वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
अपवाद-निरूपण
२२४ वेदान्तसार
दार्शनिकभाषा में 'अरुन्धती न्याय'¹ भी कहते हैं। जहाँ सूक्ष्मातिसूक्ष्म विषय
को समझाने के लिए पहले स्थूल को बताते हुए क्रमशः सूक्ष्म की ओर
बढ़ते हैं।
अतः इन श्रुतिवचनों में भी पूर्व-पूर्व में प्रस्तुत श्रुति की अग्रिम श्रुति के
प्रति आत्मारूप सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तु का ज्ञान कराने के लिए, आरूढ़ होते हुए
सोपान के समान सहयोग की भावना ही परिलक्षित होती है।
विशेष-(1) उपर्युक्त वर्णन के आधार पर ग्रन्थकार ने सिद्ध करने का
सफल प्रयास किया है कि शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि आदि से
विलक्षण एवं उन सबका अध्यक्ष अन्तरात्मा इन सबसे सर्वथा भिन्न है।
(2) पुत्रादिकों के आत्मत्व के सिद्धान्त का खण्डन अत्यन्त सरल एवं
संक्षिप्तरूप में किया गया है।
(3) ग्रन्थकार ने आत्माविषयक अपने मत का प्रतिपादन श्रुति, तर्क
(युक्ति) एवं अनुभववाक्यों द्वारा पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्तों की शैली के
आधार पर ही किया है।
(4) प्रत्यक् आत्मा (वस्तु) शुद्धचैतन्य
चित्र-४७
┌ श्रुति-प्रत्यगस्थूलोऽचक्षुरप्राणोऽमना
│ अकर्ता चैतन्य चिन्मात्रं सत्
├ तर्क-पुत्रादि से लेकर शून्यपर्यन्त सम्पूर्ण
│ जड़, घटादि के समान अनित्य
└ अनुभव-अहं ब्रह्म अस्मि-मैं ब्रह्म हूँ।
अवतरणिका-इसप्रकार अध्यारोपविषयक सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन
एवं अद्वैत का प्रतिपादन करने के पश्चात् ग्रन्थकार इसी के द्वितीयपक्ष
'अपवाद' को स्पष्ट करते हैं-
अपवादो नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्ववद्वस्त
ुविवर्तस्यावस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्। तदुक्तम्-
“सतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विकार इत्युदीरितः।
- अरुन्धती न्याय का विस्तृत वर्णन भूमिका में शीर्षक संख्या 24 पृष्ठ संख्या 101 पर
द्रष्टव्य है।
अपवाद-निरूपण २२५
अतत्त्वतोऽन्यथाप्रथा विवर्त इत्युदीरित" इति॥
तथाहि। एतद्भोगायतनं चतुर्विधसकलस्थूलशरीरजातं भोग्यरूपान्न-
पानादिकमेतदायतनभूतभूरादिचतुर्दशभुवनान्येतदायतनभूतं ब्रह्माण्डं
चैतत्सर्वमेतेषां कारणरूपं पञ्चीकृतभूतमात्रं भवति। एतानि
शब्दादिविषयसहितानि पञ्चीकृतानि भूतानि सूक्ष्मशरीरजातं चैतत्सर्वमेतेषां
कारणरूपापञ्चीकृतभूतमात्रं भवति।
एतानि सत्त्वादिगुणसहितान्यपञ्चीकृतान्युत्पत्तिव्युत्क्रमेणैत्कारण-
भूताज्ञानोपहितचैतन्यमात्रं भवति। एतदज्ञानमज्ञानोपहितं चैतन्यं
चेश्वरादिकमेतदाधारभूतानुपहितचैतन्यरूपं तुरीयं ब्रह्ममात्रं भवति॥२१॥
पदच्छेद- अपवादः नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्ववद्,
वस्तुविवर्तस्य अवस्तुनः अज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्। तद् उक्तम्-
“सतत्त्वतः अन्यथा प्रथा विकारः इति 'उदीरितः।
अतत्त्वतः अन्यथा प्रथा विवर्तः इति उदीरितः॥इति॥
तथाहि, एतद् भोगायतनम् चतुर्विध-सकल-स्थूल-शरीरजातम्
