वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
भूमिका ४५
सकता है। ठीक उसीप्रकार सत्, चित् और आनन्द इन तीन शब्दों के
माध्यम से ब्रह्म का स्वरूप प्रतिपादित किया जा सकता है। श्रुति वाक्य इस
विषय में प्रमाण हैं-
(1) सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1)
(2) विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (बृहदारण्यकोपनिषद्-3/9/28)
(3) आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (तैत्तिरीयोपनिषद्-3/6)
छान्दोग्योपनिषद्कार का इस विषय में कथन है-सदेव सोम्येदमग्र
आसीदेकमेवाद्वितीयम् (6/2/1) अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में एक अद्वितीय
तत्त्व की सत्ता थी। वेदान्तदर्शन के अनुसार वह सत्ता केवल ब्रह्म की थी।
इस प्रसंग में सत् की व्याख्या करते हुए आचार्य शङ्कर कहते हैं-सत् उसे
कहा जाता है जो तीनों कालों में विद्यमान हो तथा ब्रह्म ही एकमात्र ऐसी
वस्तु है जिसका अस्तित्व तीनों कालों में विद्यमान रहता है। यह न केवल
सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान था, अपितु वर्तमान में भी इसकी स्थिति है
और प्रलयकाल के पश्चात् भी रहेगा। यह वस्तुतः कालातीत यथार्थसत्ता है।
इसके अतिरिक्त ब्रह्म चिद्रूप है। जो ज्ञानवाची 'चिती संज्ञाने' धातु से
क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। इसीलिए शङ्कराचार्य आदि विद्वानों ने
इसे ज्ञानस्वरूप माना है। श्रुति इसे 'विज्ञान' शब्द के माध्यम से कहती है
(विज्ञानमानन्दं ब्रह्म-बृहदा० 3/9/28)। विज्ञान शब्द का सामान्य अर्थ
विशिष्ट या विशुद्धज्ञान भी किया जा सकता है। अतः ब्रह्म विशुद्ध या
विशिष्टज्ञानस्वरूप है।
'चित्' का एक अर्थ चैतन्य भी है, जिससे ब्रह्म का जडरहित होना
अभिव्यक्त होता है। अतः संसार के सभी प्राणियों एवं वनस्पति आदि में जो
चैतन्य प्रतीत होता है, वह चित्स्वरूप ब्रह्म के कारण ही है, क्योंकि
सर्वव्यापक होने से उसकी सत्ता सम्पूर्णसृष्टि के कण-कण में है। कुछ
विद्वानों ने 'चित्' शब्द का प्रकाश अर्थ भी किया है (स्वप्रकाशत्वं
चित्त्वम्-ब्रह्मसूत्र भामतीटीका-वाचस्पतिमिश्र 1/1/1)। मुण्डकोपनिषद् ने ब्रह्म
की ज्योतिषां ज्योतिः कहकर व्याख्या की है (मुण्डकोपनिषद्-2/2/9)
इसप्रकार ब्रह्म के लिए प्रयुक्त 'चित्' शब्द विज्ञान, ज्ञान, चैतन्य तथा
स्वप्रकाशत्व आदि अर्थों को अभिव्यक्त करता है। इससे ब्रह्म की सत्ता,
ज्ञानरूपता एवं स्वयंप्रकाशत्व आदि विशेषताएँ प्रकट होती हैं। ब्रह्म के
स्वरूप की व्याख्या में तीसरे 'आनन्द' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
४६ वेदान्तसार
उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं वेदान्त के सभी ग्रन्थों में इसके इस स्वरूप को
मान्यता प्रदान की गई है। तैत्तिरीयोपनिषद् का इस विषय में स्पष्टरूप से
कथन है—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् (3/6)। यहाँ आनन्द शब्द ब्रह्म में
आनन्द की प्रचुरता एवं पूर्णता को अभिव्यक्त करता है। बृहदारण्यकोपनिषद्
ने भी ब्रह्म की 'सर्वोच्च आनन्द' कहकर व्याख्या की है-(4/3/32)
इसके अतिरिक्त ब्रह्म के लिए 'अनन्तम्' पद का प्रयोग भी श्रुतियों ने
किया है- (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म-तैत्तिरीयोपनिषद्-2/1/1)। अनन्त का
अभिप्राय है जिसका कोई अन्त अर्थात् सीमा न हो। अतः वह सर्वव्यापक,
नित्य एवं सर्वात्मक है।
वेदान्तदर्शन में ब्रह्म की बीजशक्ति के रूप में माया अथवा अविद्या का
उल्लेख किया गया है। इसकी उपाधि से युक्त ब्रह्म ही 'ईश्वर' कहलाता
है। यहाँ इसी ईश्वर को सम्पूर्ण चराचरजगत् की रचना का निमित्त और
उपादानकारण माना गया है। अपनी प्रधानता की स्थिति में चैतन्यरूप ब्रह्म
निमित्तकारण तथा अपनी उपाधि की प्रधानता की स्थिति में उपादानकरण
होता है। ठीक उस मकड़ी के समान जो अपने शरीर के चैतन्य के कारण
तन्तुजाल का निमित्तकारण होती है तथा शरीर से निकलने वाले तरलपदार्थ
से तन्तुजाल का निर्माण करने से उपादानकारण भी है।
यह दर्शन ब्रह्म को सर्वशक्तिमान मानता है। इसके अनुसार सृष्टि की
रचना के लिए ब्रह्म को किसी बाह्यसत्ता की आवश्यकता नहीं होती है।
मुण्डकोपनिषद् के अनुसार 'जिसप्रकार जीवितपुरुष के शरीर से केश और
रोम स्वतः उत्पन्न होते हैं, ठीक उसीप्रकार अक्षरब्रह्म से यह सम्पूर्ण
चराचरजगत् उत्पन्न होता है।¹ इस जगत् की रचना करने के पश्चात् वह
इसी में अनुप्रविष्ट हो जाता है।² इसीकारण एक होते हुए भी इसकी सभी
यहाँ भूतों, पदार्थों एवं स्थानों में अर्थात् जगत् के कण-कण में सत्ता को
स्वीकार किया गया है।³ वही यह प्राणियों के कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म का
- मुण्डकोपनिषद् 1/1/7
- तत् सृष्ट्वा तदैवानुप्राविशत् तैत्तिरीयोपनिषद् 2/6/1
- एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।। (श्वेताश्वतरोपनिषद्,
6/11)
भूमिका ४७
साक्षी है तथा उन्हें कर्म का फल प्रदान करता है। शङ्कराचार्य के अनुसार
'इस संसाररूपी वृक्ष का मूल ब्रह्म ही है।'
इसके अतिरिक्त ब्रह्म को यहाँ 'अवाङ्मनसगोचर' कहा गया है, क्योंकि
उसे न तो आँखों से देखा जा सकता है, न ही मन और वाणी उसे जानने
में समर्थ हैं। वह अत्यन्तसूक्ष्म होने के कारण अविज्ञेय है तथा अकथनीय
है। फिर भी योगविद्या से योग्य गुरु के मार्गदर्शन में उसका साक्षात्कार किया
जा सकता है, किन्तु उसके स्वरूप की व्याख्या असम्भव है। गूँगे के गुड़
के समान उसके आनन्द को केवल अनुभव किया जा सकता है।
इसीकारण उपनिषदों में ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने के लिए 'नेति
नेति' की शैली को अपनाया गया है। यहाँ 'नेति नेति' का दो बार प्रयोग
