विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
( ४ )
फ़ायदा उठायें इसी अभिप्राय से इतने बड़े ग्रन्थ का मूल्य १।।)
डेढ़ रुपया कर दिया गया है। यदि पसन्द न हो तो पुस्तक
लौटा दीजिये, और अपने दाम वापिस मगा लीजिये।
नारी धर्म शास्त्र
गृह-प्रबन्ध शिक्षा
पुस्तक में क्या है सो नाम से ही समझ लीजिये, ऐसा
उपयोगी धार्मिक-शिक्षा और गृह प्रबन्ध शिक्षा का ग्रन्थ स्त्रियों
के लिये हिन्दी ही नहीं देश की किसी भाषा में भी नहीं छपा।
कई रंगों में छपे हुए तथा सादे सुन्दर
मनोहर चित्रों सहित बड़े सुन्दर सचित्र ग्रन्थ
का मूल्य सिर्फ २=) दो रुपया दो आना।
स्त्रियां और लड़कियां इस सुन्दर ग्रन्थ को देखकर बड़ी
प्रसन्न होंगी, वे इस ग्रन्थ को हाथ में लेकर पढ़ना आरम्भ करके
छोड़ने की इच्छा न करेंगी यह ग्रन्थ स्त्रियों को आदर्श गृहिणी
बनाने के लिये, स्त्री जाति के उपकार के लिये प्राचीन ग्रन्थों की
खोज करके तैयार किया गया है।
हर एक गृहस्थ को एक एक प्रति अवश्य घर में रखनी
चाहिये इस पुस्तक को पढ़, सुनकर स्त्रियां और पुत्रियां स्त्रियों
के सब प्रकार के कर्त्तव्यों में सर्वगुण सम्पन्न बन जाती हैं।
ऐसा उपयोगी ग्रन्थ पचास रुपया खर्च करने पर भी दूसरी
जगह न मिलेगा। शीघ्र आर्डर दीजिए।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग।
( ३ )
नया संस्करण छप गया
पाकविद्या का अपूर्व ग्रन्थ
नारी कर्त्तव्य शास्त्र पाकशास्त्र
खाने पीने के अनेक स्वादिष्ट और मनुष्य
को हृष्ट पुष्ट तथा आरोग्य रखने वाले नाना भांति
के व्यंजन और अचार, चटनी, मुरब्बा इत्यादि
बनाने की ६०० छै सौ से अधिक विधियां ।
स्त्री-गुणों में सर्वश्रेष्ठ पाकविद्या ही है
इसको पढ़, सुनकर स्त्रियां पाकविद्या में सर्वगुण सम्पन्ना
हो इसमें बताई विधि के अनुसार अत्यन्त उपयोगी और
स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं, ऋतु और प्रकृति के अनुसार
नाना प्रकार के भोजनों से उनके घर वाले हृष्ट पुष्ट और निरोग
रहने लगे क्योंकि स्त्री पुरुषों के रोग आहार विहार के अनियमों
से ही उत्पन्न होते हैं, आज तक ऐसा उपयोगी ग्रन्थ देखने
और सुनने में नहीं आया ।
इस ग्रन्थ की प्रशंसा के हजारों पत्र बड़े बड़े विद्वान् और
राजा महाराजाओं के हमारे पास आये हैं ।
इसका ३=) तीन रुपया दो आना मूल्य था, हम चाहते हैं
कि एक बार इस दुर्लभ ग्रन्थ को सभी स्त्री पुरुष पढ़कर
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३५५
का मुह, आंख के सामने आंख हो और एक दूसरे को प्रेम और
प्रसन्नता की दृष्टि से देखते रहे। स्त्री पति की मुखाकृति को अपने
हृदय मे धारण करे। जिस समय पुरुष का वीर्य पात होने लगे उस
समय स्त्री अपनी श्वास ऊपर को खींचे और कुछ देरी तक श्वास
ऊपर को ही खींचे रहे।
ऐसे समय की प्रसन्नता और स्थिति का प्रभाव गर्भपर पड़ता
