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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३४५
मैंने उसका इलाज किया। पन्द्रह दिन में वह अच्छी होकर
घर चली गई परन्तु उसकी चिट्ठी आई इससे मालूम हुआ कि
उसकी इच्छा शक्ति नष्ट होगई है। मैंने उसको समझा दिया था
कि एक वर्ष तक तुम ब्रह्मचर्य में रहो तब आराम होगा यदि
फिर तुम्हारे पति ने ऐसी मूर्खता की तो तुम सदैव के लिये
सम्भोग शक्ति नष्ट होने से वंध्या हो जाओगी, अपने पति को नम-
झती रहो। परन्तु इस मूर्ख पति ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।

एक और स्त्री इसी प्रकार की मेरे पास बहुत दुःखी होकर
आई। उसकी अवस्था लगभग ३५ पैंतीस वर्ष की थी उसके
कोई सन्तान नहीं थी, कभी गर्भ नहीं रहा। वह मेरे पास सन्तान
का इलाज कराने के लिये आई थी, उसे कोई रोग प्रत्यक्ष में नहीं
था। मैंने उसके गर्भाशय आदि की परीक्षा की, गर्भाशय में किसी
प्रकार का रोग नहीं पाया। तब मैंने उसे अपने रोगी आश्रम में
मासिक धर्म की परीक्षा करने के लिये ठहराया। वही समय उसका
मासिक धर्म होने का निकट था वह तीन चार दिन बाद मासि-
कधर्म से हुई। मैंने तीन दिन तक

३४६ आनन्द मन्दिर
इसके सब प्रश्नो का उत्तर लिख भेजे तब मैं तुम्हारे पति का
हाल मालूम करके बतलाऊगी कि किस के दोष से सन्तान
नही होती ।
इसके तीन चार दिन बाद एक दिन वह मेरे पास मुझसे
केवल मिलने के लिये आई, उस दिन उसने मुझसे कहा "देवी
जी ! न मालूम क्या बात है मेरी इच्छा कभी सम्भोग की नही
होती, अपने आप तो कभी इच्छा होती ही नही। जब मेरा विवाह
हुआ था तब इच्छा होती थी उसके बाद कभी भी स्वप्न मे भी
इच्छा नही होती । पति जी जब मेरे पास आते हैं तब घंटों वे
अनेक उपाय करते हैं तब इच्छा होती है, सो भी भलीभांति
नही होती । प्रसंग मे कुछ प्रसन्नता नही होती ।
उस स्त्री के कहने से मैं समझ गई । इसके पहिले मुझे उससे
यह बात पूछने का संकोच वश कुछ ध्यान ही नहीं रहा था
क्योंकि ऐसी बाते स्त्रियो से बिना जरूरत के पूछने में मुझे भी
कभी कभी संकोच मालूम होता है । मै जिस रोग की परीक्षा
करती हू उसके विषय मे भली भाति देखकर ही मालूम करलेती
हूँ और स्त्रियो के इस श्रग की खास कर बिना कारण के परीक्षा
नही करती, क्योकि इस

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३४७
मैंने उस स्त्री के उस स्थान को देखा तो मालूम हुआ वह
स्थान स्पर्श करते करते इतना कठोर होगया था कि उस स्त्री को
इसके स्पर्श से कुछ मालूम ही नही होता था, उतनी जगह शून्य हो
गई थी ।
यह देखकर मैंने उससे पूछा—कभी तुम्हारे पति ने तुम्हारे
इस स्थान को हाथ से तो नहीं रगड़ा ? उसने कहा कि कभी की
क्या बात पूछती हो लगभग बीस वर्ष होगये जब से मेरा विवाह
हुआ तभी से मेरे पति जी इसी प्रकार मेरी इच्छा करके तब
सम्भोग करते हैं । जब तक वे हाथ से मेरी इच्छा न करे तब तक
मेरी इच्छा स्वप्न मे भी नहीं होती और मुझे कई वर्ष होगईं जो
प्रसन्नता पहिले विवाह के बाद कुछ दिन आरम्भ में होती थी वह
अब नहीं होती ।
मैंने उसका यह हाल सुनकर जवाब दे दिया कि तुम नपुंसक
होगईं । तुम्हारे अब सन्तान नहीं हो सकती । वह स्त्री रोने लगी
और पैरों पड़गई । मैने कहा इसका कोई इलाज नहीं हो सकता
तब वह रोकर अपने घर को चली गई । गर्भाशय की परीक्षा
करने से मालूम हुआ कि उस स्त्री का गर्भाशय भी सूखगया था वह
शक्तिहीन होगया था इसी कारण जवाब देदिया । गर्भाशय के
सूखजाने और इच्छा शक्ति नष्ट होजाने से स्त्री बन्ध्या होजाती है।
जो पुरुष अथवा स्त्रियां स्वयं इस अंग का हाथो से स्पर्शकर
अर्थात् घर्षण क्रिया करके स्त्री को उत्तेजित करके उसकी इच्छा
पूरी करते हैं अथवा स्त्रियां अपने हाथ से ऐसा करती हैं वे नपु-
सक होजाती हैं । उनकी उत्तेजना शक्ति नष्ट होजाती है इसलिये

