वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
शक्तिद्वय-निरूपण (आवरण व विक्षेप शक्ति)
शक्तिद्वय-निरूपण १७३
अवतरणिका-तुरीय अर्थात् शुद्धचैतन्य की विशेषताओं का कथन करने
के पश्चात् ग्रन्थकार अज्ञान की आवरण एवं विक्षेप नामक दो शक्तियों का
सोदाहरण उल्लेख करते हैं-
अस्याज्ञानस्यावरणविक्षेपनामकमस्ति शक्तिद्वयम्। आवरण
शक्तिस्तावदल्पोऽपि मेघोऽनेकयोजनायतमादित्यमण्डलमवलोकयितृनयन-
पथपिधायकतया यथाच्छादयतीव तथाज्ञानं परिच्छिन्नमप्यात्मानम-
परिच्छिन्नमसंसारिणमवलोकयितृबुद्धिपिधायकतयाच्छादयतीव तादृशं
सामर्थ्यम्। तदुक्तम्-
“घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः।
तथा बद्धवद्भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा” इति॥
पदच्छेद- अज्ञानस्य आवरण-विक्षेपनामकम् अस्ति शक्तिद्वयम्।
आवरणशक्तिः तावत् अल्पः अपि मेघः अनेकयोजन-आयतम्
आदित्यमण्डलम्-अवलोकयितृ-नयनपथ-पिधायकतया यथा आच्छादयति इव,
तथा अज्ञानम् परिच्छिन्नाम् अपि आत्मानम् अपरिच्छिन्नम् असंसारिणम्
अवलोकयितृ-बुद्धिपिधायकतया आच्छादयति इव, तादृशम् सामर्थ्यम्। तद्
उक्तम्-
अन्वय-यथा घनच्छन्नदृष्टिः अतिमूढः (जनः) घनच्छन्नम् अर्कम्
निष्प्रभम् च मन्यते, तथा मूढदृष्टेः यः (आत्मा) बद्धवत् भाति,
नित्योपलब्धिस्वरूपः सः आत्मा अहम् (इति कथ्यते)
अनुवाद-आवरण और विक्षेप नामक अज्ञान की दो शक्तियाँ हैं।
जिसप्रकार छोटा सा बादल का टुकड़ा भी दर्शन के दृष्टिपथ को ढककर
अनेक योजन तक फैले हुए सूर्यमण्डल को आच्छादित-सा कर देता है,
उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी असीम और असांसारिक आत्मा को देखने
वाले की बुद्धि को आच्छादित करके मानो ढक देता है। (यह) आवरण
शक्ति तो उसप्रकार की सामर्थ्य से युक्त है। इसलिए कहा गया है-
“जिसप्रकार मेघ से आच्छन्न दृष्टिवाला अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति, बादल से
ढके हुए सूर्य को प्रकाशरहित मानता है। उसीप्रकार मूढ़ सामान्यदृष्टि वालों
को जो आत्मा (जन्म मरणादि बन्धनों से) बँधा हुआ-सा प्रतीत होता है,
ऐसा नित्य एवं ज्ञानस्वरूप वह आत्मा अहम् (इसप्रकार कहा गया) है।
१७४ वेदान्तसार
'चन्द्रिका'- जिस अज्ञान के स्वरूप एवं समष्टिव्यष्टिविषयक दो भेदों
का अभी तक उल्लेख किया गया है। उसकी आवरण एवं विक्षेप नामक
दो शक्तियाँ होती हैं। इसमें आवरणशक्ति द्रष्टा की दृष्टि के आगे एक
आवरण डाल देती है। इससे देखने वाला सामने स्थित वस्तु के स्वरूप को
नहीं देख पाता है। इसे अत्यन्त सुन्दर उदाहरण द्वारा समझाते हैं-
जैसे-आकाश में बादल का एक छोटा-सा टुकड़ा अनेक योजन विस्तार
वाले सूर्य के सामने आकर उसे आच्छादित कर लेता है। जिसे देखकर
सामान्यतया व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि बादल ने सूर्य को ढक