है। आयुर्वेद के लेखानुसार गर्भाधान क्रिया करने से उत्तम
सन्तान की प्राप्ति होती है और स्त्री पुरुष दोनो स्वस्थ तथा प्रसन्न
रहते हैं।
गर्भधारण के लक्षण
लिंगंतु सद्योगर्भाया योन्यां बीजस्य संग्रहः ।
तृप्तिर्गुरुत्वं स्फुरणं शुक्रास्राननुबंधनम् ॥
हृदय स्पंदनं तंद्रा तृड् ग्लानिर्लोमहर्षणम् ।
अर्थ.—तत्काल गर्भको धारण करने वाली स्त्री के ये लक्षण
होते है। यथा योनि में बीज का सम्यक रीति से ग्रहण, तृप्ति,
(आहार की अनिच्छा) कोख मे भारीपन, फड़कन, संभोग
के बाद योनि से वीर्य का वाहर न निकलना, हृदय मे प्रसन्नता,
आखो मे आलस्य, तृषा, ग्लानि और रोमांच होना ये लक्षण
तत्काल गर्भधारण के हैं। गर्भवती को ध्यान से देखने से ये लक्षण
पहचान मे आजाते हैं।
३५६ आनन्द मन्दिर
गर्भरक्षा
जब मालूम हो कि गर्भ रह गया तब स्त्री को बडी सावधानी
से रहना चाहिये। ये बात पहिले ही समझाई गई है कि माता
जैसा आहार विहार करती है उसका प्रभाव बालक पर पडता है
नाडियो के द्वारा माता के आहार विहार का प्रभाव बच्चे पर
पडता है।
जब मालूम हो जावे कि गर्भ रह गया तब से गर्भवती स्त्री
को बड़ी सावधानी से रहना चाहिये। भारी आहार तथा कब्ज
करने वाली वस्तुएं न खानी चाहिये। देर मे पचे अथवा बदहजमी
करे ऐसे पदार्थों का सेवन छोड देना चाहिये। गर्भावस्था में भारी
और अधिक ऋतु और प्रकृति के विरुद्ध भोजन से प्रायः अनेक
रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जो स्त्री गर्भावस्था मे आहार-विहार का
ठीक नियम रखती हैं उन्हे प्रसव के समय किसी प्रकार का कष्ट
नही होता। गर्भवती को यदि दस्तो का रोग उत्पन्न हो जावे
और अधिक बढ़जावे तो गर्भपात होने की सम्भावना रहती है
बहुधा गर्भ गिर भी जाता है। इसलिये गर्भावस्था मे ऐसे भी
पदार्थ न खाने चाहिये जो दस्त लावे या पेट मे किसी तरह की
शिकायत पैदा करे। गर्भावस्था मे बड़ी सावधानी से रहना
चाहिये, शरीर को आराम देना चाहिये।
आनन्द
मन्दिर
पन्द्रहवां अध्याय
—:o:—
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३५६
गर्भधारण
पीछे बतलाया गया है कि शुद्ध रज वीर्य तथा आरोग्य
जननेन्द्री वाले दम्पति ही उत्तम सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं। यदि
रज वीर्य पत्नी अथवा पति किसी की जननेन्द्री मे खराबी
हुई हो तो गर्भधारण नही होता ।
मेरे पास लाखो स्त्रियां अपना इलाज कराने आईं इनमे
आधी से अधिक संख्या ऐसी स्त्रियो की पाई गई जो सन्तानहीन
थी। रोग की परीक्षा करने से बहुतों मे गर्भाशय की खराबी न थी
उनके पति का उन स्त्रियो की जबानी हाल मालूम हुआ कि पतियो
मे इन्द्री की सिथिलता शीघ्रपात और नपुंसकता आदि रोग
मौजूद हैं।
जब उनके पतियो से पत्र द्वारा पूछा गया तब मालूम हुआ
कि उन्होने अनियम वीर्य का सत्यानाश मारकर जननेन्द्री की शक्ति
