विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ आनन्द मन्दिर
शास्त्रकार बतलाते हैं कि जब अनेक प्रकार से प्रेम प्यार से स्त्री
प्रसन्न हो और उसकी इच्छा रतिक्रिया के लिये हो तब दोनो
बड़े प्रेम से सभोग मे प्रवृत्त हो ।
समागम के समय स्त्री को उचित है कि शान्त और प्रसन्न
मन से अपने सब अङ्गो की स्थिति को यथावत करके सीधी लेटे जैसा
कि अन्यत्र चित्र मे दिखलाया गया है। गर्भाधान के समय अर्थात्
जिस समय रतिक्रिया समाप्त होने को हो तो स्त्री को बिलकुल सीधा
रहना चाहिये, हाथ पैर आदि अगो को न हिलाना चाहिये ।
इस तरह करने से वातादि सम्पूर्ण दोष अपने अपने
स्थानो मे रहते हैं जिससे बीज के ग्रहण करने मे सुभीता होता है।
आयुर्वेद बतलाता है कि नीची ऊंची पड़ी हुई व करवट लिये
हुये स्त्री से समागम न करे। कुबड़ेपन से, वात बलवान होने से
योनि मे पीडा होती है। दाहिनी करवट मे कफयोनि के मुख को
ढक लेता है। वाये करवट मे पित्त रक्त और शुक्र मे दाह पैदा
करता है जिसमे गर्भ को हानि पहुचती है। यदि गर्भ न भी रहा
तो स्त्री के गर्भाशय को हानि पहुचती है और अनेक प्रकार के
रोग उत्पन्न होते हैं। पुरुष को भी वीर्य और इन्द्री सम्बन्धी
रोग उत्पन्न होते हैं।
गर्भाधान के समय की स्थिति
जिस समय पुरुष का वीर्यपात होने का समय आये उस
समय स्त्री और पुरुष दोनो बिलकुल सीधे हो । स्त्री के मुह पर पति