माया एवं उसके प्रपञ्च का निराकरण करके एकमात्र ब्रह्म की सत्ता को
इंगित करने के लिए विशेष अभिप्राय हेतु किया गया है। वेदान्त के
अनुसार-यद्यपि यह परमतत्त्व ब्रह्म एक है-'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म'
(छान्दोग्योपनिषद्-6/2/1), किन्तु पारमार्थिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से
इसकी सगुण और निर्गुण दो रूपों में परिकल्पना की गई है। माया की
उपाधि से विशिष्टब्रह्म ही ईश्वर सगुण, साकार या सविशेष कहा गया है
तथा इससे रहित ब्रह्म ही निर्गुण, निराकार या निर्विशेष माना गया है।
उपनिषदों में ब्रह्म का ध्यान करने का सर्वश्रेष्ठ आधार 'ओम्' या
'ओङ्कार' को माना गया है-'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षुभिः
(ध्यानबिन्दूपनिषद्-2) इसका ध्यान करने से साधक ब्रह्मलोक को प्राप्त
करता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म को मुक्तजीवों का आश्रय कहा गया है
(मुण्डकोपनिषद्-2/2/8)। ब्रह्म का साक्षात्कार होने के पश्चात् साधक के
हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं तथा उसके सभी संशय दूर हो जाते हैं।
ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति ठीक उसीप्रकार ब्रह्म ही हो जाता है,
जिसप्रकार बहती हुई नदियाँ समुद्र में मिलकर अपने नामरूप को खोकर
उसमें एकाकार हो जाती हैं। ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करके व्यक्ति का पुनः
इस संसार में आगमन नहीं होता है-'न स पुनरावर्तते'। इसीकारण ब्रह्म को
आश्रय, अमृतमय एवं अविनश्वर कहा गया है। गीता ने भी इस बात का
अनुमोदन किया है-
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ (श्रीमद्भगवद्गीता 8/21)
४८ वेदान्तसार
(२) आत्मा-वेदान्तदर्शन के प्रमाणरूप उपनिषद्ग्रन्थों में आत्मा के
स्वरूप पर विशद चर्चा की गई है। यहाँ इसके लिए प्रायः उन्हीं विशेषणों
का प्रयोग किया गया है, जो ब्रह्म के लिए प्रयुक्त हुए हैं। इस दृष्टि से इसे
ब्रह्म का ही दूसरा नाम भी कहा जा सकता है। उपनिषदों में इसे 'अयमात्मा
ब्रह्म' कहकर प्रत्यक्षतः स्वीकार भी किया गया है। ब्रह्म के समान ही आत्मा
के अस्तित्व को भी 'मैं हूँ' अथवा 'मैं नहीं हूँ' इस अनुभव द्वारा स्वतः-
सिद्ध माना गया है। इसके अनुसार-जिसप्रकार सूर्य को दिखाने के लिए
दीपक की आवश्यकता नहीं होती है, ठीक उसीप्रकार आत्मा के अस्तित्व
को सिद्ध करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है। इसीकारण
बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने कहा-‘अरे विज्ञातारं केन विजानीयात्’
(2/4/14) अर्थात् 'जो सबको जानने वाला है उसे हम किस साधन द्वारा
जान सकते हैं?'
आत्मा भी ब्रह्म के समान ही सत्-चित् एवं आनन्दस्वरूप है। वर्तमान,
भूत और भविष्यत तीनों कालों में अबाधितरूप में विद्यमान रहने के कारण
इसे सत् कहा गया है।¹ साथ ही इस शब्द से इसके अमर, नित्य, शाश्वत,
पुराण तथा अजन्मास्वरूप पर भी प्रकाश पड़ता है। आत्मा की यहाँ
स्वयम्प्रकाशस्वरूप कहकर प्रशंसा की गई है। पञ्चदशीकार विद्यारण्यस्वामी
ने आत्मा के इस वैशिष्ट्य को नृत्यशाला में रखे गए दीपक का उदाहरण
देकर अत्यन्त सुंदर ढंग से प्रतिपादित किया है। तदनुसार- 'जिसप्रकार
नृत्यशाला में रखा हुआ दीपक, नृत्यशाला के स्वामी, सहृदय सामाजिक,
तथा नर्तकी को समानरूप से प्रकाशित करता है एवं स्वामी की अनुपस्थिति
में भी स्वयं प्रदीप्त होता रहता है। ठीक उसीप्रकार यह साक्षीरूप आत्मा,
अहंकार, बुद्धि एवं तत्तत् विषयों को प्रकाशित करता है तथा सुषुप्ति
अवस्था में अहंकार आदि के विद्यमान न होने पर भी स्वयं प्रकाशित होता
रहता है।
इसके अतिरिक्त आत्मा को अच्छेद्य, अग्राह्य, अक्लेद्य तथा अशोष्य
बताते हुए नित्य, सर्वव्यापी, स्थाणु, अचल एवं सनातन कहा गया है।²
- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (1/2/18) - अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥ (श्रीमद्भगवद्गीता-2/1/3)।
भूमिका ४९
अद्वैतवेदान्त के अनुसार आत्मा तीन प्रकार के शरीर-स्थूल, सूक्ष्म तथा
कारण एवं पाँच प्रकार के कोशों से अलग है, किन्तु जीव, अज्ञानवश एवं
तादात्म्य के कारण शरीरत्रय तथा पञ्चकोशों को ही किसी न किसी रूप में
आत्मा समझने लगता है। यह अविवेक ही उसके भवबन्धन का कारण
बनता है। सद्गुरु के उपदेश द्वारा साधक आत्मा को इनसे अलग समझ लेता
है तथा इस स्थिति में आत्मज्ञान होने पर वह ब्रह्म ही हो जाता है।
इसी अभिप्राय को पञ्चदशीकार ने अत्यन्त सुन्दरढंग से इसप्रकार प्रस्तुत
किया है-
यथा मुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः।
शरीरतृतीयाद्धीरैः परं ब्रह्मैव जायते॥ (पञ्चदशी 1/42)
अर्थात् जिसप्रकार मूँज से इषिका (सिरकी) युक्तिपूर्वक निकाल ली
जाती है। उसीप्रकार धीरपुरुष आत्मा को तीन प्रकार के शरीरों से पृथक्
जान लेता है। उस स्थिति में वह परमब्रह्म हो जाता है। इसके अतिरिक्त
उपनिषदों में आत्मा को विभु, सर्वगत, अत्यन्तसूक्ष्म, अदृष्ट, अव्यवहार्य,
अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अखण्ड, शुद्ध, अन्तर्यामी, कूटस्थ, अविनाशी,
विज्ञानघन, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव के रूप में भी वर्णित किया गया है।¹
अद्वैतवेदान्त के अनुयायियों ने आत्मा को 'परममहत्' परिमाण वाला माना
है। साथ ही इन्होंने आत्मा में श्रुतिप्रमाणों एवं युक्तियों द्वारा एकत्व का
प्रतिपादन किया है। यहाँ सांख्य के 'पुरुष बहुत्व' का यह कहकर खण्डन
किया गया है कि जिसप्रकार एक अग्नि विभिन्न स्थानों एवं पदार्थों में
अनेकरूपों में उद्भासित होता है, जबकि वास्तव में वह एक ही है। ठीक