भोग्यरूप-अन्नपानादिकम्, एतद् आयतनभूत-भूः आदि चतुर्दश-भुवनानि,
एतद्-आयतनभूतम् ब्रह्माण्डम् च एतत् सर्वम्, एतेषाम् कारणरूपम्
पञ्चीकृतभूतमात्रम् भवति।
एतानि शब्द-आदि विषयसहितानि पञ्चीकृतानि भूतानि सूक्ष्मशरीर-जातम्
च एतत् सर्वम् एतेषाम् कारणरूप-अपञ्चीकृतभूतमात्रम् भवति। एतानि
सत्त्वादि-गुण-सहितानि अपञ्चीकृतानि उत्पत्तिव्युत्क्रमेण एतत्
कारणभूत-अज्ञान-उपहितचैतन्यमात्रम् भवति। एतद् अज्ञानम् अज्ञानोपहितम्
चैतन्यम् च ईश्वरादिकम्, एतद् आधारभूत-अनुपहितचैतन्यरूपम् तुरीयम्
ब्रह्ममात्रम् भवति॥२१॥
अनुवाद- रस्सी में भ्रान्तिवश प्रतीत होने वाले सर्प की पुनः रस्सीमात्र
के रूप में प्रतीति के समान, ब्रह्मरूप वस्तु में मिथ्याप्रतीति के कारण
अवस्तुरूप अज्ञानादिप्रपञ्च में, पुनः ब्रह्मरूप सत्यवस्तु का भान होना ही
वस्तुतः अपवाद है। इसीलिए कहा है-
“अपने मूलरूप का परित्याग करके अन्यरूप को ग्रहण करना ही
'विकार' इसप्रकार कहा गया है। अपने रूप को बिना छोड़े अन्य वस्तु की
मिथ्याप्रतीति 'विवर्त' ऐसा कहलाता है।"
क्योंकि सुख-दुःखरूप भोग का स्थानरूप ये, उत्पन्न हुए सभी चार
प्रकार के स्थूलशरीर, भोग्यरूप अन्न-पान आदि, इसके आयतनभूत भूः
२२६ वेदान्तसार
भुवः, स्वः आदि चौदहलोक एवं उन भुवनों का आधारभूत ब्रह्माण्ड, यह
सब, अपने कारणरूप पञ्चीकृतमहाभूतों में (विलीन) हो जाता है।
शब्द आदि विषयों के साथ ये पञ्चीकृतभूत, सूक्ष्मशरीर समुदाय यह सब
इनके कारणरूप अपञ्चीकृतभूतमात्र में (विलीन) हो जाता है। सत्त्व आदि
गुणों के साथ ये अपञ्चीकृतभूत भी उत्पत्ति के विपरीतक्रम से अपने
कारणभूत अज्ञानोपहितचैतन्यमात्र (में विलीन) हो जाते हैं तथा अज्ञान की
उपाधि से युक्त चैतन्य, ईश्वर आदि अपने आधारभूत उपाधिरहित शुद्ध
चैतन्यरूप 'तुरीय' ब्रह्ममात्र (में विलीन) हो जाता है।
'चन्द्रिका'- पूर्व में ग्रन्थकार ने अध्यारोप की प्रक्रिया का विस्तृत
विवेचन करते हुए अद्वैत का प्रतिपादन किया। पुनः प्रस्तुत गद्यखण्ड में
'अपवाद' के सिद्धान्त का कथन करते हुए अद्वैत की सिद्धि करते हैं-
जैसाकि पूर्व में बताया गया है कि भ्रान्ति के कारण किसी सत्यवस्तु में
असत्य की प्रतीति होना 'अध्यारोप' है, किन्तु उस भ्रान्ति का निराकरण
करके वस्तु के वास्तविकरूप का ज्ञान प्राप्त करना 'अपवाद' कहलाता है।
जिसप्रकार अंधकार आदि के कारण रस्सी में सर्प की मिथ्याप्रतीति होना
एवं सीपी में दूरी अथवा दृष्टिदोष आदि के कारण चाँदी की प्रतीति
'अध्यारोप' प्रक्रिया के अन्तर्गत आएगी। जबकि टॉर्च के प्रकाश आदि द्वारा
अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा बताए जाने पर या फिर स्वयं ही पास जाकर
रस्सी एवं चांदी विषयक भ्रान्तियों को दूर करके, वस्तु के वास्तविकस्वरूप
रस्सी अथवा सीपी से परिचित होना ही 'अपवाद' होगा।
ठीक इसीप्रकार अज्ञान आदि के कारण ब्रह्मरूप सत्यवस्तु में जगत्रूप
प्रपञ्च की मिथ्याप्रतीति होना ही 'अध्यारोप' है एवं सद्गुरु के कुशल
मार्गदर्शन अथवा स्वयं के प्रयासों द्वारा तद्विषयक अज्ञान को दूर करके
