वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ
पृष्ठ 62, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 62(२) आत्मा-वेदान्तदर्शन के प्रमाणरूप उपनिषद्ग्रन्थों में आत्मा के
४८ वेदान्तसार
(२) आत्मा-वेदान्तदर्शन के प्रमाणरूप उपनिषद्ग्रन्थों में आत्मा के
स्वरूप पर विशद चर्चा की गई है। यहाँ इसके लिए प्रायः उन्हीं विशेषणों
का प्रयोग किया गया है, जो ब्रह्म के लिए प्रयुक्त हुए हैं। इस दृष्टि से इसे
ब्रह्म का ही दूसरा नाम भी कहा जा सकता है। उपनिषदों में इसे 'अयमात्मा
ब्रह्म' कहकर प्रत्यक्षतः स्वीकार भी किया गया है। ब्रह्म के समान ही आत्मा
के अस्तित्व को भी 'मैं हूँ' अथवा 'मैं नहीं हूँ' इस अनुभव द्वारा स्वतः-
सिद्ध माना गया है। इसके अनुसार-जिसप्रकार सूर्य को दिखाने के लिए
दीपक की आवश्यकता नहीं होती है, ठीक उसीप्रकार आत्मा के अस्तित्व
को सिद्ध करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है। इसीकारण
बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने कहा-‘अरे विज्ञातारं केन विजानीयात्’
(2/4/14) अर्थात् 'जो सबको जानने वाला है उसे हम किस साधन द्वारा
जान सकते हैं?'
आत्मा भी ब्रह्म के समान ही सत्-चित् एवं आनन्दस्वरूप है। वर्तमान,
भूत और भविष्यत तीनों कालों में अबाधितरूप में विद्यमान रहने के कारण
इसे सत् कहा गया है।¹ साथ ही इस शब्द से इसके अमर, नित्य, शाश्वत,
पुराण तथा अजन्मास्वरूप पर भी प्रकाश पड़ता है। आत्मा की यहाँ
स्वयम्प्रकाशस्वरूप कहकर प्रशंसा की गई है। पञ्चदशीकार विद्यारण्यस्वामी
ने आत्मा के इस वैशिष्ट्य को नृत्यशाला में रखे गए दीपक का उदाहरण
देकर अत्यन्त सुंदर ढंग से प्रतिपादित किया है। तदनुसार- 'जिसप्रकार
नृत्यशाला में रखा हुआ दीपक, नृत्यशाला के स्वामी, सहृदय सामाजिक,
तथा नर्तकी को समानरूप से प्रकाशित करता है एवं स्वामी की अनुपस्थिति
में भी स्वयं प्रदीप्त होता रहता है। ठीक उसीप्रकार यह साक्षीरूप आत्मा,
अहंकार, बुद्धि एवं तत्तत् विषयों को प्रकाशित करता है तथा सुषुप्ति
अवस्था में अहंकार आदि के विद्यमान न होने पर भी स्वयं प्रकाशित होता
रहता है।
इसके अतिरिक्त आत्मा को अच्छेद्य, अग्राह्य, अक्लेद्य तथा अशोष्य
बताते हुए नित्य, सर्वव्यापी, स्थाणु, अचल एवं सनातन कहा गया है।²
- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (1/2/18) - अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥ (श्रीमद्भगवद्गीता-2/1/3)।