को नष्ट कर डाला इस कारण वे सन्तान उत्पन्न करने के योग्य नही
रहे। उनके पत्र तथा स्त्रियों की जबानी मालूम हुआ कि वे उचित
रीति से रतिक्रिया नही कर सकते क्योकि वे शक्तिहीन होगये हैं।
इसलिये गर्भधारण नही होता ।
जिनकी स्त्रियों मे कुछ खराबी नही थी पति मे खराबी थी
उनके पति का इलाज कर दिया गया सन्तान होने लगी और अब
तक हो रही है। इन बातो से उत्तम गर्भ होने का अन्दाज लग
सकता है।
३६० आनन्द मन्दिर
स्त्रियों के जननेन्द्री दोष
लाखों स्त्रियो मे इलाज से उनके गुप्त रोगों की परीक्षा करके
जो रोग देखे गये और उन रोगो के उत्पन्न होने के कारणों की
खोज की गई तो स्त्रियो की जबानी तथा उनके पति के पत्रों से
मालूम हुआ कि स्त्रियो के गर्भाशय मे जितने रोग उत्पन्न होते हैं
वे सब प्रायः पतियों की अज्ञानता "अधिक विषय" और विपरीत
आसन से रतिक्रिया करने से उत्पन्न होते हैं।
पीछे स्त्री की जननेन्द्री सम्बन्धी अंगों का वर्णन किया गया
है यहा जननेन्द्री (गर्भाशय) का वर्णन किया जाता है। पुरुषों
की अज्ञानता से स्त्रियो के गर्भाशय मे नीचे लिखे रोग उत्पन्न
होते है जिनसे गर्भ नही रहता और जब तक ये रोग दूर न
हो स्त्रिया गर्भधारण नही कर सकती।
यदि गर्भ रहा भी तो निर्वल दुर्बल और कम आयु वाली
सन्तान उत्पन्न होती है तथा गर्भस्राव व गर्भपात की शिकायत हो
जाती है, इसी प्रकार के रोगो से स्त्रिया जीवन भर दुःखी रहा
करती हैं। मैने लाखो स्त्रियो का इलाज करके इस बात का
अनुभव प्राप्त किया है कि पतियों की अज्ञानता से ही स्त्रियो की
रोगी संख्या अधिक देखी जाती है।
अधिक और अनियम रतिक्रिया करने से गर्भाशय के वन्धन
ढीले होजाते हैं और नसो मे खराबी पहुँचने के कारण प्रदर,
मासिकधर्म्म की खराबी, गुल्म रोग उत्पन्न हो जाते है।
पत्नी की प्रेमवार्त्ता
( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६१
योनि और गर्भाशय
स्त्री की योनि शंख की नाभि की
समान तीन पर्तवाली होती है उसके
तीसरे पर्त मे गर्भाशय है और वह
बहुत पतली और कोमल नसो से
मिलकर बना हुआ है। जैसा रोहू
मछली का मुंह होता है, उसी आकृति
का गर्भाशय होता है, ऊपर से छोटा
और भीतर से फैला हुआ होता है
जैसा कि ऊपर चित्र मे दिखलाया
गया है।
गर्भाशय सफेद रग का बहुत
कोमल और सुन्न होता है जिससे
बच्चे के बोझ से और खिचाव से (जो गर्भ के बढ़ने मे होता है)
स्त्री को कष्ट न हो। गर्भाशय के दूसरे पर्त मे बहुत सी नसे और
चुन्नटे हैं इन्ही चुन्नटो और नसो के कारण गर्भ रुकता है।
गर्भाधान, क्रिया से अर्थात् सभोग से जब पुरुष का वीर्य
गर्भाशय मे जाता है तब वही चुन्नटे प्राकृतिक नियम से खिच
जाती है जिससे गर्भाशय मे वीर्य पहुचते ही गर्भाशय का मुख
अपने आप ही बन्द होजाता है।
मासिक धर्म्म के समय रक्त निकलने के लिये प्रकृति गर्भाशय
३६२ आनन्द मन्दिर
के मुख की उन चुन्नटो को फैला देती है जिससे गर्भाशय का
