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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

वेदान्तसार मूल एवम् 'चन्द्रिका' व्याख्या: मङ्गलाचरण

वेदान्तसारः
अखण्डं सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम्।
आत्मानमखिलाधारमाश्रयेऽभीष्टसिद्धये॥१॥
अन्वय-सत्-चित्-आनन्दम्, अवाङ्मनसगोचरम्, अखिल-आधारम्
अखण्डम्, आत्मानम् अभीष्टसिद्धये आश्रये।
अनुवाद-(ग्रन्थ की निर्विघ्नसमाप्ति अथवा त्रिविधदुःख की आत्यन्तिक-
निवृत्ति के लिए सत्य, ज्ञान एवं आनन्दस्वरूप, मन, वाणी तथा इन्द्रियों के
अविषय, सम्पूर्ण स्थावरजङ्गमस्वरूप प्रपञ्च के आधारस्वरूप, अखण्ड परमात्मा
का अभीष्ट (मनोरथ) की सिद्धि के लिए (मैं सदानन्द) आश्रय ग्रहण
करता हूँ।
'चन्द्रिका'- किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व मंगलाचरण की
भारतीयपरम्परा का निर्वाह करते हुए आचार्य सदानन्द वेदान्तदर्शन के
प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार की निर्विघ्नसमाप्ति के लिए परमात्मा का स्मरण
करते हुए कहते हैं कि मैं अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए सच्चिदानन्द,
अवाङ्मनसगोचर, सम्पूर्णसृष्टि के आधार स्वरूप, अखण्ड, परमपिता
परमात्मा का आश्रय लेता हूँ।
प्रस्तुत मङ्गलाचरण में प्रयुक्त प्रत्येक पद विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा
रखता है, क्योंकि गम्भीर अभिप्राय को लिए हुए ये सभी शब्द ग्रन्थकार ने
साभिप्राय प्रयुक्त किए हैं। वेदान्तदर्शन एकमात्र परमब्रह्म की सत्ता को
स्वीकार करता है, साथ ही आत्मा एवं ब्रह्म की एकता का भी प्रतिपादन
करता है। इसीलिए आचार्य सदानन्द ने यहाँ आत्मा शब्द का प्रयोग परमात्मा
अथवा ब्रह्म के अर्थ में किया है। वेदान्त के अनुसार मानवजीवन का
एकमात्रलक्ष्य परमब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करना है। अतः प्रस्तुत श्लोक द्वारा
इस ग्रन्थ के प्रयोजन की ओर भी ग्रन्थकार ने सङ्केत किया है।
यहाँ आत्मा के चार विशेषणों का प्रयोग किया गया है, जिनमें उसकी
सभी विशेषताओं का समावेश हो जाता है। अतः हम यहाँ उनकी क्रमशः
व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं।

मङ्गलाचरण १०९
(क) सच्चिदानन्दम्-सभी वेदान्तग्रन्थों में ब्रह्म के लिए इस विशेषण
का प्रयोग किया गया है, जो इसकी तीन विशेषताओं की ओर संकेत करता
है सत्, चित् और आनन्द। सत् शब्द अस् भुवि धातु से शत् प्रत्यय करके
निष्पन्न होता है। इसका अभिप्राय है सत्तावान्। यहाँ प्रयुक्त सत् शब्द भूत,
भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में उसकी विद्यमानता का कथन करता है,
क्योंकि वेदान्तदर्शन के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जो तीनों
कालों में यहाँ तक कि प्रलय के उपरान्त भी विद्यमान रहती है। यह न
