार्मिक सात्विक तथा
ईमानदार होता है। न तो यह धोखा खाता है और न किसी को धोखा देने का प्रयत्न
करता है। इसका हृदय दयालु होता है तथा इसके जीवन को 'आदर्श जीवन' कहा जा
सकता है। ऐसे व्यक्ति अपने प्रयत्नों से जीवन में यश, मान, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त
करते हैं।
दूसरा प्रकार :
इसमें हृदय रेखा का उद्गम बुध पर्वत के नीचे से ही होता है। परन्तु इसका
अन्त तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच में न होकर गुरु पर्वत के नीचे चलकर हथेली
के पास जाकर होता है। ऐसी रेखा बहुत ही कम लोगों के हाथों में दिखाई देती है
परन्तु जिन व्यक्तियों के हाथों में ऐसी रेखा होती है वे व्यक्ति जीवन में जरूरत से
ज्यादा महत्वाकांक्षी होते हैं और अपने प्रयत्नों से अपने जीवन को सुखमय बनाने में
समर्थ होते हैं।
सही रूप में देखा जाय तो ऐसे व्यक्ति कठोर परिश्रमी होते हैं और इनका
लक्ष्य हमेशा इनके सामने रहता है। जब तक ये अपने लक्ष्य को भली प्रकार से प्राप्त
नहीं कर लेते तब तक ये जीवन में विश्राम नहीं लेते ।
इस रेखा के बारे में विचारणीय तथ्य यह है कि जहां यह रेखा समाप्त होती
है उस स्थान का सूक्ष्मता से अध्ययन आवश्यक है। यदि अन्तिम स्थिति में इस रेखा
का झुकाव नीचे की तरफ होता है तो वह व्यक्ति अपने जीवन में अपनी इच्छाओं को
( ११८ )
पूरी नहीं कर पाता। परन्तु अन्तिम अवस्था में यदि यह रेखा ऊपर की ओर उठती हुई
दिखाई दे तो ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में अपने लक्ष्य तक पहुंच जाता है और उसके
सोचे हुए सभी काम पूरे हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में यश, मान, पद,
प्रतिष्ठा की दृष्टि से पूर्ण सौभाग्यशाली कहा जाता है।
तीसरा प्रकार :
इस प्रकार की रेखा बुध पर्वत के नीचे से लेकर सूर्य पर्वत के नीचे ही समाप्त
हो जाती है। ऐसा व्यक्ति अदूरदर्शी तथा कुण्ठाग्रस्त होता है। इसका हृदय कमजोर
होता है। छोटी-छोटी बातों पर झुंझला जाता है, तथा इसका स्वभाव चिड़चिड़ा होता
है। सही रूप में देखा जाय तो ऐसे व्यक्ति दयाहीन होते हैं। ये व्यक्ति दुःखी मनुष्यों
की सहायता नहीं करते अपितु उनकी निन्दा करने में ही अपना सौभाग्य मानते हैं।
ऐसे व्यक्ति सामान्य दृष्टि से सफल नहीं कहे जा सकते।
वृद्धावस्था में ऐसा व्यक्ति हृदय रोग से पीड़ित रहता है। तथा ऐसे व्यक्तियों
की मृत्यु हार्ट-अटैक से ही होती है।
चौथा प्रकार :
कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से निकलकर शनि पर्वत
के नीचे जाकर समाप्त हो जाती है। ऐसे व्यक्ति कई स्त्रियों से प्रेम करते हैं और
लगभग सभी को धोखा देते हैं। इनके जीवन में छल, कपट आदि बराबर बना रहता
है। सही शब्दों में कहा जाय तो ऐसे लोगों पर पूरी तरह से विश्वास नहीं किया जा
सकता।
इनका प्रेम सात्त्विक प्रेम न होकर वासना-पूर्ति का एक साधन होता है।
इनके मन में बराबर स्वार्थ बना हुआ होता है, तथा लोगों को धोखा देने में ये कुशल
होते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रदर्शन तथा आडम्बर को ज्यादा महत्त्व देते हैं। झूठा प्रचार
नकली शान-शौकत तथा व्यर्थ का दिखावा करने में यह विश्वास रखते हैं। एक बार
तो लोग इनका विश्वास कर लेते हैं, परन्तु बाद में इनसे वे लोग घृणा करते हैं। अपना