३४८ आनन्द मन्दिर
गर्भ नहीं रहता और उनको प्रसन्नता भी संभोग मे कभी नहीं
होती। इसका कोई इलाज नही हो सकता क्योकि प्राकृतिक
प्रसन्नता भी नष्ट हो जाती है और बिना स्पर्श के स्त्री की इच्छा
होती नही, सो भी जब बहुत देरी तक पुरुष हाथ से स्पर्श करता
रहे तब स्त्री की कुछ इच्छा होगी। तब तक पुरुष की इच्छा जाती
रहेगी क्योंकि जिन मूर्ख पतियो ने हाथ से इस स्थान का स्पर्श
करके स्त्री को उत्तेजित करके संभोग करने की आदत डाली है
उनने ऐसा इसी कारण किया है कि उनसे संभोग करके स्त्री को
उत्तेजित करने की सामर्थ नही होती।
जो मूर्ख पति ऐसा करते हैं उनकी स्त्रियो का जीवन तो
नष्ट होता ही है किन्तु पुरुष भी कुछ दिनो मे रोया करते हैं और
पछताते हैं। सम्भव है यह बात अभी तक किसी को कदाचित
मालूम न हो क्योकि जिन्हो ने अपनी पुस्तको मे इस अंग के
विषय मे लिखा है उन्होने केवल इतना ही लिखा है कि इस स्थान
के स्पर्श से स्त्री को बड़ा आनन्द आता है। यह बात उन्हे भी
नही मालूम है कि इस स्थान को स्पर्श करने से कितनी बड़ी
खराबिया उत्पन्न हो जाती है। उन्हे याद रखना चाहिये कि यह
स्थान हाथ से स्पर्श करने योग्य नही है।
इस दुष्ट स्वभाव से पुरुषो को बचते रहना चाहिये और
स्त्रियो को भी सावधान रहना चाहिये। जो इस पर ध्यान नही देगे
उन्हे जीवन भर रोना और पछताना पड़ेगा। उनका जीवन नीरस
हो जायगा जैसे कि ऊपर के उदाहरणों मे बतलाया गया है।

आनन्द
मन्दिर
चौदहवां अध्याय
—:०:—

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र - ३५१
रतिक्रिया का प्राकृतिक नियम और
उत्तम सन्तान
इच्छेतां यादृशं पुत्रं तद्रूपचरितांश्च तौ ।
चिंतयेतां जनपदांस्तदा चार परिच्छदौ ॥
इसका अर्थ यह है कि स्त्री पुरुष को जैसे पुत्र की इच्छा हो
वैसे ही रूप ( वर्ण संस्थान प्रमाण आकृति ) और चरित्र (श्रद्धा
श्रुत, ऋजुता, आनृशंस्य, दान, दया, दाक्षिण्यादि स्वभाव वाले )
तथा आचार ( कुल और देश के अनुरूप कर्त्तव्य कर्म ) और
परिच्छद् ( मनुष्य गौ, घोड़ा, धन, धान्य, वस्त्र, अलंकार, रत्न,
रथ, वाले ) मनुष्यो का ध्यान करे ।
कर्मांते च पुमान्सर्पिः क्षीरशाल्योदनाशितः ।
प्राग्दक्षिणेन पादेन शय्यां मौहूर्तिकाज्ञया ॥
आरोहेत् स्त्री तु वामेन तस्य दक्षिण पार्श्वतः ।
तैल माषोत्तराहारा तत्रमंत्रं प्रयोजयेत् ॥
अर्थात् पुरुष घी और दूध मिलाकर शाली चावलो ( भात )
का भोजन करके शुभ मुहुर्त का विचार कर उत्तम सन्तान की
हृदय मे इच्छा करके सभोग के लिये स्त्री के पास जावे ।
पीछे लिखा जा चुका है कि शास्त्रकारो का मत है, पति

