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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

१२२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२८९-भ्रान्तं तत्॥ ५ ॥
(तत्) वह (भ्रान्तम्) भ्रान्तियुक्त है ॥
कर्म और गुण में रहने वाली संख्या को कर्मरूप वा गुणरूप समझना
भ्रान्ति है किन्तु वास्तव में जैसे द्रव्यों में रहने पर भी गुण स्वयं द्रव्यरूप
नहीं किन्तु भिन्न पदार्थ हैं, ऐसे ही संख्या को भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥
२९०-एकत्वाभावाद्भक्तिस्तु न विद्यते ॥ ६ ॥
(एकत्वाभावात्) एकत्व न होने से (तु) तो (भक्तिः) समान धर्म
(न) नहीं हो सकता ॥
अर्थात् यदि संख्या को सर्वत्र भ्रान्त मानकर केवल भाक्त जानें तो भी
ठीक नहीं क्योंकि यदि संख्या कोई मुख्य पदार्थ न हो तो उस का भाक्त=
गौण प्रयोग भी न होसके परन्तु होता है, इस लिये संख्या रूपादि से भिन्न
एक गुण है ॥ ६ ॥
२९१-कार्यकारणयोरेकत्वैकपृथक्त्वाभावा-
देकत्वैकपृथक्त्वं न विद्यते ॥ ७ ॥
(कार्यकारणयोः) कार्य और कारण में (एकत्वैकपृथक्त्वाभावात्)
एकत्व और एकपृथक्त्व न होने से (एकत्वैकपृथक्त्वम्) एकत्व और एकपृथक्त्व
(न) नहीं (विद्यते) है ॥
अर्थात् यह आवश्यक नहीं कि कार्य में एकत्व संख्या हो तो कारण
में भी एकत्व हो तथा यह भी आवश्यक नहीं कि कार्य में एकपृथक्त्व हो
तो कारण में भी एकपृथक्त्व ही हो क्योंकि कार्य और कारण में एकत्व और
एकपृथक्त्व नियत नहीं ॥
हो सकता है कि कारणों में बहुत्व हो और कार्य में एकत्व हो तथा
यह भी हो सकता है कि कारण में एकत्व हो और कार्यों में बहुत्व हो।
जैसे एक मृत्तिकारूप कारण से अनेक घटरूप कार्य होते हैं तथा अनेक धागे
रूप कारणों से एक वस्त्ररूप कार्य भी होता है। इसी प्रकार एकपृथक्त्व भी
समझो ॥ ७ ॥ तथा-
२९२-एतदनित्ययोर्व्याख्यातम् ॥ ८ ॥

सप्तमाध्याय. २ आन्हिक १२५
( एतद् ) यही नियम ( अनित्ययोः) अनित्य एकत्व और एकपृथक्त्व
में ( व्याख्यातम् ) व्याख्यात समझो ॥
नित्य द्रव्य में एकत्व और एकपृथक्त्व भी नित्य होते हैं और अनित्य
द्रव्य में अनित्य होते हैं ॥ ८ ॥
२६३-अन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजश्च संयोगः ॥ ९ ॥
अब संयोग की परीक्षा करते हैं जो क्रमप्राप्त है-( अन्यतरकर्मजः )
दो में से किसी एक के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( उभयकर्मजः ) दोनों
के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( च ) और ( संयोगजः) संयोग से उत्पन्न होने
वाला ( संयोगः ) संयोग होता है ॥
भिन्न २ दो पदार्थोंका परस्पर मिलजाना=संयोग कहाता है। वह संयोग
तीन प्रकार का होता है। जैसे:-
१-दो पदार्थों में से एक में क्रिया होने तो एक की क्रिया से दूसरे के
साथ संयोग हो जायगा ॥
२-दोनों पदार्थों में क्रिया होने से दोनों का आपस में संयोग हो जायगा॥
३-संयोग से भी संयोग उत्पन्न होता है। जैसे वृक्ष और अङ्गुली के
संयोग में अङ्गुली की क्रिया कारण है, परन्तु साथ ही अङ्गुली और हाथ का
संयोग भी वृक्ष और हाथ के संयोग का कारण है ॥ ९ ॥
२६४-एतेन विभागोव्याख्यातः ॥ १० ॥
( एतेन ) इस संयोग के व्याख्यान से ( विभागः ) विभाग का भी
( व्याख्यातः ) व्याख्यान होगया ॥
अर्थात् जैसे संयोग तीन प्रकार का है, ऐसे ही विभाग भी तीन प्रकार
का समझो ॥
१-संयुक्त दो पदार्थों में से किसी एक की क्रिया से विभाग हो जाता है॥
२-कभी दोनों की क्रिया से विभाग हो जाता है ॥
३-और कभी विभाग से भी विभाग हो जाता है ॥ १० ॥
२६५-संयोगविभागयोः संयोगविभागाभावो
ऽणुत्व महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ११ ॥

१२४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(संयोगविभागयोः) संयोग और विभाग के (संयोगविभागाभावः)
संयोग और विभाग का अभाव (अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्) अणुत्व और महत्त्व
के साथ (व्याख्यातः) व्याख्यात होचुका ॥
अर्थात् जैसे अणुत्व में अणुत्व और महत्त्व में महत्त्व न होना कहागया
था, ऐसे ही संयोग में संयोग और विभाग में विभाग नहीं होता समझो ॥११॥
१८६-कर्मभिः कर्माणि गुणैश्च गुणा
अणुत्वमहत्त्वाभ्यामिति ॥ १२ ॥
(इति) ऐसा पूर्व कहा गया है कि (कर्मभिः कर्माणि) कर्मों के साथ
कर्म (च) और (गुणैःगुणाः) गुणों के साथ गुण (अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्)
अणुत्व और महत्त्व से व्याख्यात समझो ॥
अध्याय ७ आन्हिक १ सूत्र १४ से १६ तक तीन सूत्रों में जिन का विस्तार से
व्याख्यान करचुके हैं, उस बात को सूत्रकार इस सूत्र में स्मरण कराते हैं ॥१२॥
२८७-युतसिद्धयभावात्कार्यकारणयोः
संयोगविभागौ न विद्येते ॥ १३ ॥
(युतसिद्धयभावात्) जुड़ा हुआ होना सिद्ध न होने से (कार्यकारणयोः)
कार्य और कारण में (संयोगविभागौ) संयोग और विभाग (न) नहीं
(विद्येते) होते ॥
कारण मृत्तिका में कार्य घट जुड़ा हुआ सिद्ध नहीं होसकता । इस
लिये घट और मृत्तिका में जो कि कार्य और कारण हैं, संयोग और विभाग
नहीं मान सकते ॥ १३ ॥
२८८-गुणत्वात् ॥ १४ ॥
(गुणत्वात्) गुण होने से [द्रव्य और गुण में संयोग और विभाग नहीं
मान सकते] ॥ १४ ॥
२८६-गुणोऽपि विभाव्यते ॥ १५ ॥
(गुणः) गुण (अपि) भी (विभाव्यते) [शब्द से] प्रतिपादन किया
जाता है ॥
जिस प्रकार घट पट आदि शब्दों से उन के अर्थों का ग्रहण होता है,
जो द्रव्य हैं, इसी प्रकार गुणवाचक शब्दों से गुणों का भी ग्रहण होता है।