काम निकल जाने के बाद ये उसकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखते । समाज में इन
लोगों को किसी प्रकार का आदर या सम्मान नहीं मिलता।
ऐसे व्यक्ति निर्दयी, डाकू तथा अत्याचारी भी हो सकते हैं।
पांचवां प्रकार :
जिनके हाथों में इस प्रकार की हृदय रेखा दिखाई देती है वे व्यक्ति एक प्रकार
से आत्म केन्द्रित से ही होते हैं, और जीवन में लगभग अपने आप में ही खोये रहते हैं।
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यद्यपि ऐसे व्यक्ति जरूरत से ज्यादा परिश्रमी तथा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले
होते हैं। परन्तु कई बार के प्रयत्नों के बाद ही इनको सामान्यतः सफलता नहीं मिल
पाती। जीवन के मध्य काल तक आते-आते ये व्यक्ति ऊब से जाते हैं।
यद्यपि इन व्यक्तियों के पास उर्वर मस्तिष्क होता है, तथा योजना बद्ध तरीके
से कार्य भी प्रारम्भ करते हैं। परन्तु जितने उत्साह से ये कार्य प्रारम्भ करते हैं उस
कार्य के मध्य में आते-आते उनका जोश या उत्साह ठंडा पड़ जाता है। ऐसे व्यक्ति
जीवन में असफल होने पर चिड़चिड़े हो जाते हैं तथा इनकी प्रकृति संशयालू हो जाती
है। इनके सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आता है उन सब पर शक करना इनका स्वभाव
हो जाता है। धीरे-धीरे यह व्यक्ति अपने मित्रों तथा परिचितों से कट जाते हैं तथा
इनमें निराशा की भावना जरूरत से ज्यादा व्याप्त हो जाती है। एक प्रकार से ये
आगे चलकर अपने आपको बेसहारा और पराश्रय-सा अनुभव करते हैं।
अब मैं आगे के पृष्ठों में हृदय रेखा से सम्बन्धित उन तथ्यों को स्पष्ट कर
रहा हूं, जिसके माध्यम से इससे सम्बन्धित फला-फल ज्ञात किया जा सकता है :
१. हृदय रेखा जिस पर्वत के नीचे तक पहुंचती है, उस पर्वत में उससे
सम्बन्धित विशेष गुण स्वतः ही आ जायेंगे उदाहरणार्थ यदि हृदय रेखा अनामिका
के मूल में स्थित सूर्य पर्वत के नीचे जाकर समाप्त होती है तो सूर्य से सम्बन्धित विशेष
गुण प्रसिद्धि, कीर्ति, सम्मान आदि में स्वतः ही वृद्धि का योग बन जायगा।
२. यदि हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा की ओर झुके तो जिस जगह वह मुड़ती
है मस्तिष्क रेखा के उस बिन्दु के समान आयु में मस्तिष्क का पूर्ण विकास होता है।
३. यदि यह रेखा आगे चलकर मस्तिष्क रेखा से पूर्णतः मिल जाती है, तो वह
अपने दिमाग में कुछ नहीं सोचता अपितु दूसरों के कहने के अनुसार कार्य करता है,
और उसके आदेश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर लेता है।
४. यदि हृदय रेखा आगे बढ़कर मस्तिष्क रेखा को काट लेती है, तो दिमाग
अस्त-व्यस्त हो जाता है तथा उस व्यक्ति में निर्णय लेने की पूर्ण क्षमता नहीं होती।
५. यदि हृदय रेखा पर आकर कोई अन्य पतली रेखा मिले तो जिस पर्वत की
तरफ से वह पतली रेखा आती है, उस पर्वत के गुणों का उसके हृदय पर विशेष
प्रभाव रहता है।
६. यदि हृदय रेखा से पतली-पतली छोटी-छोटी रेखाएं मस्तिष्क रेखा की
ओर बढ़ती हों तो ऐसा व्यक्ति जीवन-भर मानसिक चिन्ताओं से परेशान रहता है।
७. यदि हृदय रेखा कई जगह टूट-फूट जाती है तो वह व्यक्ति हृदय रेखा का
धिकार होता है।
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८. यदि किसी की हथेली में हृदय रेखा पर द्वीप का चिह्न दिखाई दे तो वह