३५२ आनन्द मन्दिर
सफेद वस्त्र धारण कर सुगन्धित पदार्थों को शरीर में लगाकर
सफेद फूलों की माला ले स्त्री के पास जावे। (देखिये चित्र फूलों
का हार लिये पुरुष स्त्री के पास उत्तम सन्तान के लिये रतिक्रिया
की इच्छा करके खडा है)।
इसी तरह पत्नी भी उत्तम पदार्थों का भोजन करके
श्रृंगार कर उत्तम सन्तान की हृदय से इच्छा करके प्रसन्न चित्त
हो सम्भोग के लिये शयनगृह में जावे। देखिये चित्र गर्भाधान
की तैयारी। पत्नी श्रृंगार करके शयनगृह में जाकर पती की प्रतीक्षा
कर रही है।
शास्त्रकारो ने यहां बतलाया है कि उत्तम सन्तान के लिये
सम्भोग की इच्छा से प्रसन्नचित्त हो शयनगृह में जाकर पहिले
स्त्री बांये पैर से पलग पर चढ़े (देखिये चित्र वांये पैर से स्त्री
पलग पर चढ रही है) यदि स्त्री पहिले शयनगृह में जावे तो
वाये पैर से पलग पर चढ़े और पति के आने की प्रतीक्षा करे।
यदि पति स्त्री से पहिले ही शयनगृह में चलाजावे तो दाहिने
पैर से पलग पर चढ़े और स्त्री की प्रतीक्षा करे अर्थात् स्त्री बांये
पैर से पलग पर चढ़े और नीचे लिखे मंत्र को पढ़े —
अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठासिधातात्वम्।
दधातु विधाता त्वां दधातु ब्रह्मवर्चसाभवति॥
ब्रह्मा बृहस्पति विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाश्विनो-
भगोऽथमित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम्॥

पति का प्यार संसार के बहुमूल्य आभूषणों से भी बढ़कर है । पृ० ५००
( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३५३
इस मत्र का पाठ करे इसका अर्थ इस प्रकार है:—
शेष भी तू ही है। आयु भी तू ही है । धाता विधाता तुझे
ब्रह्म तेज से धारण करे । ब्रह्मा, विष्णु, गृहस्पति, चन्द्रमा, सूर्य,
अश्विनी कुमार, भगमित्र, वरुण ये सब मुझको वीर पुत्र दे।
सांत्वयित्वा ततोऽन्यं संविशेतां मुदान्वितौ।
उत्ताना तन्मना योषित्तिष्ठेदङ्गैः सुसंस्थितैः ॥
तथाहि बीजं गृह्णाति दोषैः स्वस्थानमास्थितैः।
स्त्री पुरुष दोनो आपस मे एक दूसरे को प्रेम प्यार से और
मीठी प्यार की बातो से अर्थात् आलिंगन चुम्वन से तृप्त करके
अनेक प्रकार से प्रसन्न करे ।
इसी तरह अनेक प्रकार के आलिंगन चुम्वन के अर्थ विषयी
पुरुषो ने आसन समझ रक्खे हैं। सम्भव है कोका पंडित ने जिनके
नाम को कोकशास्त्र ने वदनाम कर रक्खा है इसी आशय को
लेकर अनेक प्रकार के आसन वना डाले हो अथवा अन्य किसी
विषयी राजा को ठकुर सुहाती कहने वाले ने मनगढ़त विपरीत
रतिक्रिया के उपाय वताये हो, उन्ही को लोग कामशास्त्र के आसने
समझने लगे हो।
पीछे लिखा जा चुका है कि आयुर्वेद का एक अग काम-
शास्त्र है और उसमे यही विषय है। विषयी पुरुषों ने इसका कुछ
और आशय समझ रक्खा है।
२३

