वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
स्थूलसृष्टि-निरूपण
२०१४ वेदान्तसार
हैं, किन्तु इनमें अपने-अपने अंश की अधिकता के कारण ही तत्-तत् नाम
से उनका व्यवहार किया जाता है एवं तत्-तत् अंश की अधिकता से
अपने-अपने गुणों की अनुकूलता के आधार पर ही सम्बन्धित इन्द्रियों द्वारा
उसका प्रत्यक्ष किया जाता है।
इसीलिए पञ्चीकृत आकाश में शब्द। वायु में शब्द एवं स्पर्श। अग्नि में
शब्द, स्पर्श एवं रूप। जल में शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि अपने-अपने कारणों के अनुसार स्पष्टरूप
से अनुभव किए जा सकते हैं।
विशेष-(1) पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख न तो बादरायण ने
शारीरकसूत्रों में किया है और न ही आचार्य शङ्कर ने अपने भाष्य में
इसकी चर्चा की है।
(2) अपितु सर्वप्रथम इसका वर्णन उत्तरकालीन टीकाकार आनन्दज्ञान ने
किया है।
(3) इसीकारण पाश्चात्यविद्वान् डयूसन ने उपनिषदों में प्रतिपादित
त्रिवृत्करण के सिद्धान्त को भारतीयदर्शनों की विकासपरम्परा में अपेक्षाकृत
पूर्व अवस्था का द्योतक स्वीकार किया है।
(4) यहाँ प्रयुक्त 'उपलक्षण' से अभिप्राय निर्देशन अथवा संकेतमात्र से
ग्रहण करना चाहिए।
(5) वैशेष्यात्तद्वादस्तद्वाद न्याय-यदि किसी एक वस्तु में एकाधिक तत्त्व
विद्यमान हो तो अधिकता के आधार पर उसका सम्बोधन किया जाता
है-इसीको 'वैशेष्यात् तद्वादः' कहा जाएगा। आकाश आदि पञ्चीकृत
महाभूतों के नामकरण का भी यही सिद्धान्त आधाररूप में बताया गया है,
क्योंकि जिस नाम से महाभूत को जाना जाता है, उसमें उसका आधा भाग
विद्यमान रहता है।
(6) त्रिवृत्करण को अपेक्षाकृत विस्तारपूर्वक समझने के लिए भूमिका में
चित्रसंख्या-12 भी द्रष्टव्य है।
अवतरणिका-पञ्चीकरण एवं इसी प्रसङ्ग में त्रिवृत्करण का उल्लेख
करने के बाद ग्रन्थकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया के पश्चात् उत्पन्न
पञ्चमहाभूतों से होने वाली स्थूलसृष्टि का कथन करते हैं-
एतेभ्यः पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यो भूर्भुवःस्वर्महर्जनस्तपः
सत्यमित्येतन्नामकानामुपर्य्युपरिविद्यमानानामतलवितलसुतलरसातलतलातल-
स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०५
महातलपातालनामकानामधोऽधोविद्यमानानां लोकानां ब्रह्माण्डस्य
तदन्तर्वर्तिचतुर्विधस्थूलशरीराणां तदुचितानामन्नपानादीनां चोत्पत्तिर्भवति।
चतुर्विधशरीराणि तु जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजाख्यानि। जरायुजानि
जरायुभ्यो जातानि मनुष्यपश्वादीनि। अण्डजान्यण्डेभ्यो जातानि
पक्षिषन्नगादीनि। उद्भिज्जानि भूमिमुद्भिद्य जातानि लतावृक्षादीनि।
स्वेदजानि स्वेदेभ्यो जातानि यूकामशकादीनि॥१६॥
पदच्छेद- एतेभ्यः पञ्चीकृतेभ्यः भूतेभ्यः भूभुवः-स्वः-महः-जनः-तपः-
सत्यम्-इति एतत् नामकानाम् उपर्युपरि विद्यमानानाम्
अतल-वितल-सुतल-रसातल- तलातल-महातल-पाताल-नामकानाम् अधोऽधः
विद्यमानानाम् लोकानाम्, ब्रह्माण्डस्य तद् अन्तर्वर्ति-चतुर्विध-स्थूलशरीराणाम्