व्यक्ति समाज में विशेष सम्मान प्राप्त नहीं कर पाता तथा उसका सामाजिक स्वरूप
एक तरह से खण्डित हो जाता है ।
९. हृदय रेखा जितनी अधिक लम्बी होती है और बृहस्पति पर्वत से जितनी
ही अधिक दूर होती है उतनी ही ज्यादा श्रेष्ठ कही जाती है ।
१०. यदि हृदय रेखा चलती-चलती मार्ग में कहीं टूट जाती है और फिर
आगे चलकर प्रारम्भ हो जाती है, तो जीवन के उस भाग में वह व्यक्ति मृत्यु-तुल्य कष्ट
उठाता है ।
११. यदि हृदय रेखा लम्बी स्पष्ट तथा सुन्दर होती है तो उस व्यक्ति को
प्रत्येक प्राणी से भरपूर प्यार तथा स्नेह मिलता है ।
१२. यदि हृदय रेखा हथेली के पास पहुंच जाती है तो वह व्यक्ति किसी के
भी प्रति अन्ध श्रद्धा का शिकार होता है ।
१३. यदि हृदय रेखा कई जगह से कटी हुई हो तो उस व्यक्ति के जीवन में
निराशा की भावना बराबर बनी रहती है ।
१४. यदि हथेली में दूसरी हृदय रेखा हो तो वह व्यक्ति जीवन में ऊंचे स्तर
पर प्रेम करता है परन्तु उसे जीवन में निराशा हाथ लगती है ।
१५. यदि हृदय रेखा के अन्त में तारे का चिह्न बना हुआ हो तो उस व्यक्ति
की मृत्यु आकस्मिक दुर्घटना से होती है ।
१६. यदि हृदय रेखा वृहस्पति पर्वत को घेर कर चलती हो तो उस व्यक्ति
में नफरत की भावना जरूरत से ज्यादा होती है ।
१७. यदि हृदय रेखा पर नक्षत्र का चिह्न दिखाई देता है तो वह व्यक्ति
आजीवन रोगी बना रहता है ।
१८. यदि हृदय रेखा के अन्तिम सिरे दो भागों में बंट जाते हैं तो ऐसा
व्यक्ति सफल न्यायाधीश सहृदय सामाजिक तथा सद्गुणों से सम्पन्न होता है ।
१९. यदि यह रेखा शनि पर्वत पर समाप्त हो जाती है तो वह व्यक्ति जरूरत
से ज्यादा कामी होता है ।
२०. यदि यह सूर्य पर्वत पर समाप्त हो जाती है तो ऐसा व्यक्ति बार-बार
धोखा खाता है ।
२१. यदि यह रेखा गुरु पर्वत के नीचे जाकर त्रिशूल की तरह बन जाती है,
तो उसका यौवन काल पागलखाने में ही व्यतीत होता है ।
२२. यदि शनि पर्वत के नीचे हृदय रेखा तथा मस्तिष्क रेखा पर क्रॉस का
चिह्न हो तो उस व्यक्ति की बहुत छोटी उम्र में मृत्यु हो जाती है ।
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२३. हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा से जितनी ही ज्यादा लम्बी, स्पष्ट और
लालिमा लिये हुए होती है उतनी ही ज्यादा श्रेष्ठ कही जाती है । ऐसा व्यक्ति विश्व-
स्तरीय सम्मान प्राप्त करता है ।
२४. दोहरी हृदय रेखा अत्यन्त उच्च पद प्राप्ति में सहायक होती है ।
२५. यदि मंगल पर्वत उभरा हुआ हो और हृदय रेखा स्पष्ट हो तो वह
व्यक्ति जीवन में जोखिम पूर्ण कार्य करता है ।
२६. यदि वर्गाकार उंगलियां हों और हृदय रेखा आगे चलकर मस्तिष्क
रेखा की ओर झुकती हो तो ऐसा व्यक्ति निम्नस्तर का होता है ।
२७. अत्यन्त छोटी हृदय रेखा व्यक्ति के दुर्भाग्य को सूचित करती है ।
२८. यदि हृदय रेखा जरूरत से ज्यादा लाल हो तो वह व्यक्ति हिंसक
होता है ।
२९. यदि यह रेखा पीलापन लिये हुए होती है तो उसे हृदय के रोग बराबर
बने रहते हैं ।
३०. यदि हृदय रेखा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हो तो स्वास्थ्य के मामले में
वह जीवन-भर बराबर कमजोर बना रहता है ।
३१. यदि यह रेखा बहुत अधिक पतली और लम्बी हो तो वह व्यक्ति
निस्संदेह हत्यारा होता है ।