उसीप्रकार सभी प्राणियों में रहने वाला यह आत्मा भी एक ही है।
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥
(कठो० 2/5/8)
(3) माया (अज्ञान)- इसी का दूसरा नाम अज्ञान भी है। मायावाद
अद्वैतवेदान्त का प्रमुख सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के आधार पर यह दर्शन
'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' का तात्त्विक एवं सारगर्भित विवेचन करता है। इस
दृष्टि से इसे वेदान्तचिन्तन का मूल आधार भी कह सकते हैं। वेदान्त के
- कठोपनिषद्- 1/3/10-11, मुण्डकोपनिषद्-1/1/6, माण्डूक्योपनिषद्-6
५० वेदान्तसार
ग्रन्थों में इसे भ्रान्ति, अविद्या, तमस्, मिथ्याज्ञान, विपर्ययमोह, अग्रहण तथा
प्रकृति आदि नामों से अभिहित किया गया है। वस्तुतः वेदान्त की दृष्टि से
माया, अविद्या तथा अज्ञान ये तीनों शब्द समानार्थक माने गए हैं। अतः एक
ही अभिप्राय की अभिव्यक्ति करते हैं।
श्रुति एवं स्मृति के आधार पर माया को अनादि, अनिर्वचनीय, भावरूप
और मिथ्या कहा गया है। यह सत्त्व, रजस् एवं तमस् इन तीन गुणों के
कारण त्रिगुणात्मिका है। इसकी आवरण एवं विक्षेप दो शक्तियाँ हैं। इनमें से
प्रथम आवरणशक्ति वस्तु के यथार्थस्वरूप को आवृत कर लेती है तथा
विक्षेपशक्ति द्वारा जगत् का निर्माण किया जाता है। अद्वैतवेदान्त के अर्वाचीन
ग्रन्थों में 'माया' के स्थान पर 'अज्ञान' शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः
हम उसी के आधार पर 'अज्ञान' के स्वरूप का प्रतिपादन कर रहे हैं-
आचार्य सदानन्द के वेदान्तसार में 'अज्ञान' का लक्षण इस प्रकार किया
गया है-
“अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधी भावरूपं
यत्किञ्चिदिति” अर्थात् अज्ञान सत् एवं असत् से भिन्न अर्थात् अनिर्वचनीय
है। तीन गुणों वाला, ज्ञानविरोधी, भावरूप तथा 'कुछ है', इस स्वरूप वाला
है। अतः इस लक्षण के आधार पर अज्ञान अथवा माया का विवेचन हम
इसप्रकार कर सकते हैं-
(अ) सदसद्भ्यामनिर्वचनीयम्-अज्ञान को सत् और असत् दोनों से
भिन्न होने के कारण अनिर्वचनीय कहा गया है, क्योंकि यदि हम इसे सत्
रूप मानें तो इसका ब्रह्म के समान बाध नहीं होना चाहिए। जबकि
आत्मज्ञान होने पर इसकी निवृत्ति हो जाती है। इसलिए यह सत् नहीं हो
सकता और यदि इसे असत् माना जाए तो वन्ध्यापुत्र के समान इसकी
प्रतीति ही नहीं होनी चाहिए, जबकि किसी वस्तु के न जानने पर 'अहमज्ञः'
इस रूप में हमें अनुभव वाक्यों द्वारा इसकी प्रतीति होती है। अतः अज्ञान
को असद्रूप भी नहीं माना जा सकता है। परिणामस्वरूप सदसद् से
विलक्षण होने के कारण इसे अनिर्वचनीय कहा गया है। माया अथवा अज्ञान
की अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन करते हुए शङ्कराचार्य कहते हैं-
सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो
भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो।
भूमिका ५१
साङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका नो
महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा॥ (विवेक चूडामणि, 111)
‘अर्थात् माया न सत् है, न असत् है तथा सत्-असत् के रूप में
उभयात्मक भी नहीं है। यह न साङ्ग है न अङ्गरहित है न उभयरूप ही है,
अपितु यह अत्यन्त अद्भुत तथा अनिर्वचनीयरूप है।’
(ब) त्रिगुणात्मिका-वेदान्त, माया अथवा अज्ञान को सत्त्वगुण, रजोगुण
एवं तमोगुण से युक्त मानता है। जिसे यह श्रुति¹ स्मृति² एवं अनुभव के
आधार पर सिद्ध करता है। सत्कार्यवाद के सिद्धान्त के अनुसार कार्य में
दिखायी देने वाले गुण कारण में भी विद्यमान रहते हैं। अतः अज्ञान अथवा
माया से उत्पन्न होने वाले तेज में लोहित, जल में शुक्ल तथा पृथिवी
(अन्न) में कृष्ण गुण विद्यमानं हैं। वेदान्त इसी सिद्धान्त को मान्यता प्रदान
करता है। इस विषय में छान्दोग्योपनिषद् में भी उल्लेख है-
“यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्य”
(6/4/1) अतः अज्ञान अथवा माया की त्रिगुणात्मकता सिद्ध होती है।
(स) ज्ञानविरोधी-वेदान्तदर्शन तमोगुण-प्रधान आवरण एवं विक्षेप
शक्तिद्वय से युक्त अज्ञान से उपहित (आवृत) चैतन्य अर्थात् ब्रह्म से सृष्टि
की उत्पत्ति मानता है। अतः अज्ञान ही सृष्टि का मूलकारण है। यहाँ
एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है, दृश्यमान यह सम्पूर्णजगत् मिथ्या है।³ अज्ञान ब्रह्म
के साक्षात्कार में बाधक है। इसलिए इसे ज्ञानविरोधी कहा गया है, क्योंकि
श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि साधनों का अनुष्ठान करता हुआ साधक
जब ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है तो उसका अज्ञान निवृत्त हो जाता है।
अतः माया अथवा अज्ञान को ज्ञान के माध्यम से बाधित किया जा सकता
है। ठीक उसीप्रकार जैसे सूर्य के प्रकाश द्वारा अंधकार दूर हो जाता है।
(द) भावरूप- अद्वैतवेदान्त अज्ञान को भावरूप स्वीकार करता है।
इस विषय में चित्सुखाचार्य का कथन है-
अनादि भावरूपं यद् विज्ञानेन विलीयते।
- देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् (श्वेताश्वतरोपनिषद्-1/3)।
- देवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। (श्रीमद्भगवद्गीता 7/14) - ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या।
५२ वेदान्तसार
तदज्ञानमिति प्राज्ञा लक्षणं संप्रचक्षते॥ (चित्सुखी-1/9)
अर्थात् अज्ञान अनादि और भावरूप है। इसकी भावरूपता इसी बात से
सिद्ध होती है कि ज्ञान के उत्पन्न होने पर यह विलीन हो जाता है।
इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के आधार पर भी इसकी
भावरूपता का प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि 'मैं अज्ञ हूँ', 'मैं किसी को