तद् उचितानाम् अन्नपान-आदीनाम् च उत्पत्तिः भवति।
चतुर्विध-शरीराणि तु जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज-आख्यानि।
जरायुजानि-जरायुभ्यः जातानि, मनुष्य-पशु-आदीनि। अण्डजानि-अण्डेभ्यः
जातानि, पक्षि-पन्नग-आदीनि। उद्भिज्जानि-भूमिम् उद्भिद्य जातानि लता
वृक्ष-आदीनि। स्वेदजानि-स्वेदेभ्यः जातानि, यूका मशक-आदीनि।।16।।
अनुवाद-इन पञ्चीकृत महाभूतों में भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः,
सत्यम् इत्यादि नाम वाले ऊपर-ऊपर विद्यमान लोकों की और अतल,
वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल नामक अधोवर्ती
भुवनों की, ब्रह्माण्ड की तथा उनमें विद्यमान चार प्रकार के स्थूलशरीरों की
एवं उनके योग्य अन्नपान आदिकों की उत्पत्ति होती है।
जबकि जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज एवं स्वेदज नामक चार प्रकार के
(स्थूल) शरीर हैं। जरायु से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि जरायुज
(नामक स्थूलशरीर) हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सर्प आदि
अण्डज हैं। पृथिवी को भेदकर उत्पन्न होने वाले लता, वृक्ष आदि उद्भिज्ज
हैं तथा पसीने से पैदा होने वाले जूँ, मच्छर आदि स्वेदज (नामक स्थूल
शरीर) हैं।
'चन्द्रिका'-उपर्युक्त गद्यखण्ड का अर्थ स्पष्ट होने से व्याख्या की
आवश्यकता नहीं है।
विशेष-(1) प्रस्तुत अंश में भूः आदि सात ऊर्ध्वलोक, पाताल आदि
सात अधोलोक, इसप्रकार कुल चौदहभुवन, उनसे निर्मित सम्पूर्णब्रह्माण्ड तथा
उन लोकों में विद्यमान चार प्रकार के स्थूलशरीर-जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज
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तथा स्वेदज के साथ-साथ इनके पोषण के योग्य भोगपदार्थों अन्नपान आदि
की उत्पत्ति का कथन किया गया है।
(२) प्रस्तुत गद्यखण्ड को चित्रात्मकदृष्टि से समझने के लिए द्रष्टव्य
भूमिका में चित्र संख्या-11 एवं 17 ।
अवतरणिका-तत्पश्चात् स्थूलप्रपञ्च का समष्टिव्यष्टि की दृष्टि से
निरूपण करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं-
अत्रापि चतुर्विधसकलस्थूलशरीरमेकानेकबुद्धिविषयतया
वनवज्जलाशयवद्वा समष्टिर्वृक्षवज्जलवद्वा व्यष्टिरपि भवति।
एतत्समष्ट्युपहितं चैतन्यं वैश्वानरो विराडित्युच्यते सर्वनराभिमानित्वाद्विविधं
राजमानत्वाच्च।
अस्यैषा समष्टिः स्थूलशरीरमन्नविकारत्वादन्नमयकोशः स्थूल
भोगायतनत्वाच्च स्थूलशरीरं जाग्रदिति च व्यपदिश्यते। एतद्व्यष्ट्युपहितं
चैतन्यं विश्व इत्युच्यते सूक्ष्मशरीराभिमानपरित्यज्य स्थूलशरीरादि-
प्रविष्टत्वात्। अस्याप्येषा व्यष्टिः स्थूलशरीरमन्नविकारत्वादेव
हेतोरन्नमयकोशो जाग्रदिति चोच्यते।
तदानीमेतौ विश्ववैश्वानरौ दिग्वातार्कवरुणाश्विभिः क्रमान्नियन्त्रितेन
श्रोत्रादीन्द्रियपञ्चकेन क्रमाच्छब्दस्पर्शरूपरसगन्धानग्नीन्द्रोपेन्द्रयम-
प्रजापतिभिः क्रमान्नियन्त्रितेन वागादीन्द्रियपञ्चकेन क्रमाद्वचनादानगमन-
विसर्गानन्दां श्चन्द्रचतुर्मुखशङ्कराच्युतैः क्रमान्नियन्त्रितेन मनोबुद्ध्यहङ्कार-
