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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 160 में से

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पृष्ठ 138

ओ३म्
अथ नवमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
प्रश्न-ये पृथिवी आदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व सत् थे वा असत् ? उत्तर-
३२९-क्रियागुणव्यपदेशाऽभावात् प्रागसत् ॥ १ ॥
( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुण का व्यवहार न पाया
जाने से ( प्राक् ) उत्पत्ति से पूर्व ( असत् ) अभावरूप थे ॥
यदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान होता तो कोई क्रिया और
कोई गुण उस का पाया जाता, नहीं पाया जाता, इस लिये प्रागभाव
मानना ठीक है ॥ १ ॥
प्रश्न-यदि कार्य पदार्थ उत्पत्ति से पूर्व सत् नहीं था तो कारण की क्रिया
से उत्पन्न कैसे हो सकेगा ? क्योंकि हम देखते हैं कि तिलों में तेल है, इस
लिये उन से उत्पन्न होता है तथा बालू में तेल नहीं है, इस लिये उस से
उत्पन्न नहीं होता ? उत्तर-
३३०-सदसत् ॥ २ ॥
( सत् ) कारणरूप से भाव और ( असत् ) कार्यरूप से अभाव [उत्पत्ति
के पूर्व ] होता है ॥ २ ॥
प्रश्न-यदि प्रत्येक कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारणरूप में वर्त्तमान था तो
उस की उत्पत्ति मानने का क्या लाभ है ? उत्तर-
३३१--असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् ॥ ३ ॥
( असतः ) असत् के ( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुणों का
व्यवहार न पाये जाने से [ सत् पदार्थ ] ( अर्थान्तरम् ) अन्य पदार्थ है ॥
अर्थात् सत् असत् एक नहीं होसक्ते, असत् कार्य विषय में कोई क्रिया
वा कोई गुण नहीं कहा देखा माना जाता और सत्कार्य में क्रिया और गुण