वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 160 में से
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१३६ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद
(एतेन) इस से (अघटः) घट का अभाव = अघट, (अगोः) गौ का
अभाव = अगौ (च) और (अधर्मः) धर्म का विरोधी = अधर्म (व्याख्यातः)
व्याख्यान किया गया ॥ ८ ॥ परिभाषा-
३३७-अभूतं नास्तीत्यनर्थान्तरम् ॥ ६ ॥
(अभूतम्) नहीं हुवा है, (न अस्ति) नहीं है, (इति) ये दोनों
(अनर्थान्तरम्) एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं = एक ही बात हैं ॥
अर्थात् अभूत और नास्ति दोनों एकार्थी हैं ॥ ६ ॥ जैसे-
३३८-नास्ति घटोगेह इति, सतो घटस्य
गेहसंसर्गप्रतिषेधः ॥ १० ॥
(गेहे) घर में (घटः) घट (न अस्ति) नहीं है (इति) इस कथन
में (सतः) होते हुवे (घटस्य) घड़े का (गेहसंसर्गप्रतिषेधः) घर में
संसर्ग न होना अभिप्राय है ॥ १० ॥ यहां तक बाह्येन्द्रियप्रत्यक्ष की परीक्षा
कही, आगे मानसिक प्रत्यक्ष का वर्णन करते हैं:-
३३६-आत्मन्यात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मप्रत्यक्षम् ॥११॥
(आत्मनि) जीवात्मा में (आत्ममनसोः) जीवात्मा और मन के
(संयोगविशेषात्) योग की विधि से विशेष संयोग होने से (आत्मप्रत्य-
क्षम्) आत्मा = अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष होता है ॥ ११ ॥
३४०-तथा द्रव्यान्तरेषु प्रत्यक्षम् ॥ १२ ॥
(तथा) इसी प्रकार (द्रव्यान्तरेषु) अन्य सूक्ष्म प्रकृतिपर्यन्त द्रव्यों में
(प्रत्यक्षम्) प्रत्यक्ष = अपरोक्ष ज्ञान होता है ॥ १२ ॥
प्रश्न-योगी दो प्रकार के हैं-१-जो सदा समाधि लगाये रहें, २-जो
कभी २ समाधि लगावें, इन दोनों में किस को अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष
होता है ? उत्तर-
३४१-असमाहितान्तः करणा उपसंहृतसमाधयस्तेषां च॥१३॥
जो (असमाहितान्तःकरणाः) सदा अन्तःकरण का समाधान नहीं
करते = कभी २ करते हैं (च) और (उपसंहृतसमाधयः) समाधि का उप-
संहार = अन्त कर चुके हैं (तेषाम्) उन को [आत्मा का प्रत्यक्ष होता है] ॥१३॥
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