अद्वैततत्त्व तुरीयरूप शुद्धचैतन्य की अर्थात् सत्यवस्तु की प्रतीति होना ही
'अपवाद' माना जाएगा।
इसी प्रसङ्ग में अन्यथा प्रतीति के मिथ्याभाव के दो प्रकारों का कथन
करते हुए ग्रन्थकार 'विकार' एवं विवर्त को स्पष्ट करते हैं। तदनुसार- "जब
कोई वस्तु अपने स्वरूप का परित्याग करके किसी अन्यरूप को ग्रहण कर
लेती है तो उसे 'विकार' के अन्तर्गत मानना होगा। जैसे-दूध का दही के
रूप में परिवर्तित होना 'विकार' है, क्योंकि दही बनने के बाद उसे पुनः
दूध के रूप में बनाना असम्भव है। अपने रूप का त्याग करके ही दूध दही
बनता है। इसी प्रक्रिया को परिणाम भी कहा जाता है।
' अपवाद-निरूपण २२७
इसके अतिरिक्त अपने स्वरूप का परित्याग न करते हुए जब किसी
वस्तु में अन्य वस्तु की मिथ्याप्रतीति होती है, तो इस प्रक्रिया को हम
'विवर्त' कहेंगे। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति होना, सीपी में चांदी की
भ्रान्ति होना विवर्त है, क्योंकि इन दोनों स्थानों पर रस्सी एवं सीपी अपने
स्वरूप का परित्याग किए बिना ही अन्यरूप को ग्रहण कर लेती हैं। यद्यपि
यह रूप भ्रान्ति ही है, फिर भी इसके, क्षणिक ही सही, अस्तित्व को
नकारा नहीं जा सकता है।
ठीक इसीप्रकार चराचररूप सम्पूर्णप्रपञ्च शुद्धचैतन्यस्वरूप परमब्रह्म का
विवर्त है परिणाम नहीं, क्योंकि सत्यवस्तु ब्रह्म में प्रपञ्च की प्रतीति वस्तुतः
मिथ्या है। ज्ञान आदि द्वारा इस मिथ्याप्रतीति को दूर करके तुरीयचैतन्य ब्रह्म
' की तात्त्विकप्रतीति होना ही 'अपवाद' है।
जब प्रमाता को इस बात का भलीप्रकार ज्ञान हो जाता है तो यह सम्पूर्ण
चराचरप्रपञ्च अपनी उत्पत्ति के विपरीतक्रम में अपने-अपने कारणों में
विलीन होता जाता है। इसप्रकार वह मिथ्याप्रतीति विनष्ट हो जाती है तथा
अन्त में अद्वैतब्रह्म की सत्ता विद्यमान रहती है, जिसे 'तुरीय' संज्ञा भी प्रदान
की गई है, क्योंकि यह स्थूलप्रपञ्च, सूक्ष्मप्रपञ्च एवं कारणशरीर से भिन्न
अर्थात् चतुर्थ होता है। वेदान्त की दृष्टि में साधक की यही सर्वोत्कृष्ट
स्थिति है।
ज्ञान होने के अनन्तर सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च के अपने-अपने कारण में
विलय होने के क्रम को ग्रन्थकार ने 'तथाहि' इत्यादि गद्यांश में वर्णित
किया है-
सुख-दुःख आदि को भोगने वाले जरायुज, अण्डज, स्वेदज और
उद्भिज्ज नामक चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, अन्नपान आदि सभी
भोग्यपदार्थ, भूः भुवः स्वः, महः, जनः तपः और सत्यम् ये सात ऊर्ध्व
लोक तथा अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल एवं पाताल आदि सात
अधःलोक इसप्रकार कुल मिलाकर चौदहभुवन एवं इन सबका आधारभूत
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, ये सभी अपने कारणरूप पञ्चीकृतमहाभूतों आकाश, वायु,
अग्नि, जल और पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं।
तत्पश्चात् अपने शब्दादिगुणों सहित सभी पञ्चीकृतमहाभूत एवं सत्रह
अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर ये सभी अपने कारणरूप अपञ्चीकृतभूतों में