जैसे रूप, रस, गन्ध आदि शब्दों से रूप रस आदि गुणों का ग्रहण किया जाता
है। इस कारण शब्द और अर्थ में भी संयोग सम्बन्ध नहीं है ॥१५॥ क्योंकि-
३००-निष्क्रियत्वात् ॥ १६ ॥
(निष्क्रियत्वात्) क्रियारहित होने से [शब्द का अर्थ के साथ संयोग
संबन्ध नहीं है, क्योंकि संयोग तो क्रिया से उत्पन्न होता है] ॥ १६ ॥ और-
३०१-असति नास्तीति च प्रयोगात् ॥ १७ ॥
(असति) असत् पदार्थ में (च) भी (न अस्ति) "नहीं है" (इति)
ऐसा (प्रयोगात्) प्रयोग होने से ॥
जो पदार्थ अब नहीं है परन्तु आगे होगा, उस वर्त्तमान में असत् और
भविष्यत् में होने वाले पदार्थ का बोध भी शब्द से किया जाता है। यदि शब्द
का अर्थ के साथ संयोग सम्बन्ध होता तो भविष्यत् में होने वाले पदार्थ का
वर्त्तमान शब्द से बोध न होता क्योंकि दोनों भिन्नकालीन हैं। जैसे जो
घड़ा कल बनाया जायगा और आज वह घड़ा नहीं है तो भी कल को बनने
वाले घड़े का बोध आज के उच्चारण किये हुए घट शब्द से होता है। कल
को होने वाले घट द्रव्य का बोध न होता, यदि शब्द और अर्थ में संयोग
सम्बन्ध होता ॥ १७ ॥ इस से सिद्ध हुवा कि-
३०२-शब्दार्थावसम्बन्धौ ॥ १८ ॥
(शब्दार्थौ) शब्द और अर्थ (असम्बन्धौ) परस्पर संयोग सम्बन्ध-
रहित हैं ॥ १८ ॥
यदि कहो कि शब्द और अर्थ में संयोग सम्बन्ध न सही किन्तु समवाय
सम्बन्ध तो मान सकते हैं ? तो उत्तर-
३०३-संयोगिनोदण्डात्, समवायिनोविशेषाच्च ॥ १९ ॥
(संयोगिनः) संयोगी पुरुष का (दण्डात्) दण्ड से (च) और (सम-
वायिनः) समवाय सम्बन्ध वाले का (विशेषात्) विशेष अवयव से [जैसे
ग्रहण होता है वैसे अर्थ का ग्रहण शब्द से नहीं होता] ॥
यदि अर्थ के साथ शब्द का संयोगसम्बन्ध अथवा समवायसम्बन्ध होता
तो अर्थ के साथ शब्द भी प्रतीत हुवा करता। परन्तु ऐसा नहीं होता। इस
से जाना जाता है कि शब्द का अर्थ के साथ सम्बन्ध नहीं है। जैसे हाथी

३२६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
का सूंड़ के साथ अवयव विशेष से सम्बन्ध है और दण्डी पुरुष का दण्ड को
साथ संयोग सम्बन्ध है, तब दण्डी पुरुष के साथ २ दण्ड का और हाथी के
साथ २ उस की सूंड़ का ग्रहण होता है, परन्तु घटदर्शन के साथ २ घट
शब्द का दर्शन नहीं होता। इस लिये शब्द और अर्थ में न तो संयोग सम्बन्ध
है, न समवाय सम्बन्ध है ॥ १९ ॥
प्रश्न-यदि शब्द और अर्थ में दोनों प्रकार का सम्बन्ध नहीं तो शब्द
से अर्थ का बोध क्यों होता है ? उत्तर-
३०४-सामयिकः शब्दार्थप्रत्ययः ॥ २० ॥
( शब्दात् ) शब्द से ( अर्थप्रत्ययः ) अर्थ की प्रतीति ( सामयिकः )
सांकेतिक है ॥
अर्थात् आप्त पुरुषों ने जिस शब्द से जिस अर्थ का ग्रहण करना नियत
कर दिया, उसी शब्द से उस अर्थ का ग्रहण होने लगा है। जैसे फ़ारस देश
के लोग माहताब शब्द से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं और अङ्गरेज़ लोग मून
शब्द से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं और आर्य लोग शशी, चन्द्र, कला-
निधि, मृगाङ्क, चन्द्रमा इत्यादि शब्दों से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं।
अतः जब एक भाषा बोलने वाले अथवा अनेक भाषा बोलने वाले एक शब्द
से अनेक अर्थों का और अनेक शब्दों से एक अर्थ का ग्रहण कर लेते हैं तब
किसी शब्द का किसी अर्थ के साथ संयोग वा समवाय सम्बन्ध तो नहीं
रहा किन्तु केवल सांकेतिक सम्बन्ध है ॥ २० ॥
३०५-एकदिक्काभ्यामेककालाभ्यां सन्निकृष्ट
विप्रकृष्टाभ्यां परमपरञ्च ॥ २१ ॥
( एकदिक्काभ्याम् ) एक ही दिशा में रहने वाले ( एककालाभ्याम् )
एक ही काल में रहने वाले ( सन्निकृष्टविप्रकृष्टाभ्याम् ) समीप और दूर से
( परम् ) परत्व ( च ) और ( अपरत्वम् ) अपरत्व होता है ॥
यहां से क्रमागत परत्व और अपरत्व की परीक्षा करते हैं-किसी एक
दिशा में समीप पदार्थ को पर कहते हैं और उस की अपेक्षा उसी दिशा में
दूरस्थ पदार्थ को अपर कहते हैं। यह देशकृत परत्वापरत्व हुआ। दूसरा
कालकृत परत्वापरत्व वह है, जो समयके समीप और दूर होने से होता है॥२१॥