केवल सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान थी, अपितु वर्तमान में भी है तथा आगे
भी रहेगी। अतः यह कालातीत यथार्थसत्ता है।
चिती संज्ञाने धातु से क्विप् प्रत्यय करके निष्पन्न 'चित्' शब्द ज्ञान का
वाचक है। ब्रह्म को चित् कहकर उसके ज्ञानस्वरूप का प्रतिपादन किया
गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् कहता है-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (2/1/1)
बृहदारण्यकोपनिषद् उसे विज्ञान कहता है- विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (3/9/28)।
अतः ब्रह्म विज्ञानमय है। विज्ञान का सामान्य अर्थ है- विशिष्टज्ञान अथवा
विशुद्ध ज्ञान। यहाँ ब्रह्म को विज्ञान इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसके
द्वारा सभी पदार्थ जाने जाते हैं, वह ज्ञानस्वरूप है।
चित् शब्द का एक अन्य अर्थ चैतन्य भी है, अर्थात् सभी प्राणियों,
वनस्पतिजगत् आदि में जो चैतन्य प्रतीत होता है, वह उनमें ब्रह्म के
अस्तित्व को सिद्ध करता है। वाचस्पतिमिश्र ने 'चित्' का अर्थ
'स्वप्रकाशत्व' किया है-स्वप्रकाशत्वं चित्त्वम् (ब्रह्मसूत्र भामतीटीका 1/1/1)।
यहाँ स्वयंप्रकाश का अभिप्राय है- किसी अन्य से प्रकाशित न होना, अपितु
अपने प्रकाश से सभी को प्रकाशित करना। यही विशेषता वेदान्त के ब्रह्म में
विद्यमान है। वह स्वयं प्रकाश है तथा सूर्य आदि तेज-पुञ्जों का भी
प्रकाशक है- इस सम्बन्ध में मुण्डकोपनिषद् ब्रह्म को ज्योतिषां ज्योतिः
कहता है-
हिरण्मये परे कोशे विरज ब्रह्म निष्कलम्।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः॥ (2/2/9)
इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त 'चित्' शब्द विज्ञान, ज्ञान, चैतन्य एवं स्वप्रकाशत्व
आदि अर्थों की प्रतीति कराता है, जो ब्रह्म अथवा आत्मा के वैशिष्ट्य का
कथन करते हैं।

११० वेदान्तसार
सभी उपनिषद् एवं वेदान्तग्रन्थ ब्रह्म के लिए आनन्द का प्रयोग करते हैं।
इस सम्बन्ध में तैत्तिरीयोपनिषद् कहता है कि-सभी प्राणी आनन्द से उत्पन्न
होते हैं, आनन्द में स्थित हैं तथा अन्त में आनन्द में ही उनका लय भी हो
जाता है-
आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति।
आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति (तैत्तिरीयोपनिषद्-3/6)
ब्रह्म वस्तुतः आनन्दस्वरूप है (अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः)। यह सभी के
अन्तरतम में विद्यमान रहता है। इसप्रकार यहाँ प्रयुक्त सत्, चित् और आनन्द
ये तीनों पद ब्रह्म की अनेक विशेषताओं का कथन करते हुए उसकी महिमा
को कहते हैं।
(ख) अवाङ्मनसगोचरम्-यह आत्मतत्त्व ज्ञानेन्द्रियों के प्रत्यक्षज्ञान का
विषय नहीं है। यहाँ तक कि सर्वत्र गतिवाला मन भी उस तक पहुँचने में
समर्थ नहीं है और यदि कोई साधक उसे योग आदि क्रियाओं द्वारा जान भी
लेता है तो उसकी वाणी उसका कथन करने में समर्थ नहीं है। इसीलिए