विलीन हो जाते हैं। उसके बाद ये अपञ्चीकृतभूत भी अपने-अपने कारण में
उल्टेक्रम से इसप्रकार विलीन होते हैं-'पृथिवी जल में, जल अग्नि में,
२२८ वेदान्तसार
अग्नि वायु में, वायु अपने कारण आकाश में तथा आकाश अपने कारण
अज्ञान से उपहितचैतन्य में विलीन होकर तन्मात्ररूप में विद्यमान हो जाते हैं।
इसके पश्चात् यह अज्ञान एवं इससे उपहितसर्वज्ञ आदि गुणों से युक्त
चैतन्य ईश्वर आदि भी अपने आधारभूत अनुपहितशुद्धचैतन्यरूप तुरीय ब्रह्म
में विलीन हो जाता है। इसप्रकार तुरीयमात्र एक तत्त्व ही शेष बचता है और
यही वेदान्त का अद्वैतभाव भी है एवं यही अपवाद का स्वरूप भी, क्योंकि
यही परमशुद्धचैतन्य ही वस्तु है, जिसका प्रमाता को तात्त्विकज्ञान हो जाता
है।
विशेष-(1) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-
चित्र-४८
सृष्टि के विलय की अपवादरूप प्रक्रिया
┌──────────────┬──────────────┬──────────────┐
चतुर्विध शरीर भोग्य अन्नपानादि भूःभुवःस्वः आदि इन सबका
└───────┬──────┘ └──────┬──────┘ आधारभूत ब्रह्माण्ड
│ │ │
└────────────►┌──────────────┴───────────────┴─┐◄──────────────┘
│ का अपने कारण पञ्चीकृत │
│ आकाश आदि में विलय │
└──────────────┬────────────────┘
│
पञ्चीकृत
┌──────────────┬─────────────┴┬──────────────┬──────────────┐
आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी
└──────────────┼─────────────►│◄─────────────┼──────────────┘
│ ┌──────────┴──────────┐ │
└──►│ अपने कारण अपञ्चीकृत │◄──┘
│ आकाश आदि में विलय │
└──────────┬──────────┘
│
अपञ्चीकृत
│
आकाश ◄────────── वायु ◄───────── अग्नि ──────────► जल ◄───────── पृथिवी
│
│ अज्ञानोपहित शुद्धचैतन्य ───────────────► ┌───────────────┐
▼ │ शुद्धचैतन्य तुरीय │
┌───────┐ └───────┬───────┘
│ ईश्वर │ ▼
└───────┘ ( अवशिष्ट )
अवतरणिका-तत्पश्चात् 'अध्यारोप', 'अपवाद' की इन दोनों प्रक्रियाओं
से 'तत्त्वमसि' महावाक्य के तत् एवं त्वम् पदार्थों के अर्थों को समझने में
इनके सहयोग का कथन करते हैं-
अपवाद-निरूपण २२९
आभ्यामध्यारोपापवादाभ्यां तत्त्वम्पदार्थशोधनमपि सिद्धं भवति।
तथाहि। अज्ञानादिसमष्टिरेतदुपहितं सर्वज्ञत्वादिविशिष्टं चैतन्यमेतदनुपहितं
चैतत्रयं तप्तायः पिण्डवदेकत्वेनावभासमानं तत्पदवाच्यार्थो भवति।
एतदुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं चैतन्यं तत्पदलक्ष्यार्थो भवति।
अज्ञानादिव्यष्टिरेतदुपहितालपज्ञत्वादिविशिष्ट चैतन्यमेतदनुपहितं चैतत्रयं
तप्तायःपिण्डवदेकत्वेनावभासमानं त्वम्पदवाच्यार्थो भवति।
एतदुपाध्युपहिताधारभूतमनुपहितं प्रत्यगानन्दं तुरीयं चैतन्यं त्वम्पदलक्ष्यार्थो
भवति॥२२॥
पदच्छेद-आभ्याम् अध्यारोप-अपवादाभ्याम् तत्-त्वम् पदार्थशोधनम् अपि
सिद्धम् भवति। तथाहि, अज्ञानादिसमष्टिः, एतद् उपहितम् सर्वज्ञत्वादि
विशिष्टम् चैतन्यम्, एतद् अनुपहितम् च एतत् त्रयम्-तप्त-अयः पिण्डवद्
एकत्वेन अवभासमानम् तत्-पद-वाच्यार्थः भवति। एतद् उपाधि-उपहित-
आधारभूतम्-अनुपहितम् चैतन्यम् तत् पदलक्ष्यार्थः भवति।
