विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८५
गर्भाशय का योनि की दीवार में चिपटा मुख
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
गुदा द्वार योनिमुख
ले देखा । मासिकधर्म के बाद गर्भाशय शुद्ध कोमल और
निर्बल रहता है तब विपरीत रति करने से गर्भाशय का मुख टेढ़ा
होकर योनि से चिपट जाता है इसलिये गर्भ नहीं रहता है।
२५
पञ्चम खण्ड: गर्भसंस्कार, श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति एवं पारिवारिक आदर्श
३८६ आनन्द मन्दिर
दाम्पत्य जीवन को दुःखमय बनानेवाली
मनगढ़ंत पुस्तकों से सचेत रहिये
आजकल ऐसी अनेक पुस्तको के बड़े बड़े विज्ञापन देखे
जाते हैं और अनेक पुस्तके भी रोगी स्त्रियां मेरे पास लाईं जिनके
प्रयोगो और हानिकारी आसनों की विधियो से उनके कामान्ध
पतियों ने रतिक्रिया करके स्त्री को जीवन भर के लिये कष्ट
पहुँचाया।
कई स्त्रियां मेरे पास ऐसी पुस्तके लाईं जिनमे लिखी विपरीत
आसनों की विधि से रतिक्रिया करते ही स्त्रियो को कष्ट हो गया।
अनेक स्त्रियां ऐसी आईं जो विपरीत आसन से रतिक्रिया के
के कारण अनेक भयंकर रोगो मे ग्रसित थी उन सब ने मुझ से
कहा कि जबसे अमुक पुस्तक हमारे पति ने मंगाई है तब से इसी
विधि से संभोग करते हैं, जिससे हमे बड़ा कष्ट होता है, बहुत
समझाने पर भी नहीं मानते। अब हमे बहुत तकलीफ होगई है
इससे बड़ा कष्ट होता है तब हमारे पति हमको आपके पास
इलाज के लिये लाये हैं।
पाठक पाठिकाओ ! कैसे दुःख का विषय है कि विषयी
लोगो को इस बात का ध्यान नहीं है कि स्त्री रोगी हो जावेगी
और सुखमय दाम्पत्य जीवन नष्ट हो जायगा। बहुतेरे तो रोगी
स्त्री का भी पीछा नहीं छोड़ते।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८७
गर्भाशय के मुख की सूजन
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार योनिमुख
गर्भाशय के मुख पर सूजन होने से 'गर्भाशय का मुख
रतिक्रिया। के समय वीर्य ग्रहण के लिये खुलता ही नहीं इसलिये
गर्भ भी नहीं रहता है। पढ़िए पृष्ठ ३८८
३८८ आनन्द मन्दिर
विपरीत रति से
सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी हैं
जो विषयी पति स्तम्भन की औषधियां खाकर तथा मनगढ़त
कामशास्त्र कोकशास्त्र तथा अन्य इसी विषय की पुस्तको मे
अज्ञानियो की लिखी स्तम्भन की विधियां तथा औषधियों से
कोस लेते हैं और अपनी प्यारी पत्नियो पर अत्याचार करते हैं
उनकी इस अनियम रति से प्राकृतिक नियम से अधिक समय
तक रतिक्रिया होने से जनेन्द्री के बार बार दबाव पड़ने के कारण
स्त्रियो के गर्भाशय मे सूजन आ जाती है। जैसा कि चित्र पृष्ठ
३८७ मे दिखाया गया है इस प्रकार अधिक वार प्रसंग होते रहने
से वह सूजन बढ़ जाती है।
कुछ दिनो बाद उस स्त्री के गर्भाशय मे संभोग के समय
कष्ट होता है और गर्भाशय को विश्राम न मिलने के कारण वह
सूजन दूर नहीं होती । इस सूजन के कारण मासिक धर्म्म मे भी
खराबी हो जाती है क्योकि मासिक धर्म्म के समय गर्भाशय का
मुख सूजन के कारण भलीभांति नहीं खुलता इसलिये रक्त अच्छी
तरह नही निकलता रुक रुक कर निकलता है। कुछ दिनों मे
वह रक्त इकट्ठा होकर जम जाता है और गांठ पड़ जाती है।
मासिक धर्म्म के समय गर्भाशय का मुख इस प्रकार खुल
जाता है। जैसा कि पृष्ठ ३९० के चित्र मे दिखलाया
गया है। जो अज्ञानी पुरुष मासिक धर्म्म के दिनो मे रतिक्रिया
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३८६
करते हैं उनकी स्त्रियों के गर्भाशय का मुख अधिक दबाव पड़ने
से खुला ही रह जाता है यदि इस गर्भाशय को दो तीन महीने
विश्राम देदिया जावे प्रसंग न किया जावे तो ठीक भी होजाता
है। यदि ऐसी दशा में अनेक बार प्रसंग हुआ तो गर्भाशय का