मुख फैल जाता और मासिक धर्म्म का रक्त निकल जाता है,
कोई कष्ट नही होता। यदि गर्भाशय मे किसी प्रकार की खराबी
न हुई तो मासिक धर्म्म के दिनो मे गर्भाशय की चुन्नटे ठीक ठीक
खुल जाती है और रक्त भलीभांति निकल जाता है।
आरोग्यता की दशा में
जिस गर्भाशय मे किसी प्रकार की खराबी नही होती उसका
मुख ठीक खुल जाता है।
आगे के चित्र मे गर्भाशय का चित्र जननेन्द्री के सब अंगो
सहित दिखलाया गया है। यदि गर्भाशय मे किसी प्रकार का
रोग न हो तो वह पुरुष के वीर्य को अपनी ओर आकर्षण करके
अर्थात् खींच कर अपने मुख मे लेकर मुख वन्द कर लेता है वही
पुरुष का वीर्य गर्भाशय के भीतर जाकर स्त्री के रज मे मिलकर
गर्भधारण करता है।
जिस संभोग में स्त्री पति से पहिले ही स्खलित हो जाती है
उसका रज गर्भाशय मे पहिले से ही मौजूद रहता है, उसी क्षण
पुरुष का भी वीर्य गर्भाशय में पहुचकर स्त्री के रज मे मिल जाता
है। इस प्रकार स्त्री के पहिले स्खलित होने से कन्या उत्पन्न
होती है।
यदि पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे पहिले से पहुँच जावे और
स्त्री पुरुष से पीछे स्खलित हो तो पुत्र के गर्भ की स्थिति होती है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६३
मासिकधर्म्म के समय गर्भाशय का
खुला हुआ मुख
गर्भाशय
मलाशय
मूत्राशय
गुदाद्वार
योनिमुख
मूत्रमार्ग
मासिक धर्म के समय गर्भाशय का मुख खुला रहता है ऐसी
दशा मे रतिक्रिया करने से कभी २ स्त्री बन्ध्या हो जाती है।
३६४ आनन्द मन्दिर
पुत्र और कन्या की गर्भ स्थिति का कारण
आयुर्वेद मे गर्भाधान के लिये सम और विसम रात्रियो का
जो नियम वतलाया है उसका यह कारण है कि ऋतुधर्म्म के वाद
सम रात्रियों मे स्त्री रज कम होता है अर्थात् गर्भोत्पादक जीवो
की सम रात्रियो मे कमी रहती है और विसम रात्रियो मे अधिकता
रहती है। इसलिये विसम रात्रियो मे सभोग करने से जो गर्भ
रहता है उससे कन्या का जन्म होता है।
समरात्रि मे रज की कमी रहती है अर्थात् स्त्री के गर्भोत्पा-
दक जीव कम रहते हैं। पुरुप का वीर्य वलवान् पडता है अर्थात्
पुरुप के वीर्य के गर्भोत्पादक जीव अधिक रहने के कारण गर्भ मे
पुत्र होता हैं। इसीलिये सम विसम रात्रियो का विचार रक्खा
गया है। जैसा कि पृष्ठ ३६५ के चित्र से प्रकट होता है।
जो आयुर्वेद के नियमो से अज्ञान हैं वे अपनी पुस्तको मे
लोगो को शिक्षा देते हैं और स्त्री को पुरुप से पहिले स्खलित
होने के अनेक उपाय वतलाते हैं। कोई कोई मूर्ख लोग यहां तक
उपाय वतलाते हैं कि सभोग के समय पति पत्नी एक साथ ही
स्खलित हो तो वड़ा ही आनन्द आता है। मानो स्वर्ग का सीधा
रास्ता वतलाते हैं। आयुर्वेद वतलाता है पति पत्नी दोनो एक
साथ स्खलित हो और गर्भ रह जावे तो नपुंसक सन्तान उत्पन्न
होती है। इस विपय मे पीछे खुलासा लिखा जा चुका है। इसलिये