लिया है, जबकि वास्तव में यह पूर्णतया असम्भव है, क्योंकि करोड़ों योजन
विस्तार वाला सूर्य किसी भी स्थिति में बादल द्वारा आच्छादित नहीं किया
जा सकता है।
ठीक उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी अपनी आवरण नामक शक्तिविशेष
द्वारा जिसकी कोई सीमा नहीं है अर्थात् निस्सीम, जिसका कभी जन्म नहीं
होता अर्थात् अजन्मा, सांसारिक समस्तवस्तुओं से भिन्न आत्मा को आवृत
सा कर लेता है। इसकारण सामान्य बुद्धिवाला व्यक्ति आत्मा को देख नहीं
पाता है।
वास्तव में आत्मा नित्योपलब्धि स्वरूप वाला, सच्चिदानन्द है, देश, काल
आदि की सीमाओं से परे है। अतः किसी भी वस्तु द्वारा उसे ढकना पूर्णरूप
से असम्भव है। इसके अतिरिक्त उसे कभी भी संसार का कोई बन्धन
बांधने में समर्थ नहीं है, किन्तु अज्ञानी व्यक्ति उसे बंधा हुआ सा मानता है।
वस्तुतः आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढकने में अज्ञान की आवरण
शक्ति ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। अपने कथन की पुष्टि में
ग्रन्थकार 'घनच्छन्नदृष्टि' इत्यादि कारिका को उद्धृत करते हैं। इस कारिका
का भी यही अभिप्राय है जो उक्त गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है-
जिसप्रकार किसी छोटे से बादल के टुकड़े से आच्छन्नदृष्टि वाला
मूर्खबुद्धि व्यक्ति यह समझता है कि बादल ने सूर्य को ढक लिया इस
कारण सूर्य प्रकाशरहित हो गया। इसलिए सर्वत्र अंधकार का साम्राज्य हो
गया। ठीक उसीप्रकार मूढ़बुद्धि अज्ञानीजन नित्य, सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा
को जन्म-मरण आदि अनेक बन्धनों में आबद्ध मान लेते हैं। जबकि
वास्तविकता यह है कि यह आत्मा नित्य, शुद्धबुद्ध एवं प्रकाशक है। इसकी
कोई सीमा नहीं है। यह स्थान एवं समय की सीमाओं से परे है। इसे दैनिक
व्यवहार में लोग 'अहम्' इस शब्द द्वारा प्रयोग करते हैं।
शक्तिद्वय-निरूपण १७५
विशेष-(1) अज्ञान की दो शक्तियों का उल्लेख किया गया- आवरण
एवं विक्षेप।
(2) प्रस्तुत गद्यखण्ड में केवल 'आवरण' शक्ति को उदाहरण देकर
समझाया गया है।
(3) यहाँ प्रदत्त उदाहरण अत्यन्त सटीक है। मेघखण्ड अज्ञान का प्रतीक
है तथा तेजस्वी सूर्य तेजोरूपं आत्मा को संकेतित करता है।
(4) प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रयुक्त 'इव' आभासरूप अर्थ की अभिव्यक्ति
के लिए प्रयुक्त हुआ है। अभिप्राय यह है कि सूर्य वस्तुतः ढकता नहीं है,
अपितु ढका हुआ सा प्रतीत होता है। वैसा ही आत्मा के विषय में भी
मानना चाहिए।
(5) हस्तामलक नामक ग्रन्थ में आई हुई प्रस्तुत कारिका में प्रयुक्त
'बद्धवत् भाति' पद भी इसी अभिप्राय को अभिव्यक्त करता है, क्योंकि
वेदान्त की दृष्टि में आत्मा का बन्धन अथवा मोक्ष सम्भव नहीं है। यह तो
केवल आभासमात्र है, रस्सी में सर्प के समान अथवा सीप में चांदी के