चित्ताख्येनान्तरिन्द्रियचतुष्केण क्रमात्सङ्कल्पनिश्चयाहङ्कार्याचैतांश्च
सर्वानैतान् स्थूलविषयाननुभवतो "जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञ" इत्यादिश्रुतेः।
अत्राप्यनयोः स्थूलव्यष्टिसमष्ट्योस्तदुपहितविश्ववैश्वानरयोश्च वनवृक्ष-
वत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च जलाशयजलवत्तद् तप्रतिबिम्बाकाशवच्च
पूर्ववद्भेदः। एवं पञ्चीकृतपञ्चभूतेभ्यः स्थूलप्रपञ्चोत्पत्तिः॥१७॥
पदच्छेद-अत्र अपि चतुर्विध-सकल-स्थूल-शरीरम् एक-अनेक-बुद्धि
विषयतया वनवद् जलाशयवद् वा समष्टिः, वृक्षवद् जलवद् वा व्यष्टिः अपि
भवति। एतत् समष्टि-उपहितम् चैतन्यम् वैश्वानरः विराट् इति उच्यते,
सर्वनराभिमानित्वाद्, विविधं राजमानत्वात् च।
अस्य एषा समष्टिः स्थूलशरीरम्, अन्नविकारत्वाद् अन्नमयकोषः, स्थूल
भोगायतनत्वात् च स्थूलशरीरम्, जाग्रद् इति च व्यपदिश्यते। एतत्
व्यष्टि-उपहितम् चैतन्यम् विश्वः, इति उच्यते, सूक्ष्मशरीर-अभिमानम्
स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०७
अपरित्यज्य स्थूलशरीरादि-प्रविष्टत्वात्। अस्य अपि एषा व्यष्टिः स्थूलशरीरम्,
अन्नविकारत्वाद् एव हेतोः अन्नमयकोशः, जाग्रद् इति च उच्यते।
तदानीम् एतौ विश्व-वैश्वानरौ दिग्-वात-अर्क-वरुण-अश्विभिः क्रमात्
नियन्त्रितेन श्रोत्रादि इन्द्रियपञ्चकेन क्रमात्, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धान्,
अग्नि-इन्द्र-उपेन्द्र-यम-प्रजापतिभिः क्रमात् नियन्त्रितेन वाग् आदि
इन्द्रियपञ्चकेन क्रमाद् वचन-आदान-गमन-विसर्ग-आनन्दान्, चन्द्र-चतुर्मुख-
शङ्कर-अच्युतैः क्रमात् नियन्त्रितेन, मनः-बुद्धि-अहङ्कार-चित्त-आख्येन
अन्तरिन्द्रिय-चतुष्केण क्रमात् सङ्कल्प-निश्चय-अहङ्कार्य-चैत्तान् च सर्वान्
एतान् स्थूलविषयान् अनुभवतः, “जागरितस्थानः बहिःप्रज्ञ” इत्यादि श्रुतेः।
अत्र अपि अनयोः स्थूलव्यष्टि-समष्ट्योः, तद् उपहित विश्व-वैश्वानरयोः,
च, वन-वृक्षवत् तद् अवच्छिन्न-आकाशवत् च जलाशय-जलवत् तद्गत
प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च पूर्ववद् अभेदः। एवम् पञ्चीकृत पञ्चभूतेभ्यः स्थूल
प्रपञ्च-उत्पत्तिः।।17।।
अनुवाद- यहाँ भी चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, एक और अनेक
बुद्धियों का विषय होने से वन अथवा जलाशय के समान समष्टि, वृक्ष
अथवा जल के समान व्यष्टि भी होते हैं। इस समष्टिरूप उपाधि से उपहित
हुआ चैतन्य, सभी प्राणियों का अधिष्ठाता होने एवं विविध रूपों में
विराजमान होने के कारण वैश्वानर एवं विराट् कहा जाता है।
समष्टिरूप इसका यह स्थूलशरीर (माता-पिता द्वारा खाए हुए) अन्न का
विकार होने से अन्नमयकोश, स्थूलभागों का आश्रय होने से स्थूलशरीर तथा
(विषयों का भोग करने वाला होने के कारण) जाग्रद् इसप्रकार कहा जाता
है।
इस व्यष्टिरूप उपाधि से उपहित चैतन्य, सूक्ष्मशरीर के अभिमान का
परित्याग किए बिना स्थूलशरीर में प्रविष्ट होने के कारण 'विश्व' इसप्रकार
कहा जाता है। इसका भी यह व्यष्टिरूप स्थूलशरीर, अन्न का विकार होने