नहीं जानता हूँ' इस रूप में प्रत्यक्ष-अनुभवप्रतीति ही अज्ञान की भावरूपता
को सिद्ध करती है-
प्रत्यक्षं तावदहमज्ञः, अन्यं च न जानामि इत्यपरोक्षावभासदर्शनात्
(पञ्चपादिका विवरण-प्रकाशात्मयति-पृ० 74)
इसीप्रकार अनुमान एवं अर्थापत्तिप्रमाण द्वारा भी इसकी भावरूपता का
प्रतिपादन विद्वानों द्वारा किया गया है। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात् (श्वेताश्वतरो
4/10) इत्यादि श्रुतिवाक्य भी इसकी भावरूपता को ही सिद्ध करते हैं।
(न) यत्किञ्चित्-यद्यपि अज्ञान त्रिगुणात्मक एवं भावरूप है तथापि
इसके सम्बन्ध में 'इदमित्थम्' यह ऐसा ही है, यह नहीं कहा जा सकता है।
इसीलिए वेदान्ताचार्यों ने 'यत्किञ्चित्' कहकर इसके स्वरूप को स्पष्ट करने
का प्रयास किया है। वस्तुतः यही अज्ञान की विलक्षणता एवं अनिर्वचनीयता
भी है। अधिकांश वेदान्ती ब्रह्म को अज्ञान का आश्रय मानते हैं।
(४) अज्ञान के भेद-अद्वैतवेदान्त में उपाधिभेद के आधार पर
व्यावहारिक दृष्टि से अज्ञान के दो भेद माने गए हैं (अ) समष्टिरूप अज्ञान
(ब) व्यष्टिरूप अज्ञान। यहाँ समष्टि से अभिप्राय एक से है तथा व्यष्टि
द्वारा अनेक में आशय ग्रहण किया गया है। जैसे-समष्टिरूप में कहने की
इच्छा से वृक्षों के समूह को वन तथा व्यष्टिरूप में कथन की अभिलाषा से
अलग-अलग वृक्ष को आम, जामुन, पीपल आदि शब्दों से व्यवहृत किया
जाता है। इसीप्रकार समष्टिगत अनेक जलकणों के समूह को 'जलाशय'
तथा व्यष्टिरूप में एक-एक जलकण अथवा वापी, कूप, तडाग आदि अनेक
नामों से पृथक्-पृथक् व्यवहार करते हैं। ठीक उसीप्रकार अन्तःकरण की
उपाधियों से नानारूप में प्रतीत हो रहे जीवगत अज्ञानों की समष्टि के
अभिप्राय से अनेक अज्ञान इसप्रकार का व्यवहार किया जाता है। वास्तव में
अज्ञान एक ही है। केवल उपाधिभेद के कारण उसके लिए एकत्व और
अनेकत्व का व्यवहार होता है।
भूमिका ५३
(५) अज्ञान की शक्तियाँ-अज्ञान की आवरण और विक्षेप नामक
दो शक्तियाँ मानी गई हैं। इनमें आवरणशक्ति द्वारा वस्तु के वास्तविक एवं
सत्यरूप को आच्छादित कर दिया जाता है तथा विक्षेपशक्ति उसमें अनेक
प्रकार के अवास्तविकरूपों का आभास कराती है। जिसे यहाँ रज्जु में सर्प
की भ्रान्ति द्वारा समझाया गया है। तदनुसार अन्धकार में पड़ी हुई रस्सी में
अज्ञान की प्रथम आवरणशक्ति द्वारा उसके वास्तविक एवं सत्यरूप रज्जु को
पहले आच्छादित किया जाता है। तत्पश्चात् अज्ञान की द्वितीय विक्षेपशक्ति
द्वारा अपने सामर्थ्य से उसमें अवास्तविक एवं असत्यरूप सर्प का आभास
कराया जाता है।
ठीक इसीप्रकार अज्ञान की आवरणशक्ति ब्रह्म अथवा आत्मा के
वास्तविकस्वरूप को आच्छादित कर लेती है। तत्पश्चात् इसकी विक्षेपशक्ति
द्वारा इसमें आकाशादि सृष्टिप्रपञ्च की उद्भावना कर दी जाती है। इसप्रकार
सूक्ष्मशरीर से लेकर स्थूलब्रह्माण्ड पर्यन्त नामरूपात्मकजगत् की रचना इसी
विक्षेपशक्ति द्वारा की जाती है। यह सम्पूर्णसृष्टि वस्तुतः पानी के बुलबुले के
समान नाशवान् है। इसी आधार पर यहाँ 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' का उद्घोष
किया गया।
इसके अतिरिक्त आत्मा को कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं सुखदुः खमोहात्मक
इत्यादि सांसारिक तुच्छभावनाओं का अनुभव भी इसी विक्षेपशक्ति के कारण
होता है। जिसप्रकार प्रकाश पड़ने पर व्यक्ति की सर्पविषयक कल्पना
विलीन हो जाती है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान होने पर जगत् की सत्य
परिकल्पना एवं आत्मा के कर्तृत्व आदि की भावना भी विनष्ट हो जाती है।
अतः आत्मा के कर्तृत्व की भावना संसार की वास्तविक प्रतीति दोनों ही
रस्सी में सर्पत्व की भावना के समान पूर्णतया मिथ्या है। इसी अभिप्राय को
भगवद्गीता में इसप्रकार कहा गया है-
"न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः" (5/14)
इसप्रकार यह स्पष्ट है कि अज्ञान आवरण एवं विक्षेपशक्ति द्वारा अपने
आश्रय आत्मा अथवा ब्रह्म का बल प्राप्त करके उसके स्वयं प्रकाशत्व को
आच्छादित कर उसमें ईश्वर, जीव, जगत् की आकृति के रूप में रज्जु में
सर्प के समान मिथ्याप्रपञ्च की सृष्टि करता है।¹
- आच्छाद्य विक्षिपति संस्फुरदात्मरूपं जीवेश्वर जगदाकृतिभिर्मृषैव।
'अज्ञानमावरणविभ्रमशक्तियोगादात्मत्वमात्रविषयाश्रयताबलेन।। (संक्षेपशारीरक 1/20)
५४ वेदान्तसार
इस प्रसङ्ग में एक प्रश्न स्वाभाविकरूप से उठता है कि स्वयंप्रकाश,
चित्स्वरूप, अपरिच्छिन्न ब्रह्म अथवा आत्मा को जड़, परिच्छिन्न, अव्यापक
अज्ञान द्वारा किसप्रकार आवृत किया जाता है? इस सम्बन्ध में
वेदान्तशास्त्रियों ने अत्यन्त सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है-'अज्ञान की
आवरणशक्ति सीमित होते हुए भी असीम आत्मा अथवा ब्रह्म को उसीप्रकार
आवृत कर लेती है, जिसप्रकार विशाल आकार वाले प्रकाशपुञ्ज सूर्य को
मेघ का छोटा सा टुकड़ा आच्छादित कर लेता है। अज्ञानी व्यक्ति, मेघ द्वारा
दृष्टि के आच्छन्न होने पर सूर्य को मेघ से ढका हुआ मानता है, वैसे ही
अज्ञानी व्यक्ति मुक्त आत्मा को बन्धनयुक्त समझता है-
घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं
यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः।
तथा बद्धवद् भाति यो मूढदृष्टेः
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा।। (हस्तामलक-10)
(६) ईश्वर- यह सामान्य सिद्धान्त है कि प्रत्येक कार्य का कोई न
कोई कारण अवश्य होता है। इसलिए सम्पूर्ण चराचरजगत् को देखकर यह
अनुमान सहज ही किया जा सकता है कि इसका भी कोई कारण होना
चाहिए, जिससे यह उत्पन्न हुआ है। वेदान्तदर्शन इस प्रपञ्च का कारण
ईश्वर को स्वीकार करता है। अब प्रश्न उठता है कि यह ईश्वर क्या है?