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सप्तमाध्याय २ आह्विक १२१
३०६-कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच्च ॥ २२ ॥
( कारणपरत्वात् ) कारण के समीप होने से परत्व (च) और (कारण-
ऽपरत्वात्) कारण के दूर होने से अपरत्व होता है ॥
अर्थात् देश और काल की समीपता परत्व का कारण है तथा उन की
दूरी दूरस्थता अपरत्व का कारण है ॥ २२ ॥
३०७-परत्वापरत्वयोः परत्वापरत्वाभावोऽणुत्व
महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ २३ ॥
( परत्वापरत्वयोः ) परत्व और अपरत्व का ( परत्वापरत्वाभावः )
दूसरा परत्व और अपरत्व न होना ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् ) अणुत्व और
महत्त्व के साथ ( व्याख्यातः ) व्याख्यात किया गया समझना चाहिये ॥
२१३ वें सूत्र में कह चुके हैं कि अणुत्व का अणुत्व और महत्त्व का
महत्त्व नहीं होता। इसी प्रकार समझना चाहिये कि परत्व का परत्व और
अपरत्व का अपरत्व भी नहीं होता ॥ २३ ॥
३०८-कर्मभिः कर्माणि गुणैर्गुणाः ॥ २४ ॥
( कर्मभिः ) कर्मों से ( कर्माणि ) कर्म, ( गुणैः ) गुणों से ( गुणाः ) गुण
[कहे जा चुके हैं] ॥
अर्थात् २१४ और २१५ वें सूत्रों के अनुसार कर्मों से कर्म और गुणों से
गुण की व्याख्या हो चुकी है ॥ २४ ॥
प्रश्न-समवाय क्या पदार्थ है ? उत्तर-
३०९-इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः स समवायः ॥ २५ ॥
( यतः ) जिस से ( कार्यकारणयोः ) कार्य और कारण में ( इति ) यह
व्यवहार होता है कि ( इह-इदम् ) इस में यह है ( सः ) वह ( समवायः )
समवाय कहाता है ॥
जैसे मृत्तिकारूप कारण में घटरूप कार्य अथवा घटरूप कार्य में मृत्तिका
रूप कारण जिस सम्बन्ध से वर्त्तमान हैं, उस सम्बन्ध को समवाय कहते हैं ॥२५॥
प्रश्न-तो समवाय को भिन्न पदार्थ क्यों माना जावे ? द्रव्य और गुण में
ही किसी एक को समवाय क्यों न समझ लें ? उत्तर-
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

१९८ | वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

३१०-द्रव्यत्वगुणत्वप्रतिषेधोभावेन व्याख्यातः ॥ २६ ॥
(द्रव्यत्वगुणत्वप्रतिषेधः) द्रव्यत्व और गुणत्व का प्रतिषेध (भावेन)
भाव के साथ (व्याख्यातः) व्याख्यात हो चुका ॥
अर्थात् ३९ और ४० वें सूत्रों में जिस प्रकार सत्ता को गुण और कर्म से
भिन्न सिद्ध कर आये हैं, इसी प्रकार यहां भी समवाय को द्रव्य और गुण से
भिन्न समझना चाहिये ॥ २६ ॥
प्रश्न-तो क्या समवाय में केवल द्रव्यत्व और गुणत्व का निषेध ही सत्ता
के साथ कहा गया ? अन्य कुछ नहीं ? उत्तर-
३११-तत्त्वञ्च ॥ २७ ॥
(तत्त्वम्) एकत्व और नित्यत्व (च) भी [कहा गया है] ॥
अर्थात् जिस प्रकार सत्ता एक और नित्य है, इसी प्रकार समवाय भी एक
और नित्य है ॥ २७ ॥
इस आह्निक में संख्यादि ५ गुणों और समवाय सम्बन्ध की तथा शब्द
और अर्थ में क्या सम्बन्ध है, इस की परीक्षा की गयी ॥
इति सप्तमाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम्
॥ २ ॥
इति श्री तुलसीरामस्वामिकृते वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे
गुणसमवायाध्यायः सप्तमः ॥ ७ ॥

ओ३म्
अथाष्टमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
परत्व और अपरत्व की परीक्षा हो चुकी, आगे क्रमानुसार बुद्धि की
परीक्षा करनी है। प्रत्यक्षादि भेद से बुद्धियें बहुत हैं, ज्ञान भी बुद्धि ही का
नाम है, इस लिये प्रथम प्रत्यक्ष ज्ञान की परीक्षा का उपक्रम करते हैं—
३१२-द्रव्येषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १ ॥
(द्रव्येषु) पृथिव्यादि द्रव्यों के विषय में (ज्ञानम्) ज्ञान की (व्याख्यातम्)
व्याख्या होचुकी ॥
अध्याय ४ आह्निक १ सूत्र ६ में कहचुके हैं कि “महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्
रूपाच्चोपलब्धिः” इस सूत्र में द्रव्यविषयक प्रत्यक्ष ज्ञान की व्याख्या की गई
थी, जिस को वहीं १६३ में देख लीजिये ॥ १ ॥ परन्तु-
३१३-तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षे ॥ २ ॥
(तत्र) उन पृथिव्यादि द्रव्यों में (आत्मा) जीवात्मा और परमात्मा
(च) और (मनः) मन (अप्रत्यक्षे) प्रत्यक्ष नहीं हैं ॥
प्रायः सभी टीकाकार इस सूत्र के (च) शब्द से वायु, आकाश, काल,
दिशा और परमाणुओं का ग्रहण करते हैं। तब इस सूत्र का यह अर्थ होता
है कि “उन में से आत्मा, मन, वायु, आकाश, काल, दिशा और परमाणु
प्रत्यक्ष नहीं हैं”, शेष पृथिवी जल अग्नि प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥
प्रश्न-प्रत्यक्ष ज्ञान की विधि बतलाओ ? उत्तर-
३१४-ज्ञाननिर्देशे ज्ञाननिष्पत्तिविधिरुक्तः ॥ ३ ॥
(ज्ञाननिर्देशे) जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां (ज्ञाननिष्पत्तिविधिः)
ज्ञान प्राप्त होने की रीति (उक्तः) बतलाई जा चुकी है ॥
१३५ में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से प्रत्यक्ष ज्ञान की उत्पत्ति कह चुके हैं, वहीं
देख लीजिये ॥ ३ ॥
१७

