वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण
१६४ वेदान्तसार
(४) पूर्ववत् प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को भी इसप्रकार प्रदर्शित कर
सकते हैं।
चित्र-३१
अज्ञान की व्यष्टि
जीव $\leftarrow$ शुद्ध चैतन्य $\rightarrow$ जीव $\rightarrow$ प्राज्ञ
अल्पज्ञत्व $\leftarrow$ $\uparrow$ मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान की निकृष्ट उपाधि
अनीश्वरत्व $\leftarrow$
प्राज्ञः $\leftarrow$ अस्पष्ट उपाधितया
( अत्यधिक $\rightarrow$ प्रकर्षेण अज्ञः स्थूल सूक्ष्म शरीर प्रपञ्च लयात्
अज्ञानी) अनतिप्रकाशकत्वात् सर्वोपरमत्वात् लयस्थानम्
एक अज्ञान अहंकारादिकारणत्वात् आनन्दप्रचुरत्वात् कोषवदाच्छादकत्वात्
का अवभासक $\leftarrow$ आदि से अभिप्राय
व्यक्त $\leftarrow$ कारण शरीरम्
व्यष्टि $\leftarrow$ सुषुप्ति आनन्दमयकोशः
अवतरणिका-समष्टि, व्यष्टिविषयक अज्ञान का निरूपण करने के
पश्चात् इन दोनों में उदाहरणपूर्वक अभेद का प्रतिपादन करते हैं-
तदानीमेतावीश्वरप्राज्ञौ चैतन्यप्रदीप्ताभिरतिसूक्ष्माभिरज्ञान-
वृत्तिभिरानन्दमनुभवत “आनन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञ” इति श्रुतेः
सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषमित्युत्थितस्य परामर्शोपपत्तेश्च। अनयोः
समष्टिव्यष्ट्योर्वनवृक्षयोरिव जलाशयजलयोरिव वाभेदः। एतदुपहित-
योरीश्वरप्राज्ञयोरपि वनवृक्षावच्छिन्नाकाशयोरिव जलाशयजलगत्प्रति-
बिम्बाकाशयोरिव वाभेद “एष सर्वेश्वर” इत्यादि श्रुतेः॥८॥
पदच्छेद- तदानीम् एतौ ईश्वरप्राज्ञौ चैतन्यप्रदीप्ताभिः अतिसूक्ष्माभिः
अज्ञानवृत्तिभिः आनन्दम् अनुभवतः ‘आनन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञः” इति श्रुतेः।
सुखम् अहम् अस्वाप्सम्, न किञ्चिद् अवेदिषम् इति, उत्थितस्य
परामर्श-उपपत्तेः अनयोः समष्टिव्यष्ट्योः वन-वृक्षयोः इव जलाशयजलयोः
इव वा अभेदः। एतत् उपहितयोः ईश्वरप्राज्ञयोः अपि वनवृक्ष-
अवच्छिन्न-आकाशयोः इव, जलाशयजलगत्प्रतिबिम्बित-आकाशयोः इव वा
अभेदः।” एषः सर्वेश्वरः इत्यादि श्रुतेः॥८॥
प्राज्ञ-ईश्वर निरूपण १६५
अनुवाद-उससमय ईश्वर और जीव ये दोनों चैतन्य से प्रदीप्त अत्यन्त
सूक्ष्म अज्ञानरूप वृत्तियों द्वारा आनन्द का अनुभव करते हैं। “चेतोमुखी प्राज्ञ
आनन्द को भोगता है।” इत्यादि श्रुति का (वचन यहाँ प्रमाण है)। मैं
सुखपूर्वक सोया, मुझे (इस बीच) कुछ भी पता नहीं लगा' इत्यादि वाक्यों
से सोकर उठने के बाद अपने पूर्वानुभूत सुख को अभिव्यक्त करता है।
वन एवं वृक्ष अथवा जलाशय और जल इन दोनों समष्टिव्यष्टि के
समान इन दोनों (समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञानोपाधियों) में भी अभेद विद्यमान है।
वन एवं वृक्ष से अवच्छिन्न (ढका हुआ) आकाश के समान अथवा
जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान ही इन (समष्टि
व्यष्टिगत अज्ञान की उपाधियों से) उपहित ईश्वर एवं प्राज्ञ में भी अभेद
विद्यमान है। “यह (आत्मा) सबका स्वामी है” इत्यादि श्रुति का (कथन भी
यहाँ प्रमाण है)।
‘चन्द्रिका'–इससे पूर्व के खण्ड में ग्रन्थकार ने कहा कि प्रलयकाल
एवं सुषुप्ति अवस्था में ईश्वर एवं प्राज्ञ दोनों ही आत्मानन्द का अनुभव
करते हैं तथा आनन्द का प्राचुर्य होने के कारण इसे 'आनन्दमयकोश' भी
कहा जाता है, किन्तु इस प्रसङ्ग में एक शङ्का होती है कि जब प्रलय एवं
सुषुप्ति अवस्था में न तो अन्तःकरण का अस्तित्व रहता है और न ही
उसकी कोई वृत्ति विद्यमान रहती है, जिसके द्वारा ईश्वर अथवा प्राज्ञ
आत्मानन्द का अनुभव कर सकें तो फिर भला ये दोनों इस अवस्था में
आनन्द का अनुभव किसप्रकार करते हैं?