मुख इसी प्रकार खुला रह जाता है उस स्त्री के मासिकधर्म्म के
समय रक्त अधिक और अधिक दिनों तक जाता रहता है।
इस रोग वाली स्त्री के गर्भ नहीं रहता। इस रोग वाली
अनेक सन्तान हीन स्त्रियां मेरे पास इलाज के लिये आईं उनकी
जबानी मालूम हुआ कि उनके पति देव मासिक धर्म्म की दशा
में भी अपनी कामाग्नि शान्ति करते रहे।
इसी कारण हमारे आयुर्वेद में ऋषियों ने ऋतुमती
स्त्री को पति से अलग रहना लिखा है और ऋतुमती स्त्री को
बड़े आचार विचार से ऋतु समय के दिनों को व्यतीत करना
बतलाया है। ताकि स्त्री के गर्भाशय में किसी तरह की खराबी
न हो।
बतलाया है कि रजस्वला स्त्री प्रथम दिन से तीन दिन
पर्यन्त कुश की शैया पर सोवे और हाथों में या मिट्टी के बरतन
में अथवा पत्तल में सादा भोजन करे और तीन रात्रि पर्यन्त
पति को भी न देखे तदनंतर चौथे दिन शुद्ध स्नान कर उत्तम
वस्त्रों को पहिन तथा आभूषणों को पहिन श्रृंगार कर सुगन्धित
द्रव्यों से देह, वस्त्र सुवासित करके प्रसन्न मुख होकर पति का
दर्शन करे।
३६० आनन्द मन्दिर
गर्भाशय का खुला मुंह
[चित्र में अंकित शब्द:
गर्भाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार]
ऋतुस्नान से १६ रात्रि पर्यन्त गर्भाशय का मुख गर्भधारण
लिये खुला रहता है नियम पूर्वक रतिक्रिया करने से गर्भ
रहता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६१
ऋतुस्नाता स्त्री के पति दर्शन का कारण
पूर्वं पश्येदृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना ।
तादृशं जनयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥
ऋतुस्नाता स्त्री के प्रथम पति का दर्शन करने का कारण
यह है कि ऋतुस्नान के बाद स्त्री जैसे मनुष्य को देखेगी वैसा ही
पुत्र उत्पन्न होगा इसलिये पहिले पति का ही दर्शन करे ।
इस विषय मे आयुर्वेद मे यहां तक बताया गया है कि यदि
पति उस समय न हो तो पति का चित्र देखे और पति का
ध्यान करे ।
देखिए अन्यत्र चित्र मे ऋतुस्नाता स्त्री पति का चित्र देख
रही है। यदि पति उसी नगर में हो कार्य वश घर मे उस समय
न हो, कचेहरी दफ्तर अथवा दूकान पर गया हो कही भी गया
हो तो ऋतुस्नाता एकान्त में उसके आने तक पति का ध्यान करे ।
(देखिये अन्यत्र चित्र मे ऋतुस्नान के बाद पत्नी लेटी हुई
अपने पति के ध्यान में पति के आने की राह देख रही है ) जब
पति बाहर से आजावे तब उसका प्रसन्न मुख से जैसा ऊपर
बतलाया गया है दर्शन करे । देखिये इसी विषय का तीसरा चित्र
जहां पति पत्नी खड़े हुए एक दूसरे को देख रहे हैं, किस प्रकार
स्नेह की दृष्टि से देखते हैं इस चित्र में चित्रकार ने यही भाव
दर्शाया है ।
आज कल के पाश्चात्य शिक्षा के विद्वान इन बातो को ढोंग
३६२ आनन्द मन्दिर
बतलाते हैं । शहरो मे रहने वाली प्रायः पढ़ी लिखी स्त्रियां ऊपर
लिखे नियमो को ढकोसला बतलाती हैं। बड़ी लड़कियां और
अध्यापिकाए इसको बिल्कुल नही मानतीं मासिक धर्म के दिनो
मे भी पाठशाला जाया ही करती हैं ऋतुस्नान के बाद प्रथम पति
के दर्शनों की तो बात ही दूर है इक्केवाले, गाड़ीवाले, कोरी,
चमार सईसो तथा मोटर ड्राइवरो के दर्शन करती हैं ।
वे ऋतुधर्म के दिनो का कुछ भी विचार नही करती । यहां
तक देखा गया है कि शहरो की स्त्रियां भोजन बनाने इत्यादि का
भी कुछ विचार नही करती । धीरे धीरे इस विषय को लोग भूलते
ही जाते है । दो चार नही पचासो ऐसी स्त्रियो से मुझसे इस विषय
मे बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि अगर हम चार दिन
मासिकधर्म के दिनो मे भोजन न बनावे तो घर वालो को रोटी
का बड़ा कष्ट हो ।
शहरो मे जिनके घरो मे रोटी बनाने वाली नौकरानियां हैं
