विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
१६० आनन्द मन्दिर
ऋतु धर्म्म का समय
मासेनोपचितंकाले धमनी धमनीभ्यांतदार्त्तवम् ।
ईषद्रक्तं विवर्णञ्च वायुर्योनि मुखं नयेत् ॥
अर्थात्—आर्त्तव काल यानी मासिक धर्म्म का समय बारह
वर्ष से लेकर साठ वर्ष पर्य्यन्त रहता है, वह महीने के महीने इकट्ठा
होकर वायु के योग से नाड़ियो द्वारा कुछ लाल और विकृत वर्ण
अथवा बिना गन्ध का योनि के मुख से बाहर निकलता है। गर्भ
रूप फल उत्पन्न करने से इस ऋतु को पुष्प कहते हैं इसी कारण
ऋतुमती स्त्री को पुष्पवती कहा है।
ऋतु धर्म्म का बन्द होना
तद्वर्षाद्द्वादशात्काले वर्त्तमानमसृक्पुनः ।
जरापक्के शरीराणां याति पंचाशतः क्षयम् ॥
अर्थात्—ऋतु धर्म्म का रक्त बारह वर्ष से प्रकट होकर
तदनन्तर जैसे जैसे शरीर मे सप्तधातु बढ़कर शरीर बढ़ता है उसी
प्रकार ऋतु का रक्त बढ़कर महीने के महीने निकलता है और
पचास वर्ष की अवस्था होने के बाद बुढ़ापे से शरीर तथा धातु
थकित होकर जिस भांति क्रमश. धीरे धीरे बढ़ा था उसी प्रकार
क्रम से क्षीण होकर साठ वर्ष की अवस्था होने तक बन्द होजाता है।
यह नियम आरोग्य स्त्री के ऋतु धर्म का है। जो अधिक प्रसग
अमावस या पूर्णिमा को शिर मे ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६१
के कारण रोगी होजाती हैं उन स्त्रियों का मासिक धर्म समय के
पहिले ही बन्द होजाता है और रोग के कारण अधिक तथा कम
भी होजाता है और अधिक दिनों तक जारी रहता है तथा जवानी
में ही बिलकुल बन्द होजाता है। इसी प्रकार जो लड़कियां कुसङ्गति
में पड़ जाती हैं ओर कामोद्दीपन करने वाले गन्दे किस्सा कहानी
उपन्यास पढ़ा तथा सुना करती हैं वे बारह वर्ष की अवस्था के
पहिले ही ऋतुमती होने लगती हैं और उनकी इच्छा रतिक्रिया
की ओर दौड़ती है। उनको कामोत्तेजन होने का कोई नियम
नहीं है जो स्त्रियां इस प्रकार कुसङ्गति में पड़ जाती हैं वे
अनियम ऋतुधर्म से होने लगती हैं और उनके ऋतुधर्म बन्द
होने का भी कोई नियम नहीं है। यदि विवाह होने पर उन्हें
योग्य पति मिल जाये और वे उन्हें योग्य बना कर अच्छे अच्छे
धार्मिक ग्रन्थों की शिक्षा देकर नियम पूर्वक रतिक्रिया करे तो वे
सुधर सकती हैं और सन्तान भी अच्छी हो सकती है। क्योंकि
कामोद्दीपन में मानसिक वृत्तियों का जबर्दस्त असर पड़ता है।
स्त्रियों को योग्य अथवा अयोग्य बनाने वाले पुरुष ही हैं,
बाल्यावस्था में माता पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिये
कि लड़कियां गन्दी पुस्तकें न पढ़ने पावे। तथा दुष्ट लड़कों
लड़कियों के साथ न रहने पावे। आज कल तो लड़कियां
लड़कों के साथ ही पढ़ा करती हैं और स्वतन्त्र होती जाती हैं इन्ही
कारणों से ऋतुधर्म्म का भी कुछ नियम नहीं रहा। जल्दी आरम्भ
होता है ओर जल्दी बन्द होता है तथा ऋतुधर्म्म में अनेक प्रकार
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की शिकायते उत्पन्न होजाती हैं इसी कारण सैकड़ा पीछे निन्नानवे