उसे गूँगे का गुड़ कहा गया है। जिसप्रकार गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद को
कहने में असमर्थ रहता है, वह उसका केवल अनुभव कर सकता है। ठीक
उसीप्रकार उस परमब्रह्म का दर्शन करने पर भी साधक उसका वर्णन करने
में असमर्थ रहता है। इसी अभिप्राय को केनोपनिषद् इसप्रकार प्रदर्शित करता
है-
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनः।
न विद्मो न जानीमो यथैतदनुशिष्यात्॥ (केनो०-3)
अर्थात् ब्रह्म अविज्ञेय है, किन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं लेना चाहिए
कि उसकी सत्ता नहीं है, अपितु उसकी सत्ता अवश्य है। योगविद्या एवं
सद्गुरु के उपदेश से उसका साक्षात्कार किया जा सकता है। वह केवल
अनुभव का विषय है। सम्भवतः इसीकारण उपनिषदों में 'नेति नेति' कहकर
उसके स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। इस विषय में बृहदारण्यकोपनिषद्
कहता है- 'स एष नेति नेत्यात्मा (3/9/26)। यहाँ नेति नेति का अभिप्राय
'ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ नहीं है', यह ग्रहण करना चाहिए। वस्तुतः इस
विशेषण द्वारा ब्रह्म को अविज्ञेय एवं अकथनीय कहा गया है।

मङ्गलाचरण १११
(ग) अखिलाधारम्-यह ब्रह्म सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च का मूल आधार है।
वह आकाश आदि मूलकारणों का भी कारण है। यदि हम उसका भी कारण
मानें तो फिर उसका भी कारण, इसप्रकार बार-बार सोचने पर अनवस्था
दोष होगा। इसलिए एकमात्र ब्रह्म को ही वेदान्त में सम्पूर्ण चराचर जगत् का
कारण माना गया है तथा उसका कोई कारण नहीं है।
वह सम्पूर्णसृष्टि की रचना करने में पूर्णतया समर्थ है। इसके लिए उसे
किसी अन्य बाह्यसत्ता की आवश्यकता नहीं है। सृष्टिरूपी कार्य के लिए
वही उपादानकारण भी है और निमित्तकारण भी। इस विषय में यहाँ मकड़ी
का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि वह अपने जाले के निर्माण में
उपादान और निमित्तकारण दोनों होती है। जिसप्रकार मनुष्य के केश एवं
लोम स्वाभाविकरूप में उत्पन्न होते हैं। उसमें श्वसनप्रक्रिया स्वाभाविकरूप
से होती है। ठीक उसीप्रकार अक्षरब्रह्म से यह सृष्टि उत्पन्न होती है। अतः
एकमात्र वही इस सम्पूर्ण सृष्टि का आधार अर्थात् एकमात्र कारण है।
वही ब्रह्म इस समस्तसृष्टि का सञ्चालक, पालक आदि भी है। इसकी
सृष्टि, स्थिति एवं विनाश उसी की इच्छा पर निर्भर है। इसलिए जब वह
चाहता है तो सम्पूर्णप्रपञ्च को अपने में ही समेटकर अकेला विद्यमान रहता
है।
(घ) अखण्डम्-समस्त श्रुतियाँ ब्रह्म को एकमेवाद्वितीयम् कहकर
वर्णित करती हैं। अद्वैतवेदान्त के अनुसार इस सम्पूर्ण चराचरजगत् में एक ही
यथार्थसत्ता है और वह है ब्रह्म। किसी भी वस्तु के एकत्व अनेकत्व का
निर्णय भेद के आधार पर किया जाता है, जिसे तीन श्रेणियों में विभाजित
कर सकते हैं-स्वगत, सजातिगत तथा विजातीय भेद।
वृक्ष का शाखाओं एवं पत्तों में स्वगतभेद होता है। आम्र और केले के