इसी शङ्का के समाधान के लिए ग्रन्थकार ने प्रस्तुत खण्ड के प्रारम्भ में
कहा कि ये दोनों शुद्धचैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की अत्यधिक सूक्ष्म
वृत्तियों द्वारा, प्रलयकाल एवं सुषुप्ति अवस्था में भी स्वरूपानन्द का अनुभव
करते हैं। अतः इस विषय में शङ्का किया जाना उचित नहीं है। अपने कथ्य
की पुष्टि में ग्रन्थकार ने माण्डूक्योपनिषद् के आनन्दभुक् इत्यादि श्रुतिवचन
एवं 'सुखमहम स्वाप्सं' इत्यादि अनुभववाक्य उद्धृत किए हैं।
वस्तुतः सुषुप्तिदशा में अथवा प्रलयकाल में बाह्यसाधनों अन्तःकरण
आदि का अभाव होने के कारण, यद्यपि आत्मा को बाह्यविषयों का ज्ञान
नहीं होता है, किन्तु ज्ञान, जीवात्मा का स्वाभाविकगुण होने के कारण उसे
आनन्द का अनुभवरूप आन्तरिकज्ञान इस अवस्था में भी रहता है, क्योंकि
आत्मा से ज्ञान को कभी भी, किसी भी अवस्था में उसीप्रकार अलग नहीं
किया जा सकता है, जिसप्रकार अग्नि से उसकी उष्णता को किसी भी
प्रकार पृथक् नहीं किया जा सकता है, आत्मा तो वस्तुतः चित्स्वरूप है।
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वेदान्त के अनुसार- अज्ञान से उत्पन्न अन्तःकरण की वृत्तियों द्वारा ही
जीव स्वप्न एवं जाग्रत अवस्था में अनुभूति एवं भोग आदि क्रियाओं को
सम्पादित करता है। यद्यपि सुषुप्ति अवस्था में यह अन्तःकरण विपरीत क्रम
में अपने कारणरूप अज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथापि इस अवस्था में
भी चैतन्य द्वारा प्रकाशित अज्ञान की सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं,
जिनके द्वारा ईश्वर एवं प्राज्ञ अर्थात् जीव स्वरूपानन्द का अनुभव करते हैं।
अतः यहाँ किसीप्रकार की विसंगति की परिकल्पना नहीं करनी चाहिए।
तत्पश्चात् श्रुतिवचन एवं अनुभववाक्य को स्पष्ट करते हैं। 'चेतोमुखप्राज्ञ
आनन्द का भोग करता है' यह श्रुतिवचन माण्डूक्योपनिषद् में आया है। यहाँ
प्रयुक्त 'चेतोमुख' का विद्वन्मनोरञ्जनीकार ने-'चैतन्य प्रदीप्त अज्ञान वृत्तियों
को ही मुख्यरूप से अपनाने वाला' अर्थ किया है। अर्थात् शुद्धचैतन्यब्रह्म के
प्रकाश से प्रकाशित अज्ञानवृत्तिप्रधान समष्टि एवं व्यष्टिरूप ईश्वर एवं जीव
सुषुप्ति-अवस्था एवं प्रलयकाल में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। यहाँ
प्रयुक्त आनन्दभुक् से अभिप्राय है-आनन्द का अनुभव करने वाला।
'प्राज्ञ' शब्द यहाँ ईश्वर एवं जीव दोनों अर्थों में प्रयुक्त माना जा सकता
है। 'प्रकृष्टेन जानाति इति प्राज्ञः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका सर्वज्ञरूप
ईश्वर अर्थ कर सकते हैं तथा 'प्रकर्षेण अज्ञः' इति प्राज्ञः इत्यादि व्युत्पत्ति
के अनुसार प्रकृष्ट अज्ञानी अर्थात् जीव अर्थ भी ग्रहण किया जा सकता है।
अतः दोनों अर्थों की संगति उचित है। यों भी ईश्वर और जीव दोनों ही
सुषुप्ति अवस्था में आनन्द का अनुभव करते ही हैं।
'मैं सुखपूर्वक सोया, इस बीच मैं कुछ भी नहीं जान सका' इत्यादि
अनुभववाक्य सर्वसाधारण द्वारा प्रतिदिन अनुभव में आता ही है। उस गहन
निद्रा में जीव को यद्यपि अन्य बातों का ज्ञान नहीं था, किन्तु उस स्थिति में
भी उसे इस बात का भान अवश्य था कि मैं आनन्द में हूँ, जिसे उसने
सोकर उठने के बाद अभिव्यक्त किया। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा
अन्तःकरण के अभाव में भी आनन्द का अनुभव कर सकता है।
प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश में ग्रन्थकार ने समष्टिव्यष्टिरूप अज्ञान एवं
ईश्वर तथा प्राज्ञ की एकता का सोदाहरण प्रतिपादन किया है। तदनुसार
समष्टिरूप अज्ञान से उपहित चैतन्य की 'ईश्वर' तथा व्यष्टिरूप अज्ञानों से
उपहित चैतन्य की जीव अथवा 'प्राज्ञ' संज्ञा है। यद्यपि स्थूलदृष्टि से देखने
पर ईश्वरगत समष्टिरूप अज्ञान तथा जीवगत व्यष्टिमूलक अज्ञान में भेद
प्रतीत होता है, किन्तु यह वास्तविकभेद नहीं है, क्योंकि समष्टि-व्यष्टिरूप
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उपर्युक्त दोनों प्रकार के अज्ञान वस्तुतः उसीप्रकार एक हैं, जिसप्रकार वनगत
आकाश एवं वृक्षगत आकाश में भिन्नता प्रतीत होते हुए भी दोनों एक हैं।
इन दोनों के ऐक्य को समझाने के लिए ग्रन्थकार अन्य उदाहरण देते
हुए कहते हैं कि-जलाशय में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश एवं जल की
एक बूँद में प्रतिबिम्बित होने वाले आकाश में तात्त्विकदृष्टि से कोई भेद
नहीं है। ठीक उसीप्रकार ईश्वर स्थित समष्टिगत अज्ञान एवं जीवस्थित
व्यष्टिगत अज्ञान में भी कोई वास्तविकभेद नहीं है। अतः इस दृष्टि से ईश्वर
और प्राज्ञ में भी कोई भेद नहीं है।
प्रतीत होने वाला भेद वस्तुतः वैसा ही है, जैसाकि स्वर्णपिण्ड एवं उससे
बने कटक-कुण्डल आदि में होता है। जिसप्रकार स्वर्णरूप कारण तथा
उससे बनाए गए कटककुण्डल आदि कार्य, दोनों में यद्यपि भिन्नता दिखायी
देती है, किन्तु कार्यकारणरूप भेद को दूर करने पर यह भिन्नता समाप्त हो
जाती है तथा दोनों स्थलों पर स्वर्णरूप ऐक्यभाव की प्रतीति होती है।
ठीक उसीप्रकार समष्टिरूप ईश्वर में स्थित शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान तथा
व्यष्टिरूप जीव अथवा प्राज्ञ के मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान में से विशेषणरूप
शुद्धसत्त्वप्रधान एवं मलिनसत्त्वप्रधान को हटा देने पर दोनों में शुद्धचैतन्यरूप
परमब्रह्म ही विद्यमान रहता है। यही इन दोनों अर्थात् ईश्वर एवं जीव का
ऐक्य है। जिसे ग्रन्थकार ने वनगत आकाश, वृक्षगत-आकाश तथा जलाशय
में प्रतिबिम्ब आकाश तथा जल में प्रतिबिम्बित आकाश के ऐक्य द्वारा
समझाने का प्रयास किया है।
अपने इस कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार माण्डूक्योपनिषद् के ‘एष
सर्वेश्वर' इति वचन को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हैं। जहाँ प्राज्ञ को ही
सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, सभी जीवों की उत्पत्ति एवं प्रलय का स्थान
सभी का कारण बताया गया है-
“एष सर्वेश्वरः एषः सर्वज्ञः एषः अन्तर्यामि, एष योनिः सर्वस्य
प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।”
विशेष – (1) यहाँ प्रयुक्त ‘प्राज्ञ' शब्द चैतन्य की प्रधानता से ईश्वर
एवं जीव दोनों अर्थों का वाचक है। शङ्कराचार्य ने ‘चेतोमुख' का ‘स्वप्न
आदि अवस्था में अज्ञानरूप चेतना के प्रति द्वाररूप' अर्थ किया है।
(2) वेदान्त ज्ञान को अन्तःकरण की स्थितिविशेष के रूप में मानता है।
इनके अनुसार सांसारिक सुख एवं दुःख की अनुभूति भी एक मानसिक दशा
ही है तथा अन्तःकरण की इस वृत्ति का उद्भव अज्ञान से होता है। सुषुप्ति
की अवस्था में इन वृत्तियों का अज्ञान में विलय हो जाता है।