मूर्खों की पुस्तको पर विश्वास करके संभोग करने के ही कारण
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६५
गर्भाशय में कन्या व पुत्र का स्थान
गर्भाशय
कन्या
पुत्र
मलाशय
मूत्राशय
योनिमार्ग
मूत्रमार्ग
योनिमुख
गुदद्वार
गर्भाशय में दो भाग होते हैं एक कन्या का एक पुत्र का।
वर्णन पढ़िये पृष्ठ ३६४ मे—
३६६ आनन्द मन्दिर
देखने मे आता है कि नपुसको की सख्या कम नही है। मेरे पास
नपुसक पुरुषो की स्त्रियां अपने पतियो की चिकित्सा के लिये
आती हैं उनसे मुझे यह अनुभव हुआ ।
गर्भ में दो बच्चे होने का कारण
गर्भाशय मे दो थैली होती हैं एक मे कन्या और एक मे पुत्र ।
सम रात्रियो मे पुत्र का गर्भस्थित होने के लिये पुत्र वाली थैली
का मुख खुला रहता है और विसम रात्रियो मे कन्या के गर्भ की
स्थिति के लिये कन्या वाली थैली का मुख खुला रहता है।
जैसा कि आगे चित्र मे दिया गया है। कभी कभी जब संभोग
के समय वीर्यपात होते वक्त वायु से वीर्य के दो हिस्से हो जाते हैं
और अनियम गर्भाधान क्रिया के कारण दोनो थैलियों का मुह
खुल जाता है तब वीर्य के दो भाग होकर दोनो थैलियो मे गर्भ की
स्थिति होती है और दो बालक एक साथ ही उत्पन्न होते हैं।
गर्भ मे दो बालक होने से माता को कष्ट होता है और कभी
जच्चा और बच्चा दोनो के प्राण सकट मे पड़जाया करते हैं।
यह कारण अनियम रतिक्रिया का ही है।
कभी कभी एक ही मे दो बालक एक जुडे हुए भी होते हैं
दो बालक एक साथ उत्पन्न होने वाले तो सौ मे दस जीवित भी
रहते हैं परन्तु एक साथ जुडे हुए मे एक भी जीवित नही रहता
जो दो बालक एक साथ उत्पन्न होते हैं वे जो जीवित रहे तो एक
साथ दोनो बीमार होते हैं और एक साथ दोनो रोगी होते है।
जवानी (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३६६
पड़े और पीछे के हिस्से में जोरका झटका लगजावे तो गर्भ गिर
जाता है। पीछे के हिस्से में कुछ खराबी उत्पन्न होजावे तो भी गर्भ
नहीं रहता। इसलिये शास्त्रकारों ने गर्भवती को नियम पूर्वक
बड़ी सावधानी से रहना बतलाया है।
विपरीत आसन से रतिक्रिया करने से स्त्री का पीछे का हिस्सा
विपरीत स्थिति में होजाता है तो गर्भ नहीं रहता यदि रह भी जावे
तो गर्भस्राव हो जाता है और मूढ़गर्भोकी उत्पत्ति होती है।
गर्भाशय का पीछे का हिस्सा
ऊपर का चित्र गर्भाशय का पीछे का हिस्सा है। पाठक
पाठिकाओं की समझ में यह विषय भलीभांति आजावे इसलिये
गर्भाशय के हिस्से अलग अलग और एक साथ भी दिखलाये गये
हैं। पाठको को सब चित्र अच्छीतरह देखकर समझना चाहिये।
२४
३७० आनन्द मन्दिर
गर्भाशय के बन्धन
यह चित्र गर्भाशय के बन्धन ( नसे जिनसे गर्भाशय बधा रहता है ) का है । अनि-
यम रतिक्रिया से तथा विपरीत आसन से सम्भोग करने से गर्भाशय के बन्धन ढीले हो
जाते हैं अर्थात नसे कमजोर हो जाती हैं इस लिये स्त्री अनेक प्रकार के रोगों मे
ग्रसित रहती है।