यद्यपि अद्वैतवेदान्त में एकमात्र चैतन्यतत्त्व परमब्रह्म की सत्ता को सर्वोपरि
स्वीकार किया गया है, जो नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव तथा अविकारी है
तथापि माया की समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त एवं माया की उपाधि
से विवर्जित इन दो भेदों को भी मान्यता प्रदान की गई है।¹ माया की
समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त होकर निर्गुण ब्रह्म ही सगुण बन जाता
है। इसीको 'ईश्वर' संज्ञा दी गई है।² इसे सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वनियन्ता,
अन्तर्यामी, जगत् का कारण एवं आनन्दमय माना गया है। ईश्वर के इन
गुणों एवं विशेषणों का प्रतिपादन श्रुतिग्रन्थों में अनेकशः देखने को मिलता
है।³
- द्विरूपं हि ब्रह्म अवगम्यते, नामरूपविकारभेदोपाधिविशिष्टं, तद्विपरीतं च
सर्वोपाधिविवर्जितम् (ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य- 1/1/11) - तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत्। (पञ्चदशी-3/40)।
- मुण्डकोपनिषद्-1/1/9, कठोपनिषद्-2/3/3, श्रीमद्भगवद्गीता 18/61,
भूमिका ५५
इसी बात को हम इसप्रकार भी कह सकते हैं कि त्रिगुणात्मिका माया
अथवा अज्ञान को शुद्ध-सत्त्वगुण की प्रधानता और अप्रधानता के आधार पर
उत्कृष्ट उपाधि एवं निकृष्ट उपाधि के रूप में जाना जा सकता है। इसी
विशुद्धसत्त्वप्रधान उत्कृष्ट उपाधिभूतसमष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य
(परमब्रह्म) को ईश्वर तथा निष्कृष्टोपाधिभूतव्यष्टिमूलक अज्ञान से उपहित
चैतन्य को अद्वैतवेदान्त 'जीव' मानता है। यहाँ विशुद्धसत्त्वप्रधान से अभिप्राय
रजोगुण एवं तमोगुण से अनभिभूत सत्त्वगुण की प्रधानता से ही ग्रहण करना
चाहिए।
यहाँ इसी ईश्वर को जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण माना
गया है। ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। अपनी शक्ति द्वारा यह कुछ भी करने में
समर्थ है, इसका कोई कारण नहीं है। वह अनादि है। ईश्वर की शक्ति
अलौकिक है, क्योंकि हाथ न होने पर भी वह पदार्थों को ग्रहण कर सकता
है, पैर न होने पर भी उसकी सर्वत्र गति है। वह आँख न होते हुए भी
देखता है, कान न होते हुए भी सुनता है। वह सभी पदार्थों को जानता है
किन्तु उसके यथार्थरूप को जानना अत्यन्त दुष्कर कार्य है।
सम्पूर्ण चराचररूप प्रपञ्चसमूह का साक्षीरूप में ज्ञाता होने के कारण
ईश्वर को 'सर्वज्ञ' कहा गया है। सभी जीवों को उनके कर्म के अनुसार
फल प्रदान करने वाला होने के कारण उसे सर्वेश्वर अथवा ईश्वर तथा
सभी जीवों के हृदय के अन्दर स्थित होकर बुद्धि का नियामक होने से
अन्तर्यामी तथा आनन्द की प्रचुरता होने के कारण इसे आनन्दमय कहा गया
है।
ईश्वर की अलौकिकशक्ति को अद्वैतवेदान्त में 'माया' कहा गया है।
माया की शक्ति से युक्त ईश्वर सृष्टि की रचना में समर्थ होता है। यहाँ
सृष्टि के प्रति ईश्वर को उपादान एवं निमित्तकारण दोनों माना गया है।
जिसप्रकार एक मकड़ी तन्तुकार्य के प्रति अपनी प्रधानता से निमित्तकारण
तथा अपनी उपाधि की प्रधानता से उपादानकारण होती है। उसीप्रकार ईश्वर
भी चैतन्य की प्रधानता से सृष्टि का निमित्तकारण एवं मायारूप उपाधि से
युक्त होने से उपादानकारण होता है। यह सृष्टि उत्पत्ति उसीप्रकार ईश्वर की
बृहदारण्यकोपनिषद्-3/7/15)।
५६ वेदान्तसार
स्वाभाविक क्रिया है, जिसप्रकार पुरुष के शरीर से केश और लोम
स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं।
(७) जीव-जैसा कि पूर्व में हम कह चुके हैं कि अद्वैतवेदान्त
निकृष्टोपाधिभूतव्यष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य को 'जीव' संज्ञा प्रदान
करता है। इसप्रकार जीव अविद्या से अवच्छिन्नचैतन्य है तथा अविद्या, कर्म,
शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इसकी उपाधियाँ हैं। यहाँ इसे शरीरेन्द्रियरूपी
पिञ्जरे का अध्यक्ष तथा कर्मफल का भोक्ता माना गया है। शङ्कराचार्य ने
देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि उपाधियों से परिच्छिन्न परब्रह्म को ही शरीरधारी जीव
कहा है।¹
इसप्रकार ब्रह्म, ईश्वर एवं जीव इन तीनों में तात्त्विकभेद न होकर केवल
उपाधि मात्र का ही भेद है। इनमें जीव स्थूल एवं सूक्ष्मतत्त्वों का संगठन है।
चैतन्य इसकी प्रमुख विशेषता है। दूसरे शब्दों में शरीर, बाह्य और
अन्तःकरणों से युक्त चैतन्य का नाम ही जीव है। इसका तीन प्रकार के
शरीरों से सम्बन्ध रहता है-(1) स्थूल (2) सूक्ष्म एवं (3) कारण शरीर।
जीवभाव को प्राप्त करने की स्थिति में चैतन्य स्थूलशरीर धारण करता है,
जिसे वह मृत्यु के समय साँप की केंचुली के समान छोड़ देता है।
श्रीमद्भगवद्गीता ने इसे पुराने वस्त्र को छोड़ने के समान कहा है-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। (2/22)
स्थूलशरीर एवं सूक्ष्मशरीर का सम्बन्ध पञ्चकर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि तथा
पञ्चप्राण से है, जिसका हम आगे विस्तारपूर्वक उल्लेख करेंगे। स्थूल भोगों
का आयतन होने के कारण स्थूलशरीर को अन्नमयकोश की संज्ञा दी गई
है। मन, बुद्धि आदि उपर्युक्त 17 तत्त्वों से युक्त सूक्ष्मशरीर में मनोमय,
प्राणमय तथा विज्ञानमय कोशों की स्थिति मानी गई है। अद्वैतवेदान्त की
मान्यता के अनुसार जीवात्मा इसी सूक्ष्मशरीर के द्वारा इहलोक का परित्याग
करके परलोक में प्रस्थान करता है अथवा एक स्थूलशरीर को छोड़कर
दूसरे स्थूलशरीर में प्रवेश करता है। अपनी सूक्ष्मावस्था के कारण यह स्थूल
नेत्रों द्वारा दिखाई भी नहीं देता है।
- पर एवात्मा देहेन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिभिः परिच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते
(ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य-1/2/6)।
भूमिका ५७
यहाँ उपाधि-वैविध्य के आधार पर जीव की प्राज्ञ, तैजस् और विश्व
तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया है। मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान की व्यष्टि से
उपहित चैतन्य को 'प्राज्ञ- कहा गया है। इसीप्रकार सूक्ष्मशरीर की व्यष्टि से
उपहित चैतन्य को 'तैजस्' तथा स्थूलशरीर की व्यष्टि से उपहित चैतन्य को
'विश्व' संज्ञा प्रदान की गई है। जीव के इन तीन भेदों के सम्बन्ध में
आचार्य गौडपाद इसप्रकार कहते हैं-
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तः प्रज्ञस्तु तैजसः।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः॥
(माण्डूक्योपनिषद्, गौडपादकारिका-1)
वेदान्तदर्शन मनोमय आदि पञ्चकोशों से विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीव को
कर्ता, भोक्ता एवं सुख, दुःख का अभिमानी मानता है। इस सम्बन्ध में
आचार्य शङ्कर का यह कथन उल्लेखनीय है-
“कर्तृत्वभोक्तृत्वविशिष्टजीवो मनोमयादिपञ्चकोशविशिष्टः”
(बृहदारण्यकोपनिषद् शाङ्करभाष्य 1/4/15)
अद्वैतसिद्धान्त की मान्यता के अनुसार पञ्चकोशों से आवृत होते हुए भी
यह जीवात्मा उनसे अलग है। रेशम बनाने वाले कीड़ों के समान अन्नमयादि
कोशों से आवृत होकर यह दुःख पाता है एवं इन्हीं में भटकता रहता है।
आत्मज्ञान अर्थात् अपने स्वरूप का सही-सही ज्ञान प्राप्त करने पर वह
मुक्ति (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। अन्यथा उसे इस संसार में विविध
प्राणियों के शरीरों में (कर्मानुसार) बार-बार जन्म लेना पड़ता है। इस विषय
में विद्यारण्यस्वामी का यह कथन विशेषरूप से उल्लेखनीय है-
यथा मुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः।
शरीरत्रतीयाद्धोरैः परं ब्रह्मैव जायते॥ (पञ्चदशी-1/33)
अर्थात् जिसप्रकार मूँज से सींक युक्ति से प्रयत्नपूर्वक निकाल ली जाती
है। ठीक उसीप्रकार युक्तिपूर्वक आत्मा को शरीरत्रय एवं पञ्चकोशों से
अलग कर लेने पर जीवात्मा (जीव) परमब्रह्म हो जाता है।
(८) जीव की चार अवस्थायें- आचार्य गौडपाद ने जीव की चार
अवस्थाओं का कथन किया है-(1) जाग्रत, (2) स्वप्न (3) सुषुप्ति एवं
(4) तुरीय। यद्यपि इनका विस्तार से आगे वर्णन किया जाएगा तथापि
५८ वेदान्तसार
प्रसंगवश यहां संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं- इनमें प्रथम अवस्था में जीव
मन एवं इन्द्रियों के माध्यम से बाह्यपदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। इस
स्थिति में उसका स्थूलशरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सचेष्ट रहते हैं।
अन्नमयकोष से आबद्ध हुआ वह सांसारिकपदार्थों का उपभोग करता है।
आचार्य गौडपाद ने जीव को इस अवस्था में बाह्यविषयों को प्रकाशित करने
वाला अर्थात् बहिष्प्रज्ञ एवं स्थूलभुक् कहा है।¹
द्वितीय, स्वप्नावस्था में जीव का शरीर और इन्द्रियाँ विश्राम करती हैं,
किन्तु उसका मन क्रियाशील रहता है। इस अवस्था में जीव का सूक्ष्मशरीर
से सम्बन्ध होता है तथा वह मनोमय, प्राणमय एवं विज्ञानमय इन तीन
कोशों से आबद्ध रहता है। वेदान्ताचार्यों ने इसे अन्तःप्रज्ञ एवं प्रविविक्तभुक्
संज्ञा प्रदान की है। मन की वासना के अनुरूप कार्य करने के कारण इसे
अन्तःप्रज्ञ भी कहा गया है।
तृतीय, सुषुप्ति अवस्था में जीव न तो किसीप्रकार की कामना करता है
और न ही कोई स्वप्न देखता है, क्योंकि उसके स्थूलदेह, इन्द्रियाँ
अन्तःकरण आदि कार्य नहीं करते हैं। जाग्रत एवं स्वप्नावस्था में जीव
आनन्द के साथ दुःख का भी अनुभव करता है, किन्तु इस अवस्था में
केवल आनन्द की प्रचुरता रहती है। अतः उसे 'आनन्दभुक्' कहा जाता है।
इस अवस्था में जीव चैतन्य से प्रदीप्त अज्ञानवृत्ति की प्रधानता से युक्त
हुआ 'चेतोमुख' भी कहलाता है। प्रसुप्त अवस्था में बुद्धि उसीप्रकार स्थित
रहती है, जिसप्रकार वट के बीज में वट का वृक्ष छिपा रहता है। यह
आनन्दमयकोष से आबद्ध अवस्था है।
चतुर्थ, तुरीय अवस्था में सभीप्रकार के प्रपञ्चों का उपशम हो जाता है।
इसमें जीव न अन्तःप्रज्ञ रहता है, न बहिष्प्रज्ञ और न ही उभयप्रज्ञ। यह
उसका शान्त, शिव एवं अद्वैतरूप माना गया है। सभीप्रकार के दुःखों की
निवृत्ति होकर कार्यकारणभाव समाप्त हो जाता है। साथ ही वासना-बीजों
का भी नाश हो जाता है। सभी कोशों से मुक्त होकर जीव इस अवस्था में
ब्रह्ममय बन जाता है। अनादि माया अथवा अज्ञान उसका साथ छोड़ देता है
तथा उसे पूर्णतया अवबुद्ध एवं अद्वैतभाव की प्राप्ति होती है।
- माण्डूक्योपनिषद्, आगमप्रकरण-3
भूमिका ५९
(९) जगत्-अद्वैतवेदान्त जगत् को मिथ्या प्रतिपादित करता
है-“ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या" ब्रह्म अथवा आत्मज्ञान न होने की स्थिति तक ही
यह जगत् हमें सत्य प्रतीत होता है। उसकी यह प्रतीति सीप में चाँदी अथवा
रज्जु में सर्प के समान मानी गई है, क्योंकि इसकी सत्ता आत्मज्ञान न होने
की स्थिति पर्यन्त ही रहती है। जिसप्रकार अज्ञान की निवृत्ति होने पर सीपी
और रज्जु हमें अपने वास्तविकरूप में प्रतीत होते हैं, ठीक उसीप्रकार
ब्रह्मबोध होने पर जगत् का मिथ्यात्व स्वतःसिद्ध हो जाता है।
वेदान्त सत्कार्यवाद के सिद्धान्त को मानता है। उसकी दृष्टि में यह जगत्
ब्रह्म (ईश्वर) का कार्य है। साथ ही प्रातिभासिक, व्यावहारिक एवं
पारमार्थिक इन तीन प्रकार की सत्ताओं में से यहाँ जगत् की व्यावहारिक
तथा प्रातिभासिक सत्ता को स्वीकार किया गया है, क्योंकि पदार्थ की वह
सत्ता जो प्रतीतिकाल में सत्य प्रतीत हो, किन्तु कुछ समय के पश्चात् अन्य
ज्ञान द्वारा बाधित हो जाए प्रातिभासिक कहलाती है। जैसे-रज्जु में सर्प की