से ही अन्नमयकोश तथा जाग्रद् इसप्रकार कहलाता है।
ये दोनों विश्व और वैश्वानर उससमय, दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा
अश्विनीकुमारों द्वारा क्रमशः नियन्त्रित श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियों से क्रमशः
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का; अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम, प्रजापति
द्वारा क्रमशः नियन्त्रित वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः बोलना, लेना,
चलना, विसर्जन और आनन्द का; चन्द्र, ब्रह्मा, शिव और विष्णु द्वारा क्रमशः
नियन्त्रित मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त नामक चार अन्तरिन्द्रियों (के
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समूह) से क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, अहङ्कार तथा स्मरण आदि इन
सम्पूर्ण स्थूलविषयों का अनुभव करते हैं। “जाग्रत अवस्था से युक्त चैतन्य
ही बाह्यविषयों से परिचित है” इत्यादि श्रुतिवचन भी (यहाँ प्रमाण है)।
यहाँ भी इन दोनों स्थूल व्यष्टि एवं समष्टि में तथा उनसे उपहित विश्व
और वैश्वानर में, वन और वृक्ष एवं उससे अवच्छिन्न आकाश के समान,
जलाशय और जल तथा उसके प्रतिबिम्बित आकाश के समान पूर्ववत् अभेद
होता है। इसप्रकार पञ्चीकृत पाँच महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की उत्पत्ति होती
है।
‘चन्द्रिका’-स्थूलसृष्टि का कथन करने के उपरान्त समष्टि-व्यष्टि की
दृष्टि से ग्रन्थकार चैतन्य का नामकरण करते हुए उनमें अभेद की स्थापना
करते हैं-सम्पूर्ण स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत बताए गए जरायुज, अण्डज,
उद्भिज्ज एवं स्वेदज चार प्रकार के स्थूलशरीर एकत्व अथवा अनेकत्व की
विवक्षा में प्रत्येक प्राणी की एक बुद्धि तथा अलग-अलग प्राणियों की
अलग-अलग अनेक बुद्धियों का विषय होने से, वन एवं जलाशय के समान
समष्टि तथा वृक्ष एवं जल के समान व्यष्टिरूप में व्यवहृत होते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार सभी वृक्षों को एक साथ
कहने की इच्छा से वन एवं सभी जलों को एक साथ कहने की भावना से
जलाशय इसरूप में कहा जाता है, ठीक उसीप्रकार विभिन्नप्रकार के
स्थूलशरीरों को एक साथ कहने की दृष्टि से एक बुद्धि का विषय तथा
अनेकरूप में कहने की विवक्षा से भिन्न-भिन्न शरीर मानकर विभिन्न
बुद्धियों का विषय स्वीकार किया जाता है। यही क्रमशः समष्टि एवं व्यष्टि
कहलाती है।
इस समष्टि से उपहितचैतन्य को वैश्वानर अथवा विराट् कहा जाता है।
इसका मुख्यकारण यही है कि समष्टि से उपहित यह चैतन्य सभी प्राणियों
में ‘मैं’ इस अभिमान को धारण किए हुए विविधप्रकार से सुशोभित हो रहा
है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत विद्यमान अज्ञान की उपाधियुक्त, चार प्रकार
के स्थूलशरीरों की यह समष्टि विद्वानों द्वारा ‘स्थूलशरीर’ इस नाम से कही
जाती है। इसके अतिरिक्त यह स्थूलशरीर माता-पिता द्वारा खाए गए अन्न