वृक्षों में सजातीयभेद विद्यमान है, उनकी जाति वृक्षत्व एक होते हुए भी वे
व्यक्तिशः भिन्न हैं तथा वृक्ष का पत्थर से विजातीयभेद होता है। ब्रह्म एक
है, अतः अद्वितीय है वह उपर्युक्त तीनों प्रकार के भेदों से रहित है।
इसीलिए उसे एकमेवाद्वितीयम् कहा गया है। जिसे ग्रन्थकार ने अखण्डम्
विशेषण द्वारा अभिव्यक्त किया है। ब्रह्म की इस विशेषता को उपनिषदों में
इसप्रकार कहा गया है-
ओ३म् पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

११२ वेदान्तसार
( ङ ) अभीष्टसिद्धये-यहाँ प्रयुक्त अभीष्ट शब्द भी विशेषव्याख्या की
अपेक्षा रखता है, क्योंकि अभीष्ट शब्द यहाँ अनेकार्थक है, इस प्रसंग में
इस शब्द के चार अर्थ किए जा सकते हैं- प्रथम, ग्रन्थ की निर्विघ्न-
समाप्ति रूपकार्य की सिद्धि के लिए ग्रन्थकार अपने इष्ट ब्रह्म अथवा
आत्मा की शरण में जाता है। द्वितीय, वेदान्तदर्शन का अत्यन्त सरलशैली में
प्रकरणग्रन्थ का प्रणयन करना ग्रन्थकार का अभिप्रेत है, इस उद्देश्य की
सिद्धि में आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वह अपने आराध्य अथवा विवेच्य
आत्मतत्त्व की शरण ग्रहण करता है।
तृतीय, इस संसार में प्रत्येक प्राणी आध्यात्मिक, आधिभौतिक,
आधिदैविक त्रिविध दुःखों से पीड़ित है तथा ब्रह्मज्ञान इन्हें दूर करने में
समर्थ है। अतः ग्रन्थकार अपने तथा अपने पाठकों के त्रिविध दुःख की
आत्यन्तिकनिवृत्ति को अपना अभीष्ट मानकर, उसकी सिद्धिहेतु आराध्य का
शरणागत होता है।
इसके अतिरिक्त मानवजीवन का चरमलक्ष्य मोक्षप्राप्ति, ग्रन्थकार का
लक्ष्य है, ग्रन्थ के माध्यम से ब्रह्मज्ञान, यथार्थज्ञान की चर्चा करके जिसके
लिए वह प्रयत्नशील है। इसी अभीष्ट अर्थात् मोक्षप्राप्ति के लिए वह आत्मा
अर्थात् परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। प्रस्तुत मंगलाचरण के भाव को
हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-१८
स्वरूप
┌───────────────────────────┴──────────────────────────┐
सत् चित् आनन्दम्
(कालातीत सत्ता) (ज्ञान, विज्ञान, (आनन्दस्वरूप)
चैतन्य स्व प्रकाश
सम्पन्न)
│
┌─────────────┐ अखण्डम् ────────────── ┌─────────────┐ ─── अखिलाधारम् ─── ┌───────┐
│अभीष्ट-सिद्धये│─ (एकमात्र │ आत्मा/ब्रह्म │ (सम्पूर्ण │आश्रये │
└─────────────┘ यथार्थ सत्ता) │परमात्मानम् │ चराचर प्रपञ्च └───────┘
└──────┬──────┘ का मूल
│ आधार-कारण)
┌───────────────┼───────────────┐
अवाङ् अमनस् अगोचरम्
(वाणी) (मन) (इन्द्रियों से ग्रहण
न करने योग्य)

मङ्गलाचरण ११३
विशेष-(1) प्रस्तुत कारिका की भाषा सरल, प्रसादगुणयुक्त,
भावबोधगम्य, किन्तु अर्थगाम्भीर्य से युक्त प्रयुक्त हुई है।
(2) ग्रन्थकार की अभिव्यक्तिसामर्थ्य एवं शब्द सौष्ठव की अभिव्यक्ति
हुई है।
(3) आत्मा शब्द का प्रयोग ब्रह्म अथवा परमात्मा के लिए किया गया
है।