३५४ आनन्द मन्दिर
शास्त्रकार बतलाते हैं कि जब अनेक प्रकार से प्रेम प्यार से स्त्री
प्रसन्न हो और उसकी इच्छा रतिक्रिया के लिये हो तब दोनो
बड़े प्रेम से सभोग मे प्रवृत्त हो ।
समागम के समय स्त्री को उचित है कि शान्त और प्रसन्न
मन से अपने सब अङ्गो की स्थिति को यथावत करके सीधी लेटे जैसा
कि अन्यत्र चित्र मे दिखलाया गया है। गर्भाधान के समय अर्थात्
जिस समय रतिक्रिया समाप्त होने को हो तो स्त्री को बिलकुल सीधा
रहना चाहिये, हाथ पैर आदि अगो को न हिलाना चाहिये ।
इस तरह करने से वातादि सम्पूर्ण दोष अपने अपने
स्थानो मे रहते हैं जिससे बीज के ग्रहण करने मे सुभीता होता है।
आयुर्वेद बतलाता है कि नीची ऊंची पड़ी हुई व करवट लिये
हुये स्त्री से समागम न करे। कुबड़ेपन से, वात बलवान होने से
योनि मे पीडा होती है। दाहिनी करवट मे कफयोनि के मुख को
ढक लेता है। वाये करवट मे पित्त रक्त और शुक्र मे दाह पैदा
करता है जिसमे गर्भ को हानि पहुचती है। यदि गर्भ न भी रहा
तो स्त्री के गर्भाशय को हानि पहुचती है और अनेक प्रकार के
रोग उत्पन्न होते हैं। पुरुष को भी वीर्य और इन्द्री सम्बन्धी
रोग उत्पन्न होते हैं।
गर्भाधान के समय की स्थिति
जिस समय पुरुष का वीर्यपात होने का समय आये उस
समय स्त्री और पुरुष दोनो बिलकुल सीधे हो । स्त्री के मुह पर पति

( १४ )
शिशुरक्षा-विधान बालरोग-चिकित्सा
इस पुस्तक में बालकों के सब प्रकार के रोग होने के कारण
रोगों की पहिचान और उनको दूर करने के सरल उपाय तथा
सरल औषधियां नुस्खे लिखे गये हैं मूल्य ।।।) बारह आना ।
सुखी कुटुम्ब दाम ।।।) बारह आना
बालिकाओं और स्त्रियों के लिये पुस्तक बड़ी ही उपयोगी
और हर समय काम में आने वाली है।
स्त्री संगीत-सागर दाम ॥) आठ आना
पुस्तक आरम्भ करके छोड़ने की इच्छा नहीं होती स्त्रियों के
हर समय गाने योग्य भजन, ग़ज़ल ठुमरी, दादरा, कजली,
होली आदि सभी प्रकार के गाने हैं। मूल्य ॥) आठ आना ।
सच्चा पतिप्रेम दाम ।-) पाँच आना
स्त्रियों के लिये यह अत्यन्त शिक्षाप्रद अपूर्व पुस्तक है।
पत्नी पत्र-दर्पण दाम ।-) पाँच आना
कुटुम्ब के लिये सब प्रकार की चिट्ठी लिखने की सरल
विधियां इसमें लिखी गई हैं।
चित्रमय बाला रामायण मूल्य १।।)
३३-३५ रंग बिरंगे सुन्दर चित्रों से युक्त स्त्रियों के लायक
अत्यन्त उपयोगी, सरल और रोचक रामायण की कथा प्रत्येक
हिन्दू नारी को स्त्री कर्त्तव्यों के ज्ञान और सीता तथा रामचन्द्रजी
की पवित्र कथा को पढ़ने के लिये यह पुस्तक 'गान चाहिये ।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग ।

( १३ )
नारी नीति शिक्षा मूल्य ।-) आना
इस पुस्तक का गुण भी इसके नाम से ही समझ लीजिये
उपयोगी शिक्षाएं भरी पड़ी हैं ।
पति प्रेम पत्रिका, मूल्य ॥) आठ आन
इस पुस्तक में स्त्री की ओर से पति के लिये पत्नी की मनो
हारिणी चिट्ठियां लिखने की सरल रीति और पति की ओर से
पत्नी के लिये शिक्षायुक्त चिट्ठियां लिखने की रीति बताई है ।
सती भूषण मूल्य ।-) पांच आना
इस पुस्तक में स्त्रियों के सच्चे आभूषण बताये गये हैं ।
पतिव्रता मूल्य ॥) आठ आना
कौन हिन्दू स्त्री पुरुष 'आदर्श कुल रमणी पतिव्रता दमयन्ती
का नाम न जानती होगी स्त्री जाति के गौरव का जीता जागता
नमूना है हर एक हिन्दू स्त्री के पास यह पुस्तक अवश्य रहनी
चाहिये । मूल्य सचित्र पुस्तक का ॥) आठ आना ।
कन्या भजन भंडार मूल्य ।) चार आना
कन्याओं के गाने योग्य अत्यन्त उपयोगी पुस्तक भजनों
द्वारा कन्याओं के कर्तव्यों की शिक्षा दी गई है ।
घर का वैद्य मूल्य ।-) पांच आना
यह प्रतिदिन के काम में आनेवाली स्त्रियों के लिये वैद्यक की
बड़ी ही उपयोगी पुस्तक है, हर एक रोग के सैकड़ों नुस्खे हैं ।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग ।