द्वारा उत्पन्न होता है, इसलिए ‘अन्नमय’ भी कहलाता है। साथ ही आत्मा
का आच्छादक होने के कारण ‘कोश’ एवं सुखदुःख आदि के भोग का
आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा तत्तत् विषयों को भोगने के कारण ‘जाग्रत्’ भी
कहा जाता है।
स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०९
इसके अलावा उन्हीं चार प्रकार के स्थूलशरीरों की व्यष्टि से उपहित
चैतन्य यहाँ ‘विश्व’ कहलाता है। इसका भी मुख्यकारण यही है कि इन
अलग-अलग स्थूलशरीरों में रहता हुआ भी वह अपने-अपने सूक्ष्मशरीर के
प्रति ‘मैं’ रूप अभिमान को धारण किए हुए, प्रत्येक स्थूलशरीर में विद्यमान
रहता है। अज्ञान की यह व्यष्टि भी समष्टि के समान ही ‘स्थूलशरीर’,
माता-पिता द्वारा खाए हुए अन्न का विकार होने के कारण ‘अन्नमय’,
आत्मा अथवा चैतन्य का आच्छादक होने से ‘कोश तथा सुखदुःख आदि के
भोग का आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा उस-उसके विषयों का भोग करने के
कारण ‘जाग्रत्’ इन नामों से व्यवहृत होता है।
प्रस्तुत गद्यखण्ड के इतने अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझाया
जा सकता है-
चित्र-४३
चतुर्विध स्थूलशरीर की समष्टि व्यष्टि
एकत्व विवक्षा अनेकत्व विवक्षा
समष्टि वन अभेद वृक्ष व्यष्टि
चैतन्य जलाशय जल चैतन्य
वैश्वानर (विराट्) तदवच्छिन्नाकाश विश्व
समस्त प्राणियों के विविधरूप में सम्पूर्ण शरीरों में प्रविष्ट होकर
मैं इस अभिमान से युक्त
स्थूल शरीर अन्नमय कोश जाग्रत
(सुख-दुःख के भोग (माता-पिता द्वारा (आत्मा का आच्छादक (इन्द्रियों द्वारा विषयों
का आधार) खाए गए अन्न होने से) का भोग करने से)
से उत्पन्न होने से)
इसप्रकार स्थूलशरीरों की समष्टिव्यष्टि का कथन करने के पश्चात्
पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तरिन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवताओं
का उल्लेख करते हुए ग्रन्थकार उनके कार्यों का विस्तारपूर्वक कथन करते
हैं-
२१० वेदान्तसार
इस जाग्रत अवस्था में समष्टिरूप उपाधि से उपहित हुआ वैश्वानर
अथवा विराट् नामक यह चैतन्य एवं व्यष्टि-उपाधिरूप 'विश्व' ये
दोनों-दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा अश्विनीकुमार देवों से अधिष्ठित क्रमशः
श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा क्रमशः शब्द,
स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन गुणों को ग्रहण करते हैं।
इसीप्रकार अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम और प्रजापति इन देवताओं से
नियन्त्रित क्रमशः वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पाँच कर्मेन्द्रियों से
क्रमशः बोलना, ग्रहण करना (आदानप्रदान), चलना, मलत्याग एवं
आनन्दरूप कार्यों को सम्पादित करते हैं।
इसके अतिरिक्त चन्द्र, ब्रह्मा, शङ्कर तथा विष्णु इन देवों द्वारा अधिष्ठित
क्रमशः मन, बुद्धि, अहङ्कार तथा चित्तरूपी चार अन्तः इन्द्रियों के माध्यम से
