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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 314 में से

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पृष्ठ 61

भूमिका ४७
साक्षी है तथा उन्हें कर्म का फल प्रदान करता है। शङ्कराचार्य के अनुसार
'इस संसाररूपी वृक्ष का मूल ब्रह्म ही है।'
इसके अतिरिक्त ब्रह्म को यहाँ 'अवाङ्मनसगोचर' कहा गया है, क्योंकि
उसे न तो आँखों से देखा जा सकता है, न ही मन और वाणी उसे जानने
में समर्थ हैं। वह अत्यन्तसूक्ष्म होने के कारण अविज्ञेय है तथा अकथनीय
है। फिर भी योगविद्या से योग्य गुरु के मार्गदर्शन में उसका साक्षात्कार किया
जा सकता है, किन्तु उसके स्वरूप की व्याख्या असम्भव है। गूँगे के गुड़
के समान उसके आनन्द को केवल अनुभव किया जा सकता है।
इसीकारण उपनिषदों में ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने के लिए 'नेति
नेति' की शैली को अपनाया गया है। यहाँ 'नेति नेति' का दो बार प्रयोग
माया एवं उसके प्रपञ्च का निराकरण करके एकमात्र ब्रह्म की सत्ता को
इंगित करने के लिए विशेष अभिप्राय हेतु किया गया है। वेदान्त के
अनुसार-यद्यपि यह परमतत्त्व ब्रह्म एक है-'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म'
(छान्दोग्योपनिषद्-6/2/1), किन्तु पारमार्थिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से
इसकी सगुण और निर्गुण दो रूपों में परिकल्पना की गई है। माया की
उपाधि से विशिष्टब्रह्म ही ईश्वर सगुण, साकार या सविशेष कहा गया है
तथा इससे रहित ब्रह्म ही निर्गुण, निराकार या निर्विशेष माना गया है।
उपनिषदों में ब्रह्म का ध्यान करने का सर्वश्रेष्ठ आधार 'ओम्' या
'ओङ्कार' को माना गया है-'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षुभिः
(ध्यानबिन्दूपनिषद्-2) इसका ध्यान करने से साधक ब्रह्मलोक को प्राप्त
करता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म को मुक्तजीवों का आश्रय कहा गया है
(मुण्डकोपनिषद्-2/2/8)। ब्रह्म का साक्षात्कार होने के पश्चात् साधक के
हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं तथा उसके सभी संशय दूर हो जाते हैं।
ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति ठीक उसीप्रकार ब्रह्म ही हो जाता है,
जिसप्रकार बहती हुई नदियाँ समुद्र में मिलकर अपने नामरूप को खोकर
उसमें एकाकार हो जाती हैं। ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करके व्यक्ति का पुनः
इस संसार में आगमन नहीं होता है-'न स पुनरावर्तते'। इसीकारण ब्रह्म को
आश्रय, अमृतमय एवं अविनश्वर कहा गया है। गीता ने भी इस बात का
अनुमोदन किया है-
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ (श्रीमद्भगवद्गीता 8/21)