वे नौकरानियो को ऐसी दशा मे भी चार दिन की छुट्टी नही देती
अतएव नौकरानी मासिकधर्म होने पर भी बाबू जी के यहां
रोटी बनाने जाया करती है ।
जब यह दशा है तो सन्तान और सन्तानवाली दोनो
आरोग्य कैसे रह सकते हैं । इस प्रकार के विषयो पर बातचीत
होने पर स्त्रिया प्रायः विलायत की स्त्रियो का उदाहरण देती हैं ।
परन्तु उनके आरोग्यता सम्बन्धी अन्य नियमो का उन्हे पता ही
नहीं है । उनके यहां जिस विषय पर जो नियम हैं उनके विरुद्ध
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६३
वे कदापि नहीं चलतीं । उनके यहां के नियम यहां बतलाये
जावे तो पुस्तक बहुत बढ़ जायगी और विषय भी दूसरा हो
जायगा इस कारण इतना ही बतला देना बहुत है कि जिसके
देश और कुल परम्परा के जो नियम हो उसे उसी नियम पर
चलना चाहिये ।
पाश्चात्य देशो की स्त्रियां अपने रहन सहन, खान पान
आदि का अपने देश काल के अनुसार पूरा विचार रखती हैं ।
उन्हें अपनी आरोग्यता स्वस्थता और सुन्दरता का पूरा ध्यान
रहता है। इसके विपरीत भारतवर्ष की स्त्रियो की दशा बहुत
शोचनीय है । मुझे तो मालूम होता है कि यहाँ का पचानवे
प्रतिशत नारीसमाज आरोग्यता और स्वस्थता की आवश्यकता
ही नहीं समझता है । खान पान रहन सहन के नियमो के सम्बन्ध
मे पुरुष समाज ही बिलकुल बेखबर है फिर भला स्त्रियो का क्या
कहना मानो उनके लिये ईश्वर ने कोई नियम बनाए ही नही है।
हमारे देश की स्त्रियां और पुरुष अपने नियमों पर नही चलते
इसी कारण सैकड़ा पीछे निन्नानवे स्त्रियां और इतने ही पुरुष रोगी
होरहे हैं हमारे देश के बालको की भी रोगी संख्या अधिक है ।
विपरीत आसन से गर्भाशय भ्रंश
स्त्री निर्बल हो अथवा विपरीत और अनियम रतिक्रिया से
गर्भाशय निर्बल पड़गया हों तो उस निर्बलता की दशा मे विपरीत
रति से स्त्री का गर्भाशय बाहर निकल आता है। कुछ दिनो तक
३६४ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय का बाहर निकल आना
गर्भाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार
अनियम आहार विहार और विपरीत आसनों से रतिक्रिया
करने से निर्बल स्त्री का गर्भाशय प्रायः बाहर निकलने लगता है,
वह अपनी जगह से हट जाता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६५
तो मालूम नहीं होता। योनि में कुछ भारीपन या आलस्य सा मालूम
होता है। ऐसी हालत में भी सम्भोग बराबर होता ही रहे अथवा
-- के दिनों में गर्भाशय भ्रंश वाली स्त्री से सम्भोग हो तो गर्भा-
शय गिरकर बाहर निकल आता है जैसा पीछे के चित्र में है।
मेरे पास अनेक स्त्रियां ऐसी आईं और राय चाहा करती
हैं। उनकी ज़बानी मालूम होता है कि विपरीत आसन में रति
क्रिया करने से यह रोग हुआ। कई स्त्रियों ने मुझसे बतलाया कि
उनके पति ने उन्हें दिया औंधे-मुँह सुला और उन्होंने उल्टे
किसी चित्र के अनुसार पशु की समान सम्भोग किया जिससे
कि मेरे हाथ पैर कांपने लगे, मैं गिर पड़ी तभी से पेड़ू में पीड़ा होने
गर्भाशय का बाहर निकल आना
लगी और जनेन्द्री में भारीपन मालूम होने लगा। अब न जाने
क्या गुह्य स्थान में कुछ लटका हुआ सा मालूम होता है।
३६६ आनन्द मन्दिर
जब उनके गर्भाशय की मैने परीक्षा की तो गर्भाशय वाहर
निकला देखा गया और किसी किसी स्त्री के पृष्ठ ३९५ के चित्र
की आकृति का निकला देखा गया ।
गर्भाशय जव वाहर निकल आता है तव अग्रेजी इलाज
में रपड़ का छल्ला चढ़ा दिया जाता है जव छल्ला निकल जाता
है तब फिर रोग वैसा 'ही होजाता है । मेरे पास अनेक स्त्रिया ऐसी
आईं कि पांच पाँच दश दश वर्ष का गर्भाशय निकलने का रोग था,
दूर नही हुआ था, छल्ला चढ़ा रहता था । जव छल्ला निकल
गया तब फिर गर्भाशय वाहर आगया । हमारे देशी चिकित्सा