समान।
(6) अज्ञान की आवरणशक्ति को समझाने के लिए मेघखण्ड एवं सूर्य
का प्रस्तुत उदाहरण सम्पूर्ण दार्शनिकजगत् में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ है।
(7) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-
चित्र-३६
अज्ञान/माया की शक्ति द्वय
आवरण (आच्छादन) विक्षेप (उद्भावन)
(सत्य को आवृत करना) (सत् में असत् की उद्भावना)
↓ ↓
(आत्मतत्त्व/ब्रह्म को आवृत करना) यथा
↓ ↓
(रज्जु में सर्पप्रतीति)
(मेघखण्ड द्वारा सूर्य को ── उदाहरण
ढकने के समान (सीप में चाँदी का आभास)
(रज्जु एवं सीप के एतद्विषयक चित्र-३७ (ब्रह्म में सम्पूर्ण नाम रूपात्मक
ज्ञान को आच्छादित करना जगत् की प्रतीति
सूर्य ← मेघखण्ड द्रष्टा ──रस्सी (सर्पोऽयम्)
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अवतरणिका-इसी प्रसङ्ग को आगे स्पष्ट करते हुए विक्षेप शक्ति के
कार्य को प्रदर्शित करते हैं-
अनयैवावरणशक्त्यावच्छिन्नस्यात्मनः कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःख-
मोहात्मकतुच्छसंसारभावनापि सम्भाव्यते यथा स्वाज्ञानेनावृतायां रज्ज्वां
सर्पत्वसम्भावना। विक्षेपशक्तिस्तु यथा रज्जुज्ञानं स्वावृतरज्जौ स्वशक्त्या
सर्पादिकमुद्भावयत्येवमज्ञानमपि स्वावृतात्मनि विक्षेपशक्त्याकाशादि-
प्रपञ्चमुद्भावयति तादृशं सामर्थ्यम्। तदुक्तम्-
"विक्षेपशक्तिर्लिङ्गादि ब्रह्माण्डान्तं जगत्सृजेद्” त्ति॥१०॥
पदच्छेद- अनया एव आवरणशक्त्या अवच्छिन्नस्य आत्मनः कर्तृत्व
भोक्तृत्व सुख-दुःख-मोहात्मक-तुच्छसंसारभावना अपि सम्भाव्यते, यथा-स्व
अज्ञानेन आवृतायाम् रज्ज्वाम् सर्पत्व सम्भावना।
विक्षेपशक्तिः तु यथा रज्जु-अज्ञानम् स्व-आवृतारज्जौ स्वशक्त्या
सर्पादिकम् उद्भावयति। एवम् अज्ञानम् अपि स्व-आवृत-आत्मनि-विक्षेप
शक्त्या आकाशादि-प्रपञ्चम् उद्भावयति, तादृशम् सामर्थ्यम्। तद् उक्तम्-
"विक्षेपशक्तिः लिङ्गादि ब्रह्माण्ड-अन्तम् जगत् सृजेद् इति ।।10।।
अनुवाद-इसी आवरणशक्ति द्वारा आच्छादित आत्मा की कर्तृत्व,
भोक्तृत्व, सांसारिक सुख-दुःख-मोहात्मकता-विषयक तुच्छभावना भी अपने
अज्ञान से आच्छादित रस्सी में सर्पत्व की सम्भावना के समान आरोपित
होती है।
विक्षेपशक्ति तो वैसी ही सामर्थ्यसम्पन्न है, जिसप्रकार रस्सी विषयक
अज्ञान अपनी शक्ति द्वारा आवृत रस्सी में सर्प आदि की उद्भावना करता
है। उसीप्रकार (आत्मविषयक) अज्ञान भी अपनी विक्षेपशक्ति द्वारा आवृत
आत्मा में (सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त) आकाश आदि प्रपञ्च को
उद्भावित कर देता है। इसीलिए कहा गया है-"विक्षेपशक्ति ही सूक्ष्मशरीर
आदि सृष्टि से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त संसार का सृजन करती है।"
'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् अज्ञान की प्रथम 'आवरण' नामक शक्ति के