प्रतीति, क्योंकि प्रकाश की स्थिति में रज्जु में सर्पविषयकज्ञान का बाध
होकर यथार्थसत्ता रज्जु का भान हो जाता है। उसीप्रकार इस दृश्यमान जगत्
की प्रतीति ब्रह्मज्ञान पर्यन्त होती है। अतः यही इसकी प्रातिभासिक सत्ता हुई।
इसके अतिरिक्त व्यवहार के समय दिखायी देने वाली पदार्थों की सत्ता
को व्यावहारिकसत्ता कहा जाता है, क्योंकि यह सम्पूर्णजगत् तथा इसके घट,
पट आदि पदार्थ व्यवहारकाल में सत्य हैं। अतः इसे व्यावहारिकसत्ता वाला
भी माना जाएगा। पारममार्थिकसत्ता भौतिकपदार्थों की सत्ता से भिन्न एवं
विलक्षण होती है, क्योंकि तीनों कालों में एकरूप में अवस्थित रहने वाली
सत्ता पारमार्थिक कहलाती है तथा यह दृश्यमानजगत् एवं इसके घट-पट
आदि पदार्थ विकारवान् हैं, नश्वर हैं, कल नहीं रहेंगे। अतः इसकी
पारमार्थिकसत्ता का निषेध किया गया है। वेदान्त में एकमात्र ब्रह्म की
पारमार्थिकसत्ता स्वीकार की गई है।
इस आधार पर यह निष्कर्षरूप में कहा जा सकता है कि ब्रह्म
पारमार्थिक दृष्टि से सत्य है तथा जगत् की सत्ता केवल व्यवहारकाल तक
सीमित है। पारमार्थिकदृष्टि से जगत् मिथ्या है। दार्शनिकभाषा में दृश्यमान
जगत् रस्सी में सर्प के समान केवल आभासित होता है। इसीकारण ब्रह्मज्ञान
६० वेदान्तसार
सम्पन्न जीवनमुक्त को यह जगत् परमार्थतः असत् एवं मिथ्या प्रतीत होता
है।
इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि तत्त्वज्ञान की स्थिति में जगत्
अर्थात् बाह्यपदार्थों का अभाव नहीं होता है। उसकी सत्ता पूर्ववत् बनी रहती
है। यदि ऐसा नहीं होता तो एक जीव के मुक्त होने पर सभी के लिए
जगत् का अभाव हो जाता। इसलिए तत्त्वज्ञान की स्थिति में इसे इसप्रकार
समझना चाहिए कि दृश्यमानजगत् अपने उसी रूप में विद्यमान रहता है!
केवल साधक का दृष्टिकोण बदल जाता है। उसकी भावना या ज्ञान में
अन्तर आ जाता है और वह ब्रह्मैक्य को प्राप्त करके जगत् को मिथ्या
मानने लगता है।
(१०) शरीरत्रय-वेदान्तदर्शन के अनुसार जीव के तीन शरीर होते हैं-
(अ) कारणशरीर (ब) सूक्ष्मशरीर तथा (स) स्थूलशरीर।
“स्थूलं सूक्ष्मं कारणाख्यमुपाधित्रितयं चित्रेः।
एभिर्विशिष्टो जीवः स्याद् विमुक्तः परमेश्वरः॥
(अ) कारणशरीर-सृष्टि के प्रारम्भ में जीव कारणशरीर का आश्रय
लेकर विद्यमान रहता है। जैसाकि पूर्व में प्रतिपादित किया जा चुका है कि
अद्वैतवेदान्त केवल ब्रह्म की शाश्वतस्थिति को ही स्वीकार करता है तथा
द्वैतवेदान्त, ब्रह्म और माया इन दोनों के हमेशा (नित्य) अस्तित्व को मान्यता
प्रदान करता है। माया सत्त्व, रजस् तथा तमस् इन तीनों गुणों का नाम है।
इसीको अज्ञान भी कहा जाता है।
ब्रह्म जब शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आवृत्त होता है तो इसीको ईश्वर
कहा जाता है। यही अव्यक्त, अन्तर्यामी संसार का कारणरूप होने से
कारणशरीर कहलाता है। इसमें आनन्द का प्राचुर्य रहता है। अतः इसीको
'आनन्दमयकोष' भी कहते हैं। प्रलय की अवस्था में भी इसकी स्थिति बनी
रहती है। सूक्ष्म एवं स्थूलशरीरों का यह लयस्थान भी होता है। साथ ही
स्थूल एवं सूक्ष्म जगत्प्रपञ्च का लयस्थान होने के कारण इसीको 'सुषुप्ति'
भी कहा गया है।
भूमिका ६१
चित्र-१
[ब्रह्म] शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान से आवृत्त | मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान
│ ┌─ आनन्दमय कोष <──────────────┐ (ब्रह्म)
↓ │ ├─ कारण शरीर <──────────────┤ जीव
ईश्वर ─┼─ सुषुप्ति अवस्था <─────────────┤
(1) └─ लय स्थान <───────────────┘ (2)
(ब) सूक्ष्मशरीर—इसका केवल अनुमानप्रमाण द्वारा ही ज्ञान होता है।
हम इसे किसी भी प्रकार देख अथवा छू नहीं सकते हैं। इसीकारण इसे
सूक्ष्मशरीर कहा जाता है। इसका दूसरा नाम 'लिङ्गशरीर' भी है। स्वामी
रामतीर्थ ने इसकी व्युत्पत्ति इसप्रकार की है—
“लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भाव एभिरिति लिङ्गानि, लिङ्गानि च
शरीराणि चेति लिङ्गशरीराणि" (वेदान्तसार-विद्वन्मनोरञ्जनी-पृ. 100)
इसी के माध्यम से जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है। वेदान्तदर्शन
के अनुसार इसमें सत्रह अवयव होते हैं—पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ,
पञ्चवायु तथा बुद्धि एवं मन। पञ्चदशीकार के अनुसार—
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया।
शरीरं सप्तदशाभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते।। (1/23)
जीव के पापपुण्यों (धर्म-अधर्म) का लेखा-जोखा इसीकारणशरीर में
विद्यमान रहता है। यही जीवात्मा का एक प्रकार से घर अथवा निवास
स्थान है। कठोपनिषद्कार ने इसे 'रथ' की संज्ञा भी दी है। इसका रथी
आत्मा है, क्योंकि एक स्थूलशरीर से दूसरे स्थूलशरीर में प्रवेश करने के
लिए यह सूक्ष्मशरीर आश्रय अथवा माध्यम का कार्य करता है।
इसी प्रसङ्ग में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि सांख्यदर्शन भी सूक्ष्मशरीर
के अस्तित्व को स्वीकार करता है। उसने इसके अट्ठारह तत्त्वों को मान्यता
प्रदान की है—महत् (बुद्धि), अहङ्कार, मन, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय,
पञ्चप्राण। अतः स्पष्ट है कि सांख्यदर्शन 'अहङ्कार' को सूक्ष्मशरीर में
अधिक तत्त्व के रूप में स्वीकार करता है। जबकि वेदान्तसार के टीकाकार
६२ वेदान्तसार
स्वामी रामतीर्थ अहङ्कार का अन्तर्भाव मन में करते हैं। उनके अनुसार
अहङ्कार भी सङ्कल्पात्मक ही होता है।
वेदान्तदर्शन के अनुसार सूक्ष्मशरीर को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-
चित्र-२
सूक्ष्म शरीर
(17 अवयव)
5 5 5 1 1
पञ्च ज्ञानेन्द्रिय पञ्च कर्मेन्द्रिय पञ्च वायु बुद्धि मन
श्रोत्र त्वक् चक्षु रसना घ्राण प्राण अपान व्यान समान उदान