१३० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
प्रश्न-जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां सामान्य से ज्ञानप्राप्ति की
रीति कही गई थी, कृपा करके सविशेष वर्णन कीजिये ? उत्तर-
३१५-गुणकर्मसु सन्निकृष्टेषु ज्ञाननिष्पत्तेर्द्रव्यं कारणम् ॥४॥
( सन्निकृष्टेषु ) इन्द्रियों के समीप आये हुये ( गुणकर्मसु ) गुणों और
कर्मों में ( ज्ञाननिष्पत्तेः ) ज्ञान सिद्ध होने से ( द्रव्यम् ) द्रव्य ( कारणम् )
ज्ञान का कारण है ॥
यह रूप है, इत्यादि गुणों के प्रत्यक्ष में और यह उछलना है, इत्यादि
कर्मों के प्रत्यक्ष में द्रव्य ही कारण है, क्योंकि द्रव्यों के आश्रय में ही रूपादि
गुण और उछलना आदि कर्म प्रत्यक्ष होते हैं ॥ ४ ॥ और-
३१६-सामान्यविशेषेषु सामान्यविशेषा-
ऽभावात्ततएव ज्ञानम् ॥ ५ ॥
( सामान्यविशेषेषु ) सामान्य और विशेषों में ( सामान्यविशेषाभावात् )
दूसरा सामान्य और दूसरा विशेष न होने से ( ततः ) उन से ( एव ) ही
( ज्ञानम् ) ज्ञान होता है ॥
सामान्य सत्ता (होना) और उन के विशेष-द्रव्य होना, गुण होना, कर्म
होना, पृथिवी होना, रूप होना, उछाल होना; इत्यादिकों में उन के प्रत्यक्ष
का कारण वे स्वयंम् ही हैं अर्थात् उन की सत्ता का ज्ञान साक्षात् उन्हीं से
होता है ॥ ५ ॥
प्रश्न-किस की अपेक्षा से द्रव्यगुणकर्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है ? उत्तर-
३१७-सामान्यविशेषापेक्षं द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ६ ॥
(द्रव्यगुणकर्मसु द्रव्यों, गुणों और कर्मों के विषय में ( सामान्यविशेषापेक्षम् )
सामान्य विशेष की अपेक्षा से [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥
अर्थात् यह अमुक द्रव्य है, यह अमुक गुण है और यह अमुक कर्म है,
ऐसा विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥ उस में भी-
३१८-द्रव्ये द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ॥ ७ ॥
( द्रव्ये ) द्रव्य विषय में ( द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ) द्रव्य गुण और कर्म की
अपेक्षा वाला [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥ ७ ॥ परन्तु-

षष्ठसाऽध्याय १ आन्हिक १२१
३१९-गुणकर्मसु गुणकर्माभावाद्गुणकर्मापेक्षं न विद्यते ॥८॥
( गुणकर्मसु ) गुणों और कर्मों में ( गुणकर्माभावात् ) दूसरे गुण कर्म
न होने से ( गुणकर्मापेक्षम् ) गुणों और कर्मों की अपेक्षा वाला [ ज्ञान ]
( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥ ८ ॥ उदाहरण—
३२०-समवायिनः श्वैत्याच्छ्रैत्यबुद्धेश्च श्वेते
बुद्धिः, ते एते कार्यकारणभूते ॥ ९ ॥
( समवायिनः ) समवायी द्रव्य के ( श्वैत्यात् ) श्वेत होने से ( च ) और
( श्वैत्यबुद्धेः ) श्वेतत्व के ज्ञान से ( श्वेते ) श्वेत द्रव्य में ( बुद्धिः ) ज्ञान
उत्पन्न होता है, ( ते ) वे दोनों ( एते ) ये ( कार्यकारणभूते ) कार्यरूप और
कारणरूप ज्ञान हैं ॥
अर्थात् चांदी वा शङ्ख आदि द्रव्य जो श्वेतता गुण से समवाय संबन्ध
रखते हैं, द्रव्यों के श्वेत होने से और श्वेतता के ज्ञान से उन श्वेत द्रव्यों
में यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि, यह श्वेत चांदी है अथवा यह श्वेत शङ्ख
है। सो ये दोनों ज्ञान १-श्वेतता का ज्ञान और २-श्वेत चांदी आदि का
ज्ञान कार्यरूप और कारणरूप हैं अर्थात श्वेतता ( सफेदी ) कारणज्ञान है
और श्वेतशङ्खादि का ज्ञान कार्यज्ञान है ॥ ९ ॥ परन्तु—
३२१-द्रव्येष्वनितरेतरकारणाः ॥ १० ॥
( द्रव्येषु ) अनेक द्रव्यों में [ जो अनेक ज्ञान उत्पन्न होते हैं वे ]
( अनितरेतरकारणाः ) एक दूसरे के कारण नहीं होते ॥ १० ॥ क्योंकि—
३२२-कारणाऽयौगपद्यात्कारणक्रमाच्च
घटपटादिबुद्धीनां क्रमो, न हेतुफलभावात् ॥११॥
( कारणाऽयौगपद्यात् ) ज्ञान के कारण एक साथ उत्पन्न न होने से ( च )
और ( कारणक्रमात् ) कारणों के क्रम से ( घटपटादिबुद्धीनाम् ) घट पट
आदि ज्ञानों में ( क्रमः ) आगापीछा है। ( न ) न कि ( हेतुफलभावात् )
कारण का फल होने से ॥
अर्थात् यदि हम को प्रथम घट का ज्ञान हो, पश्चात् पट का ज्ञान हो,
तो ये दोनों ज्ञान एक दूसरे के कार्यकारण नहीं हैं, किन्तु ज्ञान के कारण ही