अन्य कार्य को कहते हैं-अज्ञान की इसी आवरणशक्ति से युक्त शुद्ध
चैतन्यरूप आत्मा अपने आपको नामरूपात्मक संसार के भोगादिविषयों का
कर्ता, भोक्ता तथा उनसे प्राप्त होने वाले सुख एवं दुःख आदि को अनुभव
करके स्वयं को भी सुखी दुःखी आदि मानने लगता है। जबकि वास्तविक-
शक्तिद्वय-निरूपण १७७
रूप में ये सुख-दुःख आदि आत्मा के धर्म होते ही नहीं हैं। ये तो वस्तुतः
शरीर के धर्म हैं। आत्मा इनसे लिप्त नहीं होता है। अज्ञान की आवरणशक्ति
आत्मा से इसी वस्तुस्थिति को छिपा लेती है।
वेदान्त की दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म अथवा आत्मसत्त्व ही सत् है, सम्पूर्ण
नामरूपात्मक जगत् मिथ्या है, फिर भी वास्तविकता का ज्ञान न होने से
अज्ञानी लोगों की सांसारिकबुद्धि बनी रहती है। इस बुद्धि का एकमात्र
कारण यहाँ अज्ञान को बताया गया है, क्योंकि इसकी 'आवरण' नामक
शक्ति वस्तुतः वस्तुस्थिति को आच्छादित कर लेती है। तत्पश्चात् अज्ञान की
दूसरी शक्ति 'विक्षेप' के विषय में कहते हैं।
जब हम अपने सामने पड़ी हुई रस्सी को अन्धकार आदि के कारण सर्प
समझ बैठते हैं, तब रस्सीविषयक अज्ञान पहले अपनी 'आवरण' नामक
शक्ति से रस्सी के रस्सी होना रूप ज्ञान को आवृत करता है। तत्पश्चात्
वही अज्ञान 'विक्षेप' नामक अपनी दूसरी शक्ति से उसी रस्सी में सर्पत्व
की उद्भावना कर देता है और वही रस्सी हमें रस्सी होते हुए भी सर्प
प्रतीत होने लगती है। यही अज्ञान की विक्षेपशक्ति का विक्षेपत्व है।
ठीक उसीप्रकार आत्मविषयक अज्ञान पहले अपनी आवरण नामक शक्ति
के सामर्थ्य से नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा के
वास्तविकस्वरूप को ढक देता है। पुनः वही अज्ञान अपनी दूसरी शक्ति
'विक्षेप' का प्रयोग करके सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त आकाश आदि
सम्पूर्णप्रपञ्चरूप तुच्छ स्थूलसृष्टि की उद्भावना कर देता है। इसप्रकार
उद्भावित यह स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण नामरूपात्मकसंसार वस्तुतः अज्ञान की
विक्षेपशक्ति का ही प्रभाव है, जो वस्तुतः विनाशशील है। सीप में चांदी की
प्रतीति तथा रज्जु में सर्प की भ्रान्ति के समान जो वस्तुतः मिथ्या है।
अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन उद्धृत करते हुए कहते हैं
कि प्राचीन शास्त्रों में भी आत्मज्ञानी आचार्यों ने कहा है-कि अज्ञान की
द्वितीय विक्षेपशक्ति ही लिङ्गशरीर (जिसे वेदान्त सूक्ष्मशरीर भी कहता है)
सहित सम्पूर्णसृष्टि से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त स्थूलसृष्टिरूप दृश्यमान सम्पूर्ण
संसार की संरचना करती है।
विशेष-(1) ग्रन्थकार की शैली की विशेषता है कि वह अपने कथन
की पुष्टि में श्रुति, स्मृति अथवा प्राचीन आचार्य आदि द्वारा कहे गये वचनों