(जिह्वा)
वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ
(वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (मूत्रेन्द्रिय)
इसी प्रसङ्ग में इनका पृथक्-पृथक् परिचय देना उपयुक्त होगा।
(क) पञ्चज्ञानेन्द्रिय-श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना और घ्राण इन्हें
ज्ञानेन्द्रियों की श्रेणी में रखा गया है। इनकी उत्पत्ति आकाशादि अपञ्चीकृत
सूक्ष्मभूतों के सात्त्विक अंशों से पृथक्-पृथक् रूप में मानी गयी है।
ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि। एतान्याकाशादिनां सात्त्विकां-
शेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक्-पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते (वेदान्तसार)।
अर्थात् आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति
हुई है। इसका कार्य श्रवण करना है, क्योंकि शब्द आकाश का गुण है।
अतः यह शब्द की ग्राहक है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत वायु के
सात्त्विक अंश से त्वक् नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई, क्योंकि स्पर्श वायु
का गुण है। अतः त्वगेन्द्रिय शीतल या उष्ण स्पर्श का ज्ञान कराती है।
इसके अतिरिक्त अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत अग्नि के सात्त्विक अंश से चक्षु
नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई और अग्नि का गुण है, रूप। इसलिए चक्षु
नामक इन्द्रिय दर्शन कराती है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत 'जल' के
भूमिका ६३
सात्त्विक अंश से रसना (जिह्वा) नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि
जल का गुण रस है। अतः रसना ज्ञानेन्द्रिय द्वारा हमें रस अर्थात् स्वाद की
प्रतीति होती है।
साथ ही अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत पृथिवी के सात्त्विक अंश से घ्राण नामक
ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि पृथिवी का गुण है, गन्ध। इसीलिए
घ्राणेन्द्रिय द्वारा हम गन्ध को ग्रहण करते हैं। ज्ञान को ग्रहण करने के कारण
इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं।
चित्र-३
अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत
┌─────────────┐
│ सात्त्विक अंशों │ ↗ आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी
│ से पञ्च │ │ │ │ │ │
│ ज्ञानेन्द्रियों की │ ↗ श्रोत्र त्वक् चक्षुष् रसना घ्राण
│ उत्पत्ति │ │ │ │ │ │
└─────────────┘ ↘ शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध
(ग्रहण करना)
(ख) पञ्चकर्मेन्द्रिय- कर्म को सम्पादित करने के कारण इन्हें
कर्मेन्द्रिय कहा जाता है। इनकी संख्या भी पांच है-वाक्, पाणि, पाद, पायु,
उपस्थ। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण के अंश से
अलग-अलग मानी गई है। अर्थात् रजोगुणप्रधान आकाश नामक अपञ्चीकृत
सूक्ष्मभूत से वाक् (वाणी) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुण प्रधान 'वायु'
नामक सूक्ष्मभूत से पाणि (हाथ) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुणप्रधान
'अग्नि' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पाद अर्थात् पैर नामक कर्मेन्द्रिय
की, इसीप्रकार रजोगुणप्रधान 'जल' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पायु
अर्थात् गुदा नामक कर्मेन्द्रिय की तथा रजोगुणप्रधान पृथिवी नामक
अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से 'उपस्थ' अर्थात् जननेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है।
रजोगुण के स्वभाव से चञ्चल एवं क्रियाशील होने के कारण सभी
कर्मेन्द्रियों में गति एवं क्रियाशीलता देखने को मिलती है। इसी अभिप्राय को
इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
६४ वेदान्तसार
चित्र-४
अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत
आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी
[ रजोगुण प्रधान अंशों से क्रमशः ]
वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ
(वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (जननेन्द्रिय)
बोलना कार्य करना चलना मल उत्सर्जन आनन्द
एवं
सन्तति उत्पत्ति
(ग) पञ्चवायु- प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान ये पाँच वायु
हैं। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण अंश से स्वीकार की
गई है। इनका शरीर के विभिन्न अङ्गों में वास माना गया है। जैसे-नासिका
के अग्रभाग पर विराजमान वायु 'प्राण' है। यह ऊर्ध्व गमनशीला है। (प्राणो
नाम प्राग्गमनवान् नासाग्रस्थानवर्ती-वेदान्तसार)
किन्तु ब्राह्मणग्रन्थों में इसकी स्थिति हृदय में स्वीकार की गयी है।
(प्राणी हृदये-तैत्तिरीयब्राह्मण 3/10/8/5)। पुनरपि हृदय में स्थित होते हुए भी
प्रत्यक्षरूप से नासिका के अग्रभाग पर अवस्थित होने के कारण इसका
नासिका के अग्रभाग पर स्थित होना ही विद्वानों को स्वीकार्य रहा है
(वेदान्तसार विद्वन्मनोरञ्जनीकार)
अपान नामक वायु को गुदा एवं उपस्थ (जननेन्द्रिय) में स्थित माना
गया है। नाभि के नीचे की ओर जाना इसका स्वभाव है। सम्भवतः
इसीकारण इसे अधोगमनशीला कहा गया है। इसीप्रकार 'व्यान' नामक वायु
का स्वभाव सभी ओर गमन करना है। अतः इसकी स्थिति सम्पूर्णशरीर में
स्वीकार की गई है।
प्रतिदिन खाए हुए अन्न पानादि को पचाने वाली, उदर में निवास करने
वाली वायु ही 'समान' है। इसका प्रमुख कार्य उदरस्थ अन्न से साररूप रस
निकालकर उसका रुधिर आदि के रूप में परिपाक करना तथा अवशिष्ट
अन्न को मल-मूत्र के रूप में बाहर निकलना है। उदान वायु का निवास
कण्ठ में होता है। ऊर्ध्वगमन इसका स्वभाव है। अतः मृत्यु के समय शरीर