३२. यदि हृदय रेखा हथेली के अन्तिम सिरे पर पहुंचती है, परन्तु अपने
आप में बहुत ही कमजोर होती है तो उस व्यक्ति के सन्तान नहीं होती ।
३३. यदि हृदय रेखा जंजीर के समान हो तो ऐसे व्यक्तियों का विश्वास
नहीं किया जा सकता । झूठ बोलने में ये व्यक्ति चतुर होते हैं ।
३४. यदि यह रेखा जंजीरदार हो और शनि पर्वत के नीचे जाकर समाप्त
होती हो तो उसे विपरीत सैक्स के प्रति घृणा रहती है ।
३५. यदि किसी स्त्री के हाथ में शनि पर्वत पर जाकर हृदय रेखा जंजीर
के समान बन गई हो तो वह स्त्री कुलटा होती है ।
३६. यदि यह रेखा सूर्य पर्वत के नीचे छिन्न-भिन्न हो जाती है, तो वह
व्यक्ति कमजोर होता है ।
३७. बुध पर्वत के नीचे यदि यह रेखा टूट-फूट जाती है तो उसका वैवाहिक
जीवन दुखमय होता है ।
३८. यदि हृदय रेखा से कोई शाखा निकल कर मंगल पर्वत की ओर जाती
है तो ऐसा व्यक्ति कठोर हृदय का तथा निर्दयी स्वभाव का होता है ।
३९. हृदय रेखा पर काले बिन्दु उसके विवाह में बाधा कारक माने गये हैं ।
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४०. यदि हृदय रेखा पर सफेद बिन्दु हों तो उसका वैवाहिक जीवन आदर्श
कहा जाता है ।
४१. यदि हृदय रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तो उसे विश्व व्यापी कीर्ति
मिलती है ।
४२. यदि हृदय रेखा गुरु पर्वत पर जाकर मंगल पर्वत की ओर मुड़ जाती
है तो वह व्यक्ति मूर्ख होता है ।
४३. यदि यह रेखा चतुर्भुज के साथ कहीं पर भी समाप्त होती है तो वह
अस्थिर स्वभाव वाला माना जाता है ।
४४. यदि यह रेखा शनि पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा से मिलती हो तो
उसके जीवन में कई दुर्घटनाएं होती हैं ।
४५. यदि हृदय रेखा बुध पर्वत के नीचे मस्तिष्क रेखा से मिलती हो तो उस
व्यक्ति की यौवन काल में ही मृत्यु हो जाती है ।
४६. यदि यह रेखा नीचे झुक कर चन्द्र पर्वत की ओर जा रही हो, या चन्द्र
पर्वत से कोई रेखा निकलकर इससे मिलती हो तो उसे जीवन में अप्रत्याशित
सफलता प्राप्त होती है ।
४७. यदि कुछ तिरछी रेखाएं हृदय रेखा को कई जगह से काटती हों तो
उसे जीवन में कई प्रकार के रोग होते हैं ।
४८. यदि हृदय रेखा से निकल कर कोई सहायक रेखा मस्तिष्क रेखा से
जुड़ जाती है तो उसमें प्रेम करने की क्षमता जरूरत से ज्यादा होती है ।
४६. यदि हृदय रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर शनि पर्वत की ओर
जाती है तो उसे प्रेम के क्षेत्र में निराशा मिलती है ।
५०. यदि भाग्य रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर हृदय रेखा को स्पर्श
करती हो तो उसका गृहस्थ-जीवन परेशानी पूर्ण होता है ।
५१. यदि शुक्र पर्वत से कोई सहायक रेखा निकल कर हृदय रेखा से
मिलती हो तो वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भोगी होता है ।
५२. यदि इस रेखा पर बुध पर्वत के नीचे क्रॉस हो तो उसे व्यापार में बार-
बार असफलता का मुंह देखना पड़ता है ।
५३. यदि इस रेखा से कई चतुर्भुज बनते हों तो उसकी प्रतिभा अत्यधिक
होती है, परन्तु अपने मामले में वह असफल रहता है ।
५४. यदि हृदय रेखा गुरु पर्वत के नीचे कई शाखाओं में बंट जाती है, तो
वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है ।