१३२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
भिन्न २ एक दूसरे के पश्चात् होते हैं, इस लिये ज्ञान भी एक दूसरे के पश्चात्
होते हैं, न कि एक कारण और दूसरा उस का कार्य होने से ॥ १९ ॥
इस आह्निक में द्रव्य गुण कर्म और सामान्य में जो प्रत्यक्ष ज्ञान होता
है, वह परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया ॥
इत्यष्टमाध्यायस्य प्रथमाह्निकम्
॥ १ ॥
अथ द्वितीयाह्निकम्
अब ज्ञान के प्रकार का उदाहरण देते हैं-
३२३-अयमेश त्वया कृतं भोजयैनमिति बुद्ध्यपेक्षम् ॥ १ ॥
(अयम्) यह है, (एषः) वह है, (त्वया कृतम्) तूने कर्म किया,
(एनं भोजय) इन को भोजन कराओ (इति) इस प्रकार का ज्ञान (बुद्ध्यपेक्षम्)
भिन्न २ बुद्धियों से होता है ॥ १ ॥
प्रश्न-यह है, तूने कर्म किया, इस को भोजन कराओ, इत्यादि समक्ष-
वर्त्ती पदार्थों में तो प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है परन्तु "वह वहां है" इत्यादि
परोक्षवर्त्ती पदार्थों में प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे हो सकता है ? उत्तर-
३२४-दृष्टेषु भावाददृष्टेष्वभावात् ॥ २ ॥
(दृष्टेषु) जाने हुए विषयों में [भावात्) होने से (अदृष्टेषु) बिना
जाने विषयों में (अभावात्) न होने से ॥
अर्थात् हम जिन परोक्ष विषयों का निर्देश करते हैं कि वह वहां है,
इत्यादि । सो पहिले देखे, जाने, विषयों में निर्देश करते हैं, इस लिये परोक्ष
विषयों में भी "वह वहां है" इत्यादि निर्देश प्रत्यक्षज्ञानपूर्वक ही समझना
चाहिये, क्योंकि अदृष्ट अर्थात् जिन के साथ हमारी ज्ञानेन्द्रियों का सम्बन्ध
नहीं हुवा, उन को हम यह, वह, इत्यादि प्रकार से व्यवहार नहीं करते ॥ २ ॥
प्रश्न-तुम "अर्थ" शब्द से किस का ग्रहण करते हो ? उत्तर-
३२५-अर्थ इति द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ३ ॥
(द्रव्यगुणकर्मसु) द्रव्यों, गुणों और कर्मों में (अर्थः) "अर्थ" (इति)
ऐसा व्यवहार करते हैं ॥ ३ ॥
३२६-द्रव्येषु पञ्चात्मकत्वम् ॥ ४ ॥

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अष्टमाऽध्याय २ आन्हिक १३३
(द्रव्येषु) कार्य द्रव्यों में (पञ्चात्मकत्वम्) पञ्चात्त्वात्मक होना [कहा
गया है] ॥
यद्यपि १३२ और १३४ में पञ्चात्मक और द्व्यात्मक का निषेध कर चुके
हैं परन्तु १३५ में कह चुके हैं कि "अणुसंयोग का निषेध नहीं है" इस लिये
यहां पञ्चात्मकता कहना पूर्व्वापर विरुद्ध नहीं है ॥ ४ ॥ जैसे-
३२७-भूयस्त्वाद् गन्धवत्त्वाच्च पृथिवी गन्धज्ञाने प्रकृतिः ॥५॥
(भूयस्त्वात्) बहुत होने से (च) और (गन्धवत्त्वात्) गन्धवर्मी होने
से (पृथिवी) पृथिवीतत्त्व (गन्धज्ञाने) गन्ध के ज्ञान कराने वाले नासिका
इन्द्रिय में (प्रकृतिः) उपादान कारण है ॥ ५ ॥ तथा-
३२८-तथापस्तेजोवायुश्च रसरूपस्पर्शज्ञानेऽविशेषात् ॥६॥
(तथा) इसी प्रकार (अविशेषात्) समान होने से (रस, रूप, स्पर्श,
ज्ञाने) रस, रूप, और स्पर्श के ज्ञान कराने वाले रसना, चक्षु और त्वचा
इन्द्रियों में [क्रम से] (आपः) जलतत्त्व, (तेजः) अग्नितत्त्व (च) और
(वायुः) वायुतत्त्व [उपादान कारण हैं] ॥
जिस प्रकार नासिका इन्द्रिय में पृथिवी उपादान कारण है, इसी प्रकार
रसना इन्द्रिय में जल, चक्षु इन्द्रिय में अग्नि और त्वचा इन्द्रिय में वायु
उपादान कारण हैं ॥ ६ ॥
इस द्वितीय आन्हिक में ज्ञान, ज्ञान का प्रकार; इन्द्रियों के कारण और
"अर्थ" शब्द का अर्थ वर्णन किया गया ॥
इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम्
॥ २ ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते,
वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे ज्ञानाऽध्यायोऽष्टमः
॥ ८ ॥

CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

ओ३म्
अथ नवमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
प्रश्न-ये पृथिवी आदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व सत् थे वा असत् ? उत्तर-
३२९-क्रियागुणव्यपदेशाऽभावात् प्रागसत् ॥ १ ॥
( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुण का व्यवहार न पाया
जाने से ( प्राक् ) उत्पत्ति से पूर्व ( असत् ) अभावरूप थे ॥
यदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान होता तो कोई क्रिया और
कोई गुण उस का पाया जाता, नहीं पाया जाता, इस लिये प्रागभाव
मानना ठीक है ॥ १ ॥
प्रश्न-यदि कार्य पदार्थ उत्पत्ति से पूर्व सत् नहीं था तो कारण की क्रिया
से उत्पन्न कैसे हो सकेगा ? क्योंकि हम देखते हैं कि तिलों में तेल है, इस
लिये उन से उत्पन्न होता है तथा बालू में तेल नहीं है, इस लिये उस से
उत्पन्न नहीं होता ? उत्तर-
३३०-सदसत् ॥ २ ॥
( सत् ) कारणरूप से भाव और ( असत् ) कार्यरूप से अभाव [उत्पत्ति
के पूर्व ] होता है ॥ २ ॥
प्रश्न-यदि प्रत्येक कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारणरूप में वर्त्तमान था तो
उस की उत्पत्ति मानने का क्या लाभ है ? उत्तर-
३३१--असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् ॥ ३ ॥
( असतः ) असत् के ( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुणों का
व्यवहार न पाये जाने से [ सत् पदार्थ ] ( अर्थान्तरम् ) अन्य पदार्थ है ॥
अर्थात् सत् असत् एक नहीं होसक्ते, असत् कार्य विषय में कोई क्रिया
वा कोई गुण नहीं कहा देखा माना जाता और सत्कार्य में क्रिया और गुण

नवमाध्याय १ आन्हिक . १३५
देखे पड़े और माने जाते हैं । इस लिये असत् (उत्पत्ति से पूर्व) की अपेक्षा
सत् = उत्पन्न हुवा कार्य पदार्थ भिन्न है ॥ ३ ॥
३३२-सच्चासत् ॥ ४ ॥
( सत् ) होता हुवा [ भी कार्य पदार्थ ] ( च ) फिर=नाश के पश्चात्
( असत् ) सत् नहीं रहता ॥ ४ ॥
३३३-यच्चाऽन्यदऽसदतस्तदऽसत् ॥ ५ ॥
( च ) और ( यत् ) जो पदार्थ ( अतः ) इस पूर्वोक्त सदसत् उभय-
विध से ( अन्यत् ) विलक्षण=जो तीनों काल में ( असत् ) न होवे, वह
( असत् ) केवल असत् है ॥
अर्थात् जो पदार्थ उत्पन्न होने से पूर्व असत् और उत्पन्न होकर सत्
हैं, वे तो 'सदसत्' कहाते हैं और जो कभी भी सत्तात्मक नहीं, वे असत् हैं॥५॥
३३४-असदिति भूतप्रत्यक्षाऽभावाद्
भूतस्मृतेर्विरोधिप्रत्यक्षवत् ॥६॥
( असत् ) अब नहीं है ( इति ) ऐसा जो ज्ञान है, वह ( भूतप्रत्यक्षा-
ऽभावात् ) हुवे पदार्थ का प्रत्यक्ष न होने से [परन्तु] (भूतस्मृतेः) हुवे पदार्थ
की स्मृति बनी रहने से ( विरोधिप्रत्यक्षवत् ) विरोधिप्रत्यक्ष के समान है ॥
जैसे असत् के विरोधी सत् का प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही जो होकर
फिर न रहे, उस में न रहने पर प्रत्यक्ष न होने पर भी, होते हुये समय
की स्मृति बनी रहने से ज्ञान रहता है ॥ ६ ॥
३३५-तथाऽभावे भावप्रत्यक्षत्वाच्च ॥ ७ ॥
( तथा ) इसी प्रकार ( अभावे ) अभाव=असत् में ( च ) भी ( भाव-
प्रत्यक्षत्वात् ) सत् के प्रत्यक्ष होने से [ ज्ञान होता है ] ॥
अर्थात् मृत्तिका से घट बना, फिर फूट टूट कर मृत्तिका होगया, तब
टूट जाने और अपने कारण में लीन होजाने ( अभाव होजाने ) पर भाव
(मृत्तिका) के प्रत्यक्ष होने से भी पूर्वप्रत्यक्षीकृत घट का ज्ञान होता है ॥७॥
३३६-एतेनाऽघटोऽगौरऽधर्मश्च व्याख्यातः ॥ ८ ॥