(4) प्रस्तुत प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार का प्रतिपाद्य आत्मतत्त्व रहा है, ऐसा
अभिप्रायं भी अभिव्यक्त हो रहा है।
(5) आत्मा के सभी विशेषण साभिप्राय प्रयुक्त हुए हैं, जो उसकी
लगभग सभी महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का कथन करते हैं।
(6) ग्रन्थकार के विनम्रभाव की भी अभिव्यक्ति हुई है। अपने इष्ट के
प्रति विनम्रभाव, समर्पितभाव सदैव मोक्षप्राप्ति का साधक होता है।
अवतरणिका-मङ्गलाचरण में अपने आराध्य के स्मरण के पश्चात्
प्रस्तुत श्लोक में आचार्य सदानन्द अपने गुरु अद्वयानन्द को नमन करके
वेदान्तसार के कथन की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं-
अर्थतोऽप्यद्वयानन्दानतीतद्वैतभानतः।
गुरुनाराध्य वेदान्तसारं वक्ष्ये यथामतिः॥२॥
अन्वय-अतीतद्वैतभानतः अर्थतः अपि अद्वयानन्दान् गुरून् आराध्य
यथामतिः वेदान्तसारम् वक्ष्ये।
अनुवाद- जिनकी द्वैतभावना दूर हो गई है, यथार्थरूप से भी अखण्ड
आनन्दस्वरूप (अद्वयानन्द नामक) गुरु की आराधना करके (मैं सदानन्द
अपनी) बुद्धि के अनुसार वेदान्तसार को कहूँगा।
'चन्द्रिका'- ग्रन्थ के प्रारम्भ में अपने इष्टदेव आत्मरूप परमात्मा का
स्मरण करने के बाद ग्रन्थकार अपने पूज्यपाद गुरु को नमन करना अपना
पुनीतकर्तव्य मानते हैं। साथ ही वे अपने गुरु की दो विशेषताओं का कथन
करते हैं-
(क) अतीतद्वैतभानतः- उनके गुरु का लौकिक नाम वस्तुतः अद्वयानन्द
है। उनकी विशेषता है कि उन्होंने अपनी कठोरसाधना द्वारा ब्रह्म एवं जगत्
के पार्थक्य को जान लिया है। आत्मा के दर्शन होने से उनकी द्वैतभावना दूर
हो गयी है अर्थात् उनका अज्ञानरूप 'आवरण दूर हो गया है। अब उनकी

१९४ वेदान्तसार
स्थिति वस्तुतः जीवन्मुक्त के समान है, जो अपने प्रारब्धकर्मों के कारण
स्थूलशरीर को धारण किए हुए हैं। वे वस्तुतः ब्रह्मस्वरूप ही हैं। ऐसे गुरु
अद्वयानन्द के श्रीचरणों में बैठकर आचार्य सदानन्द ने वेदान्त की शिक्षा
ग्रहण की है। अतः वेदान्तसार का उपदेश करने से पूर्व ग्रन्थकार उच्चकोटि
के साधक परमगुरु को नमन करते हुए उनका आराधन करते हैं।
(ख) अद्वयानन्दान्- यद्यपि ग्रन्थकार सदानन्द योगीन्द्र का सांसारिक
नाम भी अद्वयानन्द है तथापि उन्होंने योगियों के लिए भी अगम्य आत्मतत्त्व
का साक्षात्कार कर लिया है, जिसके कारण उनकी द्वैतभावना पूर्णतया विनष्ट
हो चुकी है। सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म में ही उन्हें सदैव आनन्द की
अनुभूति होती रहती है। वे सांसारिकता से पूर्णतया ऊपर उठ चुके हैं। इस
दृष्टि से वे सच्चे अर्थों में यथानाम तथा गुण वाले हो गए हैं। इसप्रकार की
विशेषता वाले सार्थनामा गुरु को ग्रन्थकार अपनी प्रणामाञ्जलि प्रस्तुत करने
के बाद ही अपने नूतन प्रकरणग्रन्थ वेदान्तसार का उपदेश करने की प्रतिज्ञा
करते हैं।
(ग) यथामति- इस शब्द द्वारा ग्रन्थकार अपनी विनम्रता प्रदर्शित करते