प्रणाली में वैज्ञानिक विधि से तथा देशी औषधियो से इलाज
करने से हमेशा के लिये यह रोग दूर होजाता है ।
पति के व्यभिचारी होने से गर्भाशय रोग
जिन स्त्रियो के पति व्यभिचारी होते हैं उन निरपराध स्त्रियों
को पति के कारण बड़े बड़े भयंकर रोग उत्पन्न होजाते हैं और
उससे उन्हे बड़ा कष्ट होता है। पति के उन रोगो के कारण
उन स्त्रियो की सन्तान भी रोगी होती है तथा गर्भ मे ही सड़
जाती और मर जाती है जिसके कारण स्त्री के भी प्राण जाते हैं।
पति के रोगी होने से पत्नी की जनेन्द्री मे छाले पड़जाते हैं।
जैसा कि आगे के दिए हुए दो चित्रो मे दिखलाया गया है
गर्मी रोग बड़ा भयंकर रोग है यह रोग प्रायः पर स्त्री गामी,
तथा वेश्यागामी पुरुषो के हुआ करता है। यह भयंकर रोग
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६७
योनि के छाले व फुंसियां
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार
व्यभिचार और पर स्त्री गमन से योनि मे छाले । पढ़िये
पृ० ३९६
३६८ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय के मुखपर गर्मी रोग
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार
व्यभिचार और भांति भांति के कुकर्मों से उत्पन्न हुआ गर्मी
रोग। पढिए पृ० ३९६ ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६६
प्रायः वेश्याओ से पुरुषों को होता है और पुरुषो से उनकी
स्त्रियों को होता है। स्त्रियो से सन्तान को और सन्तान से सन्तान
को इसप्रकार कई पीढ़ी तक यह रोग पीछा नहीं छोड़ता इसका
पूरा हाल लिखा जावे तो एक बड़ी भारी पुस्तक बन जावेगी
इसका पूरा हाल इस पुस्तक के दूसरे भाग में लिखा जावेगा
यहां पर केवल इतना ही बतलाना है कि स्त्रियो को ऐसे गुप्त रोग
उनके पति की कृपा से ही मिला करते हैं।
योनि मे होकर यह रोग गर्भाशय तक पहुँचता है जिससे
सन्तान श्रग भंग होती है गर्भस्राव व गर्भपात होजाता है
यदि सन्तान हुई भी तो रोगी होती है।
योनि की गांठ
पति की अज्ञानता और व्यभिचार से पत्नी की योनि मे
गांठ पड़जाती है इस गांठ के कारण गर्भाधान क्रिया के समय
स्त्री को कष्ट होता है इस लिये रतिक्रिया ठीक नहीं हो सकती
और गर्भ भी नहीं रहता। यदि इलाज ठीक और शीघ्र न हुआ
तो यह गांठ बढ़ कर गर्भाशय के मुख तक पहुंचकर गर्भाशय
को भी खराब करदेती है।
इस गांठ का भी अंग्रेजी चिकित्सा प्रणाली मे आपरेशन
होता है परन्तु हमारे देशी इलाज में विना आपरेशन के ही रोग
दूर कर दिया जाता है। इस रोगवाली अनेक स्त्रियां मेरे पास आईं।
यह रोग विपरीत आसन की रति से उत्पन्न हुआ देखा गया है।
४०० आनन्द मन्दिर
योनि की गांठ
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार योनिमुख
गर्भाशय के मुख के सामने योनि मार्ग मे गांठ निकल आने
से रतिक्रिया के समय स्त्री को कष्ट होता है और गर्भ नहीं रहता।
'अत्याचारी पति को अत्याचार का फल। पृ० ५०८ (सर्वाधिकार सुरक्षित)
The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४०१
गर्भाशय के मुख पर मस्सा
गर्भाशय
मलाशय मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
गुदाद्वार योनिमुख
अनियम रतिक्रिया तथा अनियम आहार विहार व ऋतु के
दिनो मे कुपथ्य करने से गर्भाशय के मुख पर मस्सा उत्पन्न हो
जाता है और स्त्री वन्ध्या हो जाती है ।
२६
४०२ आनन्द मन्दिर
गर्भाशय के मुख पर खराबी
गर्भाशय
मलाशय मूत्राशय
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदाद्वार
पति के गर्मी सुजाक आदि रोगो से रोगी होने से पत्नी के
गर्भाशय मे खराबी आजाती है इससे गर्भाधान के समय। स्त्री को
कष्ट होता है और गर्भ भी नही रहता ।