( ३२ )
पति की मर्यादा दाम |-) पांच आना
इस पुस्तक से स्त्रियों को पति मर्यादा का ज्ञान प्राप्त होता
है वे नारी जीवन और परलोक का सुधार कर सकती हैं ।
नई बहू दाम |=) पांच आना
नई बहू के लिये उसके कर्तव्य का अमूल्य शिक्षायें देने
वाली यह पुस्तक अत्यन्त रोचक और उपयोगी है ।
स्त्री भजन-बाटिका दाम ।) चार आना
स्त्रियों के भजनों की अत्यन्त उपयोगी अपूर्व पुस्तक है।
ऐसी पुस्तक आज तक नहीं छपी ।
घर की दर्जिन सचित्र दाम ॥) आना
इसमें सब प्रकार के कपड़े काटना, छाटना और सीने की
सरल विधियां ऐसे सीधे ढंग से समझाई गई हैं कि थोड़ी
पढ़ी लिखी स्त्री और बालिकाएं पढ़ने और सुनने मात्र से सब
प्रकार के कपड़े जनाने, मर्दाने तथा बच्चों के सीना, नापना
काटना, सीख जाती हैं दाम ॥) आठ आना ।
कण्ठाग्रगणित मूल्य ।) चार आना
कन्याओं के लिये हिसाब की अपूर्व पुस्तक है ।
पातिब्रत धर्म्म माला मूल्य |-) पांच आना
इसमें पातिब्रत धर्म्म को सिखाने वाली स्त्रियों के लिये
धर्म्म शास्त्र की आज्ञाएं ऋषियों के उपदेशों का वर्णन है ।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग ।

( ११ )
अन्य उपयोगी पुस्तकें
सच्ची सहेली मूल्य ।-) पाँच आना
सच्ची सहेली को पढकर स्त्रियां अनेक प्रकार की शिक्षायें
पाकर सर्वगुण सम्पन्न बनती हैं।
सन्तति सुधार मूल्य ॥) आठ आना
माता पिता सन्तान का सुधार किस प्रकार कर आदर्श
सन्तान बना सकते हैं यह बात इस पुस्तक से मालूम होगी।
सुघड़ रंगरेज ।) चार आना
हर प्रकार के सुन्दर देशी रंग बनाना और सब प्रकार के
कपड़े रंगने की सरल विधियां इस पुस्तक में बताई गई हैं।
नारी संगीत रत्नमाला दाम ।-) पाँच आना
स्त्री-उपयोगी भजनों की अमूल्य पुस्तक है।
चित्रमय सती सावित्री की कथा मूल्य ।।।)
चित्रमय दमयन्ती की कथा मूल्य |=)
चित्रमय रानी शैव्या की कथा मूल्य |=)
शालाशिक्षा मूल्य ।-) पांच आना
इस पुस्तक में स्त्रियों के लिये अपने हिन्दू धर्मशास्त्र का
मथन कर अत्यन्त उपयोगी शिक्षायें उद्धृत की गई हैं।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग।

( १० )
स्त्री पुरुषों के लिये नई चीज
प्रेम भाव को दृढ़ करने वाली
सचित्र
पत्नी की मनोहर चिट्ठियां
यह सचित्र पुस्तक अभी बिलकुल नई तैयार हुई है। इसमें
पत्नी की ओर से पति को बहुत ही आकर्षक मोहक मनोहर
पद्यमय अर्थ सहित मनभावनी चिट्ठियां लिखी गई हैं। जिन्हें
पढ़कर हृदय में अतीव आनन्द और प्रेम भाव उमड़ पड़ता है
साथ ही स्त्री की योग्यता, बुद्धिमानी और कोमलता का नक्शा
खिंच जाता है। पुस्तक स्त्री मात्र के पढ़ने योग्य है। मूल्य केवल
॥) आठ आना।
सचित्र पति के पत्र
मजेदार "पति के पत्र" पढ़ते ही बनते हैं। इसमें ऐसे २
पत्र लिखे गये हैं जिनसे दुष्ट से दुष्ट स्त्रियां भी पति के अनुकूल
हो जाती हैं। पति में उनकी दृढ़ श्रद्धा भक्ति हो जाती है। पर-
देश में भी रहकर पति अपनी पत्नी को हर प्रकार खुश रख
सकता है। मूल्य केवल ॥) आठ आना।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग।