स्त्रिया रोगी देखी जाती है । इनमे प्रायः विवाह होने के वाद
अधिक प्रसग से रोगी होनेवालियो की सख्या अधिक पाई
जाती है ।
इसी प्रकार पुरुषो का हाल है जो वाल्यावस्था मे सुसगति
मे रहने से वचगये तो विवाह होने पर अधिक प्रसंग और
अनियम प्रसंग करके शक्तिहीन निर्वल और दुर्वल होजाते हैं
फिर कुछ दिनो मे प्रतिदिन कई कई वार मैथुन कर महीने मे
एक वार भी ऋतुस्नाता स्त्री की इच्छा पूरी नही कर कसते ।
यदि स्त्री के पास गये भी तो शीघ्रपात के कारण स्त्री का
म्पर्श करते ही स्खलित होजाते है इस कारण उनके सन्तान
नही होती । ऐसे पुरुषो की भी सख्या कम नही है ।
मेरे पास अनेक स्त्रिया अपने पति के इलाज के लिये आया
करती है और वे कहती हैं कि महीना होने के वाद जव हमारी
इच्छा होती है तव तो हमारे पति हमसे वोलते नही और जब
उनकी इच्छा होती है तव वोलते हैं तो शीघ्रही स्खलित होजाते
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने का उचित और उत्तम आसन । पृ० २५९ (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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आनन्द
मन्दिर
ग्यारहवां अध्याय
—:o:—
९९
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६३
होता है कि उनकी इच्छा समय पर नहीं होती इसलिये वे ऋतु-
स्नान के बाद स्त्री की इच्छा होने पर सभोग नहीं कर सकते ।
कुसमय उनकी इच्छा होती है, वह झूठी इच्छा है इसलिये
स्त्री का स्पर्श करते ही स्खलित होजाते हैं ।
पुरुषों के इस रोग का भी कारण अधिक संभोग ही है
उनके रोगी फार्म देखने से मालूम होता है कि उन्होंने विवाह
होने ही कुछ दिनो तक प्रति दिन अनेक प्रकार से विपरीत रति-
क्रिया करके अपने शरीर का सत्यानाश मार लिया अब यह
दशा होगई कि स्त्री की इच्छा होने पर महीने मे एक बार भी
गर्भाधान क्रिया नहीं कर सकते ।
इसके विषय में पीछे लिखा जा चुका है आयुर्वेद
बतलाता है कि संभोग के समय पति पत्नी दोनों एक साथ
स्खलित हो तो नपुंसक सन्तान उत्पन्न होती है अतएव आयुर्वेद
का कथन मानने योग्य है और मनगढत कामशास्त्र सम्बन्धी
पुस्तको का मत मानने के योग्य नहीं क्योंकि इससे अनेक प्रकार
की हानि होती है ।
स्त्रियां अधिक संभोग की इच्छुक नहीं
सन्तान की इच्छुक होती हैं
जो मूर्ख पति अपनी स्त्रियो के स्वभाव को विषयी बतादेते
हैं अथवा जो स्त्रिया दुष्ट पुरुषो अथवा दुष्ट स्त्रियो की कुत्संगति
से दुष्ट स्वभाव की होजाती हैं उनकी बात ही और है । वर्ना
१६४ आनन्द मन्दिर
वैद्यकशास्त्र बतलाता है कि स्त्रियां अधिक प्रसंग की इच्छुक
नहीं होतीं। नियम पूर्वक संभोग से गर्भवती होने की इच्छुक
होती हैं और जो पति अपनी स्त्रियों को अधिक प्रसंग से तृप्त
करना चाहते हैं उनकी स्त्रियां अधिक प्रसंग से दुःखी होकर रोगी
तो हो ही जाती हैं किन्तु पति से विरक्त भी होजाती हैं और
सभोग से डरती रहती हैं। वे नियम पूर्वक संभोग की इच्छुक
रहती हैं। विषयी पति से तंग आकर उदासीन रहती हैं, अधिक
प्रसंग के कारण सन्तान हीन होजाती हैं उनके कभी गर्भ नहीं