५५. यदि इस रेखा के प्रारम्भ में ही शाखा पुंज हो तो वह व्यक्ति जरूरत
से ज्यादा बोलने वाला होता है ।
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५६. यदि इस रेखा के मध्य में शाखा पुंज हो तो ऐसा व्यक्ति कट्टर एवं
घमण्डी होता है ।
५७ अगर किसी व्यक्ति के हाथ में हृदय रेखा नहीं हो तो वह निर्दयी
होता है ।
५८. यदि हृदय रेखा से किसी प्रकार की कोई सहायक रेखा नहीं निकलती
है तो ऐसे व्यक्ति को सन्तान का सुख नहीं मिलता ।
५९. यदि बिना किसी शाखा के यह रेखा गुरु पर्वत के नीचे समाप्त होती
हो तो ऐसा व्यक्ति जीवन में गरीब बना रहता है ।
६०. यदि रेखा के अन्तिम सिरे पर कोई अलग तरह का निशान हो तो वह
व्यक्ति लकवे का शिकार होता है ।
६१. यदि सूर्य पर्वत के नीचे कोई बिन्दु हो तो ऐसा व्यक्ति भावुक होता है ।
६२. बुध पर्वत के नीचे यदि कोई बिन्दु दिखाई दे तो वह प्रसिद्ध चिकित्सक
होगा ।
६३. यदि रेखा पर वृत्त का चिह्न अनुभव हो तो हृदय रेखा की दृष्टि से
कमजोर होता है ।
६४. यदि हृदय रेखा पर कोई द्वीप दिखाई दे तो उसके जीवन में कई
विश्वासघात होते हैं ।
६५. यदि भाग्य रेखा तथा हृदय रेखा दोनों का द्वीप के चिह्न दिखाई दें तो
वह व्यक्ति व्यभिचारी होता है ।
६६. हृदय रेखा पर कोई चोट का चिह्न प्रतीत हो तो उसे जीवन में असफल
प्रेम का सामना करना पड़ता है ।
६७. हृदय रेखा जितनी ही ज्यादा स्पष्ट सुन्दर और लालिमा लिये हुए होगी
वह व्यक्ति जीवन में उतनी ही ज्यादा सफलताएं एवं श्रेष्ठता प्राप्त करता है ।
वस्तुतः हृदय रेखा का मानव जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है और हस्तरेखा
विशेषज्ञ के लिए यह आवश्यक है कि वह इस रेखा का सावधानी के साथ अध्ययन
करें ।
सूर्यरेखा
अंग्रेजी में इस रेखा को 'सन लाइन' एवं हिन्दी में यश रेखा भी कहते हैं। प्रत्येक
व्यक्ति की यह सामान्य इच्छा होती है कि वह जीवन में कुछ ऐसा कार्य करे जिससे
समाज में उसके कार्यों की सराहना हो । लोग उसके विचारों को आदर दें और उसकी
मृत्यु के बाद भी उसकी अक्षय कीर्ति बनी रहे। इन सबके अध्ययन के लिए सूर्य रेखा
का सहारा लेना अत्यन्त आवश्यक होता है। यह सूर्य रेखा ही मानव को उसके जीवन
में यश, मान, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, तथा कीर्ति दिलाने में सहायक होती है। यदि किसी
व्यक्ति के हाथ में स्वास्थ्य रेखा, हृदय रेखा और जीवन रेखा चाहे कितनी ही अधिक
पुष्ट हो परन्तु उसके हाथ में सूर्य रेखा कमजोर होती है तो उस व्यक्ति का जीवन
नगण्य-सा होकर रह जाता है। स्पष्ट गहरी और निर्दोष सूर्य रेखा ही मानव को ऊंचा
उठाने में सहायक होती है। हस्त रेखा विशेषज्ञ के लिए इस रेखा का सूक्ष्मता से अध्ययन
अत्यन्त आवश्यक है।
यद्यपि विद्वानों के अनुसार हथेली में केवल सूर्य रेखा को ही महत्त्व नहीं दिया
जाना चाहिए । क्यों कि जब तक हथेली में भाग्य रेखा प्रबल नहीं होती तब तक सूर्य
रेखा का प्रभाव विशेष नही मिलता । अतः सूर्य रेखा का अध्ययन करते समय भाग्य
रेखा पर भी विचार करना चाहिए ।
मेरे अनुभव में ऐसा आया है कि सभी व्यक्तियों के हाथों में सूर्य रेखा नहीं
होती और यह बात भी सही है कि सूर्य रेखा का उद्गम भी अलग-अलग हाथों में
अलग-अलग स्थानों से होता है। इसका प्रभाव इसकी लम्बाई तथा स्पष्टता से ही