हुए कहते हैं कि वेदान्तदर्शन अत्यन्त गूढ़विषय है। ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् आदि
अनेकग्रन्थों में आचार्यों ने अत्यन्त विस्तार से इसका विवेचन किया है। इस
सम्पूर्णविवेचन के कारण यह दर्शन अत्यधिक जटिल हो गया है तथा
सामान्यव्यक्ति की बुद्धि के लिए इसे ग्रहण करना कठिन हो गया है। अतः
मैंने ऐसा अनुभव किया कि वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों को समझाने वाला
एक संक्षिप्त एवं सरलग्रन्थ बनाया जाए। इस संकल्प को लेकर मैंने गुरुकृपा
एवं भगवत्कृपा से जो कुछ भी सीखा है। उसको अपनी बुद्धि सामर्थ्य से
सरलरूप में प्रस्तुत करने का मैं यह विनम्र प्रयास कर रहा हूँ। परमात्मा इस
कार्य में मुझे सफलता प्रदान करे।
(घ) वेदान्तसार-जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है (वेदान्तस्य
सारः, इति वेदान्तसारः) वेदान्तदर्शन का सार। वेद शब्द से अभिप्राय संहिता,
ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों से लिया जाता है। संहिताग्रन्थों में
प्रतिपादित ज्ञान की व्याख्या उत्तरोत्तर वैदिकसाहित्य में की गई तथा इसकी
पराकाष्ठा हमें उपनिषद्ग्रन्थों में देखने को मिलती है। इसलिए इनमें
प्रतिपादित सिद्धान्त अथवा दर्शन का नाम ही वेदान्त रखा गया। उन्हीं सब
सिद्धान्तों को सार-संक्षेपरूप में प्रस्तावितग्रन्थ में प्रतिपादित करने की प्रतिज्ञा

मङ्गलाचरण ११५
आचार्य सदानन्द द्वारा प्रस्तुत कारिका में करते हुए उसका सार्थक नामकरण
किया गया है।
(ङ) वक्ष्ये-ब्रू धातु से आसन्नवर्ती भविष्य के अर्थ में लुट् लकार का
प्रयोग ग्रन्थकार ने साभिप्राय किया है, क्योंकि इस प्रतिज्ञा के तुरन्त पश्चात्
आचार्य सदानन्द अनुबन्धचतुष्टय का कथन करते हुए ग्रन्थ का आरम्भ कर
देते हैं।
प्रस्तुत श्लोक के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझ सकते हैं-
चित्र-१९
जिनकी द्वैत भावना दूर हो गई यथार्थरूप में भी अखण्ड आनन्दस्वरूप
(अतीतद्वैतभानतः) | | (अर्थतः अपि अद्वयानन्दान्)
अद्वयानन्द नामक गुरु का)
(अद्वयानन्दान् गुरून्)
|
आराधन करके
(आराध्य)
|
अहं आचार्य सदानन्दः —अपनी बुद्धि के अनुसार
(यथामतिः)
|
वेदान्तसारम् वक्ष्ये
विशेष-(1) "देवमिवाचार्यमुपासीत" देवता के समान ही आचार्य
अर्थात् गुरु की भी उपासना करनी चाहिए, इत्यादि भारतीयमान्यता की
पालना की गई है।
(2) अद्वयानन्द शब्द में श्लेष अलंकार का प्रयोग हुआ है, क्योंकि
इसका एक अर्थ आचार्य सदानन्द के गुरु का सांसारिक नाम, द्वितीय ब्रह्म
तथा तृतीय अर्थ अद्वयानन्द का विशेषण है।
(3) यहाँ प्रयुक्त आराध्य शब्द ग्रन्थकार के श्रद्धाभक्तिपूर्वक गुरु के
प्रति नमन की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।
(4) गुरु की महत्ता की अभिव्यक्ति हुई है। शास्त्रकारों ने भी कहा है-
'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