रहता, यदि रहा भी तो गर्भस्राव व गर्भपात हो जाता है। नियम
पूर्वक सम्भोग करने वाला पति सम्भोग से पत्नी की तृप्ति कर
सकता है और अधिक प्रसंग करने वाला पति अपनी स्त्री के
प्रति कलंकित होने का कारण बनता है।
स्त्रियों का कामोद्दीपन
स्त्रियों को कामोद्दीपन ऋतुस्नान के दिन से ही होता है यदि
उस समय पति का संयोग न हो अर्थात् पति पास हो और
सम्भोग न करे तो स्त्री उसे शक्तिहीन (नपुंसक) समझने लगती
है और निराश होजाती है तथा रोगी होजाती है। क्योंकि वक्त
पर पति उसे सन्तुष्ट नहीं कर पाता है।
स्त्रियों में कामोद्दीपन (सभोग की इच्छा) ऋतुस्नान
के बाद ही गर्भधारण के लिये होता है इसके विषय में
आयुर्वेद बतलाता है।
व्यभिचार अर्थात् परस्त्रीगमन का परिणाम । पृ० १०४ (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६५
पीत प्रसन्न वदनां प्रक्लिन्नात्म मुखद्विजाम् ।
नरकामः प्रियकथांस्रस्त कुच्यक्षिमूर्द्धजाम् ॥
किसी किसी स्त्री को मासिकधर्म्म तो होता है परन्तु दिख-
लाई नहीं देता उसे “अदृष्टार्तव” कहते हैं। शास्त्रकारों ने ऐसी
ऋतुमती स्त्री के लक्षण ऊपर के श्लोक में इस प्रकार बतलाए हैं:-
अर्थात्—जिस स्त्री का मुख पीला मालूम हो और वह
स्त्री प्रसन्न मुख दिखलाई दे, दांतों के मसूढ़े पसीजते हों और
उसे पुरुष सम्बन्धी तथा विषय सम्बन्धी बातें अच्छी लगें ऐसी
बातों से प्रसन्न और कुछ नेत्र तथा केश शिथिल मालूम
पड़ने लगें उसे ऋतुमती समझना ।
स्फुरद्भुजस्तन श्रोणिनाभ्यूरुज घनस्फिजम् ।
हर्षोत्सुक्यपरां चापि विद्यादृतुमतीं स्त्रियम् ॥
भुजा, स्तन, कमर, नाभि, ऊरु जंघाएं और कूले ये सब
अंग कंपित होने लगें अर्थात् फड़कने लगें और मैथुन करने की
अत्यन्त इच्छा हो, स्त्री के सब लक्षण अदृश्य जो दिखलाई
न दे ऐसे ऋतुधर्म्म होने के हैं। जो इस प्रकार से ऋतुधर्म्म मे
होती हैं उनके मासिकधर्म्म का रक्त दिखलाई नहीं देता परन्तु
वे होती हर महीने हैं।
ऐसी अनेक स्त्रियां मेरे देखने में आई जिनको प्रकट में
मासिकधर्म्म नही होता परन्तु उनमें हर महीने ऊपर लिखे लक्षण
मालूम होते हैं।
१६६ \qquad\qquad आनन्द मन्दिर
इस विषय मे विस्तार पूर्वक लिखा जाये तो ‘पुस्तक , बहुत
बढ़ जावेगी इसलिये यहां प्रसगं वश इस विषय को सूक्ष्म करके
इसलिये लिख दिया। स्त्री मे कामोद्दीपन केवल गर्भाधान के लिये
ऋतु होने पर ही होता है । ऋतु स्नान के बाद जब तक
गर्भाधान का समय रहता हैं तब तक स्त्री की इच्छा सम्भोग के
लिये होती है। गर्भ रह जाने पर फिर इच्छा नही होती परन्तु
जिन पुरुषो ने अधिक प्रसंग करके अपनी स्त्रियो की आदत बिगाड
दी है उनकी इच्छा का कहना ही क्या है। स्त्री की इच्छा हो या
न हो पति जबर्दस्ती गर्भ रह जाने पर भी प्रसग करते ही है।
मैथुनेच्छा की शान्ति
ऋतु स्नान से शुद्ध हुई स्त्री मे यदि गर्भधारण होजावे तो
फिर उसकी सम्भोग की इच्छा शान्त हो जाती है यदि गर्भ न
रहे तो बारह दिन तक इच्छा होती है.—
आयुर्वेद बतलाता है —