अज्ञान-आदि व्यष्टिः एतद् उपहित-अल्पज्ञत्व-आदि विशिष्टचैतन्यम् एतद्
अनुपहितम् च एतत् त्रयम् तप्त-अयःपिण्डवद् एकत्वेन अवभासमानम् त्वम्
पदवाच्यार्थः भवति। एतद् उपाधि-उपहित-आधारभूतम् अनुपहितम् प्रत्यक्
आनन्दम् तुरीयम् चैतन्यम् त्वम् पद-लक्ष्यार्थः भवति॥२२॥
अनुवाद-इन दोनों अध्यारोप-अपवाद द्वारा तत् एवम् त्वम् पदों के अर्थों
का स्पष्टीकरण भी सिद्ध हो जाता है, क्योंकि-अज्ञान आदि की समष्टि, इन
सर्वज्ञत्वादि विशेषणों की उपाधि से युक्त चैतन्य (अर्थात् ईश्वर) एवं इस
उपाधि से शून्य (शुद्धचैतन्य), ये तीनों-तप्तलोहपिण्ड के समान एक ही
प्रतीत होने के कारण, तत् पद के वाच्यार्थ होते हैं तथा इस उपाधि से युक्त
(उन सबका) आधारभूत अनुपहित चैतन्य, तत् पद का लक्षणा शब्दशक्ति
द्वारा प्रतिपादित लक्ष्यार्थ होता है।
अज्ञान आदि व्यष्टि, इसकी उपाधि अल्पज्ञत्व आदि विशेषताओं से युक्त
चैतन्य (अर्थात् जीव) तथा इसकी उपाधि से रहित शुद्धचैतन्य, ये तीनों
(एक साथ) तप्तलोहपिण्ड के समान अभिन्न प्रतीत होने के कारण, त्वम्
पद के वाच्यार्थ होते हैं। इस उपाधि से युक्त (उन सबका) आधारभूत
अनुपहित आनन्दरूप तुरीयचैतन्य त्वम् पद (लक्षणाशब्दशक्ति द्वारा प्राप्त)
का लक्ष्यार्थ होता है।
1
२३० वेदान्तसार
'चन्द्रिका'—इसप्रकार अध्यारोप एवं अपवादरूप दोनों सिद्धान्तों को
भलीप्रकार समझने के बाद यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि सम्पूर्ण
चराचर नामरूपात्मक जगत् ही वस्तुतः ब्रह्म है तथा ब्रह्म ही सम्पूर्ण चराचर
नामरूपात्मक संसार है। साथ ही 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्'
एवं 'त्वम्' पदों के अर्थों का अभिप्राय भी पूर्णरूप से स्पष्ट हो जाता है।
तदनुसार-अज्ञान, कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर की समष्टि तथा
इनकी उपाधि से युक्त चैतन्य, सर्वज्ञता, व्यापकता आदि गुणों से विशिष्ट
ईश्वर, हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) और विराट् (वैश्वानर) रूप चैतन्य एवं इन सब
उपाधियों से रहित तुरीय ब्रह्मरूप शुद्धचैतन्य, इन सब में ठीक उसीप्रकार
अभिन्नता विद्यमान है, जिसप्रकार तप्त लोहपिण्ड कहने पर लोहपिण्ड एवं
अग्नि में अभिन्नता की प्रतीति होती है। यही इस तत् पद का वाच्यार्थ
अर्थात् अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्राप्त सीधा अर्थ है।
इसके अतिरिक्त अज्ञान से उपहित ईश्वररूप चैतन्य का आधार जो
उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है, उसका अज्ञान एवं उससे आच्छादित ईश्वर रूप
चैतन्य से अलग-अलगरूप में प्रकाशित होना ही 'तत्त्वमसि' महावाक्य में
प्रयुक्त 'तत्' पद का लक्ष्यार्थ है।
इस भाव को 'तप्तायः पिण्डः' इस उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझा जा
सकता है। तपे हुए लोहपिण्ड से जलने पर 'मैं लोहे से जल गया' ऐसा
सामान्यरूप से कहा जाता है, जबकि दाहकताशक्ति लोहे में न होकर अग्नि
में विद्यमान रहती है। इसलिए अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतिपादित इस