अनुभव होती है। इसलिये हाथ देखते समय सूर्य रेखा के उद्गम पर भी विशेष ध्यान
रखना चाहिए ।
यह रेखा सूर्य पर्वत के नीचे होती है। इसकी पहचान यह है कि इस रेखा
का उद्गम चाहे कही से भी हुआ हो, परन्तु इस रेखा की समाप्ति सूर्य पर्वत पर ही होती
है। जो रेखा सूर्य पर्वत तक नहीं पहुंचती वह रेखा सूर्य रेखा नहीं कहला सकती ।
पाठकों के हित के लिए मैं इस रेखा के उद्गम स्थल स्पष्ट कर रहा हूं :
१. कुछ लोगों के हाथो में यह रेखा शुक्र पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक
जाती है ।
२. कुछ हथेलियों में यह रेखा जीवन रेखा के समाप्ति के स्थान से प्रारम्भ
होकर सूर्य पर्वत तक जाती है ।
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३. इसका उद्गम मंगल पर्वत से भी देखा गया है। यहां से प्रारम्भ होकर
यह रेखा हृदय रेखा को काटती हुई सूर्य पर्वत पर पहुंचती है।
४. कुछ हथेलियों में यह रेखा मस्तिष्क रेखा से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत को
स्पर्श करती है।
५. इसका उद्गम हृदय रेखा से भी होता देखा गया है। यहां से यह सूर्य पर्वत
तक जाती है।
६. कभी-कभी यह रेखा हर्षल क्षेत्र से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक पहुंच
जाती है।
७. कभी-कभी यह रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत की ओर
जाती हुई दिखाई देती है।
८. कुछ हाथों में यह रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत पर मार्ग की
सभी रेखाओं को काटती हुई जा पहुंचती है।
९. हथेली में इस रेखा को केतु पर्वत से प्रारम्भ होकर भी अनामिका के मूल
तक पहुंचते हुए देखा गया है।
१०. कई बार इस रेखा का उद्गम राहू क्षेत्र से भी देखा गया है।
११. कुछ हथेलियों में यह रेखा हथेली के बीच में से प्रारम्भ होकर सूर्य
पर्वत पर पहुंच जाती है।
१२. कुछ हथेलियों में यह रेखा बुध पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक
पहुंचने में सक्षम होती है।
जहां तक मेरी जानकारी है, इस रेखा के उद्गम यहीं हैं। परन्तु इसके अलावा
भी इस रेखा के उद्गम हो सकते हैं, परन्तु पाठकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि
सूर्य रेखा वही मानी जा सकती है जिसकी समाप्ति सूर्य पर्वत पर होती है।
अब मैं प्रत्येक उद्गम स्थल से प्रारम्भ होने वाली सूर्य रेखा का संक्षेप में
वर्णन स्पष्ट कर रहा हूं :
१. प्रथमा अवस्था : यह रेखा शुक्र पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक
पहुंचती है। ऐसी रेखा अपने आप में अत्यन्त अनुकूल मानी जाती है। ऐसी रेखा
रखने वाला व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होता है। जीवन में पत्नी के अलावा
अन्य कई स्त्रियों से सम्पर्क रहता है और उनसे धन-लाभ करता है अथवा ऐसे
व्यक्ति को ससुराल से विशेष धन प्राप्त होता है। सही शब्दों में कहा जाय तो ऐसे व्यक्ति
का भाग्योदय विवाह के उपरांत ही होता है और अधिकतर ऐसे लोगों के भाग्योदय
प्रेमिका के माध्यम से होते देखे गये हैं। कई बार ऐसे व्यक्ति गोद चले जाते हैं जिससे
उन्हें विशेष धन-प्राप्ति हो जाता है।
२. द्वितीयावस्था : बहुत कम हाथों में ऐसी रेखा देखने को मिलती हैं परन्तु
जिन लोगों के हाथों में ऐसी रेखा होती है वे व्यक्ति उच्च कोटि के कलाकार तथा