नियतेदिवसेतीते संकुचत्यम्बुजं यथा ।
ऋतौव्यतीतेनार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा ॥
अर्थात्—जैसे फूलने के पाच सात दिन पीछे कमल स्वय
मुरझा जाता है तथा जैसे दिन मे फूला हुआ कमल सायकाल
को अपने आप ही मुद जाता है उसी प्रकार ऋतु के व्यतीत
हो जाने से अर्थात् बारह रात्रि व्यतीत होजाने पर स्त्री का गर्भा-
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शय संकुचित होजाता है। इसी कारण फिर वह गर्भधारण नहीं
कर सकती और संभोग की भी इच्छा नही करती। जब गर्भाशय
का मुख बन्द होजाता है तब पुरुष का वीर्य गर्भाशय के भीतर
नहीं जा सकता और स्त्री की इच्छा भी नहीं होती। बिना स्त्री
की इच्छा हुए गर्भ रहता ही नहीं।
उचित प्रसंग के लक्षण
जिस भोग के पश्चात आनंद आवे, शरीर मे स्फूर्ति और
नूतन शक्ति प्राप्त हो. शरीर अधिक फुरतीला और काम करने के
योग्य हो, व्यायाम या दिमागी मेहनत की अधिक रुचि हो।
लिंगेन्द्रिय मे थोडी देर पीछे शक्ति और उत्तेजना का अनुभव हो तो
यह समझना चाहिये कि सहवास स्वास्थ्य के नियमानुसार हुआ
है। यदि भोग क्रिया के पीछे थकान, शिर का भारी पन अनुभव
हो तो जान लेना चाहिये कि उचित सीमा उलघन की गई है।
क्यो साहब ? छाती पर हाथ रखकर सच्चे पन से बताइये तो
सही कि आपने इस नियम की पालना की है, फिर आपको सदा
औषधियो की आवश्यकता न रहे तो क्या हो ? दूसरा नियम
अधिकता जानने का यह भी है कि जब तक सच्ची रुचि न हो
सहवास न करे। सच्ची रुचि वह है जो बिना स्त्री के साथ हंसे
खेले, बिना किस्सा कहानियो के सुने, हृदय मे ऐसे विचारो को
बिना लाए अपने आप रुचि उत्पन्न हो और वह रुचि पति को
मैथुन की ओर प्रेरित करे।
:
स्मरण रहे कि थोड़ी सी थकावट और सुस्ती जो थोड़ी देर
के वास्ते जान पड़ती है उस में वेण्तलाली (अधिकता) जाहिर
नहीं होती। न यह अस्वास्थ्यकर होती है। दुग्धादि से वह सुस्ती
भी मिट जाती है। जब भोग के पीछे शिर में दर्द होने लगे तो
यह अत्यन्त दुर्बलता का लक्षण है इन नियमों पर ध्यान करने से
और सोचने विचारने से ज्ञात होगा कि प्रति सैकड़ा ९९ मनुष्य
उचित सीमा से बढ़ कर संभोग करने के कारण कैसे २ रोगों में
फंस रहे हैं। आज कल के दुर्बलों के लिये कुछ महीनों के पश्चात
सीमा अन्त कहा जा सकता है। लाखों स्त्रियों के इलाज से उनकी
जबानी मालूम हुआ है कि विषयी लोग नाना तरह के कष्ट उठाते
हुए भी इतनी देर संताप न कर सकें यह उनकी इच्छा है। परन्तु
चाहिए यह कि स्वास्थ्य ओर आनन्द की ओर पग धरें अथवा रोग
और दुःख की ओर दौड़ते जायें। विषयी पुरुषों के वास्ते जो किसी
की नहीं सुना करते हैं उनमें इतना ही निवेदन है कि महीने में
एक दो बार सन्तान उत्पत्ति के लिये गर्भाधान करें जब कि स्त्री
ऋतुवती होकर शुद्ध हो। अन्यथा शीघ्र ही हाथ मल कर
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ईश्वर भजन । पृ० १११ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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