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१३६ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद
(एतेन) इस से (अघटः) घट का अभाव = अघट, (अगोः) गौ का
अभाव = अगौ (च) और (अधर्मः) धर्म का विरोधी = अधर्म (व्याख्यातः)
व्याख्यान किया गया ॥ ८ ॥ परिभाषा-
३३७-अभूतं नास्तीत्यनर्थान्तरम् ॥ ६ ॥
(अभूतम्) नहीं हुवा है, (न अस्ति) नहीं है, (इति) ये दोनों
(अनर्थान्तरम्) एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं = एक ही बात हैं ॥
अर्थात् अभूत और नास्ति दोनों एकार्थी हैं ॥ ६ ॥ जैसे-
३३८-नास्ति घटोगेह इति, सतो घटस्य
गेहसंसर्गप्रतिषेधः ॥ १० ॥
(गेहे) घर में (घटः) घट (न अस्ति) नहीं है (इति) इस कथन
में (सतः) होते हुवे (घटस्य) घड़े का (गेहसंसर्गप्रतिषेधः) घर में
संसर्ग न होना अभिप्राय है ॥ १० ॥ यहां तक बाह्येन्द्रियप्रत्यक्ष की परीक्षा
कही, आगे मानसिक प्रत्यक्ष का वर्णन करते हैं:-
३३६-आत्मन्यात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मप्रत्यक्षम् ॥११॥
(आत्मनि) जीवात्मा में (आत्ममनसोः) जीवात्मा और मन के
(संयोगविशेषात्) योग की विधि से विशेष संयोग होने से (आत्मप्रत्य-
क्षम्) आत्मा = अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष होता है ॥ ११ ॥
३४०-तथा द्रव्यान्तरेषु प्रत्यक्षम् ॥ १२ ॥
(तथा) इसी प्रकार (द्रव्यान्तरेषु) अन्य सूक्ष्म प्रकृतिपर्यन्त द्रव्यों में
(प्रत्यक्षम्) प्रत्यक्ष = अपरोक्ष ज्ञान होता है ॥ १२ ॥
प्रश्न-योगी दो प्रकार के हैं-१-जो सदा समाधि लगाये रहें, २-जो
कभी २ समाधि लगावें, इन दोनों में किस को अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष
होता है ? उत्तर-
३४१-असमाहितान्तः करणा उपसंहृतसमाधयस्तेषां च॥१३॥
जो (असमाहितान्तःकरणाः) सदा अन्तःकरण का समाधान नहीं
करते = कभी २ करते हैं (च) और (उपसंहृतसमाधयः) समाधि का उप-
संहार = अन्त कर चुके हैं (तेषाम्) उन को [आत्मा का प्रत्यक्ष होता है] ॥१३॥
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नवमाऽध्याय २ आन्हिक १३७
३४२-तत्समवायात्कर्मगुणेषु ॥ १४ ॥
( तत्समवायात् ) [ जिन सूक्ष्मद्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है ] उन के सम-
वायसम्बन्ध से ( कर्मगुणेषु ) [ उन २ द्रव्यों के ] कर्मों और गुणों में [ भी
प्रत्यक्ष हो जाता है ] ॥ १४ ॥
३४३-आत्मसमवायादात्मगुणेषु ॥ १५ ॥
( आत्मसमवायात् ) जीवात्मा के साथ समवाय सम्बन्ध से ( आत्म
गुणेषु ) आत्मा के [ चेतनत्वादि वा सुखदुःखादि ] गुणों का [ प्रत्यक्ष होजाता है ] ॥
केवल जीवात्मा का यद्यपि सुखदुःखादि से समवाय सम्बन्ध वा नित्य-
सम्बन्ध नहीं है, परन्तु मनसहित आत्मा के लिये यहां आत्मा शब्द का व्यव-
हार समझो, अथवा आत्मा के गुणों में सुखदुःखादि का ग्रहण न करके,
केवल चेतनता का ग्रहण करके बहुवचन को अविवक्षित जानो ॥ १५ ॥
उत्पत्ति से पूर्व कार्य का असत् होना, प्रत्यक्ष होना, और योगियों का
प्रत्यक्ष, इस आन्हिक में वर्णित किया गया ॥
इति नवमाऽध्यायस्य प्रथममान्हिकम् ॥ १ ॥
—:०:*:०:—
अथ द्वितीयमान्हिकम्
प्रत्यक्ष की परीक्षा कह कर अब आगे लैङ्गज्ञान की परीक्षा का आरम्भ
करते हैं:-
३४४-अस्येदं कार्यं, कारणं, संयोगि, विरोधि,
समवायि, चेति लैङ्गिकम् ॥ १ ॥
( अस्य ) इस का ( इदम् ) यह ( कार्यं ) कार्य है, ( कारणम् ) कारण
है, ( संयोगि ) संयोगी है, ( विरोधि ) विरोधी है ( च ) और (समवायि)
सदा साथ मिलारहने वाला है ( इति ) इस को ( लैङ्गिकम् ) लिङ्गोत्पन्न
ज्ञान कहते हैं ॥
अर्थात् कार्य को देखकर कारण का, कारण को देखकर कार्य का, संयोग
को देखकर संयोगी का, विरोध को देखकर विरोधी का और समवाय को
देख कर समवायी का ज्ञान होता है, उस को लैङ्गिक=आनुमानिक ज्ञान
कहते हैं ॥ १ ॥
१८

१३८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
३४५-अस्येदं, कार्यकारणसम्बन्धाऽवयवाद्भवति ॥ २ ॥
( अस्य ) इस लिङ्गी का ( इदम् ) यह लिङ्ग है, ( च ) और ( कार्य-
कारणसम्बन्धः ) कार्यकारणसम्बन्ध है, [ यह ज्ञान ] ( अवयवात् ) उदाह-
रण रूप एक देश से ( भवति ) होता है ॥ २ ॥
३४६-एतेन शाब्दं व्याख्यातम् ॥ ३ ॥
( एतेन ) इस व्याख्यान से ( शाब्दम् ) शाब्दज्ञान भी ( व्याख्यातम् )
व्याख्यात होगया ॥
जिस प्रकार लिङ्गलिङ्गिसम्बन्धज्ञानपूर्वक लिङ्गज्ञानोत्पन्न लैङ्गिक ज्ञान
की व्याख्या की गई है, इसी प्रकार शब्द और उस के अर्थ तथा सम्बन्ध
के ज्ञानपूर्वक-शब्द ज्ञान से उत्पद्यमान=शाब्द ज्ञान का भी व्याख्यान
समझ लेना चाहिये ॥ ३ ॥
३४७-हेतुरपदेशो लिङ्गं प्रमाणं करणमित्यनर्थान्तरम् ॥४॥
( हेतुः ) हेतु, ( अपदेशः ) अपदेश, ( लिङ्गं ) लिङ्ग, ( प्रमाणं ) प्रमाण
और ( करणं ) करण ( इति ) ये ( अनर्थान्तरं ) एकार्थक हैं ॥
हेत्वादि शब्द इस शास्त्र में एकार्थक हैं ॥ ४ ॥
३४८-अस्येदमिति बुद्ध्यपेक्षितत्वात् ॥ ५ ॥
( अस्य ) इस लिङ्गी वा उस कार्य का ( इदं ) यह लिङ्ग वा कारण है,
( इति ) यह बात ( बुद्ध्यपेक्षितत्वात् ) बुद्धि की अपेक्षाकृत होने से [ हेतु
आदि एकार्थक हैं ] ॥ ५ ॥
प्रत्यक्षज्ञान, लिङ्ग=अनुमान से ज्ञान और आप्तोपदिष्ट शब्द से ज्ञान,
यह ३ प्रकार का ज्ञान परीक्ष पूर्वक बताया गया, आगे स्मृतिज्ञान की परीक्षा
करते हैं:-
३४९-आत्ममनसोः संयोगविशेषात् संस्काराच्च स्मृतिः ॥६॥
( आत्ममनसोः ) आत्मा और मन के ( संयोगविशेषात् ) विशेष संयोग
से ( च ) और ( संस्कारात् ) संस्कार से (स्मृतिः) स्मरण=ज्ञान होता है ॥६॥
३५०-तथा स्वप्नः ॥ ७ ॥
( तथा ) इसी प्रकार=आत्मा और मन के संयोग विशेष तथा संस्कार
से ( स्वप्नः ) स्वप्नज्ञान होता है ॥ ७ ॥

