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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 160 में से

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जैसे रूप, रस, गन्ध आदि शब्दों से रूप रस आदि गुणों का ग्रहण किया जाता
है। इस कारण शब्द और अर्थ में भी संयोग सम्बन्ध नहीं है ॥१५॥ क्योंकि-
३००-निष्क्रियत्वात् ॥ १६ ॥
(निष्क्रियत्वात्) क्रियारहित होने से [शब्द का अर्थ के साथ संयोग
संबन्ध नहीं है, क्योंकि संयोग तो क्रिया से उत्पन्न होता है] ॥ १६ ॥ और-
३०१-असति नास्तीति च प्रयोगात् ॥ १७ ॥
(असति) असत् पदार्थ में (च) भी (न अस्ति) "नहीं है" (इति)
ऐसा (प्रयोगात्) प्रयोग होने से ॥
जो पदार्थ अब नहीं है परन्तु आगे होगा, उस वर्त्तमान में असत् और
भविष्यत् में होने वाले पदार्थ का बोध भी शब्द से किया जाता है। यदि शब्द
का अर्थ के साथ संयोग सम्बन्ध होता तो भविष्यत् में होने वाले पदार्थ का
वर्त्तमान शब्द से बोध न होता क्योंकि दोनों भिन्नकालीन हैं। जैसे जो
घड़ा कल बनाया जायगा और आज वह घड़ा नहीं है तो भी कल को बनने
वाले घड़े का बोध आज के उच्चारण किये हुए घट शब्द से होता है। कल
को होने वाले घट द्रव्य का बोध न होता, यदि शब्द और अर्थ में संयोग
सम्बन्ध होता ॥ १७ ॥ इस से सिद्ध हुवा कि-
३०२-शब्दार्थावसम्बन्धौ ॥ १८ ॥
(शब्दार्थौ) शब्द और अर्थ (असम्बन्धौ) परस्पर संयोग सम्बन्ध-
रहित हैं ॥ १८ ॥
यदि कहो कि शब्द और अर्थ में संयोग सम्बन्ध न सही किन्तु समवाय
सम्बन्ध तो मान सकते हैं ? तो उत्तर-
३०३-संयोगिनोदण्डात्, समवायिनोविशेषाच्च ॥ १९ ॥
(संयोगिनः) संयोगी पुरुष का (दण्डात्) दण्ड से (च) और (सम-
वायिनः) समवाय सम्बन्ध वाले का (विशेषात्) विशेष अवयव से [जैसे
ग्रहण होता है वैसे अर्थ का ग्रहण शब्द से नहीं होता] ॥
यदि अर्थ के साथ शब्द का संयोगसम्बन्ध अथवा समवायसम्बन्ध होता
तो अर्थ के साथ शब्द भी प्रतीत हुवा करता। परन्तु ऐसा नहीं होता। इस
से जाना जाता है कि शब्द का अर्थ के साथ सम्बन्ध नहीं है। जैसे हाथी