( ४ )
तिरङ्गे, दो रङ्गे, एक रङ्गे, और सादे चित्रों से भरपूर
स्वामी दयानन्द सरस्वती
और भारत की स्त्रियां
हिन्दी जगत में यह एक अत्यन्त उपयोगी बिलकुल नई
पुस्तक है। ऐसी पुस्तक अबतक निकली नहीं। यह पुस्तक
आपकी बहू बेटियों वा बहिनों के लिये सच्ची सहेली का काम
देगी और उनके जीवन की पथ प्रदर्शिका बनकर उन्हें आदर्श
गृहिणी और योग्य माता बनायेगी नारी जीवन को पवित्र सुख
का भंडार बनाने के लिये यह पुस्तक आपने उनके हाथ में न
दी तो उनको दूसरी पुस्तकें देना व्यर्थ है।
स्त्री समाज में प्रचार करने के लिये ही १४-१५ तिरङ्गे, दो
रङ्गे, एक रङ्गे और सादे चित्रों से युक्त बढ़िया मोटे एण्टिक
कागज पर छपी पुस्तक का मूल्य केवल १।।) डेढ़ रुपया।
स्त्री-रोग चिकित्सा
इस पुस्तक में स्त्रियों के लिये सब प्रकार के गुप्तराग उत्पन्न
होने के कारण रोगों की पहिचान लक्षण और रोग दूर होने के
सरल उपाय तथा औषधियां लिखी गई हैं स्त्रियों के लिये यह
पुस्तक बहुत उपयोगी और हर समय काम देनेवाली है। इससे
समस्त स्त्री रोगों की सरल आजमाई हुई औषधियां मालूम हो
जाता हैं। दाम १।।) डेढ़ रुपया।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग।

( ८ )
२५ वर्षों का फल, जीवन के लिये अमृत
श्रीमती यशोदादेवी कृत
वैद्यक शिक्षा का सर्वोत्तम बृहद ग्रन्थ
सचित्र देवी अनुभव प्रकाश
यह वैद्यक शिक्षा का अपूर्व और बहुत बड़ा अद्वितीय ग्रन्थ
है। हिन्दी में वैद्यक शास्त्र का इतना बढ़िया और अच्छा ग्रन्थ
दूसरा नहीं निकला। इसे श्रीमती यशोदादेवी ने अपने २५ पचीसों
वर्षों के अनुभव से लाखों स्त्री पुरुषों का इलाज करके, वैद्यक
शास्त्र के प्रमाणिक ग्रन्थो का मथन कर लिखा है।
इस ग्रन्थ में समस्त गुप्त प्रकट साध्यासाध्य स्त्री रोगों का
खुलासा वर्णन, रोगों की पहचान, लक्षण आदि चित्र सहित
दिये गये हैं। तथा प्रत्येक रोग पर कई २ परीक्षित बीसों वर्ष के
आजमाये शर्तिया फायदा करने वाले नुसखे दिये गये हैं नुसखे
सरल से सरल और अच्छे हैं जिन्हें कोई भी घर पर ही तयार
करसकता है। ग्रन्थ बहुत सरल भाषा में लिखा गया है।
इस एक पुस्तक को लेकर फिर वैद्यक सीखने और अच्छे २
नुसखे जानने के लिये दूसरी पुस्तक पढ़ने की आवश्यकता नहीं
रहती। प्रत्येक स्त्री को आरोग्यता प्राप्त करने रोगों से बचने
और स्वस्थ सुन्दर सन्तान उत्पन्न करने के लिये यह अपूर्व
पुस्तक मंगाकर जरूर पढ़ना चाहिये। कई भागों की सम्पूर्ण
पुस्तक का मूल्य केवल ५॥=) पांचरुपया ग्यारह आना ।
मैनेजर स्त्रीशिक्षा पुस्तकालय कर्नलगंज प्रयाग।