नवमाऽध्याय २ आह्निक १३९

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नवमाऽध्याय २ आह्निक १३९


३५१-स्वप्नान्तिकम् ॥ ८ ॥
(स्वप्नान्तिकम्) स्वप्नावस्थाविषयक अन्य स्वप्नदृष्ट पदार्थों का ज्ञान
[भी आत्मा और मन के विशेष संयोग और संस्कार से होता है] ॥ ८ ॥
प्रश्न - स्मृतिज्ञान और स्वप्नज्ञान में भेद पाया जाता है, और कारण
दोनों का एक है, अर्थात् आत्मा और मन के संयोग विशेष से तथा संस्कार
वश स्मृति होती है, और इन्हीं कारणों से स्वप्न होता है, तब स्मृति और
स्वप्न भी दो क्यों हैं, एक ही क्यों नहीं ? उत्तर-
३५२-धर्माच्च ॥ ९ ॥
(धर्मात्) धर्म से (च) भी [स्वप्नज्ञान होता है] ॥
धर्म शब्द से शारीरक धातु विकारादि विवक्षित हैं। कामी पुरुष सोता
है, तब स्वप्न में भी संस्कारवश वैसा देखता है, परन्तु बहुत से ऐसे स्वप्न भी
दीखते हैं कि जिन का तात्कालिक संस्कार नहीं होता। जैसे अपना आकाश
में उड़ना, अग्नि में प्रवेश करना, सुवर्ण, पर्वत, उदय होते सूर्य का दीखना,
नदी समुद्र तड़ागादिका तिरना, इत्यादि प्रकार के स्वप्न शरीर के धर्म =
वातपित्तकफादि दोषों के प्राबल्य दौर्बल्य से होते हैं। इस लिये स्मृतिज्ञान
के कारणों से स्वप्नज्ञान के कारण अन्य भी हैं, यही कारण है कि स्मृति
तथा स्वप्न एक नहीं हो सक्ते ॥ ९ ॥
स्मृति की परीक्षा हो चुकी, अब अविद्या की परीक्षा करते हैं:-
३५३-इन्द्रियदोषात्संस्कारदोषाच्चाऽविद्या ॥ १० ॥
(इन्द्रियदोषात्) आंख कान आदि इन्द्रियों में कोई दोष होने से
(च) और (संस्कारदोषात्) संस्काररूप दोष से [और धर्म अधर्म आदि
से] (अविद्या) विपरीत ज्ञान होता है ॥ १० ॥
३५४-तद् दुष्टज्ञानम् ॥ ११ ॥
(तत्) वह = अविद्या (दुष्टज्ञानम्) दोषयुक्त ज्ञान है ॥ ११ ॥
३५५-अदुष्टं विद्या ॥ १२ ॥
(अदुष्टम्) निर्दोष ज्ञान (विद्या) विद्या कहाती है ॥ १२ ॥
३५६-आर्षं सिद्धदर्शनं च धर्मेभ्यः ॥ १३ ॥

१४० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(आर्षं) ऋषिकृत उपदेश (च) और-(सिद्धदर्शनं) वेदसिद्धपदार्थों का
दर्शन (धर्मेभ्यः) पूर्वकृत पुण्य कर्मों से होता है ॥ १३ ॥
इति नवमोऽध्यायस्य
द्वितीयमाह्निकम्
इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते
वैशेषिक दर्शन भाषानुवादे
नवमो ज्ञानविशेषाध्यायः
॥ ९ ॥

ॐ
अथ दशमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
३५७-इष्टानिष्टकारणविशेषाद्विरोधाच्च मिथः
सुखदुःखयोरर्थान्तरभावः ॥ १ ॥
(इष्टानिष्टकारणविशेषात्) इष्ट और अनिष्ट विशेष कारण से (च) और
(मिथः) एक दूसरे में (विरोधात्) विरोध से [सिद्ध है कि] (सुखदुःखयोः)
सुख और दुःख में (अर्थान्तरभावः) एक दूसरे से भिन्नता है ॥ १ ॥
३५८-संशयनिर्णयान्तराभावश्च ज्ञानान्तरत्वे हेतुः ॥ २ ॥
(च) और (संशयनिर्णयान्तराऽभावः) संशय और निर्णय के बीच में
कोई अन्य प्रत्यय नहीं है, [सुख वा दुःख जिस में समझे जावें] यही (ज्ञाना-
न्तरत्वे) सुख दुःख के भिन्न ज्ञान होने में (हेतुः) कारण है ॥ २ ॥
३५९-तयोर्निष्पत्तिः प्रत्यक्षलैङ्गिकाभ्याम् ॥ ३ ॥
(तयोः) उन सुख दुःखों की (निष्पत्तिः) उत्पत्ति (प्रत्यक्षलैङ्गिकाभ्याम्)
प्रत्यक्ष और अनुमान से होती है ॥
जिस प्रकार इन्द्रियार्थसंनिकर्ष से और लिङ्ग से प्रत्यक्ष और अनुमान
ज्ञान उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार मन चाहे विषय के सामीप्य से वा मन
चाहे विषय की प्राप्ति की आशा दिलाने वाले चिन्हों से सुख दुःख उत्पन्न
होते हैं ॥ ३ ॥
३६०-अभूदित्यपि ॥ ४ ॥
(अभूत्) भूतकाल में हुआ था (इति) इस से (अपि) और भविष्यत्
में होगा, इस से भी [सुख और दुःख की उत्पत्ति होती है] ॥
पूर्वानुभूत सुखसाधनों से सुख और दुःखसाधनों से दुःख होता है और
होने वाले भविष्यद्वृत्तियों से भी उस की आशा से होता है ॥ ४ ॥
३६१-सति च कार्यादर्शनात् ॥ ५ ॥