साक्षात् संकेतित अर्थ, वाच्यार्थ में अग्नि एवं लोह में अभिन्नतारूप अर्थ ही
प्रमुखता लिए होता है। ठीक इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य में भी 'तत्'
अर्थात् शुद्धचैतन्य (तुरीय) एवं त्वम् अर्थात् उपाधियुक्त चैतन्य (जीव) की
अभिन्नता का कथन ही मुख्यप्रयोजन होने से इसका वाच्यार्थ अर्थात् सीधा
अर्थ कहलाएगा।
इसके अतिरिक्त 'तप्तायः पिण्ड' इत्यादि उदाहरण में दाहकताशक्ति लोहे
में विद्यमान न होने के कारण 'लोहे से जल गया' ऐसा कहने पर मुख्य
अर्थ का बाध होने पर लक्षणा शब्दशक्ति से 'अग्नि' रूप अर्थ के साथ
'लोहे में स्थित अग्नि से जल गया' इसप्रकार लक्ष्यार्थ की प्रतीति में अग्नि
एवं लोहे की भिन्नता की प्रतीति कराना ही मुख्यप्रयोजन होगा। ठीक
इसीप्रकार 'तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद से प्रतीत होने वाले शुद्धचैतन्य
महावाक्यार्थ-निरूपण २३१
एवं 'त्वम्' से प्रतीत होने वाले उपाधियुक्त चैतन्य में, दोनों की विशिष्टता
में अभिप्राय होने की दृष्टि से, दोनों को भिन्न-भिन्न प्रतिपादित करना रूप
अर्थ लक्ष्यार्थ होगा।
कहने का अभिप्राय यह है कि 'तत्त्वमसि' महावाक्य में प्रयुक्त 'तत्'
एवं 'त्वम्' पदों में प्रत्येक के दो-दो अर्थ हैं-प्रथम वाच्यार्थ एवं द्वितीय
लक्ष्यार्थ। इस दृष्टि से अज्ञान की सम्पूर्ण समष्टि, तद् अवच्छिन्न चैतन्यरूप
ईश्वर, हिरण्यगर्भ और वैश्वानर एवं इन सबसे भिन्न अनुपहित शुद्धचैतन्य
जिसे अक्षर एवं सच्चिदानन्दस्वरूप तुरीय कहा गया है, ये तीनों तपे हुए
लोहपिण्ड के समान एक ही हैं और यही यहाँ तत् शब्द का वाच्यार्थ है।
इसके अलावा अज्ञान एवं उसका कार्यरूप समस्त चराचरप्रपञ्च, उसे
स्फूर्ति प्रदान करने वाली, यहाँ तक कि ईश्वर आदि चैतन्य की भी
आधारस्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप, अज्ञान आदि की उपाधि से रहित,
परमशुद्धचैतन्य तुरीय नामक यथार्थवस्तु इन सबकी अलग-अलग प्रतीति ही
तत् पद का लक्ष्यार्थ है।
इसीप्रकार व्यष्टिभूत अज्ञान, उससे अवच्छिन्न अल्पज्ञत्व आदि गुणों से
विशिष्ट प्राज्ञ, तैजस् एवं विश्वचैतन्य एवं इन सभी का आधारभूत शुद्ध
चैतन्य ये तीनों भी 'तपे हुए लोहपिण्ड' के समान एक ही हैं। यह यहाँ
त्वम् पद का वाच्यार्थ है तथा अज्ञान आदि उपाधियों से युक्त प्राज्ञ, तैजस्
और विश्व एवं इन सबका आधार अनुपहित शुद्धचैतन्य जिसे प्रत्यगानन्द
तुरीय भी कहा गया है ये सभी अलग-अलग हैं, यह 'त्वम्' पद का
लक्ष्यार्थ है।
अतः अनुपहित शुद्धचैतन्य तत् एवं त्वम् इन दोनों पदों का लक्ष्यार्थ है।
इसीलिए तत् एवं त्वम् ये दोनों पद यहाँ लक्षण हैं तथा शुद्धचैतन्य लक्ष्य है।
विशेष-(1) प्रस्तुत खण्ड में ग्रन्थकार ने अब तक प्रतिपादित अध्यारोप
एवं अपवाद के सिद्धान्तों द्वारा 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य में प्रयुक्त तत्
एवं त्वम् पदों के वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को बताते हुए उनके अर्थों को
स्पष्ट किया है।
(2) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी अभिव्यक्त कर सकते
हैं-