वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ६३
सात्त्विक अंश से रसना (जिह्वा) नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि
जल का गुण रस है। अतः रसना ज्ञानेन्द्रिय द्वारा हमें रस अर्थात् स्वाद की
प्रतीति होती है।
साथ ही अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत पृथिवी के सात्त्विक अंश से घ्राण नामक
ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि पृथिवी का गुण है, गन्ध। इसीलिए
घ्राणेन्द्रिय द्वारा हम गन्ध को ग्रहण करते हैं। ज्ञान को ग्रहण करने के कारण
इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं।
चित्र-३
अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत
┌─────────────┐
│ सात्त्विक अंशों │ ↗ आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी
│ से पञ्च │ │ │ │ │ │
│ ज्ञानेन्द्रियों की │ ↗ श्रोत्र त्वक् चक्षुष् रसना घ्राण
│ उत्पत्ति │ │ │ │ │ │
└─────────────┘ ↘ शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध
(ग्रहण करना)
(ख) पञ्चकर्मेन्द्रिय- कर्म को सम्पादित करने के कारण इन्हें
कर्मेन्द्रिय कहा जाता है। इनकी संख्या भी पांच है-वाक्, पाणि, पाद, पायु,
उपस्थ। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण के अंश से
अलग-अलग मानी गई है। अर्थात् रजोगुणप्रधान आकाश नामक अपञ्चीकृत
सूक्ष्मभूत से वाक् (वाणी) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुण प्रधान 'वायु'
नामक सूक्ष्मभूत से पाणि (हाथ) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुणप्रधान
'अग्नि' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पाद अर्थात् पैर नामक कर्मेन्द्रिय
की, इसीप्रकार रजोगुणप्रधान 'जल' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पायु
अर्थात् गुदा नामक कर्मेन्द्रिय की तथा रजोगुणप्रधान पृथिवी नामक
अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से 'उपस्थ' अर्थात् जननेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है।
रजोगुण के स्वभाव से चञ्चल एवं क्रियाशील होने के कारण सभी
कर्मेन्द्रियों में गति एवं क्रियाशीलता देखने को मिलती है। इसी अभिप्राय को
इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-