क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, गर्व एवं स्मरणरूपी सभी स्थूलविषयों का
अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि में माण्डूक्योपनिषद् की उक्ति को
प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि-“जाग्रत अवस्था से
युक्त यह चैतन्य ही सम्पूर्ण बाह्यविषयों से अवगत रहता है।”
इस स्थिति में भी अर्थात् स्थूल समष्टि एवं व्यष्टि में, उनसे उपहित
'विश्व' और वैश्वानररूप चैतन्य में वन से अवच्छिन्न आकाश तथा वृक्ष से
अवच्छिन्न आकाश, जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल में
प्रतिबिम्बित आकाश के समान परस्पर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है,
अपितु शुद्धचैतन्य की दृष्टि से दोनों समान हैं।
तत्पश्चात् अन्त में प्रकरण का उपसंहार करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि
इसप्रकार पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की सृष्टि होती है।
विशेष-(1) 'अभिमानी' शब्द का प्रयोग यहाँ 'अधिष्ठाता' अर्थ की
अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
(2) प्रस्तुत गद्यखण्ड के प्रारम्भिक अंश में प्रयुक्त 'नर' शब्द समस्त
प्राणियों का उपलक्षण है।
(3) छान्दोग्य एवं श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी वैश्वानर एवं विराट् शब्दों
का ही प्रयोग हुआ है।
स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २११
(4) यहाँ प्रयुक्त ‘विविधराजमानत्वात्’ का अभिप्राय देव, पशु, मनुष्य,
पर्वत, नदी, समुद्र आदि विविधरूपों में विराजमान होने से, उन सबकी
‘विराट्’ संज्ञा प्रदान करने से है।
(5) इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण करने के कारण इसे ‘जाग्रत’ कहा
गया है। शङ्कराचार्य एवं सुबोधिनी टीकाकार इस व्याख्या से सहमत हैं-
(क) इन्द्रियैरर्थोपलब्धिर्जागरितम् (शङ्कराचार्य)
(ख) इन्द्रियैरर्थोपलब्धेश्च जाग्रदवस्थात्वं घटते (सुबोधिनी टीका)
(6) स्थूलशरीरादि में प्रयुक्त ‘आदि’ पद को अधिकांश व्याख्याकार
निरर्थक मानते हैं, किन्तु विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इसे ‘परम स्थूलशरीर’ के
अर्थ में प्रयुक्त माना है।
(7) यहां प्रतिपादित इन्द्रियविषयक देवताओं का अधिष्ठातृत्व
श्रीमद्भागवत में कही गयी परिकल्पना पर आधारित है।
(8) अन्तरिन्द्रियों की संख्या चार मानी गई है-मन, बुद्धि, चित्त एवं
अहंकार। यद्यपि आचार्य सदानन्द ने मन 'और बुद्धि में चित्त और अहङ्कार
का अन्तर्भाव माना है-
“अनयोरेव चित्ताहङ्कारयोरन्तर्भावः” (वेदान्तसार)
(9) विश्व एवं वैश्वानररूप चैतन्य स्थूलशरीरों में स्थित ज्ञानेन्द्रिय,
कर्मेन्द्रिय एवं अन्तःकरणों से सांसारिक स्थूलविषयों का भोग करता है। इन
दोनों में दिखायी देने वाला भेद उपाधिमात्र का है, तात्त्विकदृष्टि से दोनों
समान हैं।
(10) विश्व एवं वैश्वानर की अन्तरिन्द्रिय तथा बाह्य इन्द्रियों के कार्यों
को यहाँ प्रतिपादित देवताओं के अधिष्ठातृत्व के अनुसार इसप्रकार भी
प्रदर्शित कर सकते हैं-